सोमवार, 3 मई 2010

प्रतिबंध के बावजूद मंत्री-अधिकारी विदेश गए



छत्तीसगढ सरकार के फैसलों का उनके ही मंत्री और अधिकारी किस तरह से धाियां उड़ा रहे है इसका ताजा उदाहरण खाद्य मंत्री पुन्नूलाल मोहिले, खाद्य सचिव विवेक ढांड और राय भंडार गृह के प्रबंध संचालक उमेश अग्रवाल के विदेश प्रवास है।
छत्तीसगढ़ सरकार ने फिजूल खर्ची पर रोक लगाने पिछले माह मंत्रियों और अधिकारियों के विदेश प्रवास पर प्रतिबंध लगा दिया था। बताया जाता है कि विधानसभा में विदेश यात्रा के बढ़ते खर्चों पर चिंता जताई गई थी और सरकार ने इसके बाद प्रतिबंध लगा दिया था। इधर इस प्रतिबंध के बाद विदेश घुमने को इच्छुक मंत्रियों और अधिकारियों ने नया पैतरा शुरू कर दिया। बताया जाता है कि इसी पैतरेबाजी के चलते राय भंडारण गृह के खर्चे से विदेश यात्रा का खाका तैयार किया।
पता चला है कि कनाडा में 2 मई को खाद्य भंडारण के वैज्ञानिक तरीकों को लेकर एक सम्मेलन बुलाया गया और यह जानकारी जैसे ही भंडारण गृह के प्रबंध संचालक उमेश अग्रवाल को हुई उसने गणितबाजी कर पहले खाद्य सचिव विवेक ढांड को विश्वास में लिया फिर खाद्य मंत्री मोहिले के साथ मिलकर विदेश यात्रा की योजना बना ली। इनकी वापसी 8 मई को होनी है। इस विदेश यात्रा का पूरा खर्च भंडारण गृह के जिम्मे है जिनका प्रबंध संचालक उमेश अग्रवाल काफी विवादास्पद माने जाते हैं।
बताया जाता है कि कनाडा सम्मेलन तो एक बहाना है और ये लोग सैर सपाटे पर ही गए हैं। इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि जिस सम्मेलन में ये लोग शिरकत करने गए हैं वहां खाद्य भंडारण के वैज्ञानिक व नई तकनीक पर चर्चा होगी ऐसे में यदि भंडारण गृह निगम इस तकनीक का इस्तेमाल करने के उद्देश्य से विदेश यात्रा की अनुमति देता तो कम से कम एक तकनीकी अधिकारी जरूर होते। लेकिन इनका उद्देश्य तकनीक समझना नहीं घुमना फिरना है।
वहीं विदेश यात्रा के लिए सरकार से अनुमति लेने की भी कोई खबर नहीं है और सरकार के आदेश को ठेंगा बताकर सरकारी राशि का दुरुपयोग का मामला सामने आया है। बहरहाल मंत्री और अधिकारियों के इस विदेश प्रवास को लेकर जबरदस्त चर्चा है और कहा जा रहा है कि प्रतिबंध के बाद भी विदेश यात्रा में जाने को मुख्यमंत्री को चिढ़ाने की कोशिश बताया जा रहा है।

