मंगलवार, 13 मई 2025

युद्ध से भी बड़ा ज़हर…

 युद्ध से भी बड़ा ज़हर…


इसी ज़हर के भरोसे आरएसएस अपनी राजनीति साधते रही है , यह बात हर मंच से उठते रहा है 

क्या है वह ज़हर…

कहते है इंसान की फ़ितरत नहीं बदलती, और जब अमेरिका के सीजफ़ायर की घोषणा से बौखलाए नफ़रती चिंटुओं ने जब कर्नल सौफ़िया पर विषवमन शुरू किया तो इस खेल में बीजेपी के मंत्री विजय शाह ही नहीं पूरी बीजेपी एक्सपोज़ हो गई, क्या विजय शाह को हटाया जाएगा, 

लेकिन शुरुआत तो शिवांगी नरवाल और विदेश सचिव विक्रम मिस्सी से हो चुकी थी 

इन सभी को गाली देने वाले एक ही थे, 

शालीनता की हर सीमा लांघने में तत्पर ये लोग कुछ भी कर सकते हैं 

यक़ीन मानिए ये लोग आतंकवादियों से भी ख़तरनाक है…

लेकिन आज हम एक और मुद्दा उठाना चाहते है , आख़िर आतंक के ख़िलाफ़ इस लड़ाई में भारत अकेले क्यों पड़ गया, जबकि पूरा विश्व आतंक के ख़िलाफ़ है

कूटनीति फेल क्यों हो गई जबकि प्रधानमंत्री मोदी सौ देश घूम आए है

क्या इसकी वजह सिर्फ़ अदाणी है 

क्या है हमारे दूसरे देशों से रिश्ते…

भारत आज विश्व में अकेला है।

और ये किसी युद्ध की वजह से नहीं —

बल्कि “नफरती चिंटू” गैंग की वजह से है कहा जाय तो ग़लत नहीं होगा..


11 साल की विदेश नीति देखने के बाद इतना तो कोई भी समझ सकता है —इन नफ़रती चिंटू गैंग ने हमारी कूटनीति का बहुत नुकसान किया है


पहले पड़ोसी देशों को देखिए:


● मालदीव — जहाँ “इंडिया फर्स्ट” था, अब “इंडिया आउट” है। लक्षद्वीप विवाद में “नफरती चिंटू गैंग” ने ट्रोलिंग से देश की छवि डुबो दी। चीन ने मौक़ा देख लिया।


● बांग्लादेश — जिसे आज़ादी दिलाई, उसे हर चुनाव में “घुसपैठिया” कहा गया। CAA-NRC ने रिश्ते जला डाले। सीमा पर गोलीबारी है, ढाका खामोश है।


● श्रीलंका — जब ज़रूरत थी, भारत पीछे रहा। चीन ने बंदरगाह खरीद लिया। “नफरती चिंटू” तमिल भावनाओं की बात तो करता रहा, ज़मीनी मदद नहीं दी।


● नेपाल — 2015 की नाकाबंदी, फिर रामजन्मभूमि की राजनीति। आज हमारी ज़मीन उसके नक्शे में है — नफरती चिंटू उसे हिंदू राष्ट्र बनाना चाहता है और दिल्ली चुप है।


● भूटान — जो कभी सबसे करीबी था, अब कहता है — "भारत अब दोस्त नहीं, दबाव है।"


● म्यांमार — सेना ने लोकतंत्र कुचला, भारत ने चुप्पी साध ली। नफरती चिंटू गैंग रोहिंग्या पर नफ़रत फैलाकर नैतिक धरातल भी गंवा दिया।


और ग्लोबल मंच पर?


● रूस — शीतयुद्ध का साथी अब चीन के साथ है। भारत बस तेल का ग्राहक बन गया।


● अमेरिका — हथियारों की डीलें हैं, लेकिन लोकतंत्र और प्रेस फ्रीडम पर वहाँ बार-बार भारत को कठघरे में खड़ा किया जा रहा है।


● फ्रांस — राफेल के बाद भी भारत की गिरती रैंकिंग और मुसलमानों के प्रति घृणा को लेकर चिंता ज़ाहिर कर चुका है।


● ईरान — भारत का कभी विरोध नहीं किया ,  “नफरती चिंटू” ने इस्लाम को गाली दी और चाबहार पोर्ट से भारत हटा, चीन आ गया। 


● मलेशिया-इंडोनेशिया — मुस्लिम विरोधी नैरेटिव ने वर्षों पुराने सांस्कृतिक रिश्तों को भी तोड़ दिया।


● फिलिस्तीन — भारत दशकों तक साथ था। अब सरकार इज़रायल के साथ हथियारों में व्यस्त है, जनता अकेली खड़ी है।


दरअसल दुनिया दोस्ती, भरोसे और स्थिरता की भाषा समझती है।





सोमवार, 12 मई 2025

मोदी के राष्ट्र के नाम संदेश के बाद…

 मोदी के राष्ट्र के नाम संदेश के बाद…


देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संदेश में एक बार फिर साफ़ किया कि पानी और खून साथ नहीं बह सकते, मुँह तोड़ जवाब दिया जाएगा, 

एक बार हमने इसलिए कहा कि यही बात पुलवामा के बाद और फिर पहलगाम के बाद बिहार में वे कह चुके थे

उन्होंने प्रधानमंत्री बनने से पहले रजत शर्मा को एक टीवी प्रोग्राम में क्या कहा उसे याद करने की ज़रूरत इसलिए नहीं है क्योंकि पीएम बनने के पहले की सारी बातें ऐसी ही वे करते रहे हैं

तब सवाल अब की बातों का है, सिजफ़ायर ने एक ही झटके में सब बदल दिया।

ट्रंप पर भी भरोसा न करें, तब किस पर?

