मंगलवार, 27 मई 2025

संघ ने कराये बम धमाके…

 संघ ने कराये बम धमाके…


वैसे तो संघ को लेकर कितने ही सवाल है, सदस्यता, रजिस्ट्रेशन न होना, नफ़रत फैलाना, लेकिन संघ के प्रचारक रहे व्यक्ति यदि न्यायालय में शपथ पत्र के साथ बम की बात कहता है तो क्या उसकी सच्चाई सामने नहीं आना चाहिए। क्या है पूरा मामला…

2022 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के पूर्व प्रचारक यशवंत शिंदे ने एक हलफनामे और सार्वजनिक साक्षात्कारों के माध्यम से ऐसे गंभीर आरोप लगाए, जिनसे राजनीतिक और सामाजिक हलकों में हलचल मच गई। उन्होंने आरोप लगाया कि 2003 से 2008 के बीच महाराष्ट्र के कई हिस्सों में हुए बम धमाकों के पीछे संघ परिवार के वरिष्ठ नेताओं की साजिश थी, जिसका उद्देश्य मुस्लिम समुदाय को बदनाम करना और समाज में ध्रुवीकरण के ज़रिए भाजपा को राजनीतिक लाभ पहुंचाना था।

नांदेड की एक अदालत में शपथपत्र दाखिल करते हुए शिंदे ने बताया कि उन्हें और कुछ अन्य लोगों को आधुनिक हथियारों और बम बनाने की ट्रेनिंग दी गई थी। यह प्रशिक्षण कुछ मौजूदा और सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों तथा खुफिया एजेंसी के सदस्यों द्वारा दिया गया। उन्होंने कहा कि इन धमाकों को इस तरह अंजाम देने की योजना थी कि उनका दोष मुसलमानों पर डाला जा सके।

शिंदे ने अपने हलफनामे में विशेष रूप से महाराष्ट्र के जालना, परभणी, पूर्णा और नांदेड में हुए बम धमाकों का जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि इन घटनाओं में संघ परिवार के सदस्य शामिल थे, और वर्तमान RSS प्रमुख मोहन भागवत सहित कई वरिष्ठ नेताओं को इस साजिश की जानकारी थी या उन्होंने चेतावनियों को नजरअंदाज किया। शिंदे के अनुसार, उन्होंने कई बार RSS, विश्व हिंदू परिषद और भाजपा के शीर्ष नेताओं को इन घटनाओं के बारे में सूचित करने की कोशिश की, लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला।

शिंदे के आरोपों को कुछ हद तक जांच एजेंसियों की रिपोर्टों और अदालत में दिए गए बयानों का समर्थन प्राप्त है। उदाहरण के लिए, 2006 के नांदेड धमाके में बजरंग दल के दो कार्यकर्ता बम बनाते समय मारे गए थे, और घटनास्थल से मुस्लिमों का भेष बनाकर हमले को उनके सिर मढ़ने की योजना के साक्ष्य मिले थे। इसी तरह, मालेगांव और अजमेर धमाकों की जांच में भी दक्षिणपंथी हिंदू संगठनों की संलिप्तता सामने आई, और स्वामी असीमानंद जैसे आरोपियों ने अपने बयानों में माना कि इन हमलों के पीछे कुछ वरिष्ठ संघ नेता भी थे।

हालांकि, यह ध्यान देना आवश्यक है कि यशवंत शिंदे के दावे अभी तक न्यायिक रूप से पूरी तरह से सत्यापित नहीं हुए हैं। नांदेड मामले में उन्हें गवाह के रूप में शामिल करने की उनकी याचिका अदालत ने समय बीत जाने और प्रक्रियात्मक आधारों पर खारिज कर दी। केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) पर यह आरोप लगे हैं कि उन्होंने इन मामलों की जांच पूरी गंभीरता से नहीं की।

कुछ मामलों में NIA ने दक्षिणपंथी संगठनों की भूमिका को जांच में शामिल किया, लेकिन शिंदे द्वारा उठाए गए सभी बिंदुओं की पुष्टि एजेंसी की रिपोर्टों में सार्वजनिक रूप से नहीं हुई है।

यशवंत शिंदे का हलफनामा और उनके सार्वजनिक बयान एक ऐसे व्यक्ति का दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं, जो स्वयं संघ का हिस्सा रह चुका है और जिसने कथित साजिशों का प्रत्यक्ष अनुभव किया है। उनके आरोप उन चुनौतियों की ओर इशारा करते हैं, जो भारत में धार्मिक सहिष्णुता, न्यायिक पारदर्शिता और लोकतांत्रिक जवाबदेही के सामने खड़ी हैं।

उमेश नारायण सक्सेना के वॉल से…

चाचा नेहरू से लोकदेव तक…

 चाचा नेहरू से लोकदेव तक…

देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की कितनी ही यादें हैं, बच्चे उन्हें चाचा नेहरू कहते थे तो राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने उन्हें लोकदेव कहा । आज़ादी की लड़ाई में नौ साल तक जेल में रहे पंडित नेहरू को लेकर  भले ही समूची बीजेपी अपने राजनैतिक ध्येय के लिए विषवमन करती हो  पर सच नहीं बदलने वाला। कुछ यादें…


मुल्क बरसों की गुलामी से आजाद हो गया था.

