गुरुवार, 23 जुलाई 2026

साय सरकार का उद्योगों से ये कैसा डील

साय सरकार का उद्योगों से ये कैसा डील


एमओयू और प्लेसमेंट कैंपों के खोखले दावों के बीच पिस रही छत्तीसगढ़ की युवा पीढ़ी; सस्ती जमीन और संसाधनों के एवज में राज्य को क्या मिला?


'इन्वेस्ट गढ़ छत्तीसगढ़' के गूंजते नारों और हजारों करोड़ रुपये के एमओयू (MoU) के बड़े-बड़े विज्ञापनों के बीच छत्तीसगढ़ का युवा आज एक बुनियादी सवाल पूछ रहा है—आखिर यह चमक-दमक किसके लिए है? प्रदेश में रोजगार के नाम पर एमओयू के रंग-बिरंगे पोस्टर तो सज रहे हैं, लेकिन धरातल पर न तो बड़ी फैक्ट्रियां आकार ले रही हैं और न ही स्थानीय युवाओं के चूल्हे जल रहे हैं [01:06]।

पंजीकृत बेरोजगारों की लंबी कतार

सरकारी फाइलों और आंकड़ों पर नजर डालें तो प्रदेश में पंजीकृत बेरोजगारों की स्थिति काफी भयावह नजर आती है। रोजगार कार्यालयों में पंजीकृत आंकड़ों के अनुसार:

 12वीं पास: 4,08,049 युवा [02:48]

 तकनीकी शिक्षा प्राप्त: 3,54,811 युवा [02:58]

 स्नातक (Graduate): 2,61,412 युवा [03:06]

 स्नातकोत्तर (Post Graduate): 1,56,998 युवा [03:10]

 10वीं पास: 63,880 युवा [03:15]

लाखों डिग्रीधारी युवाओं की इस जमात को स्थायी सरकारी या औद्योगिक नौकरियों के बजाय 'प्लेसमेंट कैंपों' के भरोसे छोड़ दिया गया है [02:17]।

प्लेसमेंट शो: महा-आयोजन या महज औपचारिकता?

सरकारी स्तर पर अब तक 556 से अधिक प्लेसमेंट कैंप आयोजित किए जा चुके हैं, जिन पर भारी-भरकम राशि खर्च की गई [02:25]। लेकिन इनका परिणाम क्या रहा?

हालिया आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2024-25 में आयोजित 311 प्लेसमेंट कैंपों में 3,000 से अधिक अभ्यर्थी पहुंचे, जिनमें से केवल 534 युवाओं को नौकरी मिल सकी [04:35]। वहीं वर्ष 2025-26 के 245 आयोजनों में यह आंकड़ा सिमटकर 449 पर ही रह गया [04:50]। हाल ही में हुए एक आयोजन में 6,366 युवाओं ने रुचि दिखाई, 18,000 को बुलाया गया, लेकिन महज 290 लोग ही पहुंचे [04:08]।

युवाओं के इस मोहभंग का मुख्य कारण है:

1. अत्यधिक कम वेतन: 4 साल की इंजीनियरिंग के बाद भी 8,000 से 9,000 रुपये प्रति माह का ऑफर [01:46, 11:00]।

2. अमानवीय काम के घंटे: बिना किसी सुरक्षा या मेडिकल सुविधा के 12 से 14 घंटे काम [05:11, 06:40]।

3. अस्थायी नौकरी: 6 महीने का कॉन्ट्रैक्ट, जिसमें न पीएफ (PF) की गारंटी है और न ही नौकरी की स्थायित्व [06:40]।

एमओयू का सच: जमीन पर सन्नाटा

राज्य सरकार ने स्टील प्लांट, सोलर हब और आईटी सेक्टर के नाम पर कई बड़े उद्योगपतियों के साथ एमओयू किए हैं [05:36]। परंतु रायपुर, बिलासपुर, भिलाई जैसे बड़े औद्योगिक केंद्रों में भी ऐसी कोई नई बड़ी फैक्ट्री खड़ी नहीं दिखती जो 5,000 स्थानीय युवाओं को सम्मानजनक रोजगार दे सके [05:59]। कई कंपनियां सैकड़ों एकड़ उपजाऊ जमीन अधिग्रहित कर सिर्फ बाउन्ड्री वॉल बनाकर गायब हो चुकी हैं [09:04]।

