बुधवार, 21 मई 2025

राजीव का सच…

राजीव का सच…



राजीव गांधी की पुण्यतिथि पर जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर उन्हें श्रद्धांजलि दी तो राजीव से जुड़े क़िस्से एक बार फिर लोगों के ज़ेहन में समा गया।

वह सौम्य और मुस्कुराता चेहरा, जिस पर किसे प्यार न आ जाये

उपलब्धियों का ऐसा पिटारा जिस पर देश को गर्व हो, 

नवोदय स्कूल, पंचायती राज, सूचना क्रांति, राममंदिर का ताला खुलवाना और वोट देने १८ साल के युवाओं को अधिकार ।

और शायद यही वजह थी कि स्वराजीव गॉधी की अंतिम यात्रा में शामिल होने दुनिया के 64 देशों से उच्च स्तरीय प्रतिनिधि आये थे , जिसमें से 20 राष्ट्राध्यक्ष थे।किसी भी देश के पूर्व प्रधानमंत्री की अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिये इतनी बड़ी संख्या में विदेशी प्रतिनिधियों  राष्ट्राध्यक्षों काशामिल होना यह दर्शाता है कि राजीव गॉधी को पूरा विश्व कितनी अहमियत देता था  यूएनओ के महासचिव  फ़िलिस्तीन के यासीरअराफात भी आये थे। यासीर अराफ़ात साहब जैसे मज़बूत शख़्स को भी राजीव जी के मृत शरीर के पास रोते हुऐ देखा गया था अमेरिका के House of Representatives के सदस्यों ने सदन में दो मिनट का मौन रखकर राजीव जी को श्रद्धांजलि दी थी औरतत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश ने गहरी संवेदना व्यक्त करते हुऐ राजीव जी अपने संबंधों को याद किया था।

राजीव को बस पांच साल मिले। प्रशासनिक रूप से वे बेहद कल्पनाशील,सफल थेराजनैतिक रूप से उतने ही अल्हड़। मित्रो और सलाहकारो पर भरोसा भी प्रेम का एक रूप है। उनके दौर के कुछ फैसले सम्प्रदायिक राजनीति की जड़ में माने जाते है। मगर कोई ये नही कह सकता कि राजीव साम्प्रदायिक व्यक्ति थे। प्रेमिल व्यक्ति वैसा हो ही नही सकता। 

राजीव के परिवार में प्रेम की वही धारा बहती है। राजीव की हत्या के बाद तीस बरसो में उन्होंने क्या नही देखा। सत्ता का सुखअपमानका सागर। बच्चो का चाइल्डहुड ट्रामाउससे उबरनाडूबना , झूलनासँघर्ष करनासामना करना.. चाहे आप उनके तरीकों औरस्मार्टनेस पर सवाल उठा लें। उनके जूतेकपड़ेजीवन शैली पर बदनाम करेंएब्यूज करें। मगर उनकी आंखों में नफरत कभी नहीमिलेगी।

नफ़रत के इस दौर में राजीव को याद करने के कई मायने है..

इसमें सोनिया गांधी के पत्र के उस अंश को भी पढ़ें और सुने की राजनीति हमे कहाँ पर ला कर पटक दिया है…

मुझे मेरा राजीव लौटा दीजिए मैं लौट जाऊंगी, नहीं लौटा सकते तो मुझे भी इसी मिट्टी में मिल जाने दो


आपने देखा है न उन्हें। चौड़ा माथा, गहरी आंखे, लम्बा कद और वो मुस्कान। जब मैंने भी उन्हें पहली बार देखा, तो बस देखती रह गयी। साथी से पूछा- कौन है ये खूबसूरत नवजवान। हैंडसम! हैंडसम कहा था मैंने। साथी ने बताया वो इंडियन है। पण्डित नेहरू की फैमिली से है। मैं देखती रही। नेहरू की फैमिली के लड़के को।


कुछ दिन बाद, यूनिवर्सिटी कैंपस के रेस्टोरेन्ट में लंच के लिए गयी। बहुत से लड़के थे वहां। मैंने दूर एक खाली टेबल ले ली। वो भी उन दूसरे लोगो के साथ थे। मुझे लगा, कि वह मुझे देख रहे है। नजरें उठाई, तो वे सचमुच मुझे ही देख रहे थे। क्षण भर को नज़रें मिली, और दोनो सकपका गए। निगाहें हटा ली, मगर दिल जोरो से धड़कता रहा।


अगले दिन जब लंच के लिए वहीं गयी, वो आज भी मौजूद थे। वो पहली नजर का प्यार था। वो दिन खुशनुमा थे। वो स्वर्ग था। हम साथ घूमते, नदियों के किनारे, कार में दूर ड्राइव के लिए निकलते, हाथों में हाथ लिए सड़कों पर घूमना, फिल्में देखना। मुझे याद नहीं कि हमने एक दूसरे को प्रोपोज भी किया हो। जरूरत नही थी, सब नैचुरल था, हम एक दूसरे के लिए बने थे। हमे साथ रहना था। हमेशा।


