गुरुवार, 11 मार्च 2021

सबसे बड़ा रुपैया !

 

सत्ता का अपना चरित्र है, तो पैसे वालों का भी अपना चरित्र है। फिर नामधारियों का चरित्र भी अपनी तरह का है? ये तीनों प्रजाति कितने भी गरीबी से उठे हो सबकुछ छिन्न भिन्न हो जाता है।

जिस भ्रष्टाचार, अपराध, कालाधन बेरोजगारी और महंगाई को लेकर सत्ता में जब मोदी सरकार आई तब देश को नई उम्मीद जगी थी! लेकिन पिछले 6 सालों में क्या हुआ? इसका जवाब किसी के पास नहीं है क्योंकि मोदी को लेकर भले ही कोई उम्मीद न हो लेकिन विपक्ष के प्रति नाउम्मीद कायम है!

तो क्या भारतीय समाज ने भ्रष्टाचार, अपराध, महंगाई और बेरोजगारी को अपनी नियति मान चुका है या उन्होंने यह स्वीकार कर लिया है कि सत्ता किसी की भी हो यह सब तो चलता ही रहता है? तब इसका अभिप्राय क्या समझा जाए!

पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, इन राज्यों में सत्ता किसकी होगी यह तो 2 मई को ही पता चलेगा लेकिन सबसे दिलचस्प चुनाव बंगाल में हो रहा है, प्रधानमंत्री बंगाल में लगभग दो दर्जन रैली करेंगे? दिलचस्प इसलिए है क्योंकि उनकी भाषण शैली में अब भी जोश बाकी है, बढ़ती बेरोजगारी, बढ़ती महंगाई, बिकते सार्वजनिक उपक्रम, भाजपा में अपराध से जुड़े लोगों को शामिल करने और धनबल के तमाम प्रदर्शन के बाद भी कोई हुंकार भर सकता है तो यह काम प्रधानमंत्री मोदी ही कर सकते है।

ऐसे में जिन लोगों को मिथुन चक्रवर्ती के भाजपा प्रवेश से हैरानी हो रही है उन्हें शायद पता नहीं है कि मिथुन चक्रवर्ती के बेटे पर एक महिला ने बलात्कार का आरोप लगाया था? ब्रिगेडियर परेड ग्राउण्ड में जिस परिवर्तन रैली की बात प्रधानमंत्री ने की वह परिवर्तन तो पूरे देश की जरुरत है लेकिन चुनाव तो बंगाल में हो रहे है ऐसे में नक्सली से लेकर कई तरह के आरोप के बाद भी मिथुन चक्रवर्ती भाजपा को इसलिए प्रिय है क्योंकि मिथुन चक्रवर्ती भाजपा को वोट दिला सकते हैं और जब वोट दिला सकते हैं। और जब वोट हासिल करना ही असली मकसद हो तब न प्रधानमंत्री मोदी की नैतिकता को देखनी चाहिए और न ही मिथुन चक्रवर्ती की ही नैतिकता या नास्तिकता वाली बात पर ध्यान देना चाहिए?

सवाल सिर्फ इन पांच राज्यों के चुनाव का नहीं है, और न ही सवाल इसके परिणाम का ही है? सवाल तो आम लोगों का है जिसका वर्तमान दौर में कोई मतलब ही नहीं रह गया है? आप आंकड़े गिनाते रहिए कि मोदी सरकार के दौर में इस देश में बेरोजगारी दर 40 फीसदी से उपर हो गया, महंगाई भी चरम पर है और आर्थिक हालत इतने खस्ते हो चले हैं कि न केवल सार्वजनिक उपक्रम बेचे जा रहे हैं बल्कि रिजर्व बैंक ने रिजर्व फंड भी खर्च किये जा रहे है, ईडी, सीबीआई या आयकर का इस्तेमाल लोगों को चुप कराने या पार्टी में लाने किया जा रहा है, धनबल से सत्ता को खरीदा जा रहा है? आम लोगों को इन बातों से क्या लेना देना है क्योंकि सत्ता की ताकत के खिलाफ आम आदमी कैसे लड़े वह तो अपने परिवार के पालन पोषण में ही उलझा हुआ है और जिसे लडऩा है वे या तो देशद्रोह कहलाने के डर से चुप हैं या पैसों से खरीदे जा चुके है!

बुधवार, 10 मार्च 2021

कांग्रेस और ठेकेदार !

