रविवार, 2 अगस्त 2026

छत्तीसगढ़ का ₹800 करोड़ का सियासी चक्रव्यूह

 छत्तीसगढ़ का ₹800 करोड़ का सियासी चक्रव्यूह


3 साल की फरारी, 8 राज्यों में पनाह और अचानक सरेंडर: रामगोपाल अग्रवाल के समर्पण के पीछे की पूरी 'क्रोनोलॉजी'


छत्तीसगढ़ के पावर कॉरिडोर से लेकर दिल्ली के राजनीतिक गलियारों तक इस समय केवल एक ही नाम की गूंज है—रामगोपाल अग्रवाल [00:41]। प्रदेश कांग्रेस के तत्कालीन कोषाध्यक्ष और छत्तीसगढ़ के चर्चित वित्तीय घोटालों के कथित 'मास्टरमाइंड' रामगोपाल अग्रवाल ने 8 जुलाई को रायपुर स्थित राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) के दफ्तर में अचानक पहुंचकर सरेंडर कर दिया [00:41]।

जो शख्स पिछले तीन सालों से देश की सबसे बड़ी केंद्रीय जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (ED) और राज्य की EOW की आंखों में धूल झोंक रहा था, उसका यह आत्मसमर्पण महज एक कानूनी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई राजनीतिक व कानूनी पेच जुड़े हुए हैं [00:17, 01:05]।

1. बोरियों में नोट डंप करने का आरोप: 800 करोड़ के साम्राज्य की परतें

EOW ने अदालत से रामगोपाल अग्रवाल की 17 जुलाई तक रिमांड हासिल की है [02:26]। अदालत में जांच एजेंसी द्वारा दिए गए दस्तावेजों और दलीलों के अनुसार:

 सिंडिकेट का वित्तीय नेटवर्क: सूर्यकांत तिवारी भले ही कोल लेवी व शराब घोटाले का मुख्य चेहरा रहा हो, लेकिन इस काली कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा रामगोपाल अग्रवाल के नेटवर्क तक पहुंचता था [02:58]।

 कैश का लेन-देन: जांच एजेंसियों का आरोप है कि अवैध वसूली के पैसे नोटों की गड्डियों में नहीं, बल्कि बोरियों और कार्टन में भरकर डंप किए जाते थे [03:23]।

 कोल लेवी घोटाला: अकेले कोयला लेवी से ₹52.65 करोड़ सीधे अग्रवाल के नेटवर्क में डंप होने का आरोप है [03:46]।

 हवाला नेटवर्क: पार्टी फंड और चुनावी प्रबंधन के नाम पर कुल ₹800 करोड़ के संदिग्ध लेन-देन का दावा किया गया है, जिन्हें हवाला के जरिए दिल्ली और अन्य राज्यों में भेजा गया [03:59]।

2. लुक-आउट नोटिस के बावजूद 8 राज्यों में कैसे रहे सुरक्षित?

रामगोपाल अग्रवाल 2023 से फरार थे और उनके खिलाफ ED द्वारा लुक-आउट सर्कुलर (LOC) जारी किया गया था [04:44]। देश के सभी एयरपोर्ट और प्रमुख नाकों पर सतर्कता के बावजूद वे ओडिशा, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और केरल जैसे आठ राज्यों में लगातार ठिकाने बदलते रहे [05:10]।

खोजी सूत्रों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इतनी लंबी फरारी बिना किसी मजबूत राजनीतिक सुरक्षा चक्र और भारी लॉजिस्टिक फंडिंग के संभव नहीं थी [05:32]। सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह फरारी केवल कानून से बचना थी, या फिर कई रसूखदार चेहरों को बचाने के लिए एक 'मैनेज्ड एस्केप' (सोची-समझी फरारी) की रणनीति थी? [05:44]

3. अचानक सरेंडर की वजह: बेटे से पूछताछ और दो सियासी कयास

सूत्रों के मुताबिक, यह सरेंडर अचानक नहीं हुआ। EOW ने जब रामगोपाल अग्रवाल के बेटे वैभव अग्रवाल को समन भेजकर दो दिनों तक कड़ी पूछताछ की, उसके तुरंत बाद रामगोपाल अग्रवाल खुद चलकर EOW दफ्तर पहुंचे [06:38]।

