सोमवार, 20 जुलाई 2026

सुशासन की पोल तो मोदी सरकार ने ही खोल दी

सुशासन की पोल तो मोदी सरकार ने ही खोल दी 


शिक्षा में पिछड़ता राज्य, बुजुर्गों के खिलाफ बढ़ता अपराध और बेबस किसान—सरकारी आंकड़ों और एनसीआरबी (NCRB) की रिपोर्ट ने खोली 'डबल इंजन' सरकार के दावों की पोल।

 दावों के शोर में गुम होती ज़मीनी हकीकत

छत्तीसगढ़ में सरकारें बदलती हैं, सत्ता के चेहरे बदलते हैं और मंचों से विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। छत्तीसगढ़ को समृद्ध और अपराध-मुक्त बनाने के वादे हर चुनाव का मुख्य आकर्षण होते हैं। लेकिन जब आंकड़े बोलने लगते हैं, तो राजनीति के बड़े-बड़े दावे ताश के पत्तों की तरह ढह जाते हैं।

हाल ही में आई राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट और केंद्रीय मंत्रालयों के आंकड़ों ने छत्तीसगढ़ की वर्तमान कानून-व्यवस्था, सामाजिक सुरक्षा और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिक्षा का गिरता स्तर हो, बुजुर्गों की असुरक्षा या फिर अन्नदाता का संकट—ये रिपोर्ट बयां करती हैं कि प्रदेश किस मोड़ पर खड़ा है।

१. शिक्षा का गिरता स्तर: भविष्य के साथ खिलवाड़?

किसी भी राज्य की प्रगति का सबसे बड़ा मापदंड उसकी शिक्षा व्यवस्था होती है। लेकिन छत्तीसगढ़ के संदर्भ में आंकड़े चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं।

 निचले पायदान पर राज्य: केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, शिक्षा के प्रदर्शन के मामले में छत्तीसगढ़ देश के राज्यों में नीचे से तीसरे नंबर पर है।

 शिक्षकों और बुनियादी ढांचे की कमी: राज्य के ग्रामीण और सुदूर अंचलों में स्कूलों की जर्जर हालत, शिक्षकों की भारी कमी और प्रशासनिक अनदेखी के कारण बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो रहा है। जब राज्य का शिक्षा मॉडल देश में सबसे निचले स्तर पर होगा, तो हम किस 'गढ़बो छत्तीसगढ़' की बात कर रहे हैं?"

२. बुजुर्गों पर बढ़ता अत्याचार: देश में पहले स्थान पर छत्तीसगढ़

सामाजिक सुरक्षा और अपराध नियंत्रण के मोर्चे पर छत्तीसगढ़ की स्थिति और भी भयावह नजर आती है। एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार, वरिष्ठ नागरिकों (बुजुर्गों) के खिलाफ होने वाले अपराधों में छत्तीसगढ़ पूरे देश में नंबर-1 पर पहुँच गया है।

वर्ष-दर-वर्ष बढ़ते अपराध के आंकड़े:

 वर्ष 2021: 1,408 मामले

 वर्ष 2022: 1,632 मामले

 वर्ष 2023: 1,798 मामले

ये आंकड़े साबित करते हैं कि पिछले तीन वर्षों में बुजुर्गों के खिलाफ अपराध में लगातार बढ़ोतरी हुई है।

अपराध का स्वरूप और न्याय में देरी:

राज्य में बुजुर्गों को निशाना बनाकर की जाने वाली हत्या, मारपीट, साइबर ठगी, संपत्ति हड़पने और अकेले पाकर लूटपाट की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई है। इसके साथ ही न्याय की सुस्त प्रक्रिया के कारण अदालतों में लंबित मामलों का अंबार लग रहा है, जिससे अपराधियों के हौसले बुलंद हैं।

३. अन्नदाता पर संकट: धान खरीद के दावों के बीच आत्महत्या की त्रासदी

छत्तीसगढ़ को 'धान का कटोरा' कहा जाता है। सरकारें अक्सर रिकॉर्ड धान खरीदी और किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं का ढिंढोरा पीटती हैं। लेकिन सवाल यह है कि यदि किसान खुशहाल है, तो फिर वह मौत को गले क्यों लगा रहा है?