नेहरू,सरदार पटेल और मौलाना आजाद के बंगले नज़दीक ही थे. उनकी ये रिवायत सी हो चली थी कि लगभग रोज़ाना शाम नेहरू, पटेल के घर खुद ड्राइव करके जाते और फिर दोनों मौलाना के घर पहुंचते. तीनों साथ बैठ के चाय पीते.

पटेल कोई काम पड़ने पर खुद नेहरू के घर जाते,बजाय फोन या फाइल भेजने के. नेहरू कहते  ऐसा क्यों करते हो. किसी को भेज दिया करो, पटेल मुस्कुराते हुए कहते कल से फोन करूंगा या किसी को भेजूंगा।

नेहरू कहते तुम और तुम्हारा कल....

दोनों हंस पड़ते. नेहरू और पटेल का आपसी प्यार अलग ही दर्जे का था। 

पटेल और नेहरू दोनों ही मौलाना का बहुत सम्मान करते थे. नेहरू हमेशा ही मौलाना को स्वयं फोन मिलाते थे। अगर मिलने की जरुरत हो, तो खुद उनके घर जाते थे. 

एक रोज़,किसी अहम मसले पर नेहरू जी को मौलाना से बात करनी थी। नेहरू ने पास खड़े सेक्रेटरी से कहा "मौलाना से बात कराओ"

फोन मिलाया गया.

"सर श्रीमान पीएम आपसे बात करेंगे"

नेहरू ने जैसे ही हैलो कहा, उधर से आवाज आई

" पंडित ,तुम्हारी उंगलियां दुख रहीं है क्या खुद फोन मिलाते हुए"

नेहरू हड़बड़ाते हुए शर्मिंदगी से बोले

"मौलाना साहब, माफ़ी , अगली बार ऐसी गुस्ताखी नही होगी". मौलाना ने कहा, ठीक है, कोई नहीं, अब बताएं, क्या हुआ.

उस शाम तीनों इस वाकए को याद कर खूब हंसे।

सियासत कभी ऐसी भी थी 

वो दौर शालीनता,सभ्यता का था

वो दौर नेहरू का था.........

एक और यादें…

पाकिस्तान के एक डिप्लोमेट थे हुसैन हक्कानी, 

  एक बार उन्होंने कहा था कि नेहरू 1949 में अमेरिका गए ,राष्ट्रपति   Trueman  से मिले। राष्ट्रपति ने पूछा बोलो अमेरिका भारत के लिए क्या कर सकता है ? नेहरू बोले हमें भारत को आधुनिक बनाना है। खेती को आधुनिक करना है। हमें भारत में भी मेस्चचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नॉलॉजी जैसे संस्थान बनाने है। अमेरिकन राष्ट्रपति ने मदद का वादा किया था ।

कुछ दिनो बाद पाकिस्तान के प्रधान मंत्री लियाकत अली को अमेरिकन दौरे की दावत मिली। अमेरिकन राष्ट्रपति ने लियाकत  से पूछा -बोलो क्या मदद कर सकता हूं ? लियाकत ने जेब से एक लिस्ट निकाली और बताने लगे हमे असलाह ,गोल बारूद ,हथियार और सैनिक उपकरण दे दीजिये । अमेरिका ने दोनों देशो को उनकी मांग के मुताबिक मदद का वादा किया।

इससे समझ आता है  कि दोनो प्रधान मंत्रियो की प्राथमिकता क्या थी ?


एक युवा राष्ट्र के नेता होने के नाते वैसे भी नेहरू को ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों द्वारा छोड़ी गई समस्याओं का एक बड़ा हिस्सा विरासत में मिला था जबकि 1943 के बंगाल के अकाल ने देश के अन्न भंडारों को खाली कर दिया था।


द्वितीय विश्व युद्ध का वो दौर जबकि कोई भी क्षण ऐसा नहीं था कि जब परमाणु युद्ध की आशंका न बन रही हो, ऐसे समय में दुनिया को एक ऐसे मध्यस्थ या शांति दूत की जरूरत थी जो पूरे विश्व में एक कद्दावर वैश्विक नेता के रूप में पहचाना जाता हो और पूरब और पश्चिम की महान ताकतों की सनक या मनमानी को भी शांति और सहमति में परिवर्तित करवा सकता हो।