 

छत्तीसगढ़ के कांग्रेस में क्या सचमुच सब ठीक चल रहा है? यह सवाल अब खुलकर सामने है कि मुख्यमंत्री की योजना को उनके ही मंत्री और पार्टी संगठन के लोग ही पलीता लगाने में लगे हैं और कांग्रेस के वे लोग अब किनारे होने लगे हैं या किनारे किये जा रहे हैं जिन्होंने कांग्रेस को सत्ता में लाने न केवल संघर्ष किया बल्कि जेल भी गये।

छत्तीसगढ़ के आधा दर्जन मंत्रियों की भूमिका को लेकर कांग्रेस के भीतर ही सवाल उठाये जा रहे हैं जिसमें प्रमुख नाम संसदीय कार्यमंत्री रविन्द्र चौबे का है। रविन्द्र चौबे शुरु से ही अपनी कार्यशैली को लेकर विवाद में रहे हैं और मीठलबरा के नाम से चर्चित भी है।

ताजा मामला उनके विभाग में जिसके चलते भाजपाई ठेकेदारों को फायदा हुआ और दो-पांच प्रतिशत कमीशन देकर अपने खेल को जारी रखने लगे। जिसका परिणाम यह है कि वे ही लोग फिर मलाई खाने लगे जो पिछले पंद्रह साल से मलाई खा रहे थे। ऐसे में मंत्रियों के बंगले में उन्हीं ठेकेदारों की चल रही है जो पहले भी अपना चलाते थे। मनमाना कमीशन दो और भ्रष्टाचार करते रहो चूंकि अफसर वहीं है और पंद्रह साल की भरपाई मंत्रियों को करनी है तो मामला फिट है। छत्तीगढ़ के कई मंत्रियों पर भाजपाई ठेकेदारों को संरक्षण देने का आरोप लगने लगा है और इनमें से एक मंत्री रविन्द्र चौबे के खिलाफ तो शिकायत करने की भी तैयारी हो चुकी है। रविन्द्र चौबे के जल संसाधन और कृषि जैसे महत्वपूर्ण विभाग के बारे में कहा जाता है कि यह इन दिनों कमाई का बड़ा जरिया बन चुका है और इन विभागों में भाजपा से जुड़े ठेकेदारों की मनमानी से कांग्रेस के लिए मुसिबत खड़ी हो सकती है। इस विभाग में चल रहे कमीशनखोरी की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मंत्री के रुख से नाराज आधा दर्जन कांग्रेसियों ने प्रदेश प्रभारी पीएल पुनिया और राहुल गांधी से मय सबूत शिकायत करने की तैयारी कर चुके हैं।

शिकायतकर्ताओं ने जिस तरह से तीन चार ठेकेदारों की रविन्द्र चौबे, भाजपा के एक पूर्व मंत्री सहित भाजपा के कार्यक्रमों में शिरकत करने की जो तस्वीरें जुटाई है वह आने वाले दिनों में बवाल खड़ा कर सकता है। शिकायतकर्ता का कहना है कि एक तरफ कांग्रेस के लोग पूरे देश में भाजपा के खिलाफ चुनौतीपूर्ण लड़ाई लड़ रहे हैं और दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में भाजपा से जुड़े लोगों को खाद-पानी दिया जा रहा है उसे बर्दाश्त नहीं किया  जायेगा।

हालांकि कई कांग्रेसियों का तो यहां तक कहना है कि यदि सत्ता आने के बाद भी कांग्रेस से जुड़े लोगों की उपेक्षा हो रही है तो हाईकमान को खबर होनी ही चाहिए।

मंगलवार, 9 मार्च 2021

घोर दरिद्रता...


 

अपने को विश्व का सबसे बड़ी पार्टी मानने घोर दरिद्रता से जूझ रही है! इतिहास की इस बेरुखी ने उन्हें इस कदर दरिद्र कर दिया है कि वे दूसरे दलों के नेताओं के पीछे छुप कर अपने इतिहास को छुपाने की कोशिश में लगी है।

यह बात हम पहले भी लिख चुके है कि माफी मांगने वाले वीर सावरकर, गोडसे, दीनदयाल उपाध्याय और श्यामा प्रसाद मुखर्जी के इस पार्टी के सामने यह संकट सदैव रहेगा कि आजादी की लड़ाई में उनके तरफ से किसी योद्धा का इतिहास में वह नाम नहीं है जिस पर गौरव करके वोट हासिल किया जा सके। यही वजह है कि पांच राज्यों के चुनाव में  उन्हें फिर से एक बार उन महान नेताओं के पीछे छुपना पड़ रहा है जिन्होंने कभी भी संघ के समर्थन में एक शब्द नहीं कहे बल्कि विरोध में खड़े रहे!