उनकी मां प्रधानमंत्री बन गयी थीं। जब इंग्लैंड आईं तो राजीव ने मिलाया। हमने शादी की इजाजत मांगी। उन्होंने भारत आने को कहा। भारत? ये दुनिया के जिस किसी कोने में हो राजीव के साथ कहीं भी रह सकती थी। तो आ गयी। गुलाबी साड़ी, खादी की, जिसे नेहरू जी ने बुना था, जिसे इंदिरा जी ने अपनी शादी में पहना था, उसे पहन कर इस परिवार की हो गयी। मेरी मांग में रंग भरा, सिन्दूर कहते हैं उसे। मैं राजीव की हुई, राजीव मेरे, और मैं यहीं की हो गयी।


दिन पंख लगाकर उ’ड़ गए। राजीव के भाई नही रहे। इंदिरा जी को सहारा चाहिए था। राजीव राजनीति में जाने लगे। मुझे नही था पसंद, मना किया। हर कोशिश की, मगर आप हिंदुस्तानी लोग, मां के सामने पत्नी की कहां सुनते हैं। वो गए, और जब गए तो बंट गये। उनमें मेरा हिस्सा घट गया। फिर एक दिन इंदिरा जी बाहर निकलीं तो गो’लियों की आवाज आई। दौड़कर देखा तो खू’न से ल’थप’थ। आप लोगों ने छ’लनी कर दिया था। उन्हें उठाया, अस्पताल दौड़ी, उन खू’न से मेरे कपड़े भीगते रहे। मेरी बांहों में द’म तोड़ा। आपने कभी इतने करीब से मौ’त देखी है?


उस दिन मेरे घर के एक नही, दो सदस्य घट गए। राजीव पूरी तरह देश के हो गए। मैंने सहा, हंसा, साथ निभाया। जो मेरा था, सिर्फ मेरा उसे देश से बांटा। और क्या मिला। एक दिन उनकी भी ला’श लौटी। कपड़े से ढंका चेहरा। एक हंसते, गुलाबी चेहरे को लोथड़ा बनाकर लौटा दिया आप सबने।

उनका आखरी चेहरा मैं भूल जाना चाहती हूं। उस रेस्टोरेंट में पहली बार की वो निगाह, वो शामें, वो मुस्कान।बस वही याद रखना चाहती हूं। इस देश में जितना वक्त राजीव के साथ गुजारा है, उससे ज्यादा राजीव के बगैर गुजार चुकी हूं। मशीन की तरह जिम्मेदारी निभाई है। जब तक शक्ति थी, उनकी विरासत को बिखरने से रोका। इस देश को समृद्धि के सबसे गौरवशाली लम्हेे दिए। घर औऱ परिवार को संभाला है।एक परिपूर्ण जीवन जिया है। मैंने अपना काम किया है। राजीव को जो वचन नही दिए, उनका भी निबाह मैंने किया है।


सरकारें आती जाती हैं। आपको लगता है कि अब इन हार जीत का मुझ पर फर्क पड़ता है। आपकी गालियां, विदेशी होने की तोहमत, बार बाला, जर्सी गाय, विधवा, स्मगलर, जासूस … इनका मुझे दुख होता है? किसी टीवी चैनल पर दी जा रही गालियों का दुख होता है, ट्विटर और फेसबुक पर अनर्गल ट्रेंड का दुख होता है?? नही, तरस जरूर आता है।


याद रखिये, जिससे प्रेम किया हो, उसकी लाश देखकर जो दुख होता है। इसके बाद दुख नही होता। मन पत्थर हो जाता है। मगर आपको मुझसे नफरत है, बेशक कीजिये। मैं आज ही लौट जाऊंगी। बस, राजीव लौटा दीजिए। और अगर नहीं लौटा सकते, तो शांति से, राजीव के आसपास, यहीं कहीं इसी मिट्टी में मिल जाने दीजिए। इस देश की बहू को इतना तो हक मिलना चाहिए शायद।


(सोनिया गांधी के पत्र का एक अंश!) The Unreal Realities से साभार

इस सवाल का जवाब मोदी को देना चाहिए…

 इस सवाल का जवाब मोदी को देना चाहिए…


सवाल यह नहीं है कि मोदी सरकार के आने के बाद हिंदू ख़तरे में है? और न ही सवाल मोदी सत्ता के रहते बारह लाख लोगों का इस देश की नागरिकता छोड़ देने का है? सवाल तो मोदी के उन लाड़लों का है जिन्हें देश के कर्णधार बनाये गये है लेकिन इन कर्णधारों का भविष्य इस देश में नहीं विदेश में जा बसे हैं।


आप सुनकर और जानकार हैरान हो जाएँगे कि भारत की सुरक्षा और विदेश नीति के शीर्ष निर्णय जिन हाथों से लिए जाते हैं, आज उन्हीं हाथों के उत्तराधिकारी इस देश से मुँह मोड़ चुके हैं। और उसके बाद यदि वे पद पर हैं तो इस देशभक्ति पर क्या संदेह नहीं करना चाहिए ?