'स्किल' के नाम पर छलावा और बाहरी बनाम स्थानीय का खेल

जब भी नए उद्योग स्थापित होते हैं, प्रबंधन 'कुशल जनशक्ति' (Skilled Manpower) की कमी का हवाला देकर स्थानीय युवाओं को दरकिनार कर देता है [06:51]।

 मैनेजर और इंजीनियर: बिहार, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, गुजरात और मुंबई जैसे राज्यों से बुलाए जाते हैं [07:45]।

 स्थानीय युवाओं की स्थिति: जिन ग्रामीणों की जमीनें फैक्ट्री के नाम पर ली गईं, वे अपनी ही जमीन पर गार्ड या लेबर की नौकरी पाने के लिए राजनीतिक पहुंच और सिफारिशें लगाने को मजबूर हैं [08:24, 11:21]।

हाल ही में बेरला की बारूद फैक्ट्री और धरसींवा के औद्योगिक हादसों में भी यह उजागर हुआ कि वहां सुरक्षा मानकों की अनदेखी के साथ-साथ मजदूरों तक की भर्तियां बाहरी राज्यों से की गई थीं [08:04]।

युवाओं का दर्द: "डिग्री हमारी, जमीन हमारी, पर रोजगार दूसरों का"

 एक इंजीनियरिंग छात्र का कहना है: "हम लाखों रुपये खर्च कर चार साल पढ़ाई करते हैं ताकि बड़ा अफसर बनें, लेकिन हमें 9,000 रुपये में 14 घंटे खटने का ऑफर मिलता है।" [10:48]

 एक प्रभावित ग्रामीण ने बताया: "फैक्ट्री लगाने के वक्त बड़े-बड़े वादे किए गए थे। आज हमारी खेती भी चली गई और अब हमें सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी के लिए भी गिड़गिड़ाना पड़ता है।" [11:12]

अनुत्तरित सवाल

1. यदि राज्य का जल, जंगल, कोयला, लोहा और बॉक्साइट उद्योगपतियों को रियायती दरों पर दिया जा रहा है, तो उसके बदले स्थानीय युवाओं को गारंटीड रोजगार क्यों नहीं मिल रहा? [08:44, 10:02]

2. एमओयू के नाम पर जमीन रोककर बैठने वाली और रोजगार न देने वाली कंपनियों पर कड़ा एक्शन क्यों नहीं लिया जाता? [09:14]

3. क्या प्लेसमेंट कैंपों के नाम पर सिर्फ आंकड़ेबाजी और बजट का खेल चल रहा है? [09:40]

छजीसगढ़ का टैलेंट और संसाधन दोनों दांव पर हैं [10:02]। यदि सरकार ने ठोस नीतियां बनाकर स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता नहीं दी, तो 'विकास' का यह ढांचा सिर्फ कागजों और विज्ञापनों तक ही सीमित रह जाएगा [01:27]।

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मंगलवार, 21 जुलाई 2026

570 करोड़ का कोयला घोटाला — फाइल दबेगी या 'उल्टा लटकेगे' भ्रष्टाचारी?

 570 करोड़ का कोयला घोटाला — फाइल दबेगी या 'उल्टा लटकेगे' भ्रष्टाचारी?


प्रशासनिक शह-मात के खेल में क्यों फूले हाथ-पांव? डबल इंजन सरकार की अग्निपरीक्षा

छत्तीसगढ़ में 570 करोड़ रुपये के कोयला लेवी/परिवहन घोटाले की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, राज्य का सियासी और प्रशासनिक तापमान बढ़ता जा रहा है [00:10]। "भ्रष्टाचारियों को उल्टा लटकाकर सीधा करने" के बड़े-बड़े दावों के साथ सत्ता में आई डबल इंजन सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती आ खड़ी हुई है [00:30]।

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने चार्जशीट दाखिल कर कार्रवाई की गेंद पूरी तरह से राज्य सरकार के पाले में डाल दी है [00:30]। सवाल यह उठ रहा है कि क्या इस घोटाले की जद में आए रसूखदार अधिकारियों पर वाकई गाज गिरेगी या फिर सियासी सेटिंग के तहत मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा [04:16]?