इस सरेंडर को लेकर राजनीतिक गलियारों में दो प्रमुख चर्चाएं हैं:

1. गठजोड़ या अंडरस्टैंडिंग थ्योरी: एक कयास यह है कि पर्दे के पीछे कोई रणनीतिक सहमति (Understanding) बनी है, जिसके तहत अग्रवाल कानून के समक्ष प्रस्तुत हुए हैं [06:59]।

2. सरकारी गवाह (Aprover) बनने की संभावना: दूसरा और अधिक खतरनाक पहलू यह है कि यदि रामगोपाल अग्रवाल PMLA की सख्त धाराओं से राहत पाने के लिए 800 करोड़ रुपये के वित्तीय तारों (हवाला और दिल्ली ट्रांसफर) की पूरी जानकारी एजेंसियों को सौंप देते हैं, तो प्रदेश व राष्ट्रीय स्तर के कई दिग्गजों पर गाज गिर सकती है [07:31, 07:52]।

 'क्रूशियल' मोड़: ED का अगला कदम तय करेगा दिशा

EOW की रिमांड अवधि 17 जुलाई को समाप्त हो रही है [02:26, 08:12]। उस दिन रायपुर अदालत में होने वाली कार्यवाही छत्तीसगढ़ की राजनीति की भावी दिशा तय करेगी:

 यदि ED कस्टडी मांगती है: कानूनन ED के पास PMLA की धारा 45 के तहत अदालत से प्रॉडक्शन वारंट मांगकर रामगोपाल को अपनी हिरासत में लेने का पूरा अधिकार है [08:45, 08:59]। ED की कस्टडी का मतलब होगा कि जमानत लगभग असंभव हो जाएगी और जांच की आंच कई नए नेताओं तक पहुंचेगी [09:09]।

 यदि ED शांत रहती है: यदि 17 जुलाई को ED रिमांड नहीं मांगती है और केवल EOW के मामले में न्यायिक हिरासत (जेल) की स्थिति बनती है, तो पर्दे के पीछे की सेटिंग/समझौते की थ्योरी को बल मिलेगा और बचाव पक्ष के लिए जमानत की राह आसान हो सकती है [09:19, 09:31]।

निष्कर्ष

छत्तीसगढ़ के इतिहास के सबसे बड़े वित्तीय और राजनीतिक सिंडिकेट का क्लाइमेक्स 17 जुलाई की कानूनी कार्यवाही पर टिका है [09:53]। अब देखना यह है कि रिमांड खत्म होने पर ED का क्या रुख रहता है और क्या 3 साल से छिपे राजदार की जुबान खुलने से सियासी गलियारों में कोई नया भूचाल आता है [08:59, 09:43]।

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शनिवार, 1 अगस्त 2026

'डबल इंजन' के साए में 50 करोड़ का खेल: हाईकोर्ट के चाबुक से बेनकाब सत्ता का घमंड

 'डबल इंजन' के साए में 50 करोड़ का खेल: हाईकोर्ट के चाबुक से बेनकाब सत्ता का घमंड


गरीब आदिवासियों के जूतों-चप्पलों के नाम पर बुना गया टेंडर का जाल, क्या न्यायालय के तमाचे के बाद जगेगी सरकार या जारी रहेगा रसूखदारों को संरक्षण?

1. जनसेवा का मुखौटा और भ्रष्टाचार की बुनियाद [02:06]

छत्तीसगढ़ के जंगलों से तेंदूपत्ता बीनकर अपनी रोजी-रोटी चलाने वाले 13 लाख से अधिक गरीब आदिवासियों और श्रमिकों के पैरों में छाले न पड़ें, इसके लिए 'चरण पादुका योजना' की शुरुआत की गई थी [02:19]। इस वित्तीय वर्ष में राज्य सरकार ने इसके लिए ₹50 करोड़ से अधिक का भारी-भरकम बजट तय किया [02:06]।

लेकिन जैसे ही जनकल्याण की फाइलों पर अधिकारियों और सत्ता के गलियारों के चहेतों की नजर पड़ी, योजना के असल उद्देश्य को दरकिनार कर दिया गया [02:29]। जनसेवा की आड़ में ₹50 करोड़ के मलाईदार टेंडर को अपने मनपसंद सांचे में ढालने का घिनौना खेल शुरू हो गया [02:29]।

2. नियम ताक पर, अपनों को रेवड़ी: क्रोनोलॉजी समझिए [02:38]