NSA अजीत डोभाल — देश की सुरक्षा का चेहरा।

उनके बेटे विवेक डोभाल — अब ब्रिटिश नागरिक।


विदेश मंत्री एस. जयशंकर — भारत की वैश्विक नीति के शिल्पकार।

उनके बेटे ध्रुव जयशंकर — अब अमेरिकी नागरिक।


यह सिर्फ दो लोगों का  मामला नहीं है। यह दर्शाता है कि जिनके पास इस देश के भविष्य की कमान है, उनके अपने भविष्य इस देश से बाहर बँधे हैं।

यह विचारणीय नहीं, बल्कि खतरनाक है।

जब नीति-निर्माताओं की अगली पीढ़ी इस देश में नहीं, तो क्या उनकी नीतियाँ इस देश के भविष्य के प्रति समर्पित होंगी?

जब उनके बच्चे यहाँ के स्कूल, अस्पताल, सड़कों, प्रदूषण, बेरोज़गारी, सैनिकों की शहादत — किसी भी सच्चाई से नहीं जुड़ते, तो क्या वे नीतियाँ आम भारतीय के जीवन की सच्ची परछाईं होंगी?

क्या भारत अब ‘सेवा का स्थान’ मात्र रह गया है, और ‘जीवन का सपना’ कहीं और?

क्या यह देश नेतृत्व की प्रयोगशाला बनकर रह गया है, जहाँ नेता अपने बच्चों के लिए पश्चिमी जीवन की नींव डालते हैं?

यह सवाल अब सत्ता से नहीं — जनता से है।

क्या हम ऐसे नेतृत्व को आँख मूंदकर स्वीकारते रहेंगे, जिनका भावी वंश इस देश में साँस लेने तक को तैयार नहीं?

तब सबसे बड़ा सवाल है कि इन लोगों के द्वारा सिर्फ नागरिकता नहीं छोड़ी गई है, ये भरोसा छोड़ा गया है।

तब देश के प्रधान सेवक को जवाब देना चाहिए कि वे कैसा देश गढ़ रहे है जिनमे उनके ही विश्वास पात्रों को इस देश पर विश्वास नहीं?

मंगलवार, 20 मई 2025

पहलगाम के बाद आई एपीसीआर की रिपोर्ट भयावह…

 पहलगाम के बाद आई एपीसीआर की रिपोर्ट भयावह…



एपीसीआर (Association for Protection of Civil Rights) की रिपोर्ट के अनुसार, पहलगाम हमले के बाद भारत में 184 घृणास्पद घटनाएं हुई हैं, जिनमें 316 लोग प्रभावित हुए हैं. इन घटनाओं में से 116 में पहलगाम हमला एक ट्रिगरिंग फैक्टर के रूप में कार्य कर सकता है. रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 43 घटनाएं हुई हैं, इसके बाद महाराष्ट्र, उत्तराखंड और मध्य प्रदेश का स्थान है. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इन घटनाओं में 36 लोग शारीरिक या मानसिक रूप से प्रभावित हुए हैं. 
एपीसीआर की रिपोर्ट के मुख्य बिंदु: 
  • घृणास्पद घटनाओं में वृद्धि:
    पहलगाम हमले के बाद भारत में घृणास्पद घटनाओं में वृद्धि हुई है. 
  • उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा घटनाएं:
    रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 43 घृणास्पद घटनाएं हुई हैं, https://www.youtube.com/watch?v=SrGnuFe5iiM https://www.youtube.com/watch?v=SrGnuFe5iiM पर एक वीडियो में बताया गया है. 
  • पहलगाम हमले का प्रभाव:
    इन घटनाओं में से 116 में पहलगाम हमला एक ट्रिगरिंग फैक्टर के रूप में कार्य कर सकता है, https://www.youtube.com/watch?v=SrGnuFe5iiM https://www.youtube.com/watch?v=SrGnuFe5iiM पर एक वीडियो में बताया गया है. 
  • प्रभावित लोगों की संख्या:
    316 लोग इन घटनाओं से प्रभावित हुए हैं, जिनमें 36 लोग शारीरिक या मानसिक रूप से प्रभावित हुए हैं, https://www.youtube.com/watch?v=SrGnuFe5iiM https://www.youtube.com/watch?v=SrGnuFe5iiM पर एक वीडियो में बताया गया है. 
एपीसीआर के वकील, शोधकर्ता, सामाजिक कार्यकर्ता और अर्ध-कानूनी स्वयंसेवक अन्य मानवाधिकार संगठनों के साथ मिलकर मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों की जांच करने के लिए भारत के विभिन्न हिस्सों का दौरा करते हैं और मामले से संबंधित मुद्दों को चिह्नित करने के लिए रिपोर्ट पेश करते हैं।
एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राईट्स (APCR) द्वारा जारी एक 178-पृष्ठीय रिपोर्ट में 22 अप्रैल से 6 मई के बीच भारत के 19 राज्यों में मुस्लिमों के खिलाफ 184 हेट क्राईम दर्ज किए गए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, इन हमलों की प्रकृति संगठित, योजनाबद्ध और लगातार थी — औसतन हर दिन 10 से अधिक घटनाएँ। पीड़ितों में महिलाएँ, बच्चे, बुज़ुर्ग और दिहाड़ी मज़दूर शामिल हैं।_
मुख्य निष्कर्ष:
• 84 हेट स्पीच, जिनमें नरसंहार और नसबंदी की मांगें शामिल।
• 39 मार-पीट की घटनाएँ, कई मामलों में भीड़ द्वारा खुलेआम हिंसा।
• 19 तोड़फोड़ की घटनाएँ — दुकानों, मस्जिदों और घरों पर हमले।
• 12 मॉब लिंचिंग प्रयास, 3 हत्याएँ।
• कम से कम 316 मुसलमानों को शारीरिक या मानसिक रूप से प्रताड़ित या विस्थापित किया गया।
“पहलगाम का बदला” — खतरनाक तर्क
रिपोर्ट के अनुसार 106 घटनाओं को हमलावरों ने “पहलगाम का बदला” कहकर जायज़ ठहराया। दक्षिणपंथी संगठनों द्वारा फैलाई गई अफवाहों और घृणात्मक भाषणों ने इस हिंसा को उकसाया।