1. ED की चार्जशीट: आधा दर्जन IAS और IPS रडार पर

घोटाले की जांच के दौरान करीब आधा दर्जन आईएएस (IAS) और आधा दर्जन आईपीएस (IPS) अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठे हैं [00:50]। जांच एजेंसियों की नजर इन पर टेढ़ी तो है, लेकिन सीधी कानूनी और विभागीय कार्रवाई की जिम्मेदारी अब शासन पर छोड़ दी गई है [04:16]।

इस पूरे मामले में कई चर्चित चेहरे और अधिकारी लगातार सुर्खियों में रहे हैं:

 दीपांशु काबरा: ईडी की जांच के दौरान परिवहन और जनसंपर्क विभाग संभाल रहे इस वरिष्ठ अधिकारी का नाम खूब उछला, लेकिन राजनीतिक व प्रशासनिक गलियारों में चर्चा रही कि वे अब तक बचे हुए हैं [04:44]।

 भोजराज पटेल: ईडी द्वारा पूछताछ किए जाने के बाद तत्कालीन सरकार ने उन्हें हटाया था, लेकिन वर्तमान में वे मुंगेली के एसपी पद पर तैनात हैं [05:08]।

 अभिषेक माहेश्वरी: महादेव सट्टा ऐप प्रकरण और अन्य वित्तीय गड़बड़ियों को लेकर जांच एजेंसियों के रडार पर रहे [05:50]।

 विवेक ढांड: राज्य के पूर्व मुख्य सचिव विवेक ढांड से पूछताछ और ईओडब्ल्यू (EOW) की सुस्ती को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं [07:07]।

 इसके अलावा पारुल माथुर, आरिफ शेख, प्रशांत अग्रवाल और अभिषेक पल्लव जैसे अधिकारियों के नाम भी अलग-अलग मामलों व जांचों के संदर्भ में चर्चा में बने हुए हैं [05:42]।

2. नौकरशाही की 'दादागिरी' और मंत्रियों का सन्नाटा

घोटाले की आंच के बीच राज्य के प्रशासनिक ढांचे के भीतर का शक्ति-संतुलन भी गड़बड़ा गया है [01:35]। हाल ही में आयोजित कलेक्टर-एसपी-डीएफओ कॉन्फ्रेंस के दौरान सत्ता के गलियारों में जबरदस्त अंदरूनी विवाद देखने को मिला [01:35]:

 2005 बैच के अफसरों का प्रभाव: आरोप हैं कि 2005 बैच के अधिकारियों के एक गुट ने अपनी धमक के आगे विभागीय मंत्रियों को भी किनारे करने की कोशिश की [01:47]।

 मंत्रियों की उपेक्षा: वन मंत्री केदार कश्यप और गृह मंत्री विजय शर्मा जैसे शीर्ष मंत्रियों की उपस्थिति को लेकर खींचतान मची [02:08]। दिल्ली के हस्तक्षेप के बाद गृह मंत्री बैठक में पहुंचे जरूर, लेकिन पूरे समय सन्नाटा पसरा रहा [02:41]।

 राहुल भगत, सुबोध सिंह और ओपी चौधरी जैसे कद्दावर चेहरों का नाम इस प्रशासनिक खींचतान के संदर्भ में चर्चा का विषय बना हुआ है [03:01]।

3. 'जीरो टॉलरेंस' का नारा या महज खोखला दावा?

कोयला घोटाला हो, शराब घोटाला हो या महादेव सट्टा ऐप का जाल—हर तरफ बड़ी-बड़ी कार्रवाई की बातें तो की गईं, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात नजर आ रहा है [06:29]। मुख्य आरोपियों और संदिग्ध अधिकारियों पर निर्णायक शिकंजा कसने के बजाय ईओडब्ल्यू जैसी राज्य एजेंसियां अब तक ठंडी नजर आ रही हैं [07:18]।

संपादकीय निष्कर्ष: क्या अब होगी वास्तविक कार्रवाई?

