सोमवार, 26 अगस्त 2024

गये थे हरिभजन को वोटन लगे कपास…

 गये थे हरिभजन को

वोटन लगे कपास…


यह तो गये थे हरिभजन को वोटन लगे कपास की कहावत को ही चरितार्थ करता है वरना मुख्यमंत्री बनकर छत्तीसगढ़ को भ्रष्टाचार मुक्त करने का दावा करने वाले उपमुख्यमंत्री अरुण साव के विभाग में भ्रष्टाचार की नदियां नहीं बहती। और न ही बटोर लेने का खेल इस पैमाने पर होता। 

हालत यह है कि अब प्रभार वाद का नया खेल भी शुरू हो गया है सीनियर अफसरों को किनारे करके  जूनियरों को प्रभार देने के इस खेल में  लेन-देन की जो खबरें आ रही है वह हैरान कर देने वाला है तो जूनियर - सीनियर की लड़ाई ने कामकाज को भी बुरी तरह प्रभावित किया है।

कहा जाता है कि उपमुख्यमंत्री साव ने मुख्यमंत्री नहीं बन पाने की कमी को अपने विभाग में धौंस जमाकर पूरी कर ली है। नगरीय निकायों में मनमाने ढंग से संविदा नियुक्ति के बाद जल संसाधन और पीएचई में प्रभारवाद का खेल कम चर्चा में नहीं है।

वैसे भी जल जीवन मिशन को कबाड़ा करने का आरोप तो विधानसभा तक में सुर्ख़ियाँ बिखेर चुका है और कहा जाता है कि प्रधानमंत्री मोदी की हस महत्वाकांक्षी योजना का सबसे ज्यादा कबाड़ा तो धमतरी, बिलासपुर और महासमुंद जिले में निकल रहा है, जहाँ इंजिनियरों और ठेकेदारों की मिलीभगत से निकल रहा मलाई सीधे बंगले तक पहुंच रहा है।

सत्ता मिलते ही संघ का संस्कार किस तरह सिर चढ़ कर बोलता है यह किसी से छिपा नहीं है लेकिन जो लोग अरुण साव के क्रियाकलापों को देख समझ रहे हैं वे भी हैरान है।

इधर जल जीवन मिशन के बजट के बंदर बाँट को लेकर खेल नया नहीं है। इस लंबे चौड़े बजट के चक्कर में भूपेश बघेल और रुद्र गुरु   की लड़ाई अभी लोग भूले नहीं है लेकिन साव के साथ अभी यह स्थति पैदा नहीं हुई है लेकिन यह स्थिति नहीं पैदा होगी कहना मुश्किल है।

कहा जाता है कि धमतरी, महासमुंद और बलौदाबाजार में चल रहे गोलमाल और  छोटे ठेकेदारों की करतूत को लेकर चर्चा अब मुख्यमंत्री तक जा पहुंचा है।

रविवार, 25 अगस्त 2024

ठन गई कौशिक और चंद्राकर के बीच...

 ठन गई कौशिक और चंद्राकर के बीच...


यह तो सूत न कपास जुलाहों में लट्ठम-लट्ठा की कहावत को ही चरितार्थ करता है वरना भारतीय जनता पार्टी के इन दोनों दिग्गज नेताओं के बीच हस कदर जंग नहीं होती कि शिकायत मुख्यमंत्री तक जा पहुंचे।

दरअसल धरमलाल कौशिक और अजय चंद्राकर दोनों ही मंत्री बनने के कतार में है। रमन सिंह ने धमलाल कौशिक को विधानसभा का अध्यक्ष बनवा कर अजय चंद्राकर की कुर्मी वाद की राजनीति पर पहले ही डेंट लगा चुके है तो अजय चंद्राकर को भरोसा है कि लोकसभा वार मंत्री बनाने की रणनीति में वे महासमुद्र के खाली पड़े मंत्री पद पर आसीन हो जायेंगे। 

ऐसे में चर्चा है कि दोनों हो नेताओ का रूतबा किसी मंत्री से कम नहीं है। कौशिक का तो अपने क्षेत्र के लोगों से बातचीत का आडियों तक वायरल हो चुका है तो अजय चन्द्राकर की जुबान को लेकर भी चर्चा पहले से गरम है।

कहा जाता है कि दोनों के बीच चल रहे कुर्मीवाद के इस जंग के बीच अब नया मामला आ गया है। सप्लायर का…।

