मंगलवार, 8 जून 2021

फटकार के बाद मोदी...

 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का वैक्सीनेशन को लेकर दिया गया बयान को कुछ लोग देर आये दुरुस्त आये कह रहे हैं तो समर्थक वाह मोदी में लगे है लेकिन हकीकत में देखा जाये तो यह लातों के भूत बातों से नहीं मानते की कहावत को चरितार्थ करता है, सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह से दो हफ्ते में वैक्सीन और 35 हजार करोड़ का हिसाब मांगा था, वैक्सीन की दो कीमतों पर सवाल उठाया था और सरकार की तैयारी पूछा था उसके बाद आये इस निर्णय का सच तो यही है।

हैरानी की बा तो यह है कि जिस राष्ट्र के नाम संबोधन पर पूरी दुनिया की निगाह होती है उसमें भी कोई झूठ बोल दे, लफ्फाजी करे और अपनी लापरवाही की वजह से हुए नरसंहार पर आंख मूंद ले तो यह बेशर्मी की पराकाष्ठा के अलावा कुछ नहीं है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के झूठ की कहानी बताने से पहले यह बात आम लोगों को जान लेना चाहिए कि इस देश में गंगा में बढ़ती लाशें, चिताओं की लाईने और आक्सीजन तथा अव्यवस्था से हुई मौत न केवल सत्ता की लापरवाही के चलते हुई है बल्कि यह मोदी सत्ता के द्वारा किया गया नरसंहार है।

हम इसे सत्ता का नरसंहार इसलिए भी कहते हैं कि नमस्ते ट्रम्प और मध्यप्रदेश में सरकार बनाने के लोभ से शुरु हुई लापरवाही आज भी जारी है, सत्ता की लफ्फाजी और झूठ का कहर आम लोगों के दैनिक जीवन पर बुरी तरह टूटा है। जिस मुक्त वैक्सीन को लेकर आज मोदी समर्थक बेशर्मी से अपनी पीठ थपथपाने की कोशिश कर रहे हैं वे भी जान ले कि यदि सुप्रीम कोर्ट ने दो सप्ताह के भीतर जवाब देने सरकार को नहीं हड़काया होता तो सत्ता अभी भी उत्तरप्रदेश सहित सात राज्यों में होने वाले चुनाव की रणनीति के अलावा कुछ सोच ही नहीं सकती। और रणनीति भी झूठ नफरत और अफवाह पर टिकी हुई।

सुप्रीम कोर्ट के जिन सवालों की वजह से फ्री वैक्सीन की गई वह सवाल लोगों का जानना चाहिए। कोर्ट ने मोदी सत्ता से पूछा था कि जिस  35 हजार करोड़ संसद में लाया थआ वह 35 हजार करोड़ कहां कैसे खर्च किया जवाब दो, वैक्सीन की दो कीमत क्यों है, यदि पिछले साल से तैयारी थी तो ऑक्सीजन और दवाई के अभाव में लोग क्यों मरे, तैयारी थी तो वैक्सीन की कमी क्यों है, वैक्सीन को लेकर कहां क्या खर्च किया गया। ऐसे कितने ही सवालों को लेकर जह सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सत्ता को लानत भेजते हुए दो हफ्ते के भीतर जवाब देने कहा तब फ्री वैक्सीन का खेल शुरु हुआ है।

इस  संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी के झूठ से पहले बता दें कि मोदी सत्ता की तैयारी क्या थी, जब विशेषज्ञ ऑक्सीजन की जरूरत बता रहे थे तो मोदी सत्ता ऑक्सीजन विदेशों को बेच रही थी। जब दुनिया भर के देश 2020 में ही वैक्सीन खरीदने आर्डर दे रहे थे तो मोदी सत्ता असम-बंगाल में चुनाव जीतने की रणनीति बना रही थी, कोरोना की कमी होते ही दूसरे देशों को वैक्सीन बेची जा रही थी और दावा किया जा रहा था कि हमने कोरोना की लड़ाई जीत ली है और अब दुनिया को मदद करेंगे।