अन्यथा उसने अचानक ही जो विनाश की ताकत हासिल कर ली थी उसमें कोई भी किसी भी समय दुनिया को मानव जाति के अंतिम युद्ध में डुबो सकता था ।

 हमारा सौभाग्य था कि ऐसे समय में हमारे पास जवाहर थे, जी हां नेहरू में वह प्रतिभा, साहस और  बुद्धिमत्ता थी जो कि इस भूमिका को बखूबी निभा सकते थे।

यह साहस बस नेहरू ही कर सकते थे कि वह अमेरिका के राष्ट्रपति और फिदेल कास्त्रो दोनों से एक ही समय में दोस्ती निभा सकते थे। हालांकि ये बात संदिग्ध है पर वो नेहरु ही हो सकते थे जो कि अंतरराष्ट्रीय हितों की इतनी समझ रखते थे कि सुरक्षा परिषद की स्थाई सीट खुद न लेकर चीन को दिलवा सकते थे।

अगर जॉन एफ कैनेडी सभी प्रोटोकॉल तोड़कर नेहरु को रिसीव करने विमान के अंदर पहुंच जाते थे या निकिता खुश्चेव तिब्बत से दलाई-लामा को खदेड़ने के लिए चीन को पूरी तरह जिम्मेदार ठहराकर नेहरु से गलबहियां कर लेते थे तो आखिर उस नेहरु में ऐसा क्या था ?

कि मुसोलिनी जैसा तानाशाह जो कि रवींद्र नाथ टैगोर और गांधी से मिलकर अपना सीना चौड़ा करता था लेकिन नेहरु उससे मिलने के आमंत्रण को भी ठुकरा सकते थे ।


सैकड़ो साल की गुलामी के बाद इस देश को जिस अवस्था में नेहरू ने पाया था अगले 17 सालों में उन्होंने इसे दुनिया के प्रमुख देशों की बराबरी में खड़ा कर दिया।


व्यापक परमाणु परीक्षण संधि जिसे सीटीबीटी ( Comprehensive Nuclear test Ban Treaty)कहते हैं उस पर आज भले ही भारत हस्ताक्षर न कर रहा हो पर उदारमना नेहरु ने इसकी जरूरत सन 1963 में ही समझ ली थी। नेहरु ने विश्व के समक्ष सीमित परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि एलटीबीटी का प्रस्ताव रखा था।जिसके अंतर्गत विश्व में परमाणु परीक्षण वायुमंडल, बाहरी अंतरिक्ष और पानी के नीचे करने के लिए प्रतिबंध लगा दिए गए।

  लेकिन उनके बाद आजतक कोई और नहीं हुआ जो कि भूमिगत परीक्षणों पर प्रतिबंध लगा सके।


जिस समय दुनिया दो प्रमुख शक्तियों के गुट में बंट रही थी जिसमें एक गुट सोवियत समर्थक समाजवादी  था और दूसरा गुट पूंजीवादी देशों का समूह अमेरिका समर्थक । जिसमें नाटो के कई देश भी थे उस समय जवाहरलाल नेहरू ने  दुनिया के कुछ प्रमुख देशों को लेकर जिसमें प्रमुख यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति जोसिप ब्रोज टीटो थी और मिस्र  के राष्ट्रपति गमाल अब्दुल नासिर घाना के राष्ट्रपति क्वामे नक्रूमा और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो गुटनिरपेक्ष आंदोलन की शुरुआत की ।

 

गुटनिरपेक्ष आंदोलन ( NAM) The Non_Aligned Movement

 राष्ट्रों की एक ऐसी अंतरराष्ट्रीय संस्था थी जिसके अनुसार वे दुनिया में किसी भी पावर ब्लॉक के साथ या विरोध में नहीं रहेंगे इसआंदोलन की स्थापना अप्रैल 1961 में हुई और 2012 तक इसमें दुनिया के 120 सदस्य देश थे ।

   इस संगठन का उद्देश्य गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों के राष्ट्रीय स्वतंत्रता,सार्वभौमिकता ,क्षेत्रीय एकता और सुरक्षा में उनके साम्राज्यवाद औपनिवेशिक वाद, जातिवाद, रंग भेद और विदेशी आक्रमण या  अधिकरण हस्तक्षेप आदि के मामलों के विरुद्ध उनके युद्ध के दौरान सुनिश्चित करना है। आज  यह संगठन संयुक्त राष्ट्र के कुल सदस्य देशों की संख्या का दो तिहाई और विश्व की लगभग 55% जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है।


तो अब अगली बार यदि कोई आपसे पूछता है कि गांधी ने नेहरू को प्रधानमन्त्री क्यों चुना ?