छत्तीसगढ़ राज्य लघु वनोपज सहकारी संघ के भीतर इस पूरे घोटाले का खाका तैयार किया गया [00:44]।

 बोर्ड को अंधेरे में रखा गया: संघ के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और संचालक मंडल को बिना बताए अंदर ही अंदर शर्ते तय कर दी गईं [02:38]।

 चहेतों के लिए शर्तें: टेंडर की शर्तें सामान्य प्रतिस्पर्धा के लिए नहीं, बल्कि एक खास ठेकेदार को फायदा पहुँचाने के लिए बनाई गईं [02:49]।

 सड़क से सियासत तक आरोप: विपक्षी नेताओं ने सीधे तौर पर नाम लेकर आरोप लगाया कि मध्य प्रदेश के एक प्रभावशाली नेता के करीबी रिश्तेदार को लाभ पहुँचाने के लिए सेफ्टी शूज़ का बहाना गढ़ते हुए यह पूरी क्रोनोलॉजी रची गई थी [03:01]।

3. हाईकोर्ट की फटकार: लोकतंत्र में शर्मिंदगी का पल [01:08]

जब यह मामला उच्च न्यायालय की चौखट पर पहुँचा और जब माननीय अदालत ने टेंडर से जुड़ी फाइलों को खंगाला, तो जिम्मेदार अफसरों और विभागीय रणनीतिकारों के हाथ-पांव फूल गए [03:22]।

पहली ही नजर में भारी गड़बड़ी पाते हुए हाईकोर्ट ने ₹50 करोड़ के विवादित टेंडर को एक झटके में निरस्त कर दिया [01:08], [03:42]। अदालत का यह फैसला सत्ता पर एक करारा कानूनी और नैतिक तमाचा है [00:17], जो स्पष्ट करता है कि नियम-कायदों को किस कदर ताक पर रखा गया था [00:09]।

4. वन विभाग का इतिहास और संरक्षण का 'सिंडिकेट' [04:44]

सवाल यह उठता है कि क्या हाईकोर्ट के फैसले के बाद उन नौकरशाहों और रणनीतिकारों पर कोई कार्रवाई होगी जिन्होंने यह खाका तैयार किया था? [03:42]

 दागी अफसरों का दबदबा: राज्य में लगभग एक दर्जन ऐसे अधिकारी (IFS) बताए जाते हैं जिनके खिलाफ ईओडब्ल्यू (EOW) और एसीबी (ACB) में जांच की प्रक्रिया चल चुकी है, फिर भी वे मलाईदार पदों पर काबिज हैं [04:56]।

 विभागीय दबंगई और पुरानी आदतें: विभाग के भीतर मंत्रियों और बड़े चेहरों की छत्रछाया में निष्पक्ष जांच को दबाने का इतिहास रहा है [04:44]। एक ओर जहाँ गरीब कर्मचारियों से बदसलूकी और शिकायत दबाने के मामले सुर्खियों में रहते हैं [05:23], वहीं दूसरी ओर अरबों के टेंडर में पारदर्शिता का पूरी तरह मखौल उड़ाया जाता है [01:20]।

5. मुख्यमंत्री की चुप्पी और जनता के सीधे सवाल [04:04]

क्या मुख्यमंत्री इस भारी फजीहत के बाद कठोर कदम उठाएंगे या फिर मामले को रफा-दफा कर दिया जाएगा? [03:52], [04:04]

1. कार्रवाई का अभाव: इतनी बड़ी अदालती फटकार और टेंडर निरस्तीकरण के बावजूद न किसी मंत्री का इस्तीफा मांगा गया, न किसी बड़े अधिकारी पर गाज गिरी [00:34]।

2. कानून-व्यवस्था का संकट: राज्य भर में पेंडिंग केसों और थानों में दर्ज शिकायतों पर कार्रवाई न होने को लेकर जनमानस में भारी रोष है [07:46], [08:21]।

3. जनता का हुक्म: लोकतंत्र में जनसेवक खुद को मालिक समझने की गलतफहमी पाल बैठते हैं [06:15]। पर जब न्यायपालिका ही घोटाले का पर्दाफाश कर दे, तो सरकार की 'जीरो टॉलरेंस' नीति का दावा बेनकाब हो जाता है [01:20]।

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शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