एनसीआरबी के चौंकाने वाले आंकड़े (2023):

 देशभर में किसान आत्महत्याएं: 4,690

 छत्तीसगढ़ में किसान आत्महत्याएं: 468 (414 पुरुष और 54 महिला किसान)

महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे बड़े राज्यों के बाद छत्तीसगढ़ में यह संख्या बेहद डरावनी है। यदि जनसंख्या और क्षेत्रफल के अनुपात में देखा जाए, तो स्थिति बेहद गंभीर है।

आखिर क्यों मजबूर है किसान?

1. खाद और बीज का संकट: समय पर डीएपी (DAP), यूरिया और सही गुणवत्ता के बीज न मिलना।

2. कालाबाजारी और बिचौलिए: खाद और कीटनाशकों की कमी का फायदा उठाकर व्यापारी किसानों का शोषण कर रहे हैं।

3. सिंचाई और कर्ज का बोझ: समय पर सिंचाई सुविधाएं न मिलना और फसल बीमा की राशि मिलने में देरी होना।

केवल समर्थन मूल्य बढ़ा देने या प्रति एकड़ बोनस का दावा करने से किसान का संकट खत्म नहीं होता; जब तक उसे सही समय पर कृषि संसाधन नहीं मिलेंगे, वह आर्थिक मानसिक तनाव से मुक्त नहीं हो सकता।

निष्कर्ष: अब बहानेबाजी नहीं, ठोस कदम उठाने की जरूरत

यह डेटा किसी राजनीतिक दल या विपक्ष का तैयार किया हुआ नहीं है, बल्कि यह भारत सरकार के अपने संस्थानों (NCRB और शिक्षा मंत्रालय) की आधिकारिक रिपोर्ट है।

छत्तीसगढ़ की 'डबल इंजन' सरकार को अब केवल अपनी पीठ थपथपाने और खोखले दावे करने के बजाय इन आंकड़ों को गंभीरता से लेना होगा। यदि बुजुर्ग अपने ही घर में सुरक्षित नहीं हैं, किसान खेतों में आत्महत्या करने पर मजबूर है और बच्चे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित हैं, तो यह प्रशासनिक तंत्र की विफलता को दर्शाता है। समय आ गया है कि सरकार जुमलेबाजी से बाहर निकलकर ज़मीनी स्तर पर काम करे, ताकि छत्तीसगढ़ सच मायने में एक खुशहाल राज्य बन सके।

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रविवार, 19 जुलाई 2026

बस्तर पर भूमाफियाओं की नज़र

बस्तर पर भूमाफियाओं की नज़र 


 छत्तीसगढ़ का बस्तर अंचल, जो लंबे समय से नक्सली हिंसा और अशांति के लिए सुर्खियों में रहता था, अब एक नए किस्म के संकट से जूझ रहा है। अंदरूनी इलाकों से आ रही खबरें इस बात का साफ संकेत दे रही हैं कि बस्तर में नक्सलवाद के कमजोर पड़ते ही राजधानी रायपुर और बाहरी क्षेत्रों के रसूखदार भू-माफियाओं और उद्योगपतियों की नजर यहाँ के जल, जंगल और जमीन पर टिक गई है। बीजापुर के भैरमगढ़ और कोंडागांव से सामने आए दो बड़े मामलों ने प्रशासनिक मुस्तैदी और आदिवासी हितों के संरक्षण के दावों की पोल खोल कर रख दी है।

राहत शिविरों में थे ग्रामीण, पीछे से रायपुर के रसूखदारों के नाम हो गई जमीन

सबसे चौंकाने वाला और गंभीर मामला बीजापुर जिले के भैरमगढ़ ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले ग्राम बैलधर्मा और बड़पली का है। मिली जानकारी के अनुसार, यहाँ के स्थानीय आदिवासी ग्रामीण नक्सली प्रताड़ना और खौफ के कारण अपने मूल गांवों को छोड़कर सुरक्षा कैंपों (राहत शिविरों) में शरण लिए हुए थे। इसी मुफ़लिसी और बेबसी का फायदा उठाकर रायपुर के एक रसूखदार उद्योगपति परिवार द्वारा कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों के सहारे आदिवासियों की लगभग 120 एकड़ से अधिक निजी भूमि की रजिस्ट्री अपने नाम करा ली गई।