हालांकि जंग और चुनाव में सब जायज है बावजूद इसे मानसिक दिवालियेपन की नजर से देखने के बजावय इतिहास को फिर से समझने की जरूरत है। बंगाल चुनाव में भारतीय जनता पार्टी सुभाष बाबू, रविन्द्र नाथ टैगोर, बकिमचंद्र चटर्जी या अरविन्दो का सहारा ले रही है जबकि उसके अपने नायक श्यामा प्रसाद मुखर्जी इसी बंगाल से है लेकिन उन पर मुस्लिम लीग से मिलकर कांग्रेस के खिलाफ सरकार बनाने, गठजोड़ करने का ही इतिहास नहीं है बल्कि भारत छोड़ो आंदोलन के खिलाफ आवाज बुलंद करने का भी आरोप है। इसलिए उन्हें वे किनारे कर सुभाष बाबू के पीछे खड़े हैं। ये अलग बात है कि सुभाष बाबू की मौत पर राजनीति करने वाले और कांग्रेस पर आरोप लगाने वाले 6 साल की सत्ता में किसी रहस्य को नहीं खोज पाये लेकिन यह सवाल कौन पूछे?

इससे भी भयावह राजनीति तो तमिलनाडु के चुनाव में चल रही है। तमिलनाडु की राजनीति के महान सपूत कामराज को कौन नहीं जानता, 15 साल की उम्र में आजादी की लड़ाई और कांग्रेस के इस महान नेता को लोग  आज भी याद करते है। मिड डे मिल और फ्री स्कूली शिक्षा के जानक के रुप में जाने जाने वाले कामराज ने लाल बहादुर शाी और इंदिरा गांधी की सत्ता के सबसे दमदार चेहरे रहे हैं।

ऐसे नेता कामराज के फोटो और कटआउट के साथ तमिलनाडु चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कट आउट का अर्थ क्या है जबकि वे जीवन पर्यन्त संघ का विरोध करते रहे हैं। क्या राजनीति का स्तर और भी गिरने वाला है। बेशर्मी क्या और बढ़ाने वाली है। आप इन सवालों को नजरअंदाज भले ही कर दें लेकिन सवाल उनके भीतर की आदमियत को समाप्त तो कर ही दिया है जो सत्ता मोह में बेशर्मी के हद तक गिर रहे हैं।

सोमवार, 8 मार्च 2021

समय लिखेगा अपराध...



एक तरफ फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट को अमेरिका के विदेश सचिव ने स्वीकार करते हुए दरियादिली दिखाई है और कहा है कि हाल के सालों में जो कुछ हुआ उसमें अमेरिका सरकार सुधार लायेगी तो दूसरी तरफ भारत सरकार ने इस रिपोर्ट को भ्रामक, गलत और अनुचित कहा है?

ेऐसे में भारत के हर नागरिक को फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट पढऩी चाहिए और फ्रीडम हाउस द्वारा आंशिक रुप से स्वतंत्र कहने वाले मुद्दों के अलावा दूसरी बातों को भी गौर करना होगा? एक तरफ हम 21वी सदी में भारत की तरक्की और अच्छे दिन आयेंगे के सपने में जी रहे हैं तो दूसरी तरफ नागरिक स्वतंत्रता का क्या हाल है यह किसी से छिपा नहीं है।

जिस देश में आज भी लिंग भेद, जाति और धर्म के नाम पर न केवल विभाजन रेखाएं खींची जाती है बल्कि कानूनन भेदभाव होता है, वहां आजादी का मतलब आसानी से समझा जा सकता है। सत्ता और राजनैतिक दलों की मनमानी, उनके झूठे वादों पर कानून की भूमिका पर कितने ही सवाल उठते रहे हैं। माफिया, आतंक की परिभाषाएं तक सुविधानुसार बदलती रही है।

हमने पहले ही कहा है कि इस देश में चुनाव करा लेना और कुछ भी बोल देना को ही लोकतंत्र मान लिया गया है, जबकि लोकतंत्र का मतलब नागरिक अधिकार से जुड़ा हुआ है, लेकिन नागरिक अधिकार का कोई मतलब ही नहीं रह गया है। बोलने की आजादी के नाम पर सत्ता के साये में कुछ भी बोले जाने की छूट है लेकिन सत्ता विरोधी स्वर को देशद्रोही मान लिया जाता है।