और सप्लायर भी ऐसा वैसा नहीं है, सप्लायर की करतूत से पूरा प्रदेश वाकिक है। 

चर्चा है कि सत्ता मिलते हीं अपने अपने सप्लायर को काम दिलाने के फेर में वैसे तो कई भाजपाई उलझे हुए हैं, लेकिन यहां तो मामला हसे छोड़कर किसी को भी काम देने का है।

अब जब विवाद मुख्ययमंत्री तक जा पहुंचा है तो इसका परिणाम क्या होगा कहना मुश्किल है क्योंकि वहाँ भी तो कई घाघ बैठे हैं और जब मामला परसेंटेज का हो तो फिर इस बात का मतलब कहाँ रह जाता है कि कौन कितना चूना लगाने में सक्षम है।

बहरहाल यह लड़‌ाई अब कुर्मी राजनीति में प्रभाव को लेकर मी चल रहा है ऐसे में राजस्व के साथ खेल खेल रहे टंकराम की कहानी एक अलग ही रूप ले रहा है।

शनिवार, 24 अगस्त 2024

ओपीएस - एनपीएस - यूपीएस के बाद क्या ...

 ओपीएस - एनपीएस - यूपीएस के बाद क्या ...


एक बार फिर सरकारी कर्मचारियों के लिए नई पेंशन स्कीम लागू करने की घोषणा कर दी गई है। लेकिन ओल्ड पेंशन स्कीम की मांग पर अड़े कर्मचारियों का ग़ुस्सा इससे शांत नहीं हो रहा  है, वे  इस नये पेशन स्कीम यानी यू पी एस को अपनाने तैयार नहीं हैं।

दरअसल ओपीएस का मामला इतना बड़ा हो गया कि वह चुनाव को प्रभावित करने लगा है और जब अब हरियाणा - जम्मूकश्मीर के बाद महाराष्ट्र और झारखंड में विधानसमा का चुनाव है तो मोदी सरकार ने यूपीएस स्कीम लांच कर कर्मचारियों के ग़ुस्से पर पानी डालने की कोशिश कर रही है। लेकिन लगता है कि इससे बात नहीं बनने वाली है कर्मचारी संगठनों ने अपनी ओपीएस की माँग को दोहराते हुए नये सिरे से आन्दोलन की रूपरेखा बनाने की घोषणा कर दी है।

असल में एन पी एस को लागू करने का काम भारतीय जनता पार्टी की सरकार के पूर्व  प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के कार्यकाल में शुरू किया गया था, इसलिए कर्मचारियों का ग़ुस्सा बीजेपी पर फूटने लगा है। और मोदी सरकार जानती है कि यदि कर्मचारियों को नहीं मनाया गया तो जैसे जैसे आन्दोलन तेज होगा, बीजेपी का चुनाव जीतना मुश्किल होता चला जायेगा।

इस स्कीम के लागू होते ही कर्मचारियों के पास विकल्प चुनने का अवसर तो बढ़ गया है लेकिन वोट की राजनीति के चलते जिस तरह से सरकार नई-नई पेंशन स्कीम ला रही है क्या आने वाले दिनों में कोई और स्कीम लाई जायेगी।

इस नई पेंशन स्कीम के तहत केंद्रीय कर्मचारियों के अंतिम वेतन के 40 से 50 प्रतिशत के बराबर पेंशन की गारंटी होगी. आसान भाषा में कहें तो, यदि आपका 50,000 रुपये महीने के अंतिम वेतन पर रिटायर होते हैं तो, आपको 20 से 25 हजार रुपये प्रति महीने पेंशन के रूप में दिया जाएगा. हालांकि कुल सेवा का समय और पेंशन कोष से आपके द्वारा किसी भी प्रकार की निकासी का समायोजन किया जाएगा. इस पेंशन गारंटी को पूरा करने के लिए पेंशन कोष में किसी भी कमी को पूरा करने के लिए केंद्र सरकार के बजट से पूरा किया जाएगा. 

दावा किया जा रहा है कि अगर राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली को लागू किया जाता है तो 1 जनवरी साल 2004 से नेशनल पेंशन स्कीम में रजिस्ट्रर्ड कें 87 लाख से अधिक केंद्रीय कर्मचारियों को इसका फायदा मिलेगा. वित्त मंत्रालय के एक बयान के अनुसार, डीए दरों में बढ़ोतरी के साथ यह राशि बढ़ती रहती है. मंत्रालय ने कहा था कि ओपीएस वित्तीय रूप से टिकाऊ नहीं है क्योंकि यह अंशदायी नहीं है और सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ता रहता है. 