सत्ता और संगठन से जुड़े कई लोग आज भी जेल की सलाखों के पीछे हैं, जबकि कई अधिकारियों को अब तक अभयदान मिला हुआ है [03:43]। जनता यह देखने के लिए टकटकी लगाए बैठी है कि क्या डबल इंजन सरकार अपने वादे के मुताबिक इन शक्तिशाली अफसरों के खिलाफ कड़े कदम उठाएगी या फिर यह पूरा मामला महज एक सियासी तमाशा बनकर रह जाएगा [07:27]?


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सोमवार, 20 जुलाई 2026

सुशासन की पोल तो मोदी सरकार ने ही खोल दी

सुशासन की पोल तो मोदी सरकार ने ही खोल दी 


शिक्षा में पिछड़ता राज्य, बुजुर्गों के खिलाफ बढ़ता अपराध और बेबस किसान—सरकारी आंकड़ों और एनसीआरबी (NCRB) की रिपोर्ट ने खोली 'डबल इंजन' सरकार के दावों की पोल।

 दावों के शोर में गुम होती ज़मीनी हकीकत

छत्तीसगढ़ में सरकारें बदलती हैं, सत्ता के चेहरे बदलते हैं और मंचों से विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। छत्तीसगढ़ को समृद्ध और अपराध-मुक्त बनाने के वादे हर चुनाव का मुख्य आकर्षण होते हैं। लेकिन जब आंकड़े बोलने लगते हैं, तो राजनीति के बड़े-बड़े दावे ताश के पत्तों की तरह ढह जाते हैं।

हाल ही में आई राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट और केंद्रीय मंत्रालयों के आंकड़ों ने छत्तीसगढ़ की वर्तमान कानून-व्यवस्था, सामाजिक सुरक्षा और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिक्षा का गिरता स्तर हो, बुजुर्गों की असुरक्षा या फिर अन्नदाता का संकट—ये रिपोर्ट बयां करती हैं कि प्रदेश किस मोड़ पर खड़ा है।

१. शिक्षा का गिरता स्तर: भविष्य के साथ खिलवाड़?

किसी भी राज्य की प्रगति का सबसे बड़ा मापदंड उसकी शिक्षा व्यवस्था होती है। लेकिन छत्तीसगढ़ के संदर्भ में आंकड़े चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं।

 निचले पायदान पर राज्य: केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, शिक्षा के प्रदर्शन के मामले में छत्तीसगढ़ देश के राज्यों में नीचे से तीसरे नंबर पर है।

 शिक्षकों और बुनियादी ढांचे की कमी: राज्य के ग्रामीण और सुदूर अंचलों में स्कूलों की जर्जर हालत, शिक्षकों की भारी कमी और प्रशासनिक अनदेखी के कारण बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो रहा है। जब राज्य का शिक्षा मॉडल देश में सबसे निचले स्तर पर होगा, तो हम किस 'गढ़बो छत्तीसगढ़' की बात कर रहे हैं?"

२. बुजुर्गों पर बढ़ता अत्याचार: देश में पहले स्थान पर छत्तीसगढ़

सामाजिक सुरक्षा और अपराध नियंत्रण के मोर्चे पर छत्तीसगढ़ की स्थिति और भी भयावह नजर आती है। एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार, वरिष्ठ नागरिकों (बुजुर्गों) के खिलाफ होने वाले अपराधों में छत्तीसगढ़ पूरे देश में नंबर-1 पर पहुँच गया है।

वर्ष-दर-वर्ष बढ़ते अपराध के आंकड़े:

 वर्ष 2021: 1,408 मामले

 वर्ष 2022: 1,632 मामले

 वर्ष 2023: 1,798 मामले

ये आंकड़े साबित करते हैं कि पिछले तीन वर्षों में बुजुर्गों के खिलाफ अपराध में लगातार बढ़ोतरी हुई है।

अपराध का स्वरूप और न्याय में देरी:

राज्य में बुजुर्गों को निशाना बनाकर की जाने वाली हत्या, मारपीट, साइबर ठगी, संपत्ति हड़पने और अकेले पाकर लूटपाट की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई है। इसके साथ ही न्याय की सुस्त प्रक्रिया के कारण अदालतों में लंबित मामलों का अंबार लग रहा है, जिससे अपराधियों के हौसले बुलंद हैं।

३. अन्नदाता पर संकट: धान खरीद के दावों के बीच आत्महत्या की त्रासदी

छत्तीसगढ़ को 'धान का कटोरा' कहा जाता है। सरकारें अक्सर रिकॉर्ड धान खरीदी और किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं का ढिंढोरा पीटती हैं। लेकिन सवाल यह है कि यदि किसान खुशहाल है, तो फिर वह मौत को गले क्यों लगा रहा है?