ऑपरेशन का नाम चयन की सोच…

अब जब अमेरिका बीच में आ ही गया है और पीएम ने राष्ट्र के नाम संबोधन कर ही दिया है तब क्या इस पूरे प्रकरण की विवेचना अपने अपने ढंग से करने की छूट नहीं होनी चाहिए..

प्रमोद जैन लिखते हैं…

किसी भी प्रकरण की सफलता उसके परिणाम से आकी जाती है!

भले गेंद पूरे टाइम आपके पाले में रही, पर आखिरी मिनट में यदि पेनल्टी कॉर्नर पर सामने वाली टीम में आप पर गोल कर दिया,

तो आप जीता हुआ नहीं कह लाओगे!

पहलगाम के बाद कुछ नकारात्मक पहलू जो जनता को परेशान कर रहे हैं! 


1_सीजफायर यदि भारत की शर्तों पर हुआ है तो क्या भारत को पहलगाम और पुलवामा के आतंकवादियों के संदर्भ में अपनी बात नहीं रखनी चाहिए थी?

 और जो खुखार  आतंकवादी हैं उन्हें गिरफ्तार कर भारत में क्यों नहीं लाया गया? 


2_सीजफायर की घोषणा अमेरिका से करवा कर किसी तीसरे देश को भारत और पाकिस्तान के बीच में क्यों महत्व दिया गया? 


3_क्या भारत की विदेश नीति एक्सपोज नहीं हुई, ?


चीन ने खुलकर पाकिस्तान का साथ दिया अमेरिका पर्दे के पीछे पाकिस्तान के साथ गल बहियां करता रहा, और रूस तटस्थ, ना यूरोपीय देशों का समर्थन मिला युद्ध के संदर्भ में ना नाटो के मुस्लिम देश भारत के साथ खड़े हुए ना कोई पड़ोसी मुल्क!


4_और तो और बीएसएफ का एक जवान जो अभी पाकिस्तान के अभिरक्षा में है उसे तक भारत सरकार ने वापस नहीं लिया!


5_हिंदुस्तान के भांड मीडिया ने इतना झूठ क्यों बोला? और भारत की रणनीति को कमजोर क्यों किया?


 इसके बावजूद सरकार द्वारा उन पर कोई प्रतिबंध नहीं लिया गया! 


6_ट्विटर अकाउंट पर सेना के प्रवक्ता विपिन मिस्त्री को गालियां देकर, और पहलगाम के शहीद की पत्नी हिमांशी को जलील कर आखिर हिंदुस्तान के इन तथाकथित भक्तों ने कौन से संस्कारों का परिचय दिया?


7_अमेरिका और चीन कश्मीर के मुद्दे का अंतरराष्ट्रीय करण करने की कोशिश कर रहे हैं, भारत सरकार ने यदि उचित  स्टेप नहीं लिए तो यह भारत के लिए बेहद तकलीफ भरा कार्य रहेगा और इसे लेकर भी देश की जनता बहुत चिंतित है!


8_जिस परमाणु युद्ध की विभीषका का डर दिखाकर यह तथाकथित सीज फायर किया गया है तो क्या भारत को इसका पूर्वानुमान नहीं था?

 यानी यह खुफिया तंत्र कीविफलता है !


9_जिस तरह राफेल के लिए फ्रांस में तकनीक देने से मना किया है और जिस तरह राफेल को लेकर बहुत सारी कंट्रोवर्सी है उसके बाद क्या सरकार का चेहरा नंगा नहीं हुआ है कि उन्होंने भ्रष्टाचार के चलते  देश की सुरक्षा से समझौता किया है?


10_56 इंची सीने का दावा करने वाले मोदी जी स्थितियों का सामना क्यों नहीं कर पाते ?


ना तो आल पार्टी  मीटिंग में आए, न युद्ध विराम की घोषणा की, ना संसद का विशेष सत्र बुलाने की हिम्मत कर पा रहे हैं! 


11,_क्या सीज फायर के बाद पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद की गतिविधियां रुक जाएंगे और क्या अमेरिका की बात पर पाकिस्तान पर भरोसा किया जा सकता है?


12_अग्नि वीर योजना पर भारत के सेना अध्यक्षों ने  जो निराशा जाहिर की है , क्या उसके बाद सरकार एक बार फिर बैक फुट पर आएगी इस योजना केसंदर्भ में?

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लेकिन इन नकारात्मक पहलुओं में भी कुछ  सकारात्मक बातें भी थी, जिसे जनता ने स्वागत किया है! 


1_आतंकवादी गतिविधियों पर पहली बार सीधे पाकिस्तान पर आक्रमण कर भारत सरकार ने यह तो जाहिर किया है इन आतंकवादी घटनाओं के खिलाफ उनकी नीति जीरो टॉलरेंस की रहेगी!