सत्ता के नर‌पिशाचों की हवस...

 सत्ता के नर‌पिशाचों की हवस... 


दिल्ली की निर्भया से लेकर उत्तराखंड की अंकिता भंडारी,  कुछ भी तो नहीं बदला है। बल्कि कानून कड़े  करने की नौटंकी और राजनैतिक नफा-नुक़सान  वाला प्रदर्शन नया जुड़ गया है। 

ऐसे में छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य में बलात्कारियों के साथ सत्ता का गठजोड़ एक वीभत्स चेहरा  के रूप सामने आकर छाती ठोंककर खड़ा होने लगा है। राजनैतिक दलों की बेशर्मी को उजागर करती घटनाएं क्या इस शांत प्रदेश को उद्देलित नहीं करती ।

ऐसा भी नहीं है कि रायगढ़ और कांकेर में हुए गैंगरेप पर जो मीडिया आज खामोश है, पहले भी ऐसा ही था । तब मीडिया ईट पर ईट बजा देता था और न तो  राजनैतिक दलों की और न ही उनके नेताओं की हिम्मत पड़ती कि वह किसी यौन शोषण के किसी छिछोरे  के साथ खड़ा  हो सके ।

लेकिन राज्य बनने के बाद सत्ता ने जिस तरह से मीडिया को अपने ईशारे पर नचाना शुरु किया है उसके बाद ऐसे छिछोरों के साथ न केवल नेता बल्कि समूची पार्टी खड़ी हो जाती है।

रायगढ़ के भाजपा जिलाध्यक्ष अग्रवाल की करतूत पर तो उसे हटाने की बजाय समू‌ची पार्टी का इस कदर संरक्षण में खड़ा रहा कि बेशर्मी की सारी हदें पार कर दी गई।

कांकेर के बाहुचर्चित घटना के आरोपी को तो सांसद की रिकिट तक दे दी गई।

और औद्योगिक नगरी के विमला रेप कांड का कथित आरोपी सत्ता तक जा पहुंचा है तो फिर हिमशिखर गुप्ता से लेकर कितने ही नाम बरबस ही याद आ जाते हैं जो सत्ता और नेताओं के साये तले अपनी हवस के लिए नरपिशाच से कम नहीं है।

क्या एक बार फिर उन घटनाँओं को सामने लाया जाना चाहिए जिसने आदोलन की शक्ल लेकर समूचे छत्तीसगढ़ में हलचल मचा दी थी।

हमने तय किया है कि अब इतिहास के पन्नों को कुरेद कर उन नरपिशाचों की करतूत को लोगों तक लाने की जो शायद आम लोगों को यह से सोचने के लिए मजबूर कर दे कि राजनीति में हवस के नरपिशाचों के लिए कोई जगह नहीं है और राजनैतिक दल भी ऐसे लोगों से ही दूरी बना लें।

याद कीजिए 80 के दशक की नह श्वेता हत्याकांड जिसने समूचे छत्तीसगढ़ में अपने विरोध प्रदर्शन से हलचल मचा दी थी, और पुलिस की वह भूमिका जिसने आनन फानन में किसी को भी पकड़ लेने की पटकथा लिखी थी । इस घटना में शामिल डाक्टरी की पढ़ाई करने वालों को बचाने की भी चर्चा रही। क्या है यह श्वेता रेप हत्याकांड, पूरे मामले को  एक बार किए आपकी आँखों के सामने लाने की कोशिश होगी। विमला रेप कांड हो या हो या कांकेर रायगढ़ हो या छत्तीसगढ़ के किसी भी हिस्से का रेप कांड  सिलसिलेवार प्रस्तुत करने की कोशिश होगी।

किस किस पाटी के कौन कौन से नेता या फिर संभ्रात परिवारों के रईसज़ादे ? सब कुछ आपने सामने लाने की कोशिश... (शीघ्र ही)

गुरुवार, 22 अगस्त 2024

हमने मारी औरतें…

 हमने मारी औरतें....