कोरोना काल में तब्लीकी जमात पर कोरोना फैलाने का आरोप लगाकर क्या एक धर्म विशेष पर निशाना साधने की कोशिश नहीं हुई, किसान आंदोलन के दौरान भी खालीस्तानी और आतंकवादी बताकर क्या धर्म विशेष पर निशाना नहीं साधा गया। इस आंदोलन के दौरान नमाज पढऩे मुस्लिमों का वीडियो जारी कर क्या बताने की कोशिश हुई।

दिल्ली के सड़कों के नामकरण को लेकर की जा रही टिप्पणी किसे निशाना बनाने किया जाता है? ऐसे कितने ही सवालों को आप छोड़ दे तो थानों में रिपोर्ट लिखने की स्थिति, अदालतों में तारीख पर तारीख क्या लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता की आदर्श स्थिति है। आम कहावत है आप कितने भी सच्चे और ईमानदार रहे एक बार ताकतवर के चंगुल में फंस गये तो न्याय धरा का धरा रह जायेगा। ताकतवर तारीख लेता रहेगा और ईमानदार थक कर स्वयं से हार जायेगा?

हम यहां फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट को जस्टिफाई नहीं कर रहे हैं बल्कि हमारा कहना है कि न्याय यदि विलंब से मिले तो उस न्याय का कोई अर्थ नहीं रह जाता। विरोध के स्वर को देशद्रोह कहकर हम क्या अपने ही नागरिकों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार नहीं कर रहे है। हाल के वर्षों में तुष्टीकरण और धर्मनिरपेक्ष शब्दावली पर प्रहार करके किसे निशाने पर लिया जाता है।

प्रवीण तोगडिय़ा, हरेन पंड्या और आडवानी को किनारे करने की राजनीतिक मजबूरी को सब जायज करार देने वाले ये भूल जाते हैं कि पड़ोसी के घर में आग लग जाये तो चुप बैठने का अर्थ स्वयं के घर को भी आग में झोंक देना है। जेएनयू आंदोलन हो सीएए आंदोलन, नोटबंदी के खिलाफ आंदोलन हो, या किसान आंदोलन हर उस विरोध के स्वर को देशद्रोह का रुप दिया गया, रोहित वेमुला से लेकर कितने दलित आज भी दबंगों के आगे न्याय मांगने मर जाते हैं!

ऐसे में फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट को सिरे से नकारने का क्या मतलब है? जब सत्ता के इशारे पर इडी, आयकर सीबीआई के छापे पड़ते हो और धर्म और जाति के आधार पर हमले होते हो!

रविवार, 7 मार्च 2021

किसानों के सौ दिन...

 

किसानों के आंदोलन को सौ दिन पूरे हो गये है लेकिन सरकार को इससे कोई मतलब भी है यह दिखाई नहीं देता? इसका मतलब क्या है? क्या मोदी सत्ता ने यह तय कर लिया है कि उसे चुनाव जीतने आता है और वह ऐसे किसी भी आंदोलन की परवाह नहीं करेगी? इसका मतलब साफ है कि किसानों का आंदोलन अभी और लंबा चलने वाला है। वैसे भी केन्द्र की पूरी सत्ता इन दिनों पांच राज्यों में होने वाली चुनाव में व्यस्त है तब किसानो के आंदोलन का क्या होगा?

सवाल यह भी है कि यदि मोदी सत्ता 2 मई को आने वाले चुनाव परिणाम में जीत जाती है, तब किसान क्या आंदोलन समाप्त कर देंगे? ऐसा भी नहीं है तब आने वाले दिनों में किसान आंदोलन का रुख क्या होगा? क्या किसान अब पांच राज्यों में जाकर भाजपा के खिलाफ माहौल बनायेंगे? अडानी-अंबानी के बहिष्कार को और गति देंगे या इसके बाद खुद चुनाव लड़ेंगे। यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि किसान आंदोलन अब गांव-गांव तक पहुंचने लगा है।  यहां तक कि गांवों में भाजपा के सांसद विधायक और दूसरे नेताओं को किसानों के बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में आंदोलन को लेकर जो परिस्थितियां बन रही है वह देश को किस दिशा में ले जायेगी कहना कठिन है।

मोदी सत्ता ने साफ कर दिया है कि न वे तीनों कानून को वापस लेंगे और न ही एमएसपी को कानूनी दर्जा ही देंगे। इसके बाद भी यदि किसान आंदोलन कर रहे हैं और आंदोलन को गांव-गांव तक पहुंचा रहे है तो फिर सवाल यही है कि आने वाले दिनों में यह आंदोलन का स्वरुप क्या होगा?