इस महाघोटाले का खुलासा तब हुआ जब राहत शिविरों में रह रहे कुछ ग्रामीण अपने बच्चों के जाति प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र या जमीन के बंटवारे के सिलसिले में पटवारी के पास बी-वन, नक्शा और खसरा निकालने पहुंचे। सरकारी रिकॉर्ड देखते ही ग्रामीणों के पैरों तले जमीन खिसक गई, क्योंकि जिस पैतृक भूमि पर वे अपना हक समझ रहे थे, वह राजस्व रिकॉर्ड में रायपुर (कचना रोड, आनंदम वर्ल्ड सिटी) निवासी मीनू गोयनका और महेंद्र गोयनका के नाम पर दर्ज हो चुकी थी। इस संवेदनशील मामले के सामने आने के बाद बीजापुर से लेकर रायपुर तक हड़कंप मच गया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने भी एक विशेष जांच दल का गठन कर प्रतिवेदन मांगा है। वहीं, दूसरी ओर इस मामले को उजागर करने वाले एक समाचार पत्र पर संबंधित पक्ष द्वारा 100 करोड़ रुपये का मानहानि का दावा ठोकने की बात भी सामने आ रही है।

कोंडागांव: बिना अनुमति के पहाड़ तोड़ रही 'रितेश अग्रवाल एंड कंपनी'

दूसरा मामला कोंडागांव जिले के चिखलपुरी बस स्टैंड के ठीक पीछे का है। बस्तर में इन दिनों चौतरफा चल रहे सड़क निर्माण कार्यों की आड़ में नियमों को ताक पर रखकर अवैध कमाई का बड़ा खेल चल रहा है। आरोप है कि मई 2025 में यहाँ 'रितेश अग्रवाल एंड कंपनी' द्वारा रातों-रात एक विशाल 'हॉट मिक्स प्लांट' स्थापित कर दिया गया।

हैरानी की बात यह है कि इस प्लांट की स्थापना के लिए न तो जिला प्रशासन से कोई वैध अनुमति ली गई और न ही पर्यावरण विभाग से एनओसी (अनापत्ति प्रमाण पत्र) ली गई। बिना किसी कानूनी औपचारिकता के इस प्लांट के जरिए बस्तर के जंगलों और पहाड़ों को बेतरतीब तरीके से तोड़ा जा रहा है और पत्थरों का अवैध उत्खनन धड़ल्ले से जारी है। स्थानीय स्तर पर कई शिकायतें होने के बावजूद प्रशासन मौन साधे हुए है, जिससे यह साफ अंदेशा होता है कि इन रसूखदार ठेकेदारों को किसी बड़े राजनीतिक दल या सत्ता का सीधा संरक्षण प्राप्त है। सूत्र बताते हैं कि बस्तर और सरगुजा संभाग में ऐसे दर्जन भर से ज्यादा अवैध प्लांट बिना किसी रोक-टोक के संचालित हो रहे हैं।

क्या बस्तर में दोहराया जाएगा 'रायपुर मॉडल'?

वरिष्ठ पत्रकारों और जानकारों का मानना है कि बस्तर में जो कुछ भी शुरू हुआ है, वह हुबहू राजधानी रायपुर के उस 'लैंड ग्रैबिंग मॉडल' की तरह है, जहां शंकर नगर, मौलश्री विहार और चारागाह की बेशकीमती सरकारी व काबिल काश्त जमीनों को रसूखदारों ने गुपचुप तरीके से अपने नाम करा लिया था। यदि समय रहते शासन और प्रशासन ने बस्तर में चल रहे इस फर्जीवाड़े और अवैध उत्खनन पर नकेल नहीं कसी, तो आने वाले दिनों में जल, जंगल और जमीन को लेकर आदिवासियों का असंतोष एक नए आंदोलन का रूप ले सकता है।

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शनिवार, 18 जुलाई 2026

दर्जनों दवाओं के सैंपल फेल, फिर भी एक कंपनी पर मेहरबान क्यों है सरकार?

 छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य व्यवस्था से खिलवाड़: दर्जनों दवाओं के सैंपल फेल, फिर भी एक कंपनी पर मेहरबान क्यों है सरकार?



छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति को लेकर एक बड़ा और चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है। राज्य के सरकारी अस्पतालों में आम जनता को बांटी जाने वाली दवाइयों की गुणवत्ता को लेकर एक ऐसा खेल चल रहा है, जो सीधे तौर पर लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ है। सरकारी अस्पतालों की बदहाली और निजी अस्पतालों की कथित लूट के बीच एक ऐसा नेक्सेस (गठजोड़) काम कर रहा है, जिसमें दवा कंपनियां, रसूखदार अधिकारी और सत्ता में बैठे लोग शामिल नजर आते हैं।

इस पूरे नेक्सेस के केंद्र में है एक स्थानीय दवा कंपनी—नियो इंडिया लिमिटेड’ (Neo India Limited), जिसकी दर्जनों दवाइयां जांच में फेल हो चुकी हैं, लेकिन इसके बावजूद सरकार और प्रशासन इस पर मेहरबान हैं।

🏛️ एमएसएमई (MSME) की आड़ और नियमों में भारी ढील

इस पूरे खेल के पीछे केंद्र सरकार की एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) को बढ़ावा देने की नीति का हवाला दिया जा रहा है, जिसका फायदा उठाकर छत्तीसगढ़ की वर्तमान सरकार ने टेंडर प्रक्रियाओं में अभूतपूर्व छूट दे दी है [01:17]।

राजधानी रायपुर के पास आरंग (दी औद्योगिक क्षेत्र) में स्थित इस नियो इंडिया लिमिटेड कंपनी को सरकारी टेंडरों में भाग लेने के लिए कई तरह के नियमों से मुक्त रखा गया है:

1. टर्नओवर की बाध्यता खत्म: स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा देने के नाम पर टेंडर में कंपनी के लिए अपने टर्नओवर का जिक्र करना जरूरी नहीं रखा गया है [03:27]।

2. सर्टिफिकेट की अनदेखी: हर जिम्मेदार दवा कंपनी के लिए जरूरी माने जाने वाले WHO-GMP (World Health Organization - Good Manufacturing Practices) सर्टिफिकेट की अनिवार्यता को भी इस टेंडर प्रक्रिया में शिथिल कर दिया गया [03:47]।

3. L1 रेट पर 50% सप्लाई का अधिकार: यदि कोई बाहरी राज्य की कंपनी टेंडर में सबसे कम बोली (L1) लगाकर जीत भी जाती है, तो भी स्थानीय नीति के तहत इस कंपनी को उस L1 रेट पर 50% दवाइयां सप्लाई करने की भारी छूट दी गई है [04:06]।

💊 दर्जनों दवाइयां फेल, फिर भी ब्लैकलिस्ट से दूरी क्यों?

नियमों के मुताबिक, यदि किसी दवा कंपनी की तीन दवाओं के सैंपल गुणवत्ता जांच में फेल हो जाते हैं, तो उसे 3 साल के लिए ब्लैकलिस्ट (काली सूची) में डाल दिया जाता है [05:06]। लेकिन नियो इंडिया लिमिटेड के मामले में यह नियम पूरी तरह हवा में उड़ा दिया गया है।

कंपनी की लगभग दो दर्जन से अधिक दवाइयों के सैंपल गुणवत्ता मानकों पर पूरी तरह फेल पाए गए हैं। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं [05:14]:

 नाइट्रेट से संबंधित दवाइयां और टेलमीसार्टन (Telmisartan)

 जिंक सल्फेट और डाइसाइक्लोमाइन (Dicyclomine)

 फाइटोनाडियोन (Phytonadione)

 सामान्य इलाज में काम आने वाली बुखार-खांसी की दवाइयां, जैसे पैरासिटामॉल (Paracetamol) भी जांच में फेल हो चुकी हैं।

 सिर्फ दवाइयां ही नहीं, अस्पतालों में ऑपरेशन के लिए सप्लाई किए गए चिकित्सा उपकरण (औजार) भी घटिया दर्जे के और जंग लगे हुए पाए गए, जिन्हें वापस करना पड़ा था [06:07]।

इतने गंभीर उल्लंघनों के बाद भी अधिकारियों की मेहरबानी का आलम यह है कि कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने के बजाय, सिर्फ खराब बैच की दवाइयां लौटा दी जाती हैं और उनसे नया बैच भेजने को कह दिया जाता है [07:41]।

👥 कौन हैं इस कंपनी के पीछे?