पिछले दस दिनों से देश का प्रायः हर राज्य औरतों के बलात्कार की घटना से स्तब्ध है । लगातार हो रही अपराधों में सबसे विभत्स अपराध को लेकर बहस भी हो रही है कि इस बढ़ते अपराध लिए कौन दोषी है, इसका कारण  क्या है।जबकि ऐसे अपराधों पर सज़ा के कानून भी कड़े बना दिये गए है फिर भी अपराध पर अंकुश क्यों नहीं लग रहा है।

हर रोज 87 बलात्कार ! क्या किसी  सभ्य समाज को विचलित नहीं करते। चर्चा में कहा जा रहा है मोबाईल और बाजारवाद ही इसका प्रमुख कारण है लेकिन कलकत्ता जैसे महानगर से लेकर सुदूर बस्तर जैसे इलाके में हो रही घटनाओं की असली वजह से कौन भाग रहा है।

सबके अपने अपने विचार और सुझाव है लेकिन किसी ने राजनैतिक दलो पर ऊँगली उठाने की हिम्मत नहीं की जो इन घटनाओं के बढ़ने में सबसे बड़े दोषी के रूप में दिखाई दे रहे हैं।

राजनीति का अपराधीकरण को लेकर अब कोई बहस भी नहीं कहना चाहता। तब बलात्कारियों के लिए संरक्षक बन चुके इन संगठित गिरोह पर उंगली उठाना आसान भी नहीं है।

बेटी बचाओ - बेटी पढ़‌ाओ के नारे जितने सुन्दर लगते है, नारा लगाने वालों की करतूत उतनी ही भयावह हो चली है। बेशर्मी की पराकाष्ठा तक पहुंच चुके लोग अब बलात्कार को भी राजनैतिक नफ़ा-नुक़सान के तराजू से तौलने लगे हैं।

शायद यही वजह है कि कल तक जो राजनैतिक दल बलात्कारियों को टिकिट देने से या पार्टी संगठन में बड़े पद देने से कतराती थी वे अब खुले आम बलात्कारियों के संरक्षक बने हुए है।

जैसी राजा-वैसी प्रजा कहना बेहद कठोर हो जायेगा लेकिन सन्च तो यही है कि बलात्कार के आरोपियों को टिकिट देकर, या पद देने के बाद भी लोगों की खामोशी से राजनैतिक दलों के हौसले इतने बुलंद हो गये कि इन दलों  ने बलात्कारियों का पक्ष लेना, स्वागत करना और रिहाई का इंतजाम करने जैसे फैसले बेशर्मी से करने लगे।

कांकेर में कल हुए गैंगरेप के बाद किसी ने सोशल मीडिया में अपना गुस्सा उतारते हुए लिख मारा कि जब यौन शोषण के आरोप के बाद बीजेपी  ने सांसद की टिकिट दे दी और जनता ने जीता दिया तो फिर झेलो...।

ग़ुस्सा कितना जायज है? लेकिन कठुआ के बलात्कारियों का स्वागत करने की बेशर्मी पर चुप्पी  और बिल्किस बानों के बलात्कारियों की समय पूर्व रिहाई और  स्वागत  पर लोगों की ख़ामोशी क्या विचलित नहीं करता। या देश का गौरव बढ़ाने वाली महिला पहलवानों के यौन शोषण के आरोपी बृजभूषण शरण सिंह को सत्ता संरक्षण पर लोगों की चुप्पी ? क्या राजनैतिक दलों के हौसले बुलंद नहीं करता ?

राजनैतिक दलों के हौसले कितने बुलंद है, 'सत्ता का हौसला किस तरह उफान मारता है इसका सबसे बड़ा उदाहरण तो बलात्कारी और छिछोरे राम-रहीम का हर चुनाव के पहले पैरोल पर रिहा हो जाना है। अब तक इस बलात्कारी को 12 बार से अधिक पैरोल मिल चुका है।

सत्ता के इस कृत्य पर किसने विरोध जताया। तब कदम, कदम पर राज्य दर राज्य आ  रहे बलात्कारियों के चेहरे और बढ़‌ती घटनाए क्या यह तय नहीं करती कि हम सबने मिलकर औरतों  को मारा है और रोज मार रहे हैं...।

बुधवार, 21 अगस्त 2024

चौधरी को छवि की चिंता...

 चौधरी को छवि की चिंता...