 अगर भविष्य में सरकार चुनाव के समय ही अपने इस नीति पर काम करेगीतो लोग इसे इवेंट या स्टंट मान ने पर मजबूर होंगे!

पर अभी लोग सेना की वजह से इस पर विश्वास कर रहे हैं!


2_जिस तरह पूरे देश ने तमाम राजनीतिक दलों ने सरकार के और सेना के प्रति समर्थन जाहिर किया वह निश्चित रूप से इस देश की एकता और अखंडता की गारंटी था! 


3_भारतीय सेना ने अद्भुत पराक्रम दिखलाया और भारत की युद्ध क्षमता को सबके सामने जाहिर किया और जो हौसला सेना ने दिखाया वह देश के लिए एक सकारात्मक पहलू था!


4_सेना ने आतंकवादीअड्डे , ध्वस्त किए, टारगेटेड अटैक किया, एयर बेस और एयर डिफेंस नष्ट की और अपने नए दौर के युद्ध कौशल का परिचय दिया!


5_ पहलगाम की घटना के बाद जिस तरह घाटी में बंद रहा कश्मीर में बंद रहा, भारत की तमाम मस्जिदों से उस घटना का विरोध किया, धर्म पूछ जात नहीं इस नॉरेटिव को जिस तरह हिंदुस्तान की जनता ने मुंह तोड़ जवाब देकर भारत के आंतरिक  एकता का परिचय दिया वह भी इस घटना का एक सकारात्मक पहलू था!


6_जिस तरह यह कहा गया है की आतंकवादी हमले को सीधा युद्ध समझ जाएगा अगर यह जुमला साबित नहीं हुआ और भारत सरकार  मजबूती से इस रणनीति  पर खड़ी पाई गई तो यह भी एक बहुत बड़ा सकारात्मक पहलू रहेगा आतंकवाद को खत्म करने के लिए!

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दोनों पक्षों के अपने बचाव है अपने-अपने तथ्य है लेकिन जो एक भावनात्मक सैलाब भारत की जनता में बह रहा था pok के संदर्भ में बलूचिस्तान के संदर्भ में और आतंकवादियों को गिरफ्तार करने के संदर्भ में पाकिस्तान के टुकड़े करने के संदर्भ में उस झटका लगा है और इसलिए भी लगा मोदी जी की छवि को मीडिया ने आईटी सेल ने और एक राजनीतिक विचारधारा के लोगों ने इतना ओवररेटेड कर दिया था कि लोगों की आशाएं बहुत ज्यादा थी!

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और निष्कर्ष के रूप में हम यही मान सकते हैं सेना एक बार फिर भारत के लिए गौरव का विषय बनी है और सरकार की नीतियां आलोचना का! 

लेकिन जाते-जाते राहुल गांधी की भूमिका पर भी थोड़ा सा विचार कर ले उसने अग्नि वीर का विरोध किया  और सेना के साथ खड़ा हो गया, राहुल गांधी की सारी बातें सही क्यों निकलती है ?

 और अंत में…

पुलवामा और पहलगाम पर विपक्ष के आरोपों का जवाब नहीं दिया गया है!


रविवार, 11 मई 2025

अब इनकी भी सुन लो…

 अब इनकी भी सुन लो…



भारत और पाकिस्तान के बीच अप्रत्याशित सीजफायर ने कई लोगों को चौंका दिया है. सरकार के इस फैसले पर मशहूर जियोपॉलिटिकल एक्सपर्ट ब्रह्मा चेलानी और पूर्व सेनाध्यक्ष  जनरल वीपी मलिक ने भी सवाल उठाए हैं. 


               चेलानी ने कहा भारत जीत की दहलीज पर था, लेकिन अंत में मन मसोस कर रह गया. युद्धविराम पर नाराजगी जाहिर करते हुए उन्होंने कहा कि भारत इतिहास से सीखने में विफल रहा है. सिर्फ पिछली रणनीतिक गलतियों को दोहरा रहा है. सैन्य गतिविधि भारत के पक्ष में थी. पाकिस्तान की हवाई सुरक्षा भारत की अपेक्षा से कहीं अधिक कमजोर साबित हुई. वे भारत में बहुत सारे ड्रोन और मिसाइल भेज रहे थे, लेकिन प्रभावी रूप से नहीं. दूसरी ओर भारत ने सीमित संख्या में मिसाइल और ड्रोन भेजे और अपने लक्ष्यों को भेदने में सक्षम रहा.'


              ब्रम्हा चेलानी ने सैन्य रूप से स्पष्ट बढ़त रखने के बावजूद भारत के तनाव कम करने के निर्णय के पीछे के तर्क पर सवाल उठाया. उन्होंने कहा, 'यह जीत के मुंह से हार छीनने की भारत की पुरानी राजनीतिक स्थिति को रेखांकित करता है.' उन्होंने आश्चर्य होते हुए कहा कि भारत ने तनाव कम करने का फैसला क्यों किया.


             चेलानी ने मौजूदा स्थिति की तुलना पिछले उदाहरणों से की, जहां उनके विचार में, भारत ने स्थायी रणनीतिक लाभ हासिल किए बिना सैन्य या कूटनीतिक लाभ को आत्मसमर्पण कर दिया.  2021 में हमने रणनीतिक कैलाश हाइट्स को खाली कर दिया, बातचीत में अपनी एकमात्र सौदेबाजी चिप को खो दिया और फिर हम लद्दाख क्षेत्रों में चीनी-डिजाइन किए गए बफर जोन और अब ऑपरेशन सिंदूर पर सहमत हुए.'