  तो आप बस इतना कह सकते हैं कि किसी देश के प्रधानमंत्री को न सिर्फ घरेलू मुद्दे बल्कि इससे अधिक अंतराष्ट्रीय मुद्दों की समझ होनी चाहिए। ये बात गांधी जी  खूब समझते थे। और देश के शुरुआती तीन आम चुनावों में नेहरु की जीत भी ये बताती है कि वे जनता के बीच कितने लोकप्रिय थे।

सोमवार, 26 मई 2025

103 की उम्र में बरी, 43 साल जेल में बिताये…

 103 की उम्र में बरी, 43 साल जेल में बिताये…


तारीख़ पर तारीख़, जेल में सड़ जाओगे, क्या यह भारतीय न्याय व्यवस्था की पहचान बन चुकी है, जेल में सड़ा देने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने Ed से लेकर दूसरी एजेंसियों को फटकार भी लगाती रही है, लेकिन कुछ मामले इतने हैरत अंगेज़ होते है कि इतिहास में दर्ज हो जाता है । ऐसा ही एक मामला उत्तर प्रदेश का है…

यह 103 वर्ष के एक ऐसे व्यक्ति की ख़बर है  जिसे 43 साल तक जेल में रखा गया और 43 साल जेल में रहने के बाद अदालत ने अब उसे बाइज़्ज़त बरी कर दिया है, जब उसकी उम्र 103 वर्ष हो चुकी है।

ख़बर लखन पुत्र मंगली की है, जो उत्तर प्रदेश की कौशांबी जेल से बाहर आए हैं। 43 साल लखन ने इसी जेल में बिताए और अब अदालत ने उसे बाइज़्ज़त बरी कर दिया। लखन को हत्या के आरोप में वर्ष 1977 में गिरफ्तार करके जेल भेजा गया था। 5 साल के बाद, उन्हें 1982 में निचली अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई। लखन का कहना था कि वह निर्दोष है। इसलिए 1982 में ही उसने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपनी सजा के खिलाफ एक अपील दायर की।

लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसकी विवेचना ज़रूर होनी चाहिए। हाईकोर्ट ने लखन की इस याचिका को स्वीकार तो कर लिया, लेकिन यह मुकदमा जानते हैं कितने साल तक चला? 43 वर्ष तक यह मुकदमा चला और इन 43 सालों में लखन जेल में ही बंद रहा। अंततः इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2 मई 2025 को उन्हें बाइज़्ज़त बरी किए जाने का आदेश दिया और लखन को रिहा किया गया।


103 वर्ष की उम्र में ये बुजुर्ग अब इस अवस्था में जाकर रिहा हुए हैं।

यह शायद भारतीय इतिहास में न्यायालय और फ़ैसले के रूप में दर्ज होगा

यदि रिकॉर्ड की बात करें तो शायद यह विश्व रिकॉर्ड भी हो सकता है 

रविवार, 25 मई 2025

तब और अब- तेजप्रताप यादव के बहाने…

 तब और अब- तेजप्रताप यादव के बहाने…


तेजप्रताप  यादव को लेकर बिहार की राजनीति में तूफ़ान खड़ा इसलिए हो गया क्योंकि बिहार विधान सभा का चुनाव नज़दीक है , लालू यादव ने अपने इस बड़े बेटे को पार्टी से निष्कासित भी कर दिया , तब अनानास गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के बेटे की  याद आ गई,,,

गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर के पुत्र थे रथीन्द्रनाथ टैगोर। आज़ादी के बाद जब गुरुदेव द्वारा स्थापित विश्वभारती को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया तो रथीन्द्रनाथ टैगोर को उसका वाइस चांसलर बनाया गया। विश्वविद्यालय के चांसलर थे देश के प्रधानमंत्रीजवाहरलाल नेहरू। 

कहते है प्रेम उम्र नहीं देखता और न ही समाज की परवाह ही करता है , और शायद यही वजह है कि 65 साल की उम्र में रथींद्रनाथ विश्वभारती में अंग्रेजी के प्रोफ़ेसर निर्मल चंद्र चट्टोपाध्याय की पत्नी मीरा के प्रेम में पड़ गए। जब यह ख़बर फैली तो पहले रथींद्रनाथ टैगोर को वित्तीय गड़बड़ियों का आरोप लगाकर विश्वभारती से हटाने की कोशिश की गई। लेकिन आरोप साबित नहीं हुए। लेकिन असली समस्या तो मीरा के साथ उनके प्रेम संबंधों की थी। बाद में जवाहरलाल नेहरू विश्वभारती गए और उन्होंने रथीन्द्रनाथ को समझाया कि गुरुदेव की विरासत की बदनामी हो रही है आप पद छोड़ दें। 22 अगस्त 1953 को उन्होंने त्यागपत्र दिया और मीरा के साथ रहने के लिए देहरादून चले गए। रथीन्द्रनाथ टैगोर की कृतियों कोउनकी तमाम सार्वजनिक उपलब्धियों को सार्वजनिक पटल से पूरी तरह हटा दिया गया। क्योंक्योंकि उन्होंने प्रेम किया था। बाद में 2019 में लोगों को यह एहसास हुआ कि रथीन्द्रनाथ टैगोर के योगदान को महज इसलिए नहीं भुलाया जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने प्रेम किया था। अनिमेष मुखर्जी की किताब ‘ठाकुरबाड़ी’ में यह प्रसंग बहुत विस्तार से आया है। 