यह तो बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय की कहावत को ही चरितार्थ करता है वरना अमित शाह जैसे कद्‌दावर नेता के खासमखास और प्रदेश सरकार के दमदार मंत्री ओपी चौधरी को अपनी छवि सुधारने के लिए इतनी कवायद नहीं करनी पड़ती।

कहा जा रहा है कि ३३ हजार शिक्षकों की भर्ती वाले मामले में विडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया में जिस तरह से ओपी चौधरी के ख़िलाफ़ बेरोजगारों ने मोर्चा खोला है उससे ओपी चौधरी अपनी छवि को लेकर कुछ ज्यादा ही चिंतित हो गए है, हालाँकि कलेक्टरी के दौरान भ्रष्टाचार के आरोप भी उन पर कम नहीं है, लेकिन अमित शाह के वरदहस्त में सुपर सीएम की कथित पदवी से उत्साहित ओपी चौधरी ने जिए ताह से सत्ता और संगठन में अपनी पकड़ मजबूत की थी वह उतनी ही तेजी से फिसलता जा रहा है।

और शायद यही वजह है कि उन्होंने अब अपनी छवि नये सिरे से गढ़ने की कवायद करने में  लग गये  हैं। दरअसल ओपी चौधरी यह बात भूल गये हैं कि एक बार छवि बिगड़ गई तो उसे सुधारना बड़ा टेढ़ा काम है लेकिन नौकरशाही का रुतबा उन्हें हार नहीं मानने दे रहा है, ऐसे में चर्चा  इस बात की भी है कि नेशनल प्रोपेगेंडा ग्रुप भोपाल वाले ने ठेका लिया कि वे हर हप्ते अपने सबसे बड़े पोर्टल में उनकी छवि सुधारेंगे तो दर्जन भर पोर्टल को भी छवि सुधारने की जिम्मेदारी तो दे दी गई लेकिन छवि है कि...!

राजीव गांधी को क्यों याद किया जाना चाहिए...

 राजीव गांधी को क्यों याद किया जाना चाहिए...


युवा प्रधानमंत्री, मिस्टर क्लीन के रूप में चर्चित रहे इंदिरा के बेटे राजीव गांधी की असमय मृत्यु ने देश को नई आधु‌निक सोच के साथ काम करने वाले को ही नहीं खोया था, बल्कि  उस  नये भारत की उम्मीद की नींव को भी धराशाही कर दिया था, जो विश्व में युवाओं ने जो सपने पाल रखे थे।

समूचा देश २० अगस्त को जब उन्हें याद कर रहा था तब मेरे ज़ेहन में रायपुर के उस छोटे से एयरपोर्ट में उनकी आमद  की धुंधली  तस्वीर में खो गया ।

हम रिपोर्टरों का समूह एक ही जगह पर खड़े थे और राजीव हम सबके बेहद नज़दीक। फोटोग्राफरों गोकूल सोनी - विनय शर्मा की सजग आँखें राजीव की एक एक हरकत पर

कैमरे को क्लीक कर रही थी तो तमाम कांग्रेसियों की नजर टकटकी लगाए राजीव को देख रही थी। हाथ हिलाते पत्रकारों के सामने से गुजरते हुए एक आवाज ने सबका ध्यान अपनी खीच लिया 

राजीव....

यही कहा था नेता शिवेन्द्र बहादूर सिंह ने। राजीव के लिए यह संबोधन जीतना सहज़ रहा होगा मौजूद लोगों के लिए उतना ही असहज । इस घटना की चर्चा अब भी होती है। राजीव और शिवेंद्र दून स्कूल के सहपाठी थे।

लेकिन वे जितने सहज और सरल थे उतने ही संवेदनशील और बेबाक ।

गांवों की बदहाली उन्हें भीतर तक सालती रही होगी इसलिए उन्होंने जब कहा कि केंद्र सरकार एक रुपये भेजतीं है वह गाँव तक पहुंचते पहुंचते 25 पैसे रह जाते है तब विपक्ष ने राजीव के इस कथन को कांग्रेस राज में भ्रष्टाचार के रूप में प्रस्तुत प्रस्तुत करने लगे और आज भी गाहे-बगाहे कांग्रेस राज में भ्रष्टाचार  के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। 

राजनैतिक चालबाज़ी से दूर 1984 के दंगों पर उनकी टिप्पणी को  भी विपक्ष  ने कांग्रेस के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल किया 'जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो....! लेकिन यह बात उन्होंने इंदिरा की जयंती समारोह में तब कही थी जब दंगे समाप्त हो चुके थे।