विकास या विनाश का 'एथेनॉल जाल': सुलगती ज़मीन, छिनती साँसें और खाली हाथ किसान

विकास या विनाश का 'एथेनॉल जाल': सुलगती ज़मीन, छिनती साँसें और खाली हाथ किसान



20% एथेनॉल ब्लेंडिंग का सुनहरा सपना या छत्तीसगढ़ के जल-जंगल-ज़मीन पर डाका? जानिए कैसे पर्यावरण और रोज़गार के नाम पर चांदी काट रहे हैं पूंजीपति और राइस मिलर्स, जबकि स्थानीय युवाओं के हिस्से आई सिर्फ़ 8 हज़ार की गार्डगिरी!

छत्तीसगढ़ में इन दिनों पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाने की राष्ट्रीय नीति के तहत एक के बाद एक एथेनॉल प्लांट्स (Ethanol Plants) लगाने की बाढ़ आ गई है [01:26, 02:21]। सरकार इसे कृषि और ऊर्जा क्रांति का प्रतीक बता रही है—यह दावा किया जा रहा है कि अन्नदाता अब 'ऊर्जादाता' बनेगा [00:45]।

लेकिन कवर्धा से लेकर बेमेतरा के बेरला, पथर्रा, राका और चुन्नू जैसे ग्रामीण इलाकों में ज़मीनी हकीकत इस गुलाबी तस्वीर के बिल्कुल विपरीत है [00:55, 02:43, 02:54]। राज्य में लगभग 29 से 42 प्लांटों को मंज़ूरी दी गई है और ₹5200 करोड़ से अधिक के एमओयू (MoU) साइन किए गए हैं [02:31, 03:04]। मगर इस उद्योग क्रांति की आड़ में जो तबाही पक रही है, उसने दर्जनों गाँवों के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है [00:55, 02:12]।

2. भूजल पर डाका: प्यासा होगा छत्तीसगढ़?

पर्यावरण विशेषज्ञों और शोध रिपोर्टों के अनुसार, 1 लीटर एथेनॉल बनाने के लिए लगभग 5 से 7 लीटर साफ़ पानी का इस्तेमाल होता है [03:48]।

 रोज़ाना लाखों लीटर एथेनॉल बनाने वाली ये फैक्ट्रियाँ हर दिन करोड़ों लीटर पानी सोखेंगी [03:56, 04:08]।

 बेमेतरा और बेरला जैसे मैदानी क्षेत्र पहले से ही 'डार्क ज़ोन' (Dark Zone) की कगार पर हैं, जहाँ गर्मियों में हैंडपंप और ट्यूबवेल जवाब दे जाते हैं [04:17, 04:27]।

 सवाल यह उठ रहा है कि जो इलाका पहले से ही पानी की किल्लत झेल रहा है, वहाँ जल-भंडार का सीना चीरकर इन फैक्ट्रियों को अरबों लीटर भूजल दोहन की छूट किसने और क्यों दी? [04:35, 04:48]

3. 'रोज़गार' का लॉलीपॉप और भूमपुत्रों के साथ छल

प्लांट लगाने से पहले जनसुनवाई में ग्रामीणों को बड़े-बड़े सपने दिखाए गए थे कि स्थानीय पढ़े-लिखे युवाओं को सम्मानजनक नौकरियां मिलेंगी [04:55, 05:08]। लेकिन सच्चाई बेहद कड़वी है:

 एथेनॉल प्लांट पूरी तरह ऑटोमेटिक और हाई-टेक तकनीक पर चलते हैं, जहाँ डिस्टिलरी एक्सपर्ट्स, केमिकल इंजीनियरों और लैब तकनीशियनों की ज़रूरत होती है [05:25]।

 स्थानीय युवाओं के पास डिग्रियाँ तो हैं, लेकिन इस विशिष्ट तकनीक का अनुभव न होने का बहाना बनाकर बाहरी राज्यों के लोगों को मलाईदार और मोटी तनख्वाह वाले पदों पर बैठा दिया गया है [05:38, 05:50]।

 ज़मीन गंवाने वाले भूमिपुत्रों को बदले में मिली तो बस 8,000 से 10,000 रुपये की सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी, हमाली या साफ़-सफ़ाई का काम [05:59]।