            चेलानी ने कहा, 'ऑपरेशन सिंदूर में 26 हत्याओं का बदला लेने का एक शक्तिशाली प्रतीक था और फिर भी आज जिस तरह से हमने पाकिस्तान द्वारा दिल्ली पर मिसाइल दागे जाने के बाद इस ऑपरेशन को समाप्त किया, उससे कई सवालों के जवाब नहीं मिले.' चेलानी ने कहा, 'इतिहास आज भारत के निर्णय को अच्छी तरह से नहीं देखेगा.'


         उन्होंने 'ऑपरेशन सिंदूर' के समापन को रणनीतिक और प्रतीकात्मक चूक बताया, जो जवाब से अधिक सवाल उठाती है.


        करगिल युद्ध के नायक  तत्कालीन सेनाध्यक्ष रहे जनरल वीपी मलिक सीजफायर के ऐलान के बाद कहा - '22 अप्रैल को पहलगाम में हुए भयावह पाकिस्तानी आतंकी हमले के बाद भारत ने सैन्य और असैन्य कार्रवाइयालेकि, लेकिन इनसे कोई राजनीतिक या रणनीतिक लाभ मिला भी या नहीं- यह सवाल हमने भविष्य के इतिहास पर छोड़ दिया है।'

यह सच भी जान लें

परमाणु अप्रसार संधि 1970 में लागू की गई थी भारत ने इसे भेदभाव पूर्ण करार दिया और संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए थे ।

जिसकी वजह से आज भारत के पास अपनी आत्मरक्षा के लिए परमाणु हथियार है । कितना दबाव था जब 1971 में युद्ध दो मोर्चा पर भारत की सेना लड़ रही थी ।

आज भी 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान के आतंकवादी समर्थक ठिकानों पर सेना ने हमले करके । पाकिस्तान और आतंकवाद को मुंहतोड़ जवाब दिया है सेना के शौर्य पर कोई सवाल नहीं है। 

लेकिन युद्ध विराम करना था तो पाकिस्तान पर जोरदार प्रहार के बाद करते। 

भारतीय सेना मजबूत स्थिति में थी तो राजनीतिक नेतृत्व क्यों युद्ध विराम के लिए जल्दबाजी में राजी हो गया, जबकि हमले की शुरुआत पाकिस्तान ने की थी । यही हमारा सबसे मजबूत पक्ष था । हमारे लोग मारे गए थे ।

इसके विपरीत शिमला समझौते की शर्तों को तोड़ने में पाकिस्तान कामयाब रहा क्योंकि तीसरे की मध्यस्ता के बिना द्विपक्षीय समझौते से कश्मीर समस्या को हल करना था ये शर्ते भारत ने लगाई थी और पाकिस्तान इस शर्त को तोड़कर इसमें तीसरे अमरीका की घुसपैठ करवाना चाहता था ताकि भारत पर  दबाव  बनाया जाए।

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस चालाकी को समझा और दोनों पाकिस्तान और अमेरिका को कड़ा जवाब दिया था । आज  प्रधानमंत्री मोदी ने इस समझौते में अमेरिका को जवाब देने के बजाय तीसरे पक्ष को न जाने किस दबाव में स्वीकार किया है । शायद भविष्य में गोदी मीडिया इसका खुलासा कर पाए ।

लेकिन इस सब से हटकर देश के मीडिया संस्थान की खबर देखिए तो 22 अप्रैल के बाद फर्जी खबरों की बाढ़ सी चली है । फिर से वही सत्तासीन नेताओं के बचाव के लिए झूठे प्रोपेगैंडा की स्क्रिप्ट लिख दी गई है । उसे फैलाने का काम मंडली पूरे जोर से लग चुकी है ।

यह सवाल पूछने के बजाय कि युद्धविराम भी कुछ शर्तों पे किया जाता की

_पहलगाम हमले के 

हमलावरों की भारत को सौंप दिया जाए

सीमावर्ती इलाकों में भारत के खिलाफ कोई आतंकवादी घटना न हो इसके लिए सुरक्षात्मक उपाय तकनीक के इस्तेमाल की शर्त लगाई जा सकती थी

पाकिस्तान अंतराष्ट्रीय मदद 

का इस्तेमाल भारत के खिलाफ करता है उस विषय पर अंतराष्ट्रीय समर्थन हासिल कर पाकिस्तान को मिलने वाली आर्थिक मदद में रोक लगाई जा सकती थी ।

पाकिस्तान की सेना ही आतंकवाद की समर्थक है इस विषय को वैश्विक मंच पर रखकर पाकिस्तान समर्थित आतंक पर लगाम लगाई जा सकती थी

इन शर्तों पर युद्ध विराम होता तो भी भारत का मजबूत पक्ष वैश्विक स्तर पर उभर कर आता

 लेकिन ऐसा नहीं हुआ और यही बहुत चिंता की बात है ।

अमेरिका ने अपने व्यापारिक हित को महत्व दिया , पाकिस्तान शिमला समझौते की शर्त जिसमें की द्विपक्षीय वार्ता की शर्त भारत की थी उसको तोड़ कर अमेरिकी दबाव से युद्ध विराम अपने पक्ष में  करता दिखता है ।