रविवार, 2 मई 2010

मंत्रीगिरी से लोग नाराज

भीड़ देख मूणत बौखलाए
राशन दुकानों की अनियमितता की शिकायत लेकर वार्ड पार्षद के साथ पहुंचे कोटा वार्ड के नागरिकों को तब अपमानजनक स्थिति से गुजरना पड़ा जब नगरीय निकाय मंत्री राजेश मूणत ने शिकायत सुनने की बजाए महिला पार्षद को चिल्लाते हुए कहा कि पार्षद का काम राशन दिलाना नहीं है, कार्ड मिल गया यही काफी है चुपचाप घर में बैठें।
वैसे नगरीय निकाय मंत्री राजेश मूणत का यह रवैया नया नहीं है उनके व्यवहार से आम आदमी ही नहीं भाजपा के कई कार्यकर्ता भी दुखी है जो मन में आए कह देने की उनकी आदत से आम लोगों में सरकार के प्रति क्रोध बढता ही जा रहा है। यही नहीं मुख्यमंत्री के गृह जिले कवर्धा में भी उनकी भाजपा कार्यकर्ताओं से झड़प हो चुकी है।
ताजा मामला 26 अप्रैल की है जब कोटा वार्ड की निर्दलीय पार्षद श्रीमती अंजू तिवारी ने वार्ड में राशन ठीक से नहीं बांटने व राशन दुकानदारों द्वारा अनियमितता की शिकायत लेकर करीब डेढ़ सौ कार्डधारियों को लेकर कलेक्टर संजय गर्ग के पास पहुंची थी। पार्षद का आरोप है कि प्रियदर्शनी और मां खल्लारी सहकारी समिति की अनियमितता से लोग त्रस्त हैं। बताया जाता है कलेक्टर ने कार्रवाई का आश्वासन तो दिया लेकिन इससे लोग संतुष्ट नहीं हुए और वहीं नगरीय निकाय मंत्री राजेश मूणत जो क्षेत्र के विधायक भी है से मिलने का निश्चय किया।
बताया जाता है कि पहले से ही परेशान नागरिक जब मंत्री बंगला पहुंचे तो मंत्री के जवाब से उन्हें आश्चर्य हुआ। श्रीमती तिवारी का कहना था कि श्री मूणत शिकायकर्ताओं की भीड़ देख बौखला गए और जो मन में आया कहने लगे इससे नागरिकों में भारी आक्रोश व्याप्त है। इधर कोटा वार्ड के नागरिकों का कहना है कि दूसरी बार मंत्री बने मूणत नहीं चाहते कि कोई शिकायत करे इसलिए जब भी कोई शिकायत लेकर जाता है वे ऐसा ही व्यवहार करते हैं। बहरहाल इस मामले से लोग नाराज है और आगे की रणनीति बनाने में लगे है। एक नागरिक संजय ने कहा कि वे इस घटना की शिकायत मुख्यमंत्री से भी करेंगे।

गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

दबाव के आगे कार्रवाई रूकी

घोटालेबाजों का जमाना महाधिवक्ता है सुराना - 6
पार्टी के प्रति निष्ठा के चलते देवराज सुराना ने महाधिवक्ता पद का सफर कर लिया हो पर विवाद उनका पीछा नहीं छोड़ रही है। धम कमाने में कानूनी दांव पेंच ने नैतिकता का तो किनारे किया ही परिवार की महिला सदस्य भी कानूनी दांव पेंच में फंस गई। अब जब सरकार को जेब में रखने का दावा हो तो फिर प्रशासन से उम्मीद बेमानी हो जाती है। यही सब कारण है कि आम लोगों का कानून से भरोसा उठने लगा है।
महाधिवक्ता पद तक पहुंचने देवराज सुराना व उनके परिजनों पर दर्जनभर से अधिक मामले ऐसे हैं जो उन्हें सीधा कटघरे पर खड़ा करता है लेकिन शासन-प्रशासन कानूनी पेचदगीयों में इस कदर उलझी है कि कार्रवाई की आस में लोग अपना सिर धुन रहे हैं। जब मंदिर की जमीनों को बेचने-खरीदने में दुनियाभर के नियम कानून है तब सुराना परिवार के नानेश बिल्डर्स द्वारा गोपियापारा स्थित श्री हनुमान मंदिर की भाठागांव स्थित बेशकीमती जमीन का घोटाला कैसे कर लिया गया। इस संपूर्ण मामले में भाजपा सरकार की भूमिका पर भी जांच होनी चाहिए जब जोगी शासनकाल में इस पर बंदिश लगाई गई थी तब आनन-फानन में डॉ. रमन सरकार में इस जमीन की खरीदी बिक्री की अनुमति कैसे दी गई।
इस मामले में फर्जी मुख्तियार नामा से लेकर खरीदी बिक्री में जो घपले हुए उस पर कार्रवाई की बजाए प्रशासनिक स्तर पर लीपापोती की गई। जिस कलेक्टर ने इसकी बिक्री को रोका उसी ने अचानक सरकार बदलते ही रजिस्ट्री की अनुमति कैसे दे दी। इस पूरे मामले का जांच प्रतिवेदन भी समझने योग्य है कि किस तरह से जांच प्रतिवेदन में तहसीलदार और उपपंजीयक के विरुध्द कार्रवाई की बात कही गई लेकिन अचानक सारा मामला भूला दिया गया। इस जमीन की रजिस्ट्री के बाद जब विवाद बढ़ा तो इसे रामसागर पारा के सुशील अग्रवाल और रवि वासवानी को बेचा गया। इन लोगों के नामांतरण की फाईल जब तहसीलदार ने रोकी तो कैसे नानेश बिल्डर्स ने दूसरे के नाम रजिस्ट्री के बाद अपने नाम डायवर्सन करा लिया।
हिन्दूवादी पार्टी का दंभ भरने वाली भाजपा ने श्री हनुमान मंदिर की बेशकीमती जमीन पर खेले गए खेल को कैसे चुपचाप देखते रही। यह सब ऐसा सवाल है जिसका जवाब सरकार को देना ही होगा। बहरहाल इस पूरे मामले की राजधानी ही नहीं न्यायधानी में भी जमकर चर्चा है और आने वाले दिनों में इसका खामियाजा भी भुगतना पड़े तो आश्चर्य नहीं है।

आदिवासी अधिकारियों ने भी रमन के खिलाफ मोर्चा खोला

आयोग से शिकायत, पदोन्नति से वंचित
आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग को लेकर भले ही भाजपा के आदिवासी नेताओं की मुहिम फेल हो गई हो लेकिन अब आदिवासी अफसरों ने अपनी उपेक्षा का आरोप लगाकर सरकार के लिए नई मुसिबत खड़ी कर दी है। करीब आधा दर्जन आदिवासी अधिकारियों ने पदोन्नति में भेदभाव का आरोप लगाया है और इनमें से कुछ ने आयोग में शिकायत तक कर दी है।
भाजपा में आदिवासियों की उपेक्षा को लेकर आदिवासी नेता पहले ही नाराज हैं। नंदकुमार साय, ननकीराम कंवर से लेकर रामविचार नेताम ने समय-समय पर सरकार के खिलाफ खड़ा होने की कोशिश की है यहां तक कि आरक्षण कम किए जाने को लेकर भी आदिवासी नेता नाराज हैं। ऐसे में आदिवासी होने की वजह से पदोन्नति नहीं देने का आरोप डॉ. रमन सिंह को भारी पड़ सकता है और इस मामले में यदि कांग्रेस खड़ी हुई तो मामला तूल पकड़ सकता है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार अपनी उपेक्षा को लेकर डॉ. राजमणि, डॉ. आर.आर. मंडावी और डॉ. आर.एन. नेताम ने आयोग से शिकायत की है कि आदिवासी होने के कारण उन्हें पदोन्नति से वंचित किया जा रहा है। आयोग में की गई शिकायत काफी गंभीर है और इसका परीक्षण चल रहा है। डॉ. राजमणि रायपुर में पदस्थ हैं वहीं डॉ. आर.आर. मंडावी कांकेर में हैं।
सूत्रों ने बताया कि तीन-तीन अधिकारियों के द्वारा आयोग से की गई शिकायत पर फिलहाल सरकार में बेचैनी है और वह यह जानने में लगी है कि कहीं इसके पीछे राजनीति तो नहीं है। बहरहाल आदिवासी अधिकारियों के इस नए आरोप से एक तरफ जहां सरकार बेचैन है वहीं कांग्रेस के इसे मुद्दा बनाने से नई मुसिबत का अंदेशा भी है।