आज तेजप्रताप यादव द्वारा अपने प्रेम के स्वीकार और लालू प्रसाद यादव द्वारा उनको घर से निकाल दिए जाने के बाद यह कहानी याद आ ही आई। 

हाँलेकिन रथीन्द्रनाथ टैगोर की बात अलग थी। उन्होंने विश्वभारती छोड़ कर जाने से पहले मीरा के पति से अनुमति ली थी और अपनी पत्नी प्रतिमा देवी को भी बता दिया था। खैर टैगोर परिवार के इतिहास में उनको ओझल ही रखा गया।प्रभात रंजन के प्रति आभार 

ऐसे में तेजप्रताप यादव को लेकर मचे बवाल का क्या होगा कहना मुश्किल है क्योंकि कई मायने में समाज बेहद क्रूर होता है…

बिहार में बवाल 

राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) ने रविवार को बड़ा फैसला लेते हुए तेज प्रताप यादव (Tej Pratap Yadav) को पार्टी ने निकाल दिया है. तेज प्रताप उनके बड़े बेटे हैं. शनिवार को तेज प्रताप अपने निजी जिंदगी से जुड़े खुलासे को लेकर चर्चाओं में थे. उनके फेसबुक पोस्ट पर अनुष्का यादव (Anushka Yadav) नामक लड़की के साथ तस्वीर सामने आई थी. इस पोस्ट में यह लिखा गया था कि तेज प्रताप यादव और अनुष्का 12 साल से एक दूसरे को जान रहे हैं. दोनों ने रिलेशनशिप में रहने की बात कही थी. हालांकि बाद में तेज प्रताप यादव ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा कि उनका फेसबुक अकाउंट हैक कर लिया गया था. अब आज लालू प्रसाद यादव ने बड़ा फैसला लेते हुए तेज प्रताप यादव को पार्टी से निकाल दिया है. 

लालू प्रसाद यादव ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक पोस्ट लिखते हुए तेज प्रताप यादव को पार्टी और परिवार से निकालने की घोषणा की. लालू प्रसाद यादव ने लिखा- निजी जीवन में नैतिक मूल्यों की अवहेलना करना हमारे सामाजिक न्याय के लिए सामूहिक संघर्ष को कमज़ोर करता है.

ज्येष्ठ पुत्र की गतिविधि, लोक आचरण तथा गैर जिम्मेदाराना व्यवहार हमारे पारिवारिक मूल्यों और संस्कारों के अनुरूप नहीं है. अतएव उपरोक्त परिस्थितियों के चलते उसे पार्टी और परिवार से दूर करता हूँ. अब से पार्टी और परिवार में उसकी किसी भी प्रकार की कोई भूमिका नहीं रहेगी. उसे पार्टी से 6 साल के लिए निष्कासित किया जाता है

शनिवार, 24 मई 2025

जादू भरी आँखों वाले गाने का हीरो चला गया

 जादू भरी आँखों वाले गाने का हीरो चला गया 


मुकुल देव एक ऐसा नाम जिसने अपनी प्रतिभा के दम पर न केवल फ़िल्मो का सफ़र शुरू किया, बल्कि टेलीविजन की दुनिया में भी डंका बजाया।

चला गया, जादू भरी आंखों वाले गाने का ये हीरो...


सन 94 में सुष्मिता सेन मिस यूनीवर्स बनीं, दो साल बाद महेश भट्ट उन्हें फ़िल्मों में काम करने के लिए मना लाए। फ़िल्म थी, दस्तक और उसके लिए जावेद अख़्तर का लिखा वो गाना बहुत फेमस हुआ कि, जादू भरी आंखों वाली सुनो तुम ऐसे मुझे देखा न करो...!