इंटरनेट और आधिकारिक दस्तावेजों के मुताबिक, इस कंपनी के डायरेक्टर्स में मनीष अग्रवाल, आशीष अग्रवाल, अजय अग्रवाल और राहुल शेरस शामिल हैं [06:34]। सत्ता और व्यापारियों के बीच के इस कथित गठजोड़ के कारण ही इस कंपनी पर कार्रवाई करने से हाथ खींचे जा रहे हैं।

📜 मेडिकल घोटालों का पुराना इतिहास

छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य महकमे और दवा आपूर्ति में गड़बड़ी का यह कोई पहला मामला नहीं है। पूर्ववर्ती डॉक्टर रमन सिंह के कार्यकाल से लेकर अब तक कई मेडिकल घोटाले सामने आ चुके हैं। पूर्व गृह मंत्री ननकीराम कंवर द्वारा उठाए गए एक अन्य दवा घोटाले में भी जांच चल रही है, जिसमें 14 अफसरों के शामिल होने की बात सामने आई थी, हालांकि केवल आधा दर्जन लोग ही जेल में हैं और बाकी आज भी मजे से नए पदों पर बैठे हैं [09:00]।

वर्तमान में स्वास्थ्य मंत्रालय सरगुजा क्षेत्र से आने वाले मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल के पास है [01:32]। अस्पतालों में खाली पदों की भर्ती न होना और इस तरह की गुणवत्ताहीन दवाओं की बेखौफ सप्लाई ने राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

🕒 निष्कर्ष

स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा देने की नीति अपनी जगह सही हो सकती है, लेकिन जब बात जनता की सेहत और जिंदगी की हो, तो मानकों से समझौता करना एक गंभीर अपराध है। दर्जनों जीवनरक्षक दवाओं के फेल होने के बाद भी एक ही कंपनी को बार-बार जीवनदान देना यह साफ करता है कि राज्य में आम लोगों की जान की कीमत से बड़ा रसूखदारों का खेल हो चुका है।

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शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

अतिथि शिक्षकों की बेबसी

भविष्य गढ़ने वालों का धुंधला भविष्य: नियमितीकरण के वादे और 'इच्छा मृत्यु' की गुहार


दुर्ग-भिलाई की सड़कों से लेकर राज्यपाल की चौखट तक गूंज रही अतिथि शिक्षकों की बेबसी; बस्तर-सरगुजा के जंगलों में रौशनी फैलाने वाले खुद झेल रहे अनदेखी 


छत्तीसगढ़ में नौनिहालों का भविष्य संवारने वाले 'गुरुजी' आज खुद अपनी जिंदगी और आजीविका के लिए संघर्ष कर रहे हैं। राज्य के शिक्षा हब कहे जाने वाले दुर्ग-भिलाई के ट्विन सिटी इलाके में इन दिनों भारी आक्रोश और मायूसी का माहौल है। दुर्ग-भिलाई के कलेक्टोरेट और संभागीय मुख्यालयों के बाहर बड़ी संख्या में अतिथि शिक्षक और डीएड-बीएड अभ्यर्थी पिछले कई हफ्तों से अपनी जायज मांगों को लेकर धरना दिए बैठे हैं। धूप, बरसात और प्रशासनिक बेरुखी को झेलते हुए इन शिक्षकों का यह आंदोलन अब उस मुकाम पर पहुंच गया है, जहां छत्तीसगढ़ के इतिहास में शायद पहली बार, हजारों की संख्या में पहुंचे अतिथि शिक्षकों ने महामहिम राज्यपाल से मिलकर एक बेहद मार्मिक पत्र सौंपा है और सम्मानजनक रास्ता न निकलने की स्थिति में 'इच्छा मृत्यु' की इजाजत मांगी है। किसी भी संवेदनशील लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए यह स्थिति न केवल चिंताजनक है, बल्कि शासन-प्रशासन की प्राथमिकताओं पर भी एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करती है।