हमने पहले ही कह दिया है कि जिस तरह से किसानों ने पंजाब, हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश में भाजपा से जुड़े नेताओं का बहिष्कार कर रहे हैं वैसा बहिष्कार यदि दूसरे राज्यों में होने लगे तब क्या होगा? क्या तब भी सरकार अपने कार्पोरेट मित्रों के भरोसे चुनाव जीत जायेगी।

कहना कठिन है क्योंकि किसानों की रणनीति को लेकर साफ है कि आगे वे कार्पोरेट घरानों का ही नहीं सत्ताधारी दल के नेताओं का भी बहिष्कार की रणनीति को विस्तार देने में लगे हैं। तब क्या भाजपा पांचों राज्यों में चुनाव हार जायेगी। क्योंकि चुनाव होने वाले राज्यों में भी तो बड़ी संख्या में किसान है?

सवाल कई है लेकिन एक बात तो तय है कि किसान आंदोलन लंबा ही नहीं चलेगा बल्कि वह भविष्य की राजनीति की दिशा भी तय करेगा और इतिहास में भी दर्ज होगा!

शुक्रवार, 5 मार्च 2021

हिटलर की राह...

 

क्या भारत में लोकतंत्र खतरे में है? क्या देश के प्रधानमंत्री की राह हिटलरी हो चली है? क्या असहमति के स्वर को दबाने सरकारी तंत्र का दुरुपयोग किया जा रहा है? ये ऐसे सवाल है जिसे फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट से बल मिलता है।

दुनिया में लोकतंत्र को लेकर अपनी रिपोर्ट में फ्रीडम हाउस ने जिस तरह से अमेरिका और भारत सहित दुनिया के कई देशों में लोकतंत्र में गिरावट बताया है उसके बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि भारत आखिर किस दिशा में जा रहा है। हालांकि इस रिपोर्ट पर अमेरिका के विदेश सचिव ने सहमति जताई है लेकिन भारत भर में इस रिपोर्ट से सन्नाटा छाया हुआ है। यही कोई वाहवाही की रिपोर्ट होती तो अब तक भक्त, वाट्सअप यूनिर्वसिटी और आईटी सेल तारीफों के कसीदे गढ़ते रहते लेकिन रिपोर्ट मोदी सत्ता की करतूतों पर सवाल उठा रहा है तो सन्नाटा है।

सन्नाटे और चुप्पी में वे लोग भी हैं जो कल तक किसान आंदोलन के समर्थन में खड़े थे, फिल्मी हस्तियां, कलाकार, साहित्यकारों की इस रिपोर्ट पर चुप्पी ने ही साबित कर दिया है कि सत्ता का भय किस कदर हावी है। रिपोर्ट की एक-एक बातें न केवल महत्वपूर्ण है बल्कि यह बताती है कि वर्तमान सत्ता ने लोकतांत्रिक मूल्यों को किस तरह तोड़ा है।

ऐसे में नागरिकता कानून से लेकर जेएनयू और वर्तमान में चल रहे किसान आंदोलन को लेकर सरकार भूमिका को स्पष्ट करती है। सीबीआई, ईडी और आयकर की कार्रवाई को लेकर विपक्ष पहले ही आरोप लगाते रही है कि ये सब विरोध के स्वर को दबाने मोदी सत्ता का औजार है। अनुराग और तापसी के यहां मारे गये आयकर छापे भी इसी ओर चुगली करते हैं।

भारत की आंशिक आजादी को लेकर फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट को लेकर इतिहास को पलटने की जरूरत है कि आजादी की लड़ाई में कौन खड़ा था, कैसे मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने झूठ और अफवाह का सहारा लिया गया ?

ऐसी कितनी ही रिपोर्ट फाइलों में बंद है जो साफ कहता है कि दंगा होता नहीं करवाया जाता है, गढ़ा जाता  है? ऐसे कितने ही सवाल उठाये गये जो गैर जरूरी थे, जिसमें सिवाय नफरत के अलावा कुछ नहीं था।

ऐसे में आज तक फ्रीडम हाउस ने भारत के लोकतंत्र में आई गिरावट को लेकर जब रिपोर्ट प्रकाशित की है तब आम आदमी को सोचना होगा कि आखिर इस देश में किसकी जरूरत है।

क्या नेताजी सुभाष बाबू की वकालत सिर्फ इसलिए की जाती रही ताकि बीस साल तक तानाशाही शासन की मंशा के समर्थक है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि चालीस और पचास के दशक में बहुत से देश आजाद हुए जिनमें से अधिकांश देशों में राजशाही या तानाशाही सत्ता का उदय हुआ। भारत में भी कई राजा  इसके समर्थक थे लेकिन गांधी-नेहरु की सोच ने इस देश में लोकतंत्र की नींव रखी। 

ऐसे में सवाल यही है कि गांधी-नेहरु का विरोध करते-करते हम इतने अलोकतांत्रिक हो चले है कि इस देश में ही लोकतंत्र खतरे में आ रहा है।

गुरुवार, 4 मार्च 2021

गलतियों का पुलिंदा...