कुछ गंभीर घटनाएँ:
• आगरा: एक मुस्लिम युवक की गोली मारकर हत्या, दूसरा गंभीर रूप से घायल।
• मैंगलुरु: झूठे आरोपों पर 32 वर्षीय मुस्लिम युवक की पीट-पीटकर हत्या।
• शामली: भीड़ ने “26 के बदले 2600” के नारे लगाते हुए युवक पर कुल्हाड़ी से हमला किया।
महिलाओं और बच्चों पर हमले
• हिजाब पहनने वाली महिला और उसके बच्चे को डंडों और तलवारों से पीटा गया।
• 15 वर्षीय लड़के को ज़बरदस्ती पाकिस्तानी झंडे पर पेशाब करवाया गया।
• कश्मीरी लड़की को हॉस्टल में पीटा गया और आतंकवादी कहा गया।
राज्य-प्रायोजित हेट स्पीच और बहिष्कार
• यति नरसिंहानंद ने मुस्लिमों के संहार की बात कही।
• बीजेपी सांसद आलोक शर्मा ने मुस्लिमों की नसबंदी की मांग की।
• कई राज्यों में मस्जिदों पर हमले, मुस्लिम दुकानदारों का बहिष्कार,
संस्थागत भेदभाव:
• मुस्लिम महिलाओं को चिकित्सा सेवाएँ नकारना।
• हिजाब पहनने पर छात्राओं को स्कूलों से निकालना।
• मुस्लिम जवान को पाकिस्तानी महिला से शादी पर CRPF 
पुलिस की निष्क्रियता और पक्षपात:
• कई मामलों में FIR दर्ज नहीं हुई, पीड़ितों को ही गिरफ्तार कर लिया गया।
• वीडियो सबूत के बावजूद हमलावरों पर कोई कार्रवाई नहीं।
निष्कर्ष: एक सुनियोजित उत्पीड़न की प्रक्रिया
यह रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि यह हिंसा आकस्मिक नहीं, बल्कि एक विचारधारात्मक और संस्थागत नफरत के अभियान का हिस्सा है। मुस्लिमों को टारगेट करना आज राजनीतिक रूप से स्वीकृत, सामाजिक रूप से सामान्यीकृत, और संवैधानिक संस्थाओं द्वारा अनदेखा किया जा रहा है।



रविवार, 18 मई 2025

जिसे मानद उपाधि देने का विरोध उसे ज्ञान पीठ…

 जिसे मानद उपाधि देने का विरोध उसे ज्ञान पीठ… 


वैसे तो यह किसी से छिपा नहीं है कि इस दौर में सत्ता का खेल क्या है, अपने लोगों को नवाज़ने के इस दौर में जब रामभद्राचार्य को ज्ञानपीठ देने की घोषणा हुई, तो इसे लेकर कई सवाल खड़े हो गये, अभी ज़्यादा वक्त नहीं बिता है जब अप्रैल २०२५ में उन्हें सागर विश्वविद्यालय ने डी लिट की उपाधि देने की घोषणा को भारी विरोध में निलंबित करना पड़ा। इसकी शिकायत राष्ट्रपति तक हुई , और अब ज्ञानपीठ देने पर सवाल खड़े हो गये है 