यह आक्रोश केवल दुर्ग-भिलाई तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें राज्य के सबसे सुदूर और संवेदनशील अंचलों से जुड़ी हैं। बस्तर, बीजापुर, दंतेवाड़ा, सुकमा, सरगुजा, सूरजपुर और जशपुर जैसे दुर्गम तथा नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में, जहां नियमित शिक्षक जाने से कतराते हैं, वहां ये अतिथि शिक्षक पिछले 10 वर्षों से अपनी सेवाएं दे रहे हैं। अपने घरों से 500 से 600 किलोमीटर दूर जंगलों और संवेदनशील क्षेत्रों में रहकर इन शिक्षकों ने आदिवासी बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ा है। विडंबना देखिए कि जिन क्षेत्रों में इनके अथक प्रयासों की बदौलत स्कूलों का परीक्षा परिणाम 100 प्रतिशत आ रहा है, वहां काम करने वाले इन राष्ट्र-निर्माताओं को व्यवस्था केवल 'अतिथि' मानकर उनके मूलभूत अधिकारों से भी वंचित रखे हुए है।

वादाखिलाफी का दंश और बजट सत्र की कड़वी हकीकत

अतिथि शिक्षकों की इस बदहाली और हताशा का सबसे मुख्य कारण हाल ही में संपन्न हुए छत्तीसगढ़ विधानसभा के बजट सत्र में मिला सरकारी जवाब है। चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी ने अपने घोषणा पत्र और 'मोदी की गारंटी' में यह स्पष्ट वादा किया था कि सरकार बनते ही अनियमित कर्मचारियों व अतिथि शिक्षकों के नियमितीकरण की दिशा में 100 दिनों के भीतर एक उच्च स्तरीय कमेटी का गठन कर त्वरित कार्रवाई की जाएगी। तत्कालीन घोषणा पत्र समिति के प्रमुखों द्वारा भी इसे प्रमुखता से शामिल किया गया था। लेकिन बजट सत्र के दौरान जब विपक्ष द्वारा अतिथि शिक्षकों के भविष्य को लेकर सवाल दागा गया, तो शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने साफ तौर पर कह दिया कि फिलहाल अतिथि शिक्षकों के नियमितीकरण के लिए कोई समय सीमा तय नहीं है और न ही वर्तमान में ऐसा कोई प्रावधान विचाराधीन है।

सरकार के इस रुख ने उन 10,500 से अधिक अतिथि शिक्षकों के सपनों पर पानी फेर दिया है, जो उम्मीद लगाए बैठे थे कि नई सरकार उनके जीवन में स्थिरता लाएगी। विधानसभा में शिक्षा मंत्री के इस बयान का राज्य अतिथि शिक्षक संघ की प्रांताध्यक्ष अन्नपूर्णा पांडे सहित तमाम पदाधिकारियों ने तीखा विरोध किया है। शिक्षकों का कहना है कि मंत्री महोदय का यह बयान कि 'वे केवल अतिथि हैं, इसलिए शासन उनके लिए ज्यादा कुछ नहीं कर सकती' सरासर असंवेदनशील है। शिक्षकों का तर्क है कि उन्हें अतिथि बनाने वाली भी यही शासन व्यवस्था है, वे खुद से अतिथि बनकर नहीं आए हैं। जब वे एक नियमित व्याख्याता के समकक्ष योग्यता रखते हैं और उन्हीं के समान सारे कार्य (जैसे चुनाव ड्यूटी, जनगणना, उत्तरपुस्तिकाओं का मूल्यांकन और ग्रीष्मकालीन प्रशिक्षण) पूर्ण ईमानदारी से करते हैं, तो फिर वेतन और सुविधाओं के मामले में उनके साथ यह सौतेला व्यवहार क्यों किया जा रहा है?

अन्नपूर्णा पांडे (प्रांताध्यक्ष, राज्य अतिथि शिक्षक संघ) का कहना है कि "हम 10 वर्षों से बस्तर और सरगुजा के उन अंदरूनी इलाकों में पढ़ा रहे हैं जहां कोई नहीं जाना चाहता। आज जब हम अपने हक की बात कर रहे हैं, तो हमें यह कहकर टाल दिया जाता है कि तुम तो सिर्फ 'अतिथि' हो। क्या बच्चों का भविष्य बनाने वालों की अपनी कोई जिंदगी नहीं है?"