सत्ता की लापरवाही से हुए नरसंहार के बाद भी यदि कोई झूठ बोले तो सवाल उठना चाहिए कि क्या देश के प्रधानमंत्री को झूठ बोलना चाहिए। प्रधानमंत्री अब भी अपनी वाहवाही की भूख मिटाने झूठ बोलते है कि भारत ने दो वैक्सीन बनाई जबकि हकीकत यही है कि भारत ने  केवल कोवैक्सीन ही बनाई और यह कारनामा भारत टेक ने किया जबकि जिस कोविशील्ड को लेकर प्रधानमंत्री मोदी दावा करते हैं वह वैक्सीन आस्ट्राजेनिका आक्सफोर्ड का है और अदार पूनावाले का सिरम इंस्टीट्यूट ने लाइसेंस लेकर कोविशील्ड तैयार किया है। यानी आप देखेंगे कल स्पूतनिक, जानसन या दूसरी कंपनी का वैक्सीन यदि भारत में तैयार होने लगे तो क्या मोदी सत्ता इसी तरह का दावा करेंगी। लापरवाही के नरसंहार का जवाब तो सुप्रीम कोर्ट ने दो हफ्ते में मांगा है लेकिन सच आपके सामने है कि मोदी सत्ता तब जागी जब सुप्रीम कोर्ट हड़काया।

सोमवार, 7 जून 2021

ढाई साल का सच!

 

वैसे तो राजनीति में निश्चित कुछ भी नहीं होता है, तब ढाई-ढाई साल वाला फार्मूला क्या बला है? छत्तीसगढ़ में जब से कांग्रेस की सरकार आई है तभी से यह चर्चा जोरों पर रही कि भूपेश बघेल और सिंहदेव उर्फ बाबा के बीच ढाई-ढाई साल का बंटवारा हुआ है, और यह चर्चा अब तेज इसलिए हो गया है क्योंकि वर्तमान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का ढाई साल 17 जून को पूरा होने जा रहा है।

ऐसे में इस सच को आम लोगों को जानना भी जरूरी है कि आखिर यह ढाई साल क्या बला है और इसमें कितनी सच्चाई है। हैरानी तो लोगों को इसलिए भी है या ढाई-ढाई साल के चर्चे को बल इसलिए भी मिलता है क्योंकि इससे अब तक सीधे तौर पर नो मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कभी इंकार किया और न ही सिंहदेव ने ही कभी इसका सीधे समर्थन ही किया।

यदि दोनों नेता भूपेश बघेल और सिंहदेव इस फार्मूले को इंकार कर देते तो विवाद ही नहीं होता और यदि इस सवाल पर गोल-मोल जवाब  आ रहा है तो इसका मतलब साफ है कि यह फार्मूला कहीं न कहीं अस्तित्व में रहा है। तब सच का पड़ताल जरूरी है। तब सच क्या है?

पंद्रह साल के निर्वासन के बाद जब छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने भारी बहुमत से जीत दर्ज करने से पहले मुख्यमंत्री पद के दो दावेदार थे भूपेश बघेल और सिंहदेव! लेकिन बहुमत आते ही चरणदास महंत और ताम्रध्वज साहू भी मुख्यमंत्री की दौड़ में शामिल हो गए। एक अनार सौ बीमार की तर्ज पर जब मुख्यमंत्री बनने की होड़ मची तो किसी का किसी से समझौता मुश्किल हो गया। हालांकि तब भी मुकाबला भूपेश और सिंहदेव में ही था और दोनों पीछे हटने को तैयार नहीं थे।

जैसा कि कांग्रेस में अमूमन होता है लड़ाई के फैसला का निर्णय हाईकमान पर छोड़ दिया गया, और दो की लड़ाई में तीसरे को फायदे की न केवल उम्मीद ही बढ़ गई बल्कि हाईकमान ने भी साफ कह दिया कि जीत का श्रेय भूपेश बघेल और सिंहदेव को है लेकिन दोनों एक नहीं हो पा रहे हैं तो फिर उनका निर्णय ही सर्वोपरि होगा और हाईकमान के इस फैसले पर सभी यानी चारों दावेदार राजी भी हो गये।