लेकिन हमें क्या हासिल हुआ, गोदी मीडिया का झूठ, फर्जी खबरें बस यही परिणीति है क्या 140 करोड़ देशवासियों की, भारत बहुत सी आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक चुनौतियों से जूझ रहा है ।

लेकिन पाकिस्तान की तरह भिखमंगिरी भारत ने नहीं की है। भारत अपने दम पर आजाद हुआ और तमाम मुश्किलों के बावजूद आज एक मजबूत राष्ट्र बन कर खड़ा है तमाम अवरोधों, स्वार्थी राजनीति, के बावजूद 140 करोड़ भारत 

वासी स्वार्थी राजनीति और आतंकवाद से आज, कल और भविष्य मे भी टकराने को  तैयार है ।

शनिवार, 10 मई 2025

धोखा…

 धोखा…


पाकिस्तान कभी भी भरोसे के लायक़ नहीं है और उसने हमेशा ही पीठ पर छुरा मारा है 

तब भारत को क्या अब अंतिम उपचार नहीं करना चाहिए

ट्रंप ने जैसे ही सीजफ़ायर की घोषणा की लोग इंदिरा को याद करने लगे

पूरा सोशल मीडिया इंदिरा की तारीफ़ से भर गया,

ऐसे में कुछ सवाल जो सोशल मीडिया में सुलगने लगे

उन चार आतंकवादियों का अब तक  ना पकड़ा जाना, 


उसके बाद पाकिस्तानी सेना द्वारा आम नागरिकों की हत्या,


सैनिकों का शहीद होना, 


पाकिस्तान को लोन मिलना, 


इस सबके दौरान मीडिया का बेशर्मी से अनियंत्रित होकर झूठ फैलाना,


अमेरिका का खुले आम कहना कि हमने सीज़फायर करवाया, जबकि हमारा स्टेंड हमेशा से रहा है कि हम तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार नहीं करेंगे, 


कूटनीतिक रूप से असफलता, जबकि कहा जाता है कि हमारा डंका विदेशों में बज रहा है,


पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वी पी मलिक का बेहद निराशाजनक बयान कि हमें इस सबसे क्या मिला,


इन सब बातों के बाद भी आप सरकार का समर्थन कर रहे हैं तो मान लीजिये कि आपकी भक्ति देश से बढ़कर किसी पार्टी के प्रति है, और ये शर्म की बात है.

मनी तिवारी लिखते है… आप लोग अपने अपने तर्क और अंदाजे लगाते रहिए पर इस युद्ध और युद्धविराम, दोनों के पीछे पूरा खेला IMF का ही है। 


आईएमएफ यानी "इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड" हिंदी में कहें तो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष।


एक तरीके से बीसी या फिर कमेटी वाले खेल की तरह यहां भी करीब 190 देश अपना अंशदान करते है ताकि संकट में जरूरत पड़ने पर यहां से लोन लिया जा सके।


अब पाकिस्तान को लोन चाहिए था तो उसे अपने देश पर संकट तो दिखाना पड़ेगा, मसलन भारत ने वो मंसूबा पूरा कर दिया। फिर अमेरिका के वॉशिंगटन डीसी स्थित आईएमएफ मुख्यालय से पाकिस्तान को वो फंड भी जारी कर दिया गया।


190 देशों के इकट्ठा किए अरबों डॉलर किसी को संकट के नाम पर बांट देना कोई आसान काम नहीं है। बकायदे तनाव और युद्ध जैसी स्थितियां निर्मित करनी पड़ती है।


बाकी दलाली क्या होता है आप सब को पता हइए है। किसी सरकारी बैंक से लोन अप्रूव तो आपने भी करवाया  ही होगा।

रजनीश जे जैन का लिखना है… सीज़फायर ! इस एक शब्द ने बहुत कुछ बदल दिया है। 


आज दो बाते सिद्ध हुई। पहला , यह तय हो गया कि दुनिया का चौधरी कौन है। विश्व गुरु का गुब्बारा फुट गया।  दूसरा ,  भारत की कूटनीति पर प्रश्न चिन्ह लग गया। सन इकहत्तर में जो कमाया था , आज गँवा दिया।  भारत पाकिस्तान को आतंकवादी राष्ट्र घोषित नहीं करवा पाया , न ही आईएमएफ को खैरात देने से रोक पाया ,  न ही पहलगाम  पीड़ितों को न्याय दिला पाया ! 


अब सवाल तो उठेंगे ही ! पीछा भी करेंगे। मिटटी में मिला देने वाली हुंकार का क्या होगा ? यह भी पूछा जाएगा कि क्या  एक रिफाइनरी और एक पोर्ट आई बी की ख़ुफ़िया रिपोर्ट में संभावित टारगेट होने की पुष्टि के बाद सीज फायर की प्रस्तावना लिखी गई ?


देश तो सवाल करेगा ही , और करना भी चाहिए कि ऐसी कौन सी नस दबा दी मित्र डोलांड ने जिसने भारत के विजय रथ को रोक दिया है।

और भी लोगो की प्रतिक्रिया में इंदिरा ऐसे याद आई..





कागो प्रसादो महलो अपि न गरुणायते....