बुधवार, 28 अप्रैल 2010

बड़े अखबारों की नई खिचड़ी

छत्तीसगढ़ में स्थापित हो चुके बड़े अखबारों की सरकार के भ्रष्ट मंत्रियों के साथ अलग तरह की खिचड़ी पक रही है। वैसे भी राय बनने के बाद छत्तीसगढ़ की मीडिया में नया परिवर्तन आया है कभी रुपया दो रुपया फीट पर जमीन पाने भोपाल के चक्कर लगाने पड़ते थे और दूसरे उद्योग चलाने से पहले सोचना पड़ता था।
राय बनने के बाद परिवर्तन बड़ी तेजी से आया है। सकारात्मक खबरों के चक्कर में उन खबरों पर भी बंदिशें लगनी शुरु हो गई जिससे राय या देश को सीधे नुकसान उठाना पड़ रहा है। कोई अखबार वाला शॉपिंग मॉल की तैयारी में है तो कोई आयरन उद्योग में कूद रहा है। किसी के नए धंधे करने से किसी को भी आपत्ति नहीं हो सकती। इसलिए अखबार वाले भी अखबार के साथ दूसरा धंधा कर सकते हैं लेकिन धंधा के लिए गंदा समझौता उचित नहीं है।
यही वजह है कि अखबारों की विश्वसनियता पर सवाल उठने लगे हैं। चौक-चौराहों पर इसकी चर्चा होने लगी है और रिपोर्टरों को यह सब भुगतना भी पड़ रहा है। इन दिनों ग्राम सुराज को लेकर भी अखबारों की भूमिका भाढ की तरह हो गई थी। सुराज दल को जिस पैमाने पर गांव वालों के कोप भाजन बनना पड़ा है वह खबरों में कहीं नहीं दिखी। सरकारी विज्ञापन के दबाव में स्थानीय अखबार जिस तरह से सरकारी प्रचार का माध्यम बनता जा रहा है वह स्वस्थ पत्रकारिता के लिए चिंता का विषय है। भ्रष्ट मंत्रियों के विज्ञापन भी उतनी ही प्रमुखता से प्रकाशित किए जाने लगे है ऐसे में आम लोगों की सोच भी अखबारों के प्रति बदल जाए तो नुकसान इस प्रदेश का ही होना है।
और अंत में....संवाद के खिलाफ खबर जुटाने में लगे एक पत्रकार की किस्मत अच्छी है कि उसकी नौकरी अभी तक उस अखबार के दफ्तर में कायम है वरना संवाद के खाटी अधिकारी ने तो फोन कर उसे नौकरी से निकालने का फरमान सुना ही डाला था।