अब सुनिये इस ढाई साल का सच। जिससे न भूपेश बघेल इंकार करते हैं न ही सिंहदेव उर्फ बाबा ही सीधे इंकार करते हैं। दरअसल ढाई साल का इस सच से कांग्रेस हाईकमान ने पहले ही दिन कह दिया था कि ये तुम लोग जानो। तुम लोग मतलब भूपेश बघेल और सिंहदेव। अब असल कहानी में आते हैं, हाईकमान पर निर्णय छोड़ दाऊ, बाबा और महंत लौटने लगे और अभी वे हवाई अड्डे पर पहुंचे ही थे कि ताम्रध्वज साहू के नाम पर मुहर लगने की खबर ने इस ढाई साल के फार्मूले की नींव रखी, उल्टा पैर लौटे भूपेश बघेल, सिंहदेव और चरणदास महंत ने सीधे राहुल गांधी यानी हाईकमान से कहा कि हमारे बीच सहमति बन गई है कि भूपेश बघेल को मुख्यमंत्री बनाया जाए। राहुल गांधी को सहमति का फार्मूला भी समझाया गया लेकिन कहते हैं राहुल गांधी ने साफ कह दिया कि इस फार्मूले को आप लोग जानो, अभी क्या करना है। तीनों का समवेत स्वर गूंजा भूपेश बघेल। और भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बन गये।

फार्मूले और सहमति का स्टाम्प पेपर तो है नहीं कि चुनौती दी जा सके और जब तक सीधे-सीधे दाऊ, बाबा और महंत कुछ नहीं कहेंगे यह कोई जान भी नहीं सकता कि आखिर सच क्या है, और जनता जान भी गये तो इसे लागू करवाने वाला हाईकमान को जानना ही नहीं मानना जरूरी है और हाईकमान जब किसी को कभी भी हकाल सकता है तो इस फार्मूले का मतलब ही क्या है।

रविवार, 6 जून 2021

आ गये हैं भगवाधारी!

उत्तरप्रदेश सहित देश के 11 राज्यों में अगले साल यानी 2022 को होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा ने कमर कस ली है लेकिन सर्वाधिक दिलचस्प स्थिति उत्तरप्रदेश की है। जहां भगवाधारी योगी आदित्यनाथ की सत्ता है और यह ऐसी सत्ता है जिसके आगे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भी नहीं चलती कहा जाए तो गलत नहीं होगा।

ऐसे में मोदी और योगी के बीच विवाद इसलिए भी उठ खड़ा हुआ है क्योंकि भाजपा के भीतर भी योगी आदित्यनाथ प्रधानमंत्री के रेस में है। उत्तरप्रदेश में चल रहे विवाद की एक वजह यह भी मानी जाती है कि योगी आदित्यनाथ को लेकर भाजपा में जिस तरह का उत्साह है उसे गुजरात गैंग पचा नहीं पा रहे हैं। 

दरअसल कभी अपनी सुरक्षा को लेकर संसद में जार-जार रोने वाले योगी आदित्यनाथ का उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री बनना असाधारण घटना थी, क्योंकि योगी आदित्यनाथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पसंद कभी नहीं रहे और यदि चर्चाओं पर विश्वास करें तो योगी आदित्यनाथ ने भी समय-समय पर गुजरात गैंग को अपनी ताकत का अहसास कराने से परहेज नहीं किया, इसके लिए चाहे किसी की छवि खराब हो तब भी उन्होंने इसकी परवाह नहीं की।

कट्टर हिन्दुत्व का नया चेहरा के रुप में योगी आदित्यनाथ ने कब अमित शाह को पराजित किया इसकी तारीख बताना मुश्किल है लेकिन कभी नरेन्द्र मोदी के विकल्प माने जाने वाले अमित शाह की जगह योगी आदित्यनाथ कभी का ले चुके हैं। तब गुजरात गैंग का बौखलाना स्वाभाविक है और यह मौका दिया पंचायत चुनाव के परिणाम ने। भाजपा की पंचायत चुनाव में बुरी गत बनते ही गुजरात गैंग सक्रिय हो गया लेकिन कहा जा रहा है कि योगी की कट्टर हिन्दू वाली छवि के आगे गुजरात गैंग को एक बार फिर मुंह की खानी पड़ी।

योगी आदित्यनाथ ने जिस तरह से जातिवाद चलाकर ब्राम्हणों के खिलाफ कार्रवाई की है यह भी भाजपा के लिए बेचैन कर देने वाला है। उत्तरप्रदेश में ब्राम्हण वोट का अपना प्रभाव है और योगी आदित्यनाथ के बारे में कहा जाता है कि ब्राम्हणों से उनका बैर बहुत पुराना है और यही वजह है कि सत्ता में आने के बाद उन्होंने परशुराम जयंती पर दिये जाने वाले शासकीय अवकाश को रद्द कर दिया ताकि ठाकुर लॉबी खुश हो सके।