क्या है डी लिट.. का मामला 


डॉ. हरिसिंह गौर यूनिवर्सिटी अपने 33वें दीक्षांत समारोह में जगद्गुरु रामभद्राचार्य को डी. लिट की मानद उपाधि देने जा रही है. इसके लिए विश्वविद्यालय को राष्ट्रपति से भी मंजूरी मिल गई है. ये बात सामने आते ही फोरम ऑफ प्रोग्रेसिव एकेडेमिया के बैनर तले देश भर के शिक्षाविद, कानूनविद, पत्रकार, समाजसेवी, पूर्व छात्र और शोध छात्र विरोध में उतर आए हैं. वो जिला और विश्वविद्यालय प्रशासन के समक्ष विरोध जता रहे हैं. उन्होंने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर इस फैसले पर विरोध प्रकट किया है. उनका कहना है कि ये फैसला लोकतांत्रिक, सामाजिक न्याय और संवैधानिक नैतिकता के मूल्यों को कमजोर करता है. साथ ही वंचित समुदाय के लिए पीड़ादायक संदेश भी है.

रामभद्राचार्य पर लगा रहे हैं गंभीर आरोप

रामभद्राचार्य को दी जा रही डी. लिट की मानद उपाधि का विरोध करने वालों का तर्क है कि "रामभद्राचार्य विद्वान होने के साथ-साथ विवादास्पद भी हैं. उन्होंने कई बार अपने भाषण और वक्तव्यों में डाॅ. भीमराव अंबेडकर, बौद्ध धर्म और दलित समुदाय के विरुद्ध आपत्तिजनक और अपमानजनक टिप्पणियां की है. उनके बयान समाज में विभाजन पैदा करने वाले, जातिवादी और अपमानजनक होते हैं. ऐसे बयान हमारे संविधान के बंधुत्व, समानता और गरिमा के प्रतिकूल हैं."

इसके अलावा उनका कहना है कि"इस यूनिवर्सिटी के संस्थापक डाॅ. हरीसिंह गौर प्रगतिशील सुधारक, विधि विशेषज्ञ और बौद्ध चेतना से युक्त व्यक्ति थे. जिन्होंने दलितों, महिलाओं और पिछड़ों के लिए संघर्ष किया और वैज्ञानिक सोच, लैंगिक समानता और सामाजिक उत्थान को अपने जीवन का आधार बनाया. ऐसे में यूनिवर्सिटी द्वारा ऐसे व्यक्ति को सम्मान देना, उनके मूल्यों के विपरीत, विडंबना पूर्ण और यूनिवर्सिटी की मूल आत्मा का अपमान है."

भारत में साहित्य का सर्वोच्च नागरिक सम्मान—

ज्ञानपीठ पुरस्कार—सिर्फ भाषा और शैली का ही नहीं, बल्कि लेखक के सामाजिक दृष्टिकोण, नैतिकता और मानवीय मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता का भी सम्मान माना जाता है। इसी सम्मान का 58वां संस्करण 2024 में संस्कृत विद्वान जगद्गुरु रामभद्राचार्य को दिया गया। लेकिन इस निर्णय ने साहित्यिक, सामाजिक और बौद्धिक वर्गों में गहरी चिंता और आलोचना उत्पन्न की है।


रामभद्राचार्य को ज्ञानपीठ क्यों मिला?

सीतामढ़ी के प्रो राजकुमार गुप्ता लिखते हैं जगद्गुरु रामभद्राचार्य को यह पुरस्कार उनके संस्कृत साहित्य में योगदान के लिए दिया गया। वे एक अंध विद्वान हैं और उन्होंने विभिन्न ग्रंथों की रचना व व्याख्या की है, जिनमें धार्मिक-दार्शनिक और काव्यात्मक रचनाएँ प्रमुख हैं। उनके समर्थक उन्हें तुलसीदास की परंपरा का आधुनिक व्याख्याता मानते हैं।

लेकिन सवाल ये उठता है-क्या सिर्फ पांडित्य और भाषिक लेखन ही पुरस्कार के लिए पर्याप्त हैं? क्या लेखक की सामाजिक संवेदनशीलता, जातीय समरसता, और संविधान के मूल्यों के प्रति निष्ठा का कोई मूल्य नहीं रह गया?

विवादित और घृणास्पद बयान:

1. जातिसूचक टिप्पणी: “जो राम को नहीं भजता वो चमार है”-

जनवरी 2024 में रामभद्राचार्य का एक वीडियो सामने आया जिसमें उन्होंने कहा:“जो राम को नहीं भजता, वो चमार है।”

यह कथन न सिर्फ घोर जातिवादी है, बल्कि दलित समुदाय का अपमान भी है। देशभर में इस बयान की निंदा हुई और उनकी गिरफ्तारी की माँग उठी। (TV9Hindi)

बाद में उन्होंने सफाई दी कि उनका इरादा किसी जाति को अपमानित करने का नहीं था, लेकिन सार्वजनिक मानसिकता और इतिहास को देखते हुए यह माफ़ी अपर्याप्त मानी गई।