टू इन वन में लूप पर बजता था ये गाना। उदित नारायण की आवाज़ ऐसी कम ही हीरोज पर फबी है। नया लड़का था, मुकुल देव। सब एक दूसरे से पूछते कि यार, इसे पहले तो कहीं देखा नहीं। तो कोई बताता अरे ये वही वाला है धारावाहिक 'मुमकिन' वाला। बड़े भैया का नाम पता चला फिर कि ये तो राहुल देव का छोटा भाई है।


मुकुल देव कल दुनिया छोड़ गए। हिंदी सिनेमा में उनको लेकर कभी कोई कंट्रोवर्सी नहीं सुनाई दी। फ़ुर्सतगंज जाकर उन्होंने हवाई जहाज उड़ाने का लाइसेंस भी लिया था। पिता पुलिस में बड़े अफ़सर रहे तो शुरू से क्रिएटिव चीजें करने की छूट रही।


बताते हैं कि आठ साल के थे मुकुल जब उनके हाथ में पहली कमाई दूरदर्शन की तरफ से आई थी। किसी कार्यक्रम में माइकल जैक्सन बनकर नाचे थे वो। वैसे बताते ये भी चलें कि अरशद वारसी और चंद्रचूड़ सिंह को लॉन्च करने वाली अमिताभ बच्चन की कंपनी एबीसीएल ने मुकुल देव को भी एक फ़िल्म के लिए साइन कर लिया था। 'नाम क्या है' नामक ये फ़िल्म बनी होती तो मुकुल की पहली फ़िल्म होती।


भाई मुकुल 54 साल कोई उमर नहीं जाती, यूं ज़िंदगी से रूठ जाने की लेकिन ये एक ऐसी बात भी है जो रिवर्स नहीं हो सकती। जहां रहना खुशहाल रहना, कोशिश करते रहना कि यादों में आकर किसी को ज़्यादा सताना मत और हां, वहां ऊपर कोई जादुई आंखों वाली मिले तो बिंदास अपना गाना जऱूर गाना, जादू भरी आंखों वाली सुनो, तुम ऐसे मुझे देखा न करो...!


बहुत याद आओगे, मुकुल...


.साभार  पंकज शुक्ला


मुकुल देव कौशल (17 सितंबर 1970 - 23 मई 2025) [ 3 ]एक भारतीय टेलीविजन और फिल्म अभिनेता थे। उन्हें हिंदी फिल्मों , पंजाबी फिल्मों , टीवी सीरीज और संगीत एल्बमों में उनकी भूमिकाओं के लिए जाना जाता था । वह कई बंगाली , मलयालम , कन्नड़ और तेलुगु फिल्मों में दिखाई दिए । [ 4 ]उन्होंने यमला पगला दीवाना में अपनी भूमिका के लिए अभिनय में उत्कृष्टता के लिए 7वां अमरीश पुरी पुरस्कार जीता । [ 5 ] 23 मई 2025 को संक्षिप्त बीमारी के बाद 54 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।

टेलीविजन

मुकुल देव ने 1996 में विजय पांडे की भूमिका निभाकर धारावाहिक मुमकिन के माध्यम से टीवी पर अपने अभिनय की शुरुआत की। [ 13 ] उन्होंने दूरदर्शन के एक से बढ़कर एक , कॉमेडी बॉलीवुड काउंटडाउन शो में भी अभिनय किया।

वह फियर फैक्टर इंडिया सीज़न 1 के होस्ट भी थे। [ 14 ] उन्होंने 2000 के दशक में कहीं दिया जले कहीं जिया (2001), कहानी घर घर की (2003), प्यार जिंदगी है (2003) जैसे कई टेलीविजन धारावाहिकों में अभिनय किया । उन्होंने 2008 में एक नृत्य प्रतियोगिता शो कभी कभी प्यार कभी कभी यार में भाग लिया।

फिल्में

उन्हें अमिताभ बच्चन की कंपनी एबीसीएल ने देखा और नाम क्या है नामक फिल्म में भूमिका दी, लेकिन यह फिल्म ठंडे बस्ते में चली गई । [ 11 ] उन्होंने 1996 में दस्तक के साथ एसीपी रोहित मल्होत्रा ​​के रूप में अपनी फ़िल्मी शुरुआत की, उसी फ़िल्म में मिस यूनिवर्स 1994 सुष्मिता सेन भी नज़र आईं। वह किला (1998), वजूद (1998), कोहराम (1999) और मुझे मेरी बीवी से बचाओ(2001) जैसी कई फ़िल्मों में नज़र आए । हाल के वर्षों में उन्होंने यमला पगला दीवाना (2011), सन ऑफ़ सरदार (2012), आर...राजकुमार (2013) और जय हो (2014) फ़िल्मों में सहायक भूमिकाएँ निभाईं।

शुक्रवार, 23 मई 2025

स्वाभिमान और सिंदूर…

 स्वाभिमान और सिंदूर…


अमेरिका की दादागिरी किसी से छिपा नहीं है और ट्रंप ने दोबारा सत्ता सँभालते ही जिस तरह से अति मचाना शुरू किया है, उसके आगे मोदी सत्ता की चुप्पी भी कम हैरान करने वाली नहीं है

ऐसा शायद इतिहास में पहली बार हो रहा है कि ट्रंप की दादागिरी पर भारत ख़ामोश है और वह भारत की खामोशी का फ़ायदा उठाकर देश की बेइज्जति करने आमादा है

भारतीयों को हथकड़ी लगाने वाली बात को जायज़ ठहराने वाले शायद भारत-पाक के बीच सीजफ़ायर वाले ट्रंप के फ़ैसले को भी अपनी कुतर्कों से जायज़ ठहरा दे ?