कोरोना काल में भी योगी आदित्यनाथ की कार्यपद्धति को लेकर सवाल उठते रहे। विभिन्न राज्यों में फंसे उत्तरप्रदेश के छात्रों को लाने में योगी आदित्यनाथ ने जिस तरह से मोदी सरकार पर दबाव बनाया उसके बाद ही दूसरे राज्यों में अफरा-तफरा मची और कोरोना नियंत्रण में दिक्कतें आई। ताजा मामला तो गंगा में बहती लाशें, श्मशान में चिंताओं की लाईन है जिसके चलते सरकार की छवि बिगड़ी है लेकिन मोदी और योगी के बीच चल रहे इस लड़ाई में गुजरात गैंग असहाय है और भाजपा के कुंठित हिन्दु अभी से नारा लगाने लगे हैं- 

आ गये हैं भगवाधारी

राज तिलक की करो तैयारी।

शुक्रवार, 4 जून 2021

क्या ये नरसंहार नहीं है साहेब!

 

इतिहास में यह बात भी दर्ज होगा कि जब भीषण महामारी में देवभूमि के लोग दाना-दाना के लिए तरस रहे थे, गंगा में लाशें बह रही थी, श्मशान में चिताओं की लम्बी लाईनें थी, लोग आक्सीजन के अभाव में मर रहे थे, चारों तरफ सत्ता की लापरवाही से नरसंहार हो रहा था, तब देश की मौजूदा मोदी सरकार अपनी रईसी बरकरार रखने टैक्स पर टैक्स वसूल रही थी, राज्य वैक्सीन के लिए तरस रहे थे बल्कि प्रधानमंत्री सेन्ट्रल विस्टा में अपना महल बनाने में व्यस्त थे।

कोरोना के इस भीषण महामारी में जब आम आदमी बेरोजगारी और महंगाई की मार से नारकीय जीवन जीने मजबूर है तब सत्ता न केवल वैक्सीन पर टैक्स घटाने तैयार नहीं बल्कि सरकार का पैसा बचाने निजी अस्पतालों को फायदा पहुंचाने आम आदमी पर आर्थिक बोझ डाल रही है। पूरा देश इन दिनों वैक्सीन की कमी से जूझ रहा है, सरकारी अस्पतालों में यदि वैक्सीन उपलब्ध नहीं है और निजी अस्पतालों में वैक्सीन उपलब्ध है तो इसका मतलब क्या है? इसका मतलब साफ है कि सरकार केवल अपने फायदे देख रही है, जनता आर्थिक बोझ से मरे तो मरे।

सरकार की करतूतों की वजह से सुप्रीम कोर्ट बेहद नाराज है और अब तो उसने मोदी सत्ता से सीधे पूछ लिया कि आखिर वैक्सीन के लिए रखे वह 35 करोड़ का क्या किया? हालांकि इसका जवाब न केन्द्र देने वाला है और न ही न्यायालय ही इस सरकार को चेतावनी देने या लानत भेजने के अलावा ही कुछ कर सकती है।

आयेगा तो मोदी ही, हौसला मत टूटने देना इस मोदी का ब्रम्हा लेकर छवि चमकाने वालों को भी इस भीषण महामारी में टैक्स और रईसी दिखाई नहीं देने वाला है। तब कांग्रेस की बड़ी नेता श्रीमती सोनिया गांधी का मोदी सत्ता को लेकर किया गया प्रहार को याद करना चाहिए कि सरकार चलाना बच्चों का खेल नहीं है। वैसे भी जिन लोगों ने जीवनभर झूठ, अफवाह और नफरत की राजनीति की हो उनसे आपदा के समय भी बेहतरी की उम्मीद बेमानी है। तब क्या हाथ पर हाथ बांधकर कर 2024 का इंतजार करना चाहिए। 

क्योंकि इस सत्ता ने जिस तरह से संघीय ढांचे पर प्रहार कर संवैधानिक संस्थाओं की साख का बट्टा बिठा दिया है उसके बाद इस देश में क्या बचा रह सकता है। शिक्षा और स्वास्थ्य तो कैसे भी आम आदमी की पहुंच से दूर है, सत्ता की लापरवाही ने इस भीषण महामारी में लोगों का जीवन बर्बाद कर दिया है ऐसे में सरकारी अस्पतालों में वैक्सीन की अनुलब्धता क्या एक तरह का नरसंहार नहीं है, क्योंकि जब सारी दुनिया अपने-अपने देश के लिए वैक्सीन खरीद रही थी तब भी मोदी सत्ता अपनी रईसी और छवि बनाने में लगी थी। 

तब एक ही नारा एक ही राग होना चाहिए 'गद्दी छोड़ो।Ó

गुरुवार, 3 जून 2021

हौसला मत टूटने देना...