2. डॉ. भीमराव अंबेडकर पर अमर्यादित टिप्पणी-

रामभद्राचार्य ने अपने एक भाषण में कहा: "अगर अंबेडकर को संस्कृत आती, तो वो मनुस्मृति को नहीं जलाते।"

यह कथन न सिर्फ तथ्यात्मक रूप से ग़लत है (क्योंकि अंबेडकर को संस्कृत का ज्ञान था), बल्कि यह मनुस्मृति जैसे जातिवादी ग्रंथ के समर्थन में दिया गया बयान है, जिसने सदियों से शूद्रों, स्त्रियों और अछूतों के साथ भेदभाव किया। (The Sootr)

3. वर्ण–उपवर्ण के बीच जातिगत भेद-

रामभद्राचार्य ने एक मंच से कहा था कि:"चौबे, पाठक, दीक्षित, उपाध्याय नीच कुल के ब्राह्मण हैं।"

इस तरह का बयान ब्राह्मणों के भीतर भी जातिगत ऊँच-नीच को बढ़ावा देता है, जो मनुवादी सोच का स्पष्ट प्रमाण है।

4. पाकिस्तान के खिलाफ उन्मादी भाषण-


नवंबर 2024 में जयपुर में श्रीराम कथा के दौरान उन्होंने कहा:

 “अब वह दिन दूर नहीं जब विश्व के नक्शे से पाकिस्तान का नामोनिशान मिट जाएगा।”

उन्होंने यह भी जोड़ा कि पाकिस्तान की ज़मीन वापस लेनी है, और ये हनुमान जी की कृपा से संभव होगा। (Patrika)

यह बयान धार्मिक और राजनीतिक कट्टरता को बढ़ावा देने वाला है, जो अहिंसा और विवेक आधारित संवाद की भारतीय परंपरा के विरुद्ध है।

5. आरक्षण पर अपमानजनक टिप्पणी-

उन्होंने आरक्षण पर बोलते हुए कहा: “सवर्ण बच्चा 100% लाकर जूता सिलाई करे, और दलित 4% लाकर कलेक्टर बने – ये कैसा न्याय है?”

यह बयान न सिर्फ दलितों की योग्यता का अपमान करता है, बल्कि सामाजिक न्याय की संवैधानिक अवधारणा पर भी हमला है। (Navbharat Times)


कई संगठनों ने उनकी गिरफ्तारी और पद्म विभूषण/ज्ञानपीठ जैसे सम्मानों को वापस लेने की माँग की है। सोशल मीडिया पर #RevokePadmaVibhushan और #ArrestRambhadracharya जैसे हैशटैग ट्रेंड कर चुके हैं।

सवाल जो देश को सोचने चाहिए-

क्या किसी लेखक या संत को सिर्फ शास्त्र ज्ञान और भाषा के बल पर सम्मानित किया जाना चाहिए, जब वह सार्वजनिक रूप से संविधान, दलित समाज, और सामाजिक समरसता के खिलाफ बोलता हो?

क्या ज्ञानपीठ जैसी संस्था का यह नैतिक दायित्व नहीं बनता कि वह सिर्फ साहित्यिक गुणवत्ता नहीं, बल्कि लेखक की सामाजिक प्रतिबद्धता को भी तौले?


निष्कर्ष- रामभद्राचार्य भले ही संस्कृत के ज्ञाता हों, लेकिन उनके जातिवादी, दलित-विरोधी और उन्मादी अंधविश्वासी वक्तव्य उन्हें 'ज्ञान' और 'विवेक' के प्रतीक के रूप में अयोग्य बनाते हैं।

भारत में आज आवश्यकता है ऐसे साहित्य और विचारों की जो समावेशिता, संविधानवाद, और सामाजिक न्याय को बढ़ावा दें, ऐसे विचारकों की जो सदियों पुरानी असमानताओं को नए रूप में प्रतिष्ठित करते हो…

जब इंदिरा ने पूरी दुनिया हिला दी…

 जब इंदिरा ने पूरी दुनिया हिला दी…

यह इतिहास की ऐसी सच्चाई है जिसे कोई नहीं भूल सकता, और यहीं से शुरू हुआ था इंदिरा का आयरन लेडी कहलाने का सफ़र…

बात १८ मई से पहले की थी जब इंदिरा १९७२ में अचानक दौरे में परमाणु केंद्र जा पहुँची थी, शायद उनके मन में एक ध्येय था…



दिन 18 मई 1974, यानि आज का ही दिन।

सम्पूर्ण देश के लिए यह दिन एक इतिहास बन चुका था, ऑपरेशन 'स्माइलिंग बुद्धा' चलाया जा चुका था

अब  भारत संयुक्त राष्ट्र संघ के पांच स्थायी सदस्यों के अलावा वह देश बन चुका था जिसने परमाणु परीक्षण करने का साहस किया था।

और इस परीक्षण की पूरी पटकथा सन 1972 में लिखी गयी थी जब इंदिरा जी ने 'भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र' का दौरा किया था।

अब समझ में आया इंदिरा जी और परमाणु केंद्र के वैज्ञानिकों के मध्य क्या बात हुई होगी....