मात्र 20,000 रुपये का वेतन और मानवाधिकारों का हनन

यदि इस मामले के वित्तीय और जमीनी पहलुओं पर गौर करें, तो अतिथि शिक्षकों का आर्थिक शोषण चौंकाने वाला है। राज्य में एक पूर्णकालिक नियमित व्याख्याता को जहां 80,000 से 90,000 रुपये मासिक वेतन और तमाम शासकीय भत्ते मिलते हैं, वहीं ठीक उसी पद पर उतनी ही योग्यता के साथ 10 वर्षों से काम कर रहे अतिथि शिक्षक को मात्र 20,000 रुपये मासिक मानदेय पर गुजारा करना पड़ रहा है। बढ़ती महंगाई के इस दौर में 20,000 रुपये के अल्प वेतन में 500 किलोमीटर दूर रहकर परिवार चलाना और बच्चों की शिक्षा-दीक्षा पूरी करना असंभव सा हो गया है।

इससे भी अधिक दर्दनाक पहलू यह है कि इन शिक्षकों को कोई भी सवैतनिक अवकाश (Paid Leave) प्राप्त नहीं है। यदि कोई शिक्षक अस्वस्थ होने या किसी पारिवारिक आपातकाल के कारण एक दिन की भी छुट्टी लेता है, तो उसके वेतन से प्रति दिन के हिसाब से पैसे काट लिए जाते हैं। इतना ही नहीं, हर साल गर्मियों की छुट्टियों (समर वेकेशन) के डेढ़ महीने (45 दिन) का इन्हें कोई वेतन नहीं दिया जाता, जबकि इस अवधि में भी शासन द्वारा संचालित विभिन्न शैक्षणिक योजनाओं और बच्चों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में इनकी पूरी सहभागिता ली जाती है। बिना वेतन के डेढ़ महीने का यह खालीपन इन परिवारों के लिए आर्थिक रूप से कमर तोड़ने वाला साबित होता है। पिछली सरकार के कार्यकाल में दो बार में कुल 5,000 रुपये की वृद्धि की गई थी, लेकिन वर्तमान सरकार ने आने के बाद से मानदेय में एक रुपये की भी बढ़ोतरी नहीं की है, बल्कि विधानसभा में पूर्व की वृद्धि को ही आधार बनाकर भ्रामक तथ्य प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

तुलनात्मक विवरण (नियमित बनाम अतिथि शिक्षक):

1. मासिक वेतन / मानदेय:

नियमित व्याख्याता को 80,000 से 90,000 रुपये के साथ सभी सरकारी भत्ते मिलते हैं, जबकि अतिथि शिक्षक को केवल 20,000 रुपये का नियत मानदेय मिलता है, कोई भत्ता नहीं दिया जाता।

2. आकस्मिक / चिकित्सा अवकाश:

नियमित व्याख्याता को नियमानुसार पूर्ण सवैतनिक अवकाश मिलता है, जबकि अतिथि शिक्षक की पात्रता शून्य है। एक दिन की छुट्टी पर भी इनका वेतन काट लिया जाता है।

3. ग्रीष्मकालीन अवकाश (45 दिन):

नियमित व्याख्याता को इस अवधि का पूर्ण वेतन मिलता है, जबकि अतिथि शिक्षकों से काम लेने के बावजूद उन्हें शून्य वेतन दिया जाता है।

4. कार्यभार व जिम्मेदारियां:

नियमित व्याख्याता की तरह ही अतिथि शिक्षक भी अध्यापन, चुनाव, जनगणना और मूल्यांकन का समान कार्यभार संभालते हैं और शत-प्रतिशत परिणाम देते हैं।

नियम बनाना सरकार के हाथ में, फिर बेरुखी क्यों?