4. किसान बेहाल, सिंडिकेट की चाँदी

दावा था कि मक्का और धान उगाने वाले किसानों को इस क्रांति से सीधे नकद फ़ायदा होगा [03:16, 06:10]। लेकिन ज़मीनी खेल कुछ और ही है:

 ये निजी कम्पनियाँ छोटे किसानों से सीधे अनाज नहीं खरीदतीं [06:20]।

 इनका सीधा गठजोड़ और सिंडिकेट बड़े राइस मिलर्स के साथ है, जहाँ से भारी मात्रा में 'कनकी' (टूटा चावल) और राइस ब्रान उठाया जाता है [06:29, 06:39]।

 आम किसान आज भी अपनी फ़सल बेचने के लिए सरकारी उपार्जन केंद्रों (सोसायटियों) की लंबी कतारों में खड़ा है [06:47, 06:56]। इस पूरी नीति का सीधा मुनाफ़ा उद्योगपतियों और मिलरों की तिजोरी में जा रहा है [06:39, 06:47]।

5. ज़हरीली हवा, दूषित पानी और जन-आक्रोश

कवर्धा और बेरला क्षेत्र के ग्रामीणों का कहना है कि इन प्लांट्स से निकलने वाला गंदा पानी और तीखी ज़हरीली बदबू आने वाले 10 किलोमीटर के दायरे में हवा और पानी को ज़हरीला बना रही है [07:25, 08:03]। ग्रामीणों में यह खौफ़ है कि आने वाले समय में यहाँ की हवा-पानी इतनी दूषित हो जाएगी कि उल्टी, सांस की बीमारियाँ और खेती का बंज़र होना तय है [08:03, 08:33]।

प्रमुख सवाल जो शासन-प्रशासन से जवाब मांगते हैं:

1. वाटर ऑडिट क्यों नहीं? क्या सरकार इन भारी जल-शोषण करने वाले प्लांट्स पर कड़ा वाटर ऑडिट लागू करेगी [08:13]?

2. रोज़गार कानून कब? क्या स्थानीय युवाओं के लिए कम से कम 80% नौकरियों की कानूनी गारंटी तय की जाएगी [08:24]?

3. पर्यावरण की रक्षा का क्या प्लान है? क्या चंद उद्योगपतियों के मुनाफ़े के लिए आने वाली पीढ़ियों के हिस्से का पानी और साफ़ हवा छीन लेना ही 'सुशासन' है 


गुरुवार, 30 जुलाई 2026

वीआईपी सपनों’ के नीचे कुचला गया ‘नकटी’: कौन है सत्ता, शासन और तंत्र का असली 'खलनायक'?

 वीआईपी सपनों’ के नीचे कुचला गया ‘नकटी’: कौन है सत्ता, शासन और तंत्र का असली 'खलनायक'?



छत्तीसगढ़ की राजधानी की नाक के ठीक नीचे स्थित 'नकटी' गांव में हाल ही में चली बुलडोजर कार्रवाई ने राज्य की प्रशासनिक और राजनीतिक समरसता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विधायकों के लिए बनने वाली आलीशान कॉलोनी और रसूखदारों के वीआईपी प्रोजेक्ट्स की खातिर सदियों पुराने बसे-बसाए आशियाने ढहा दिए गए और मवेशियों का चारागाह निगल लिया गया। मूसलाधार बरसात के बीच सिर से छत छिन जाने के बाद, नया रायपुर के सेक्टर-30 के छोटे कमरों के आवंटन को ठुकराकर ग्रामीण फिर से उसी मलबे और खंडहरों में अपनी रातें काटने को मजबूर हैं [05:42]।

इस पूरे घटनाक्रम के बाद केवल बुलडोजर की गड़गड़ाहट शांत नहीं हुई है, बल्कि सत्ता के गलियारों में जवाबदेही और राजनीतिक साख को लेकर घमासान छिड़ गया है।

1. मौन स्वीकृति या नीतिगत विफलता?

सुशासन का दावा करने वाले मुख्यमंत्री कार्यालय की भूमिका पर अब सीधे सवाल उठ रहे हैं [01:45]। सवाल यह उठ रहा है कि क्या विधायकों और रसूखदारों के ऐशो-आराम के लिए गरीबों के आशियानों को उजाड़ने से पहले प्रशासनिक संवेदनशीलता को पूरी तरह ताक पर रख दिया गया? स्कूल खुलने के ठीक बाद, बारिश के इस मौसम में बच्चों और महिलाओं की चीख-पुकार के बीच मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों के आवासों का घेराव यह साफ़ संकेत दे रहा है कि जनता की नजर में सत्ता शीर्ष का यह मौन किसी अपराध से कम नहीं है [02:35]।

2. नीति या हठ? किसके इशारे पर चली कार्रवाई?