पूर्व मंत्री के कान्हा किसली का दौरा पर्यटन के जिम्में

साल में परिवार सहित दो दौरा
भाजपाई राजनीति को तार-तार कर कांग्रेस में मंत्री पद पाने वाले ब्राम्हण नेता भले ही भाजपाईयों के दुश्मन हो लेकिन पर्यटन मंत्री के दोस्ती का लाभ उन्हें गाहे-बगाहे अब भी मिल रहा है और साल में परिवार सहित कान्हा किसली यात्रा का खर्च पर्यटन विभाग उठाता है।
छत्तीसगढ क़ी भाजपाई राजनीति में तूफान मचा कर जोगी शासनकाल में मंत्री बन बैठे इस नेता को लेकर कांग्रेस ही नहीं भाजपा के लोग भी भद्दी गाली देते हैं। कभी राजधानी की राजनीति में एक क्षत्र राय करने वाले पूर्व मंत्री को इन दिनों राजनैतिक दुर्दिन का सामना करना पड़ा रहा है लेकिन उनके अब भी पर्यटन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल से मधुर संबंध है।
भले ही भाजपाई इस पूर्व मंत्री को पसंद नहीं करते लेकिन जीत हार की गणित समझने वाले बृजमोहन अग्रवाल को इससे कोई मतलब नहीं है इसलिए उनके इस पूर्व मंत्री से न केवल संबंध बने हुए हैं बल्कि उनके विभाग पर्यटन भी उनका पूरा ध्यान रखता है। बताया जाता है कि पूर्व मंत्री और उनका परिवार साल में दो बार कान्हा किसली की यात्रा करता है और कहा जाता है कि इस यात्रा का पूरा खर्च पर्यटन विभाग द्वारा किया जाता है।
इस मामले में जब पर्यटन विभाग के अधिकारियों से पूछताछ की गई तो उन्होंने खामोशी ओढ़ ली लेकिन मीडिया से जुड़े एक अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि ऐसा तो यहां चलते रहता है यात्रा कोई करे बिल किसी के नाम पर एडजेस्ट कर दिया जाता है। सूत्रों के मुताबिक पर्यटन में भारी गड़बड़ी चल रही है निर्माण कार्य से लेकर प्रचार प्रसार में मनमाने गड़बड़ी से लोग हैरान है जबकि यहां के अधिकारियों पर कार्रवाई की बजाय रिकवरी निकालकर मामला रफा-दफा किया जाता है। बहरहाल मंत्री और पूर्व मंत्री की जोड़ी को लेकर पार्टी में भी चर्चा है लेकिन कोई खुलकर सामने नहीं आ रहा है।

मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

पानी और धरती बचाने वाले अब कहां हैं...

आमापारा बाजार के पीछे का तालाब पाटा जा रहा
आर्ट ऑफ लिविंग हो या राजधानी में जल जमीन बचाने में लगी संस्था हो किसी की नजर अभी तक आमापारा बाजार के पीछे सरकारी स्तर पर पाटे जाने वाले तालाब की ओर नहीं है। आसपास के लोग दबी जुबान पर इसका विरोध जरूर कर रहे हैं लेकिन नेतृत्व का अभाव इसे आंदोलन का शक्ल नहीं दे पा रहा है। ऐसे में रजबंधा तालाब या लेडी तालाब की तरह यह कारी तालाब भी सरकार बलि चढ़ जाए तो आश्चर्य नहीं है।
एक तरफ पूरी दुनिया में जल, जमीन और जंगल बचाने का अभियान चल रहा है। छत्तीसगढ क़े मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह तक अपने को इस अभियान का हिस्सा मानते हैं लेकिन दूसरी तरफ इसी सरकार के अधिकारी कुछ भू-माफियाओं के ईशारे पर कारी तालाब को पाटा जा रहा है। आश्चर्य का विषय तो यह है कि पर्यावरण की चिंता में दुबले हो रहे लोगों का ध्यान अभी तक इस तरफ नहीं गया है और भू-माफिया अपना खेल खुले आम खेल रहा है।
आमापारा क्षेत्र में वैसे तो लाईन से पांच तालाब है और इन तालाबों से लगी बेशकीमती जमीनें पहले ही अवैध कब्जे का शिकार है। हांडी तालाब से लेकर करबला तक तालाबों पर निगाह रखने वालों ने अवैध कब्जों के लिए गरीबों का सहारा लिया और फिर खुद ही बिल्डिंग खड़ी कर बेच दी। आमापारा का ऐतिहासिक महत्व है। मंदिरों के अलावा सब्जी बाजार में रोज हजारों लोग आते हैं ऐसे में तालाब को सुन्दर बनाकर अन्य बगीचों में भीड़ कम की जा सकती है। इस मामले में पर्यावरण प्रेमी कब ध्यान देंगे यह देखा है।