अतिथि शिक्षक संघ का कहना है कि सरकार का यह बहाना कि 'अधिकारियों के अनुसार नियमों में पेच है' या 'अन्य अनियमित कर्मचारियों के कारण मामला उलझा है' पूरी तरह से आधारहीन है। छत्तीसगढ़ का इतिहास गवाह है कि वर्ष 2003 और 2005 के पूर्व भी शिक्षा व्यवस्था में ऐसे शिक्षक थे जो मात्र 10.5 महीने का वेतन पाते थे और उन्हें किसी अवकाश की पात्रता नहीं थी। लेकिन तत्कालीन सरकारों ने दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाते हुए नियम बदले, उन्हें पहले शिक्षाकर्मी बनाया और बाद में उनका संविलियन कर उन्हें नियमित शिक्षक का दर्जा दिया। जब पूर्व में ऐसा किया जा चुका है, तो आज के नीति-नियंताओं के हाथ क्यों बंधे हुए हैं? नियम बनाना और जनहित में उनमें संशोधन करना पूरी तरह से सरकार और उच्च अधिकारियों के क्षेत्राधिकार में आता है।

अतिथि शिक्षकों की प्रमुख मांगें:

1. पूर्ण संविलियन (Regularization): घोषणा पत्र और 'मोदी की गारंटी' के वादे के अनुरूप 10,500 अतिथि शिक्षकों का शिक्षा विभाग में पूर्ण संविलियन किया जाए।

2. सम्मानजनक वेतनमान: संविलियन की प्रक्रिया पूरी होने तक व्याख्याता पद के समकक्ष एक गरिमापूर्ण और सम्मानजनक अंतरिम वेतनमान लागू हो।

3. सवैतनिक अवकाश व ग्रीष्मकालीन वेतन: अन्य शासकीय कर्मचारियों की भांति आकस्मिक अवकाश की पात्रता हो और समर वेकेशन (45 दिन) के दौरान ली जाने वाली सेवाओं का पूर्ण भुगतान किया जाए।

राजनीतिक गलियारों में हलचल और विपक्ष के तीखे बाण

इस संवेदनशील मुद्दे ने अब छत्तीसगढ़ की सियासत में भी उबाल ला दिया है। दुर्ग-भिलाई में धरने पर बैठे डीएड अभ्यर्थियों और प्रदेश भर के अतिथि शिक्षकों के इस 'इच्छा मृत्यु' वाले कदम को लेकर विपक्ष सरकार पर हमलावर हो चुका है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज सहित प्रमुख विपक्षी नेताओं ने साय सरकार को आड़े हाथों लिया है। विपक्ष का आरोप है कि 'मोदी की गारंटी' केवल चुनाव जीतने का एक लोकलुभावन जुमला था, जिसका धरातल पर क्रियान्वयन शून्य है। विपक्ष का कहना है कि केवल अतिथि शिक्षक ही नहीं, बल्कि राज्य के 57,000 से अधिक अनियमित कर्मचारी, पंचायत कर्मी और डीएड अभ्यर्थी पिछले कई महीनों से सड़कों पर आंदोलन करने को मजबूर हैं, लेकिन सरकार कुंभकर्णी नींद सो रही है।

निष्कर्ष:

छत्तीसगढ़ जैसे प्रगतिशील राज्य में यदि शिक्षा की अलख जगाने वाले शिक्षकों को अपनी आजीविका के लिए महामहिम राज्यपाल से 'इच्छा मृत्यु' मांगनी पड़ रही है, तो यह पूरी व्यवस्था के लिए एक अलार्मिंग सिचुएशन है। दुर्ग-भिलाई के आंदोलनकारी युवाओं और राज्य के कोने-कोने में तैनात 10,500 अतिथि शिक्षकों की यह सामूहिक पुकार केवल एक नौकरी की मांग नहीं है, बल्कि यह उनके आत्मसम्मान और जीने के अधिकार की लड़ाई है। सरकार को चाहिए कि वह नौकरशाही के तकनीकी बहानों से ऊपर उठकर, अपने चुनावी वादों का सम्मान करे और इन गुरुजियों को सड़क से उठाकर सम्मानपूर्वक दोबारा कक्षाओं में भेजने का मार्ग प्रशस्त करे, ताकि छत्तीसगढ़ के नौनिहालों का भविष्य गढ़ने वाले इन हाथों का अपना भविष्य कभी अंधकारमय न हो।

वीडियो देखें 

https://youtu.be/bLflgYIHVAI?si=FHIgpxNhEZuALJ-h