राजनीतिक चर्चाओं के केंद्र में इस वक्त प्रदेश के वित्त मंत्री ओपी चौधरी और राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा की भूमिका है [02:58]।

 ओपी चौधरी का 'मास्टरमाइंड' एंगल: पूर्व आईएएस अधिकारी होने के नाते नियम-कायदों की बारीक समझ रखने वाले ओपी चौधरी के शंकर नगर स्थित आवास पर ग्रामीणों का फूटा गुस्सा यह बताता है कि इस 'वीआईपी प्रोजेक्ट' को अमलीजामा पहनाने की जिद का ठीकरा प्रशासनिक से ज्यादा नीतिगत स्तर पर फोड़ा जा रहा है [03:19]।

 राजस्व विभाग का मौन: जमीन और बेदखली का सीधा ताल्लुक राजस्व विभाग से होता है। पटवारी भर्ती और ट्रांसफर-पोस्टिंग के पुराने विवादों से घिरे टंकराम वर्मा के मातहत अमले ने जिस तत्परता से बेदखली को अंजाम दिया, उससे राजस्व अमले की मंशा पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं [04:31]।

3. 'रील और रियल' के बीच फंसे जनप्रतिनिधि

 अनुज शर्मा पर जनता का गुस्सा: क्षेत्रीय विधायक अनुज शर्मा को शायद पहली बार रील और रियल लाइफ के फर्क का कड़वा अहसास हुआ है [07:00]। बेघर हुई महिलाओं का आक्रोश और सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो क्षेत्रीय नेतृत्व की नाकामी को उजागर कर रहे हैं।

 बृजमोहन अग्रवाल का 'सहानुभूति कार्ड': सांसद बृजमोहन अग्रवाल द्वारा जारी वीडियो संदेश और अफसरों पर कार्रवाई की मांग वाले पत्र को जनता महज "राजनीतिक नौटंकी" करार दे रही है [09:31]। सवाल उठ रहा है कि यदि सरकार और सत्ता उनकी अपनी है, तो उनके ही नाक के नीचे अधिकारी इतनी बड़ी कार्रवाई करने की जुर्रत कैसे कर सकते हैं? क्या यह अपनी साख बचाने की कोशिश है [10:12]?

4. दागी अफ़सर के हाथों में बेदखली की कमान

मामले में सबसे सनसनीखेज पहलू कार्रवाई का नेतृत्व करने वाले अफसर कीर्तिमान सिंह राठौर का ट्रैक रिकॉर्ड है [11:04]।

 विवादित ट्रैक रिकॉर्ड: बिलासपुर में पदस्थापना के दौरान बहुचर्चित 'अरपा भैंसाझार सिंचाई परियोजना' के मुआवजा वितरण में अनियमितताओं और रसूखदारों को फायदा पहुंचाने के गंभीर आरोपों के तहत राठौर जांच के दायरे में हैं [11:39]।

 EOW की जांच का दायरा: एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) और इकोनॉमिक ऑफेंस विंग (EOW) में मामला दर्ज होने और जांच की अनुमति मिलने के बावजूद ऐसे विवादित अधिकारी को जमीनी स्तर पर बेदखली और तोड़फोड़ का कमान सौंपना, पूरे प्रशासनिक ढर्रे की नीयत पर सीधे प्रश्नचिह्न लगाता है [13:06]।

सियासत गर्माई, खंडर में तब्दील जिंदगी

एक तरफ कांग्रेस इस मुद्दे को लेकर गांव में डेरा जमाए हुए है और इसे प्रशासनिक बर्बरता करार दे रही है [06:13], वहीं दूसरी तरफ नकटी के मासूम बच्चे और परिवार तिरपाल के नीचे बरसात से बचने की जद्दोजहद कर रहे हैं [05:53]। सत्ता की हनक और अफसरों की बेदर्दी के बीच नकटी का यह सच अब किसी एक गांव की नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही के पतन की दास्तान बन चुका है।

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