 

राहुल गांधी जब कहते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाया गया आपातकाल एक गलती थई तो इसके मायने साफ है कि राहुल में गलत को गलत कहने का साहस है वे जानते है कि यह देश झूठ और नफरत से तरक्की नहीं कर सकता और न ही जनता को ज्यादा दिनों तक मूर्ख ही बनाया जा सकता। सत्ता में बने रहने के लिए कोई झूठ, अफवाह और भ्रम का सहारा तो ले सकता है लेकिन इससे देश का भला नहीं होने वाला।

लेकिन सवाल अब भी गलती स्वीकार करने की है तो गुजरात की गलती को गिनना शुरु कर दीजिए जिसे वे कभी स्वीकार नहीं करेंगे और न ही नोटबंदी, जीएसटी का गलत इम्पीयरेंशन को ही गलत मानेंगे वे तो बिना बुलाये अमेरिका जाने और पाकिस्तान जाकर बिरयानी खाने को भी गलत नहीं मानेंगे और तो और बढ़ती महंगाई-बेरोजगारी को ही गलत कहा जायेगा। विरोध के स्वर को देशद्रोही और जेएनयू के सच को भी वे गलत नहीं मानेंगे, आज इनकी गलती गिनते जाईये, आप इनके झूठ भी गिन सकते है जो ये कभी स्वीकार करने की साहस नहीं कर पायेंगे?

तब सवाल यही उठता है कि लोकतंत्र में क्या चुनाव जीतने ही महत्वपूर्ण हो चला है, जनसरोकार का कोई मतलब ही नहीं  रह गया, सुविधानुसार एनआरसी का खेल खेलो और जन सरोकार से टेक्स तब तक वसूलते रहो जब तक वह दम न तोड़ दे।

संवैधानिक संस्थानों के बजट को लेकर भी सवाल उठने लगे है तो सीबीआई, सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग के बजट में पिछले 6 सालों में लगभग दो गुणा बढ़ोत्तरी क्या दर्शाती है। क्या संस्थागत ढांचों को अपने अनुरूप करने की मंशा क्या नहीं दिखती, सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ट जज गोगोई की राज्यसभा में नियुक्ति क्या गलत होने की चुगली नहीं करती?

ऐसे कितने ही सवाल है जो गलत फैसलों की ओर साफ इशारा करती है। किसानों को आतंकवादी और किसान आंदोलन को देशद्रोही बता देना क्या गलत नहीं है?

लेकिन इन गलतियों को स्वीकार करने का साहस किसमें है। ऐसे में राहुल गांधी के इमरजेंसी को लेकर वर्तमान में तुलना करने वाला बयान कई मायने में महत्वपूर्ण है।

आखिर इमरजेंसी क्यों लगी? इलाहाबाद के जस्टिस सिंहा ने दो बातों का जिक्र कर फैसला सुनाया था। जनप्रतिनिधि कानून 123/7 के तहत दो आरोप लगाये गये। पहला आरोप था जिसमें रायबरेली सभा के लिए सरकारी विभाग बिजली खीची गई उसके लिए सरकारी विभाग ने मदद की दूसरा आरोप था पीएमओ से जुड़े अधिकारी कपूर का सरकारी प्रचार में सहयोग कर रहे थे।

ऐसे में क्या यह वर्तमान में नहीं हो रहा है? लेकिन अब इन मामलों में न कोर्ट को कोई मतलब है न चुनाव आयोग का। ऐसे में यदि राहुल जब इमरजेंसी और वर्तमान दौर का जिक्र करते हैं तो साफ है कि सत्ता ने लोकतंत्र की खाल का जूता बनाकर पहन लिया है और संवैधानिक संस्था बजट के भार में दब गये है तब सवाल यही है कि गलती कैसे स्वीकार की जा सकती है क्योंकि नैतिकता से बड़ा चुनाव जीतना है।