श्रीलंका में शांति  सेना भेजने की बात हो या उन पर हमला ।' कोई कैसे भूल सकता है।

इस देश को राजीव को क्यो याद कर नमन करना चाहिए यह बताने से पहले यह जान लेना जरूरी है कि उनकी हत्या की खबर जब लोगों तक पहुंची तब तक शाम का अंधेरा गहरा चुका था, दोपहर की इस घटना की खबर जब प्रेस तक पहुंची तो रोजमर्रा के कामकाज ऊफान पर था।

खट् खट् करते टेली प्रिंटर से आई इस खबर को देखकर सहसा किसी को भरोसा नहीं हो रहा था । पर नियति ने अपनी इबादत लिख दिया था । तब मैं दैनिक स्वदेश में रिपोर्टर की हैसियत से काम कर रहा था।

फ़्रंट पेज प्रशांत शर्मा देखते थे। उन्होंने ही यह खबर पहले दी थी, और इसके बाद आनन फानन में बुलेटिन निकाला गया था ।

राजीन के इस असमय चले जाने को लेकर देश भर से शोक संवेदनाओ ने टेली प्रिंटर की स्पीड बड़ा दी थी और  छोड़ गई राजीव की वह यादें जिसके लिए यह देश उन्हें हमेशा याद रखेगा।

राजीव ने इस देश को क्या दिया इसका सबसे अच्छा जवाब यह है कि आज जो दूरसंचार, डिजिटल हेडिया, सोशल मीडिया जो  कुछ भी दिखाई दे रहा है, उसके पीछे का मूल विचार राजीव का ही था। उन्होंने दूरसंचार क्रांति लाई। सी डॉट  से लेकर एमटीएनएल जैसी  कंपनियां उन्ही की देन है।

90 के दशक में जब लोग बेरोजगारी से जूझ रहे थे तब लाखों लोगों को रोजगार देने वाला एसटीडी पीसीओ बूथ उनकी ही देन है। स्वरोजगार का वर्तमान मॉडल जनसेवा केंद्र की नींव भी राजीव की सोच है।भारत का युवा आईटी सेक्टर में जो झंडे गाड़ रहा है उसके पीछे एक छोटी उम्र के प्रधानमंत्री की बड़ी सोच है । राजीव गांधी ने देश में कंप्यूटर क्रांति लाने का काम किया राजीव विज्ञान और तकनीक की ताकत जानते थे उन्होंने सस्ते कंप्यूटर के लिए इंपोर्ट ड्यूटी कम कर दी थी . रेलवे में कम्प्यूटरों का इस्तेमाल करके टिकीटिंग भी शुरू करवाई. राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने से पहले 1970 में देश में पब्लिक डिपार्टमेंट ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स की शुरुआत हो गई थी लेकिन आईबीएम के साथ देश मे कम्प्यूटर के व्यवसायिक उपयोग को गति राजीव के प्रयासों से ही मिली थी आज अगर भारत आईटी सेक्टर का सुपर पावर है तो उसकी एक वजह राजीव की सोच है।

राजीव गांधी को 21 वीं सदी के महान लोकतंत्र का सबसे बडा कैटेलिस्ट माना जाना चाहिए।  राजीव सरकार ने 1989 में संविधान के 61 वें संशोधन के जरिए वोट देने की उम्रसीमा 21 से घटाकर 18 वर्ष कर इस लोकतंत्र की जवान कर दिया, तो पंचायत राज अधिनियम लाकर ग्रामीण भारत को शहर के बराबर शक्तिशाली बनाया।

राजीव गांधी ने शिक्षा क्षेत्र में क्रांति की पहल करते हुए नवोदय विद्यालयों की शुरुआत की और गाँव के बच्चों को भी उत्कृष्ट शिक्षा मिले इसलिए गाँव -गाँव मे नवोदय विद्यालय खोलकर बच्चों को कक्षा 6 से 12 वीं तक की मुफ्त शिक्षा और हॉस्टल में रहने की सुविधा दी और आज नवोदय विद्यालय के विद्यार्थी पूरे देश विदेश मैं देश का झंडा ऊंचा कर रहे है

ये है इंदिरा के बेटे की सोच जिसकी वजह से उन्हें देश हमेशा याद रखेगा।