लेकिन सवाल तब उठता है जब ट्रंप की दादागिरी पर चीन और फ़्रांस के नेता माकूल जवाब देकर ट्रंप को घुटने में ले आते है लेकिन मोदी सत्ता अब भी ख़ामोश है 

और अब तो साउथ अफ़्रीका जैसे देश भी ट्रंप को जवाब देने लग गये तब जो  फ़ेसबुक में चल रहा है… या सोशल मीडिया में सुर्ख़ी बटोरने वाले इन सवालों को समझे…

*दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति का स्वाभिमान और हमारे प्रधानमंत्री जी की रगों में दौड़ता सिंदूर*


★ कल "व्हाइट हाउस" में अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प और साउथ अफ़्रीक़ा के राष्ट्रपति रामाफोसा के बीच "जेलेन्सकी" वाली 'जूतम पैजार' हो गई..


★ ट्रंप Tv स्क्रीन लगा कर पूरी तैयारी के साथ बैठा था ताकि साउथ अफ़्रीक़ा के राष्ट्रपति की बे-'इज़्ज़ती की जाए..


★ ट्रंप ने रामाफोसा को साउथ अफ़्रीक़ा के कुछ VDO दिखाते हुए बोला कि तुम्हारे देश में काले लोग गोरों का क़त्ल कर रहे हैं..ट्रंप का ऐसा कहना ग़लत था


★ राष्ट्रपति रामाफोसा ने बोला कि VDO फ़र्ज़ी है..बल्कि साउथ अफ़्रीक़ा में काले लोगों का ही क़त्ल हुआ है..ट्रम्प को झूटा बोल दिया😃


◆ राष्ट्रपति रामाफोसा ने ट्रम्प को बोला कि मेरे पास आप को देने के लिए 3200 करोड़ का हवाई जहाज़ नहीं है..


◆ क़तर ने ट्रम्प को 3200 करोड़ का हवाई जहाज़ दिया था, यह उस पर तंज़ था🤣


◆ ट्रम्प एक बार सकपका गया था..संभलते हुए ट्रम्प ने राष्ट्रपति रामाफोसा को कहा कि अगर आप 3200 करोड़ का हवाई जहाज़ देंगे तो अमरीका क़ुबूल करेगा🔔🔔🔔


👉 राष्ट्रपति रामाफोसा साहब, हम भारतवासी आप को सलाम करते हैं..क्योंकि ट्रम्प जैसे बदतमीज़ को आप ने सही सबक़ सिखाया..


👉 राष्ट्रपति रामाफोसा साहब, आप ने अपने देश की 'इज़्ज़त, ग़ैरत और आज़ादी का समझौता नहीं किया


✋ भक्तों एक भारत के PM मोदी जी हैं ट्रम्प रोज़ मोदी जी को ज़लील करता है..पर मोदी जी के मुंह से एक लफ़्ज़ नहीं निकलता है..


👉 ख़ून में ख़ुद दारी दौड़नी चाहिए  ख़ून में सिंदूर नहीं दौड़ता... और हां व्यापार भी नहीं दौड़ना चाहिए;;;;;



इस तस्वीर से युद्ध नहीं चुनाव जीते जाते हैं

 इस तस्वीर से युद्ध नहीं चुनाव जीते जाते हैं


पाकिस्तान की पीठ पर सवार होकर अमेरिका ने जो सीजफ़ायर का एलान किया, उसे क्या कोई भुला पाएगा

चीन ने पाकिस्तान की संप्रभुता की आड़ लेकर भारत को धमकाया क्या उसे नज़र अन्दाज़ किया जा सकता है

लेकिन यदि खून की जगह ठंडा तासीर वाला सिंदूर बहे तब क्या किया जा सकता है 

ऐसे में अब यदि राम को लायें है कि तर्ज़ पर हर रेलवे की टिकिट पर और चौक चौराहों में सेना की वर्दी पहने मोदी दिखे तो इसका मतलब क्या है यह बताने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए 

ऐसे में राजेश जे जैन ने फ़ेसबुक में जो लिखा वह आप भी पढ़िए..