इंदिरा जी को इंसानों की काफी तजुर्बेदार परख थी, और वही परख हमारे नायाब परमाणु वैज्ञानिकों में देखकर, सिर्फ बातों ही बातों में उन्हें परमाणु परीक्षण करने की अनुमति दे 

स्माइलिंग बुद्धा ( विदेश मंत्रालय का पदनाम: पोखरण-I ) 18 मई 1974 को भारत के पहले सफल परमाणु हथियार परीक्षण का कोड नाम था। राजस्थान में भारतीय सेना के पोखरण परीक्षण रेंजमें परमाणु विखंडन बम का विस्फोट किया गया था। संयुक्त राज्य अमेरिका की सैन्य खुफिया जानकारी के अनुसार , इस ऑपरेशन को हैप्पी कृष्णा नाम दिया गया था । भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने इस परीक्षण को एक शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोटबताया । 

इस बम का निर्माण राजा रमन्ना की अध्यक्षता वाले भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) के वैज्ञानिकों ने किया था , जिसमें बीडी नाग चौधरी की अध्यक्षता वाले रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) की सहायता ली गई थी और होमी सेठना की अध्यक्षता वाले परमाणु ऊर्जा आयोग की देखरेख में इसका निर्माण किया गया था। बम के लिए परमाणु सामग्री के उत्पादन में कनाडा द्वारा दिया गया एक CIRUS परमाणु रिएक्टर और संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा आपूर्ति किया गया भारी पानी ( न्यूट्रॉन मॉडरेटर के रूप में उपयोग किया जाता है) का उपयोग किया गया था । परीक्षण और विस्फोट की तैयारी अत्यधिक गोपनीयता में की गई थी। इसे प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी द्वारा कड़ा नियंत्रण दिया गया था और वैज्ञानिकों की टीम के बाहर बहुत कम लोगों को परीक्षण के बारे में पता था। 

यह उपकरण प्लूटोनियम कोर के साथ विस्फोट-प्रकार केडिजाइन का था । इसका क्रॉस सेक्शन षट्कोणीय था, व्यास 1.25 मीटर (4 फीट 1 इंच) था, और इसका वजन 1,400 किलोग्राम (3,100 पाउंड) था। इसे इकट्ठा किया गया, एक षट्कोणीय धातु तिपाई पर रखा गया, और रेल पर परीक्षण स्थल पर ले जाया गया। परीक्षण 18 मई 1974 को 8.05 IST पर किया गया था। परीक्षण के सटीक परमाणु उत्पादन पर डेटा अलग-अलग और दुर्लभ रहा है, और स्रोत संकेत देते हैं कि बम ने छह से दस किलोटन के बीच उत्पादन किया होगा ।

यह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों के बाहर किसी देश द्वारा किया गया पहला पुष्टिकृत परमाणु हथियार परीक्षण था । इस परीक्षण के परिणामस्वरूप परमाणु प्रसार को नियंत्रित करने के लिए परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (NSG) का गठन हुआ । परीक्षण के बाद, भारत ने 1998 में पोखरण-IIनामक एक और परमाणु परीक्षण किया ।

परीक्षण के बाद भारतीय प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी को बहुत लोकप्रियता मिली, जो 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के बाद अपने चरम पर थी। कांग्रेस पार्टी की समग्र लोकप्रियता और छवि में वृद्धि हुई और इसे भारतीय संसद में अच्छी प्रतिक्रिया मिली । 1975 में, सेठना, रमन्ना और नागचौधरी को भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया । पांच अन्य परियोजना सदस्यों को भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म श्री मिला । भारत ने लगातार कहा कि यह एक शांतिपूर्ण परमाणु बम परीक्षण था और इसका अपने परमाणु कार्यक्रम का सैन्यीकरण करने का कोई इरादा नहीं था, लेकिन स्वतंत्र निगरानीकर्ताओं के अनुसार, यह परीक्षण एक त्वरित भारतीय परमाणु कार्यक्रम का हिस्सा था ।

शुक्रवार, 16 मई 2025

राष्ट्रपति की चिट्ठी और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी…

 राष्ट्रपति की चिट्ठी और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी…

इन दो खबरों को सिर्फ़ खबर की तरह लेना देश की दशा और दिशा मुँह फेरना जैसा है। सीजफ़ायर की तरह भले ही इस खबर से लोग न चौंके होंगे लेकिन यह खबर उतनी ही चौंकाने वाली है…