अर्थात महल के सबसे उंचे शिखर पर बैठने से कौवा कभी गरुण नहीं हो जाता।


इसी तरह पीएम की कुर्सी पर बैठ जाने से हर कोई इंदिरा नहीं बन जाता, वह इंदिरा गांधी ही थी जिसने अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन को अपने जूती के नोक पर रखा, पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए एवं 1983 में दुनिया के 108 गुट निरपेक्ष राष्ट्रों का नेतृत्व संभाला।


सर्दियों का नवंबर 1971...

इंदिरा गांधी अमेरिका के दौरे पर थीं। व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति निक्सन से मुलाकात हुई। बातचीत शुरू होते ही निक्सन ने घमंड में डूबकर चेतावनी दे डाली:

"अगर भारत ने पाकिस्तान के मामले में नाक घुसाई, तो अमेरिका चुप नहीं बैठेगा!"


इंदिरा गांधी ने बिना किसी उत्तेजना के, बेहद गरिमामयी अंदाज़ में जवाब दिया:

"भारत अमेरिका को मित्र मानता है, मालिक नहीं। हम अपनी किस्मत खुद लिखते हैं।"

और इतना कहकर वे बैठक छोड़कर उठ गईं।


बाद में इस पूरी मुलाकात का ज़िक्र अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने अपनी आत्मकथा "White House Years" में किया।


उस दिन बैठक के बाद मीडिया को साझा संबोधन होना था — पर इंदिरा गांधी बाहर निकलते ही कार्यक्रम रद्द करके सीधे अपनी कार की ओर बढ़ गईं।


कार का दरवाज़ा बंद करते वक्त किसिंजर ने कहा:

"मैडम, आपको नहीं लगता कि राष्ट्रपति के प्रति थोड़ा और धैर्य दिखाना चाहिए था?"


इंदिरा गांधी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया:

"धन्यवाद मिस्टर सेक्रेटरी, भारत भले ही विकासशील देश हो, लेकिन हमारी रीढ़ की हड्डी मजबूत है। हमारे पास अत्याचार झेलने की आदत नहीं, बल्कि उसका जवाब देने का साहस है। वो दिन लद चुके जब कोई ताकत हज़ारों मील दूर बैठकर हम पर राज कर सके।"


इसे कहते हैं नेतृत्व, साहस और आत्मविश्वास ।


" एक वो थीं.....,एक ये हैं "


युद्ध समाप्ति की घोषणा अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने किया, ऐसा भारत के इतिहास में पहली बार हुआ, एक सार्वभौमिक राष्ट्र का अपमान हुआ ।


गरिमामयी हार भी स्वीकार्य है किन्तु साहसहीन,डरपोक नेतृत्व कभी नहीं, कभी भी नहीं !


मंगलवार, 6 मई 2025

जूलियस रेबेरो ने पीएम नरेंद्र मोदी से क्या कहा

 जूलियस रेबेरो ने पीएम नरेंद्र मोदी से क्या कहा, कृपया पढ़ें


पंजाब के पूर्व डीजीपी और देश के बेहद प्रतिष्ठित आईपीएस अधिकारी के विचार.

जूलियस रेबेरो आईपीएस (सेवानिवृत्त) (पूर्व डी.जी.पी. महाराष्ट्र)

आंखें खोलने वाला

देश के नागरिक के तौर पर मुझे लगा कि ये बात उन तक पहुंचानी होगी.

मोदी जी, एक मंच पर खड़े होकर चिल्लाने और यह सवाल पूछने का कोई 👍मतलब नहीं है कि पिछले 60 वर्षों में क्या हासिल हुआ। क्या आपको नहीं लगता कि हमारे देश के नागरिक मूर्ख हैं.  आप एक ऐसे देश के प्रधान मंत्री हैं, जो 300 से अधिक वर्षों तक ब्रिटिश शासन के अधीन था।  लोग बिल्कुल गुलामों की तरह जी रहे थे।  आज़ादी के बाद 1947 में कांग्रेस सत्ता में आई और शून्य से शुरुआत की. इस देश में अंग्रेजों द्वारा छोड़े गए कूड़े के अलावा कुछ भी नहीं था। अंग्रेजों के भारत छोड़ने के बाद से भारत के पास एक पिन बनाने के भी संसाधन नहीं थे।  पूरे देश में केवल 20 गांवों के लिए बिजली उपलब्ध थी।  इस देश में केवल 20 शासकों (राजाओं) के लिए ही टेलीफोन सुविधा उपलब्ध थी। पीने के पानी की कोई आपूर्ति नहीं थी. केवल 10 छोटे बांध थे।  खेती के लिए न अस्पताल, न शैक्षणिक संस्थान, न खाद, न चारा, न पानी की आपूर्ति।  कोई नौकरियाँ नहीं थीं और पूरे देश में केवल भुखमरी देखी जा सकती थी।  अनेक शिशुओं की मृत्यु हुई।  सीमा पर बहुत कम सैन्य कर्मचारी. केवल 4 विमान, 20 टैंक और देश के चारों तरफ पूरी तरह खुली सीमाएँ। बहुत कम सड़कें और पुल। खाली खजाना.


इन परिस्थितियों में नेहरू सत्ता में आये।


60 साल बाद भारत क्या है?