ये कैसा खून है जो समय के साथ बदल जाता है ? कभी ये धंधा बन जाता है ,कभी व्यापार और आज तो  ये सिंदूर बन गया !! ट्रम्प के सामने ठंडा पड़  जाता है ! चाइना का नाम आते ही सूख  जाता है। चलिए मान लेते है.  गरम सिंदूर बन गया तो बताए कि पहलगाम के पीड़ितों के लिए आपने क्या किया ? लफ्फबाजी ! किसी को दिलासा देने की कोशिश की ? उनसे मिलकर सांत्वना के दो शब्द कहे ? बिलकुल नहीं ! हाँ नितीश कुमार के साथ ठिलवाई जरूर की।

राहुल गांधी दुरुस्त कह रहे है कि आपके खून में केमिकल रिएक्शन ' कैमेरा ' देखकर ही होने लगता है। अन्यथा तो आप सर्वदलीय बैठक से ही कल्टी मार जाते है। अगर यह खून वाकई रिएक्शन करता तो 22 अप्रैल को ही उबल जाता , विदेश सचिव विक्रम मिस्त्री की ट्रोलिंग पर आपकी नींद उड़ा देता , सोफिया कुरैशी और सेना के अपमान के जिम्मेदार दोनों मंत्रियों को सड़क पर ला देता। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से खून ने कोई हरकत नहीं की !

तो अब थोड़ा विश्राम कीजिये  श्रीमान।  बातों की जलेबियाँ तलना बंद कीजिये। एक काम कीजिये ,  अपना ये होर्डिंग भी  उतरवा लीजिये , लोग मजाक बना रहे है  , हंसा हंसा कर जान लेंगे क्या ? इस तरह के इवेंट से अब आपके अंधभक्तो को भी कोफ़्त होने लगी है , आते जाते लोग उन्हें मुस्कुराकर देखते है।  इससे उनका खून जरूर उबल जाता है।

डॉ पंकज यादव ने जो लिखा…

कथा: एक जाबांज की...

22 अप्रैल को हुये कायर आतंकियों के हमले में जान गंवाने वाले बेगुनाहों की मौत का बदला लेने को हमारा वो वीर योद्धा पल-पल व्याकुल था, देश के इंटेलीजेंस फेल्योर पर उठ रहे सवालों के बीच वो नापाक आतंकियों को सबक सिखाने को व्याकुल होता ही जा रहा था, हालांकि आतंकी घटना के बाद उसने बिहार में जंग के मैदान से शब्दभेदी बाण छोड़े, पर इंतकाम की आग उसे चैन नहीं लेने दे रही थी। 


आखिरकार 06-07 मई, 2025 की आधी रात को वो घड़ी आई जब रडार परास्त तकनीकी का इस्तेमाल करते हुये वो अकेला ही लड़ाकू विमान लेकर दुश्मन देश के आतंकी ठिकानों पर टूट पड़ा। खाकी वर्दी, काला चश्मा और कार्गो पहन हमारा वो वीर योद्धा उस रात एको एक आतंकी को नेस्तानाबूद कर देने को आतुर था, उसने पूरी ड्रेस पहन अपनी सभी जेबों में बम भर रखे थे, अपने पूरे विमान को गोला बारूद से फुल कर रखा था। दुश्मन खेमे में लड़ाकू विमान के घुसते ही उसने आतंकी ठिकानों पर बमबारी शुरु कर दी। धमाके पे धमाका, बूम-बूम की आवाज से दुश्मनों के होश उड़ गये, उन्होंने आकाश की ओर देखा तो वो जाबांज अकेला ही मोर्चे पर डटा था, कभी धाँय-धाँय, कभी धम-धम, कभी बूम-बूम करके जब उसने ब्लास्ट किये तो आतंकियों को सम्भलने का मौका भी नहीं मिला, एक-एक बम के धमाके के साथ सैकड़ों आतंकी ढेर हो रहे थे।


दुश्मनों ने भी अपने हथियार उठाये धाँय-धाँय, ठिचकियाऊँ-ठिचकियाऊँ करके एक के बाद कई प्रहार हमारे वीर योद्धा पर किये गये, लेकिन हमारे जाबांज ने उस दिन दुश्मनों की एक न चलने दी। सू-सांय, सू-सांय, घर्र-घर्र करते उसके लड़ाकू विमान ने दुश्मनों के हमले को फेल कर दिया। हमारे जाबांज योद्धा ने लगातार 2 घण्टे तक मौत बनकर दुश्मनों के सीने पर तांडव किया और फिर वो योद्धा आखिरकार 07 मई की अलसुबह अपने वतन वापस लौटा, लड़ाकू विमान स्टैंड पर खड़ा कर, हैलमेट हाथ में लेकर जब वो उतरा तो उसकी जाबांजी देखते ही बनती थी, तसवीर उसी वक्त की है। गौर से देख लो, हजारों सालों में एक बार पैदा होते हैं ऐसे वीर योद्धा। शत-शत नमन है हमारे देश के ऐसे वीर, जाबांज योध्दा को...