एनसीआरबी के चौंकाने वाले आंकड़े (2023):

 देशभर में किसान आत्महत्याएं: 4,690

 छत्तीसगढ़ में किसान आत्महत्याएं: 468 (414 पुरुष और 54 महिला किसान)

महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे बड़े राज्यों के बाद छत्तीसगढ़ में यह संख्या बेहद डरावनी है। यदि जनसंख्या और क्षेत्रफल के अनुपात में देखा जाए, तो स्थिति बेहद गंभीर है।

आखिर क्यों मजबूर है किसान?

1. खाद और बीज का संकट: समय पर डीएपी (DAP), यूरिया और सही गुणवत्ता के बीज न मिलना।

2. कालाबाजारी और बिचौलिए: खाद और कीटनाशकों की कमी का फायदा उठाकर व्यापारी किसानों का शोषण कर रहे हैं।

3. सिंचाई और कर्ज का बोझ: समय पर सिंचाई सुविधाएं न मिलना और फसल बीमा की राशि मिलने में देरी होना।

केवल समर्थन मूल्य बढ़ा देने या प्रति एकड़ बोनस का दावा करने से किसान का संकट खत्म नहीं होता; जब तक उसे सही समय पर कृषि संसाधन नहीं मिलेंगे, वह आर्थिक मानसिक तनाव से मुक्त नहीं हो सकता।

निष्कर्ष: अब बहानेबाजी नहीं, ठोस कदम उठाने की जरूरत

यह डेटा किसी राजनीतिक दल या विपक्ष का तैयार किया हुआ नहीं है, बल्कि यह भारत सरकार के अपने संस्थानों (NCRB और शिक्षा मंत्रालय) की आधिकारिक रिपोर्ट है।

छत्तीसगढ़ की 'डबल इंजन' सरकार को अब केवल अपनी पीठ थपथपाने और खोखले दावे करने के बजाय इन आंकड़ों को गंभीरता से लेना होगा। यदि बुजुर्ग अपने ही घर में सुरक्षित नहीं हैं, किसान खेतों में आत्महत्या करने पर मजबूर है और बच्चे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित हैं, तो यह प्रशासनिक तंत्र की विफलता को दर्शाता है। समय आ गया है कि सरकार जुमलेबाजी से बाहर निकलकर ज़मीनी स्तर पर काम करे, ताकि छत्तीसगढ़ सच मायने में एक खुशहाल राज्य बन सके।

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रविवार, 19 जुलाई 2026

बस्तर पर भूमाफियाओं की नज़र

बस्तर पर भूमाफियाओं की नज़र 


 छत्तीसगढ़ का बस्तर अंचल, जो लंबे समय से नक्सली हिंसा और अशांति के लिए सुर्खियों में रहता था, अब एक नए किस्म के संकट से जूझ रहा है। अंदरूनी इलाकों से आ रही खबरें इस बात का साफ संकेत दे रही हैं कि बस्तर में नक्सलवाद के कमजोर पड़ते ही राजधानी रायपुर और बाहरी क्षेत्रों के रसूखदार भू-माफियाओं और उद्योगपतियों की नजर यहाँ के जल, जंगल और जमीन पर टिक गई है। बीजापुर के भैरमगढ़ और कोंडागांव से सामने आए दो बड़े मामलों ने प्रशासनिक मुस्तैदी और आदिवासी हितों के संरक्षण के दावों की पोल खोल कर रख दी है।

राहत शिविरों में थे ग्रामीण, पीछे से रायपुर के रसूखदारों के नाम हो गई जमीन

सबसे चौंकाने वाला और गंभीर मामला बीजापुर जिले के भैरमगढ़ ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले ग्राम बैलधर्मा और बड़पली का है। मिली जानकारी के अनुसार, यहाँ के स्थानीय आदिवासी ग्रामीण नक्सली प्रताड़ना और खौफ के कारण अपने मूल गांवों को छोड़कर सुरक्षा कैंपों (राहत शिविरों) में शरण लिए हुए थे। इसी मुफ़लिसी और बेबसी का फायदा उठाकर रायपुर के एक रसूखदार उद्योगपति परिवार द्वारा कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों के सहारे आदिवासियों की लगभग 120 एकड़ से अधिक निजी भूमि की रजिस्ट्री अपने नाम करा ली गई।