विश्व की सबसे बड़ी सेना में से एक.  हजारों युद्धक विमान, टैंक।  लाखों औद्योगिक संस्थान। लगभग सभी गांवों में बिजली. सैकड़ों विद्युत विद्युत स्टेशन। लाखों किलोमीटर लंबे राष्ट्रीय राजमार्ग और ओवर ब्रिज।  नई रेलवे परियोजनाएं, स्टेडियम, सुपर स्पेशलिटी अस्पताल, अधिकांश भारतीय घरों में टेलीविजन, सभी देशवासियों के लिए टेलीफोन।  देश के भीतर और बाहर काम करने के लिए सभी बुनियादी ढांचे, बैंक, विश्वविद्यालय, एम्स, आईआईटी, आईआईएम, परमाणु हथियार, पनडुब्बी, परमाणु स्टेशन, इसरो, नवरत्न सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयाँ।

सालों पहले लाहौर तक घुसी थी भारतीय सेना...पाकिस्तान के 2 टुकड़े कर दिए. पाकिस्तान के 1 लाख सैनिकों और कमांडरों ने भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।

भारत ने खनिज और खाद्य पदार्थों का निर्यात शुरू कर दिया। श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा बैंकों का राष्ट्रीयकरण। भारत में कंप्यूटर का आगमन हुआ और भारत तथा देश के बाहर रोजगार के अनेक अवसर प्राप्त हुए।

आप सूचना प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल कर पीएम बने हैं.

जब आपने प्रधानमंत्री का पद संभाला था, तब भारत दुनिया की शीर्ष 10 अर्थव्यवस्थाओं में था। इसके अलावा जीएसएलवी, मंगलयान, मोनोरेल, मेट्रो रेल, अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे, पृथ्वी, अग्नि, नाग, परमाणु पनडुब्बियां....ये सब आपके पीएम बनने से पहले ही हासिल कर लिया गया था।

कृपया लोगों के पास चिल्लाने और पूछने न आएं कि कांग्रेस ने 60 वर्षों में क्या हासिल किया है।

कृपया लोगों को बताएं कि आपने पिछले 9 वर्षों में क्या हासिल किया है, नाम बदलने, मूर्ति स्थापित करने और लगातार गाय की राजनीति करने, हिंदू और मुस्लिम, हिंदू और ईसाई, हिंदू और दलित, हिंदू और अन्य अल्पसंख्यकों के बीच दरार पैदा करने के अलावा।

आपकी असफल नोटबंदी, खराब ढंग से क्रियान्वित जीएसटी (आज़ादी मिलने के बाद से सबसे कम) और लोगों को लंबी कतारों में खड़ा करना, जिससे अनावश्यक मौतें हुईं।

पाखंडी भाजपाइयों ने एफडीआई का विरोध किया और अब भाजपा बेशर्मी से एफडीआई का समर्थन कर रही है.. भाजपा भारत को अंबानी और अडानी को बेच रही है और भारत सरकार के स्वामित्व वाली एचएएल के बजाय अनिल अंबानी की 2 महीने पुरानी कंपनी को राफेल सौदा इसका एक प्रमुख उदाहरण है.. भाजपा  ज्यादा टैक्स लगाकर पेट्रोल, डीजल और एलपीजी के दाम बढ़ा दिए, जबकि कच्चे तेल के दाम सस्ते हो गए.. मोदी सरकार ने गरीबों से मिनिमम बैलेंस न रख पाने पर एसबीआई के जरिए जुर्माने के तौर पर 1771 करोड़ रुपये वसूले हैं.  भारत के लोग.  विकास अमित शाह के बेटे, शौर्य डोभाल, अंबानी, अडानी, बाबा रामदेव के पतंजलि समूह और बीजेपी को प्रायोजित करने वाले लोगों के लिए हो रहा है.. बीजेपी ने गंगा नदी को साफ करने के लिए 3000 करोड़ रुपये खर्च किए हैं, जिसका भ्रष्टाचार हर कोई पा सकता है  गंगा नदी में डुबकी लगाने से आप अपने पूरे शरीर पर मल, मैल, ग्रीस लेकर बाहर आते हैं।

पुनश्च.  यह कांग्रेस के प्रचार अभियान का विज्ञापन नहीं है.  मैं कांग्रेस समर्थक नहीं हूं.  मैं सिर्फ एक जागरूक मतदाता हूं, जो हर बार यह महसूस करता है कि यह उसकी बुद्धि का अपमान है जब वर्तमान सरकार कहती है कि हमारा देश पिछले 60 वर्षों में अच्छा नहीं रहा है!

गरिमा पर समझौता नहीं किया जा सकता!!

From Rakesh Nagar post

बुधवार, 23 अप्रैल 2025

आपदा में अवसर और गिद्धों की वोटों पर निगाह


 आपदा में अवसर और गिद्धों की वोटों पर निगाह 

करोना काल में जब देश के प्रधान सेवक ने आपदा में अवसर की बात कही थी तब भी कुछ लोग आक्सीजन और रेमडीसीवीर की कालाबाज़ारी कर रहे थे

शायद उन्हीं लोगो को अब पहलगाम में हुए आतंकी हमला से मारे गये लोगों की चिता की राख ठंडी होने का भी सब्र नहीं है और वे लोग नफ़रत की बीज बोकर वोटों की फसल काटने आतुर है

आतंकवादियों की नीचताई पर सरकार से सवाल क्यों नहीं पूछा जा रहा…

नीचता की भी हद होती है, लेकिन भाजपाइयों ने तो उसे भी पार कर दिया है...