हम जस्टिस बेला एम त्रिवेदी को लेकर सुप्रीम कोर्ट के वकीलों की रुख़ पर आयें उससे पहले यह जान लेना ज़रूरी है कि आख़िर राष्ट्रपति द्रौपदी मूर्मू ने सुप्रीम कोर्ट को पत्र क्यों लिखा ।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट के 8 अप्रैल के ऐतिहासिक फैसले पर कड़ी प्रतिक्रिया जताई है, जिसमें राज्यपालों और राष्ट्रपति को विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए समय-सीमा निर्धारित की गई थी। राष्ट्रपति ने इस फैसले को संवैधानिक मूल्यों और व्यवस्थाओं के विपरीत बताया और इसे संवैधानिक सीमाओं का अतिक्रमण करार दिया। संविधान की अनुच्छेद 143(1) के तहत राष्ट्रपति ने सर्वोच्च न्यायालय से 14 संवैधानिक प्रश्नों पर राय मांगी है। यह प्रावधान बहुत कम उपयोग में आता है, लेकिन केंद्र सरकार और राष्ट्रपति ने इसे इसलिए चुना क्योंकि उन्हें लगता है कि समीक्षा याचिका उसी पीठ के समक्ष जाएगी जिसने मूल निर्णय दिया और सकारात्मक परिणाम की संभावना कम है।

राष्ट्रपति मुर्मू ने एक और महत्वपूर्ण सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि राज्य सरकारें संघीय मुद्दों पर अनुच्छेद 131 (केंद्र-राज्य विवाद) के बजाय अनुच्छेद 32 (नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा) का उपयोग क्यों कर रही हैं। उन्होंने कहा, “राज्य सरकारें उन मुद्दों पर रिट याचिकाओं के माध्यम से सीधे सुप्रीम कोर्ट आ रही हैं। यह संविधान के अनुच्छेद 131 के प्रावधानों को कमजोर करता है।”

हालाँकि सुप्रीम कोर्ट इस सवाल को सीधे ख़ारिज कर सकती है…

अब इस सवाल को लेकर राष्ट्रपति पर सवाल उठाये जाने लगे है और इसे सत्ता यानी मोदी सरकार का पत्र कहा जा रहा है

दूसरी खबर भी कम चौंकाने वाला नहीं है , आख़िर वकीलों ने यह क्यों किया 

दरअसल जस्टिस बेला त्रिवेदी, सुप्रीम कोर्ट की एक ऐसी जज जिसके कानूनी योग्यता, संविधान के प्रति निष्ठा तथा आचरण के तौर पर ईमानदारी  एवं सत्यनिष्ठा पर सदैव सवालिया निशान लगा रहा,

गुजरात निवासी बेला त्रिवेदी,मोदी शाह गैंग की ज्यूडिशियल प्यादों में गिनती की जाती थीं, नरेन्द्र मोदी के मुख्यमंत्री कार्यकाल में उनकी कानून सचिव थीं। ये कभी किसी हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश नही रहीं, किन्तु सत्ता के दांव पेंच से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचाया गया। गणपति बप्पा, भक्त पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ ने अपने कार्यकाल में सरकार विरोधी हर केस की सुनवाई इसी बेला त्रिवेदी के बेंच को सौंपते थे, बल्कि नियम परिपाटी को ताख पर रखकर कुछ केस इन्हें दिए गए तब वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण एवं दुष्यंत दवे, सिंघवी जैसे बड़े वकीलों ने इसके खिलाफ सार्वजनिक तौर पर आवाज उठाया था।

जैसे कि वकील प्रशांत भूषण ने जस्टिस बेला त्रिवेदी की अगुवाई वाली पीठ के समक्ष मामलों के समूह को 'मनमाने ढंग से' सूचीबद्ध करने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार को पत्र लिखा था। ये मामले त्रिपुरा दंगों पर तथ्यान्वेषी रिपोर्ट के संबंध में पत्रकारों और वकीलों के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA Act) लागू करने को चुनौती देते थे।


हालांकि, 29.11.2023 को मामलों के बैच को जस्टिस त्रिवेदी के नेतृत्व वाली पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया गया। भूषण ने कहा कि यह सूची मनमानी है और सुप्रीम कोर्ट नियम, 2013 के आधार पर न्यायिक पक्ष पर अभ्यास और प्रक्रिया और कार्यालय प्रक्रिया पर हैंडबुक के खिलाफ है।

पत्र में कहा गया कि लंबित मामलों को सीनियर पीठासीन न्यायाधीश के समक्ष सूचीबद्ध किया जाना है और पहले सब-जज को केवल तभी सूचीबद्ध किया जाए, जब सीनियर पीठासीन न्यायाधीश अनुपलब्ध हो।

 और अब प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) बी.आर. गवई ने शुक्रवार को रिटायर्ड जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी के लिए सामान्य विदाई समारोह आयोजित नहीं करने के ‘सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन’ (एससीबीए) के फैसले की निंदा की...

परंपरा के अनुसार, एससीबीए उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के लिए विदाई समारोह आयोजित करता है और न्यायमूर्ति त्रिवेदी के मामले में एक असाधारण निर्णय लिया गया,.. 

अब आप समझ ही गये होंगे कि सत्ता क्यों आवारा हो जाती है…