इस महाघोटाले का खुलासा तब हुआ जब राहत शिविरों में रह रहे कुछ ग्रामीण अपने बच्चों के जाति प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र या जमीन के बंटवारे के सिलसिले में पटवारी के पास बी-वन, नक्शा और खसरा निकालने पहुंचे। सरकारी रिकॉर्ड देखते ही ग्रामीणों के पैरों तले जमीन खिसक गई, क्योंकि जिस पैतृक भूमि पर वे अपना हक समझ रहे थे, वह राजस्व रिकॉर्ड में रायपुर (कचना रोड, आनंदम वर्ल्ड सिटी) निवासी मीनू गोयनका और महेंद्र गोयनका के नाम पर दर्ज हो चुकी थी। इस संवेदनशील मामले के सामने आने के बाद बीजापुर से लेकर रायपुर तक हड़कंप मच गया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने भी एक विशेष जांच दल का गठन कर प्रतिवेदन मांगा है। वहीं, दूसरी ओर इस मामले को उजागर करने वाले एक समाचार पत्र पर संबंधित पक्ष द्वारा 100 करोड़ रुपये का मानहानि का दावा ठोकने की बात भी सामने आ रही है।

कोंडागांव: बिना अनुमति के पहाड़ तोड़ रही 'रितेश अग्रवाल एंड कंपनी'

दूसरा मामला कोंडागांव जिले के चिखलपुरी बस स्टैंड के ठीक पीछे का है। बस्तर में इन दिनों चौतरफा चल रहे सड़क निर्माण कार्यों की आड़ में नियमों को ताक पर रखकर अवैध कमाई का बड़ा खेल चल रहा है। आरोप है कि मई 2025 में यहाँ 'रितेश अग्रवाल एंड कंपनी' द्वारा रातों-रात एक विशाल 'हॉट मिक्स प्लांट' स्थापित कर दिया गया।

हैरानी की बात यह है कि इस प्लांट की स्थापना के लिए न तो जिला प्रशासन से कोई वैध अनुमति ली गई और न ही पर्यावरण विभाग से एनओसी (अनापत्ति प्रमाण पत्र) ली गई। बिना किसी कानूनी औपचारिकता के इस प्लांट के जरिए बस्तर के जंगलों और पहाड़ों को बेतरतीब तरीके से तोड़ा जा रहा है और पत्थरों का अवैध उत्खनन धड़ल्ले से जारी है। स्थानीय स्तर पर कई शिकायतें होने के बावजूद प्रशासन मौन साधे हुए है, जिससे यह साफ अंदेशा होता है कि इन रसूखदार ठेकेदारों को किसी बड़े राजनीतिक दल या सत्ता का सीधा संरक्षण प्राप्त है। सूत्र बताते हैं कि बस्तर और सरगुजा संभाग में ऐसे दर्जन भर से ज्यादा अवैध प्लांट बिना किसी रोक-टोक के संचालित हो रहे हैं।

क्या बस्तर में दोहराया जाएगा 'रायपुर मॉडल'?

वरिष्ठ पत्रकारों और जानकारों का मानना है कि बस्तर में जो कुछ भी शुरू हुआ है, वह हुबहू राजधानी रायपुर के उस 'लैंड ग्रैबिंग मॉडल' की तरह है, जहां शंकर नगर, मौलश्री विहार और चारागाह की बेशकीमती सरकारी व काबिल काश्त जमीनों को रसूखदारों ने गुपचुप तरीके से अपने नाम करा लिया था। यदि समय रहते शासन और प्रशासन ने बस्तर में चल रहे इस फर्जीवाड़े और अवैध उत्खनन पर नकेल नहीं कसी, तो आने वाले दिनों में जल, जंगल और जमीन को लेकर आदिवासियों का असंतोष एक नए आंदोलन का रूप ले सकता है।

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