वोटिंग कैंपेन में लगे हो तुम?

27 भारतीयों की लाशें पड़ी हैं, और तुम्हारी आंखों में सिर्फ वोट नाच रहा है?


सरकार तुम्हारी, गृहमंत्री तुम्हारा, जिम्मेदारी भी तुम्हारी — फिर क्यों नहीं जवाब दे रहे हो?

कश्मीर में 2000 पर्यटकों की मौजूदगी में आतंकवादी घुस आए, हमला किया, लोगों को बेरहमी से मार डाला और आराम से निकल भी गए — कहाँ थी तुम्हारी सुरक्षा? कहाँ था तुम्हारा इंटेलिजेंस?


गृहमंत्री कहां थे उस वक़्त? चुप क्यों हैं अब?

क्या गृहमंत्री सिर्फ चुनावी भाषणों और रैलियों के लिए हैं? जब देश के नागरिक मारे जा रहे हों, तब क्या उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं?


पूछो सवाल! उठाओ आवाज़! मांगो इस्तीफा उस निकम्मे गृहमंत्री से!

और पाकिस्तान से आये इन दरिंदों के आकाओं को सबक सिखाने की बात करो, सिर्फ टीवी पर गाल बजाने से कुछ नहीं होगा!


लेकिन नहीं —

तुम्हारा ज़मीर तो कब का मर चुका है…

तुम्हें हर लाश में सिर्फ एक नया वोट बैंक दिखता है,

तुम्हें हर आतंकवादी हमले में चुनावी रणनीति नज़र आती है,

तुम इंसान नहीं, प्रचार के गुलाम बन चुके हो।


कल से देख रहा हूँ —

कोई नहीं पूछ रहा कि सुरक्षा कहाँ थी,

कोई नहीं पूछ रहा गृहमंत्री क्या कर रहे थे,

कोई नहीं कह रहा कि इस बर्बर हमले का ज़ोरदार बदला लिया जाए!


नीचता की भी कोई हद होती है...

गुरुवार, 17 अप्रैल 2025

ग्राहम स्टेन्स की हत्या करने वाला महेंद्र की रिहाई

 ग्राहम स्टेन्स की हत्या करने वाला महेंद्र की रिहाई  




आस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स को जिंदा जलाकर मार डालने के अपराध में शामिल महेंद्र हेम्ब्रम को अच्छे व्यवहार के आधार पर जेल से रिहा कर दिया गया है । 


ऑस्ट्रेलिया के एक पादरी थे ग्राहम स्टेन्स । ओडिशा के आदिवासी इलाकों में कुष्ठ रोगियों की सेवा करते थे। 30 सालों से वहां एक्टिव थे । 

22-23 जनवरी 1999 के रात की बात है जब वह अपने दो बेटों 10 साल के फिलिप और 6 साल के टिमोथी के साथ ग्राहम अपनी जीप में सो रहे थे । तभी कुछ लोगों ने उनकी जीप में आग लगा दी । उन्हें शक था कि ग्राहम सेवा की आड़ में धर्मांतरण कराते हैं । अपने 2 बेटों के साथ ग्राहम स्टेन्स जीप में जिंदा जलकर मर गए । 

इस घटना ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया था । इस केस में 51 लोगों की गिरफ्तारी हुई जिसमे 14 लोग दोषी पाए गए पर सजा 3 को ही हुई । सजा पाए इन्हीं लोगों में से एक था महेंद्र हेम्ब्रम । कोर्ट ने उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी लेकिन 25 साल की कैद के बाद अब उसे कोर्ट ने रिहा कर दिया गया है क्योंकि कैद मे उसका व्यवहार ‘ अच्छा ‘ पाया गया है । 

'द हिंदू' की रिपोर्ट के मुताबिक, महेंद्र हेम्ब्रम की रिहाई के लिए ओडिशा राज्य सजा समीक्षा बोर्ड (Odisha State Sentence Review Board) ने सिफारिश की थी । इसके बाद कोर्ट ने जेल में 'अच्छे व्यवहार’ के आधार पर हेम्ब्रम को रिहा करने का आदेश दिया। 25 साल की उम्र में सजा मिली । 50 साल का हेंब्रम बुधवार को जेल से बाहर आया । स्वागत में उसके समर्थकों ने उसे माला पहनाई और ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाए । 

दारा सिंह जेल में- 

ग्राहम स्टेन्स को बेटों समेत जिंदा जलाने वाले लोगों में हेम्ब्रम के अलावा दारा सिंह भी मुख्य दोषी पाया गया था । उसे कोर्ट ने मौत की सजा सुनाई थी । पर बाद में इसे आजीवन कारावास में बदल दिया था । दारा सिंह अब इस मामले का अकेला दोषी है, जो अभी भी जेल में है । उसकी भी रिहाई के लिए भी लगातार अभियान चलाया जा रहा है और उम्मीद है कि वह भी ‘ अचछे व्यवहार ‘ के आधार पर शीघ्र रिहा हो जाएगा । 

इन लोगों की रिहाई कैंपेन को प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन माझी ने भी तब समर्थन दिया था , जब वो क्योंझर से विधायक होते थे ।