 

जब से मोदी सत्ता की लापरवाही के चलते इस देश में नरसंहार की तस्वीरे आई है एक नये तरह से सत्ता की छवि चमकाने का उपक्रम शुरु हो गया है, ट्रोल आर्मी और वॉट्सअप युनिर्वसिटी ने एक नया खेल शुरु कर दिया है वह खेल है ''हौसला मत टूटने देना इस मोदी का भले ही पेट्रोल दो सौ हो जाए, खाने का तेल तीन सौ हो जाए नहीं तो हिन्दू खत्म हो जायेंगे ये देश इस्लामी देश बन जायेगाÓÓ।

कोरोना की इस भीषण महामारी में भी यदि सत्ता सोचती है कि वह इस नरसंहार के बाद भी अपनी रईसी बरकरार रखने और छवि चमकाने में इन ट्रोल आमी  और वॉट्सअप युनिर्वसिटी के भरोसे कामयाब हो जायेगी तो वह क्या गलत सोचती है क्योंकि नफरत के बीज इस गहरे तक बोया गया है कि कोई हिन्दू-मुस्लिम के अलावा सोच भी नहीं पा रहा है।

पहले कार्यकाल की घोर नाकामी के बाद भी मोदी सरकार दूसरी पारी के लिए जीत गई तो इसकी वजह सिर्फ और सिर्फ हिन्दू मुस्लिम है ऐसे में यदि 2024 में मोदी सरकार को आने से कौन रोक सकता है। हिन्दू-मुस्लिम की राजनीति का प्रभाव को लेकर भले ही भारतीय जनता पार्टी सीधी बात न करे लेकिन सच तो यही है कि इस खेल ने देश की बर्बादी की राह तो तैयार कर दी है। सत्ता की लापरवाही के चलते हो रहे नरसंहार पर न्यायालय की लगातार लताड़ और लानत के बाद भी सत्ता की बेशर्मी बढ़ते ही जा रही है, न्यायालय ने जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल मोदी सत्ता के लिए किया है वह किसी भी व्यक्ति के लिए डूब मरने वाली बात है लेकिन सत्ता को इन सबसे कोई मतलब नहीं है। 

कोरोना की महामारी से मरने वालों में हिन्दुओं की संख्या ही लाखों में है तब आने वाले दिनों में जब प्रतिशत में मुस्लिम आबादी बढ़ते दिखाई देगी तो वह सत्ता के लिए वोट पाने का जरिया बनेगा। नरसंहार सिर्फ बीमारी से ही नहीं हो रहा बल्कि बेरोजगारी भी इसमें मदद कर रही है। मोदी सरकार के आने के बाद करोड़ लोगों से अधिक की नौकरी चली गई। इंडियन इकानामी के ताजा आंकड़े बेहद डरावने है लेकिन सत्ता को इससे मतलब नहीं।

इसके अलावा बढ़ती महंगाई भी लोगों को मौत के नजदीक ढकेल रही है। महंगाई को रोक पाने में सरकार बुरी तरह असफल हो चुकी है और मध्यम वर्ग तेजी से गरीब होते जा रहे हैं। किसान तो वैसे भी मर रहे हैं। लेकिन सरकार की प्राथमिकता आज भी सेन्ट्रल विस्टा और उस जैसे प्रोजेक्ट है जो रईसी का नया इतिहास गढ़ लेना चाहती है। इसके बाद भी यदि हौसला न टूटने देना का खेल, खेल छवि चमकाने की कोशिस हो रही है तो उसमें यह भी जोड़ देना चाहिए कि फिक्र न करे राम मंदिर के बाहर पर्याप्त भीख मिलेगी।

बुधवार, 2 जून 2021

प्रधानमंत्री का शौक सबसे बड़ी चीज...

 

सेन्ट्रल विस्टा के निर्माण को जब केन्द्र सरकार ने अतिआवश्यक सेवा घोषित कर दिया है तब न्यायालय का फैसला तो वही होना था जिसका अंदेशा था, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उन लोगों में से है जो अपनी शौक के आगे किसी को ठहरने नहीं दे सकते, भले ही वे खुद मजाक बन जायें या देश के लोगों की हालत खराब हो जाए। भले ही उनके फैसलों से लोगों की जान गई हो या देश आर्थिक बदहाली की ओर चला गया हो वे अपनी शौक के आगे किसी की नहीं सुनते, अपवाद नौ लाख वाले सूट को छोड़ कर।

ऐसे में सेन्ट्रल विस्टा की बात करने से पहले पाठकों को स्मरण दिलाना जरूरी है कि वे गरीब घर के हैं और उन्होंने चाय तक बेची है, शायद यह गरीबी की वजह से वे अपनी शौक पूरी नहीं कर पाये थे और आज जब सत्ता के सर्वोच्च पद पर है तो एक-एक करके अपनी सभी शौक पूरा कर रहे हैं। मोदी जी के कपड़े और जैकेट का शौक तो उनके चहेते लोगों के उपहार से ही पूरा हो जाता है, चश्मा और दो ढाई लाख का पेन भी शायद उनके चाहने वाले ही पूरा कर देते हैं, खानपान का शौक मोदी जी को कितना है मशरुम काजू का आटा वगैरह-वगैरह किसी से छिपा ही नहीं है। तब सरकारी संपत्ति यानी सरकारी खर्चे से जो शौक पूरा किया गया है उस पर चर्चा इसलिए भी जरूरी है क्योंकि जनता को तय करना है कि यह शौक कितना शानदार है और राजा का शौक निराला तो होता ही है, इतिहास राजाओं के शौक के किस्से से अटा पड़ा है। 

सेन्ट्रल विस्टा के बारे में बताने से पहले प्रधानमंत्री मोदी के उन शौक को भी जानना जरूरी है जो वे प्रधानमंत्री बनते ही पूरा करने लगे, इसे उनके समर्थक समय की जरूरत भी कह सकते है लेकिन इससे पहले देश के प्रधानमंत्री एक बंगले में रहते थे लेकिन नरेन्द्र मोदी के लिए पांच बंगले मिलाकर एक बंगला बनाया गया कल्याण मार्ग भी नाम जोरदार है। इसके बाद पूर्व प्रधानमंत्री के काफिले में शामिल बीएमडब्ल्यू 7 को बदला गया और इसके बदले रेंज रोवर का काफिला खरीदा गया, चूंकि बीएमडब्ल्यू सीरिज सेडान है और सामने सीट में बैठने वाले जनता को ठीक से नहीं दिखते थे और नरेन्द्र मोदी को फोटो शोटो और दिखने दिखाने का शौक है शायद इसलिए वाहनों का काफिला ही बदल दिया गया। ऐसा मानने वाले मोदी विरोधी ही है जबकि समर्थक इसे जरूरत ही बता रहे हैं। इसमें सरकार का कितना खर्च हुआ सुरक्षा कारणओं से बताना उचित नहीं है। 

लेकिन सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री को अमेरीका से होड़ भी करना है इसलिए एयर इंडिया वन खरीदा गया आठ हजार चालीस करोड़ का खर्च होना बताया जा रहा है। चूंकि शौक से बड़ी चीज दुनिया में कुछ नहीं है और शौक यदि सरकारी खजाने से पूरी हो तो फिर यह समय भी जरूरत के रुप में प्रचारित किया जाता है। यह अलग बात है कि देश में आज भी ईलाज के अभाव में लोग दम तोड़ रहे हैं, बेरोजगारी और महंगाई ने आम लोगों का जीवन नारकीय कर दिया है लेकिन हौसला इस व्यक्ति का नहीं तोडऩा है क्योंकि ये न होगा तो हिन्दुतत्व खतरे में पड़ जायेगा, ऐसा इन दिनों वाट्अप युनिवर्सिटी के विद्यार्थी जोर-शोर से कह रहे हैं। सेन्ट्रल विस्टा को लेकर नवभारत टाईम्स के खुलासे के अनुसार सेन्ट्रल विस्टा में प्रधानमंत्री का जो बंगला बनेगा वह 15 करोड़ में बनेगा, जिसमें सभी तरह का आधुनिक सुविधा होगी, यह किसी महल से कम नहीं होगा और पुराने जमाने के राजा महाराजाओं की तर्ज पर इसके किले के भीतर परींदा भी पर नहीं मार सकता।

खर्च कितना भी होगा शौक के आगे कुछ नहीं है, हम यह नहीं कहेंगे कि इस भीषण महामारी में  इसकी क्या जरूरत है क्योंकि शौक से बड़ी चीज न देश है और न ही धर्म है।

मंगलवार, 1 जून 2021

होशियार! अच्छे दिन तो यही है...

 

गलत आदमी भी कितना सही, और मूर्ख आदमी भी कितना ताकतवर हो सकता है इसका अंदाजा किसे था, लेकिन अच्छे दिन की लालच ने सब कुछ उलट दिया था। नरसंहार के इस भयावह दौर के बाद भी यदि सत्ता की जिम्मेदारी से इतर लोग धर्म और राष्ट्रवाद के चक्कर में पड़े थे। तो इसका मतलब साफ है कि पिछले कई दशकों से नफरत का जो बीज बोया जा रहा था वह फलने फूलने लगा है। 

इतिहास गवाह है कि जिस भी राष्ट्र ने धर्म और राष्ट्रवाद को ज्यादा महत्व दिया वे न केवल पिछड़ गये बल्कि बर्बादी की राह को अग्रसर हुए। ऐसे में कोरोना की महामारी ने जो तांडव मचाया है उसे दूसरे देशों की तुलना करना सिर्फ लोगों को भ्रम में डालना है। हैरानी तो इस बात की है कि सत्ता अब भी लोगों की भावनाओं के साथ खेलने में लगी है, देश का आर्थिक ढांचा पूरी तरह से गड़बड़ा गया है। और आर्थिक ढांचे के गड़बड़ाने की वजह से महंगाई और बेरोजगारी अपने चरम पर है। लोगों का जीना दूभर होता जा रहा है लेकिन सत्ता को अपनी रईसी बरकरार रखने आज भी सेन्ट्रल विस्टा की जरूरत हैं और अपनी छवि चमकाने के लिए हिन्दू-मुस्लिम ही चाहिए।

यह ठीक है कि कोरोना वैश्विक महामारी है लेकिन वैश्विक चेतावनी को नजर अंदाज करना, क्या सत्ता की लापरवाही नहीं है, कोरोना से मौत के आंकड़े को छुपाने की कोशिश क्यों की गई। क्या सरकार के पास इस बात का जवाब है कि इस देश में कोरोना की बदइंजामी के चलते आक्सीजन के अभाव में कितने लोगों की मौत हुई, दवाई के अभाव में कितने लोग मर गए, सरकार की नासमझी के लाकडाउन के चलते कितने मजदूर सड़कों में मर गए, भूख और आर्थिक बदहाली के चलते कितने परिवार बरबार हो गए, कितने बच्चे अनाथ हो गए और किसी भी महामारी या आपदा से निपटने के लिए क्या योजना है?

हम जब कहते हैं कि गलत आदमी भी कितना सही, और मूर्ख आदमी भी कितना ताकतवर हो सकता है तो इसका मतलब साफ है कि भावनाएं और आस्था के विभत्स खेल ने देश में असुर प्रवृत्ति को ही बढ़ावा दिया है। जिसका दुष्परिणाम नरसंहार के रुप में देश भुगत रहा है। क्या इस देश की सत्ता की आंख तब भी नहीं खुलती है जब हमारे बाद पैदा हुआ बंग्लादेश हमें हर मामले में पीछे छोड़ देता है। भूखमरी और खुशहाली के इंडेक्स में हम यदि पाकिस्तान से भी पीछे चले जाते हैं तो फिर जीत किसी हो रही है।

और यह सब सत्ता की नासमझी की वजह से हो रही है क्योंकि सत्ता को आज भी इस बात की समझ नहीं है कि सरदार पटेल की बड़ी मूर्ति बना देने से नेहरु का कद छोटा नहीं हो जाता। आधुनिक भारत के निर्माण में जिन लोगों ने अपना सबकुछ होम कर दिया उनकी आलोचना ही नासमझी और मूर्खता है तब अच्छे दिन कैसे आ सकता है। चुनाव जीतना अलग बात और देश चलाना बिल्कुल अलग बात है साहेब।