रविवार, 22 मार्च 2020

निजी अस्पतालों में लूट की छूट


जमीन तक लिखवा ले रहे हैं डाक्टर!
विशेष प्रतिनिधि
रायपुर। छत्तीसगढ़ में ईलाज के नाम पर डाक्टरों द्वारा चल रही लूट खसोट नया नहीं है लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद जब टीएस बाबा स्वास्थ्य मंत्री बने तो लोगों को उम्मीद थी कि बहुत कुछ ठीक कर लिया जायेगा लेकिन हॉल ही में श्री नारायणा हा
स्पिटल देवेन्द्र नगर का जो मामला सामने आया है उसके बाद तो यह स्पष्ट है कि स्वास्थ्य मंत्री को कोई मतलब नहीं है और रसूखदार राजनैतिक एप्रोच वाले डाक्टरों की मनमानी के आगे पूरी सरकार ही नतमस्तक है। आम आदमी ईलाज के नाम पर जमीन जायदाद बेच रहे हैं और कई अस्पतालों के डाक्टरों द्वारा इलाज का खर्चा नहीं पटाने पर स्टाम्प पेपर में जमीन तक लिखवा दी जा रही है।
छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित स्वास्थ्य घोटाले और स्लाटर हाउस बनते निजी अस्पतालों को लेकर हमने कई रिपोर्ट प्रकाशित की है लेकिन लगता है स्वास्थ्य मंत्री टीेस बाबा को इन बातों से कोई लेना देना नहीं है। अडानी से सेंटिंग के लिए चर्चित टीेस बाबा पर अब बड़े निजी अस्पतालों से भी सांठ-गांठ के किस्से जन चर्चा का विषय बन गया है। बताया जाता है कि जिलों के स्वास्थ्य अधिकारियों का निजी अस्पताल प्रबंधकों से न केवल गठजोड़ है बल्कि हर माह बंधी बंधाई रकम की वसूली के भी चर्चे हैं।
ताजा मामला तिल्दा विकासखण्ड निवासी निषाद परिवार का है जिसके एक सदस्य को सड़क दुर्घटना के बाद श्री नारायणा हास्पिटल देवेन्द्र नगर में एडमिट किया गया जहां बताया गया है छत्तीसगढ़ सरकार की योजना के तहत केवल राशन कार्ड से ईलाज किया जायेगा। लेकिन अस्पताल प्रबंधन ने ईलाज के नाम पर दवाई के नाम पर अलग से पैसे लगने की बात कही और जब वे  ईलाज का खर्चा उठाने में असमर्थता जाहिर करते हुए डिस्चार्ज करने की बात कही तो ढाई लाख देने के बाद ही डिस्चार्ज करने की बात कहीं। दुर्घटनाग्रस्त परिवार के विजय निषाद ने प्रेस क्लब में अपनी आप-बीती बताते हुए कहा जय निषाद पिता श्री अर्जुन निषाद निवासी राम औरिगन, तिल्दा, जिला रायपर छग का निवासी हूँ। दिनांक 02.03.2020 को मेरे पापा का किसी ने कार से एक्सीडेंट करके वहां से भाग गया जिसका ईलाज के लिए मैने श्री नारायणा हॉस्पीटल देवेन्द्र नगर में एडमीट किया डॉ. ने कहा कि आपके पापा के ऑपरेशन का खर्चा राशन कार्ड के द्वारा हो जायेगा और जो दवाई का खर्चा आयेगा वह आपको करना पड़ेगा दिनांक 14.03.2020 तक दवाई में हमने 1 लाख रुपये लगभग दवाई में लगा चुके हैं हमारे पास ईलाज के लिए और पैसे नहीं है तो हम अपने पिताजी का ईलाज सरकारी हॉस्पिटल में करना चाहते है जिसके लिए हम डॉक्टरों से पांच दिन से डिस्चार्ज करने के लिए बोल रहे हैं लेकिन वे लोग बोल रहे हैं पहले 2.50 लाख रुपये जमा करो फिर डिस्चार्ज करेंगे बोल रहे हैं। हमें ईलाज करने से पहले हमें नहीं बताया गया था कि ीलाज करने में 2.5 लाख रुपये लग जायेगा और हमें बार-बार धमकी देते हैं कि आप यहां पर साईन किये हैं हमें पता नहीं था कि उसमें क्या लिखा है हम लोग सोंचे कि डॉ. लोग हमें राशन कार्ड से ईलाज करवाने के लिए हस्ताक्षर ले रहे हैं। हमें पता नहीं था कि उसमें क्या लिखा है। अभी हमें जो भी दवाई का खर्चा आ रहा है। उसका वहन करने में हमें काफी परेशानी हो रही है हम लोग मजदूरी का काम करते हैं। हमारे पास ईलाज के लिए पैसा नहीं हो पा रहा है जिससे हमारे पिताजी का ईलाज नहीं करेंगे बोल रहे है और 2.5 लाख दोगे तभी आगे का ईलाज हो पायेगा ऐसा बोल तो अभी एटीएच क्लब द्वारा 2-3 दिन से हमें दवाई का खर्चा दिया जा रहा है। एटीएच क्लब द्वारा जब हमें बाहर से दवाई लाकर दिया गया तो पता चला कि दवाई कॉफी कम रेट में प्राप्त हुआ जो कि हॉस्पिटल के दवाईयों से कॉफी कम था। हॉस्पिटल के दवाईयों का तुलना किया गया तो दवाई का रेट बाहर के दवाई के रेट से हॉस्पीटल के दवाईयों का रेट तीन गुना ज्यादा अंतर था।
 इस दौरान वहां मौजूद एटी एच के आर्यन राव ने भी अस्पताल प्रबंधन के रवैया की आलोचना की। सूत्रों की माने तो नारायणा अस्पताल को एक दमदार पूर्व मंत्री का वरदहस्त है और वे उनके रिश्तेदारी में भी आते हैं और यही वजह है कि इस अस्पताल की शिकायतों को नजरअंदाज कर दिया जाता है।

शनिवार, 21 मार्च 2020

विभीषण होने के मायने


इतिहासत का एक ऐसा पात्र जिसने ईश्वर भक्ति में स्वयं को प्रमाणित करने का कोई मौका नहीं छोड़ा। इसमें कतई संदेह भी नहीं है कि वे सबसे बड़े रामभक्त थे लेकिन उसे न तो समाज ने स्वीकारा न ही किसी और ने? जी हां हम यहां बात कर रहे हैं विभिषण का!
इतिहास गवाह है कि उनसे बड़ा रामभक्त कोई नहीं हुआ जिसने अपने कुल की परवाह नहीं की लेकिन यह भी सच्चाई है कि कोई भी मानव समाज न तो विभिषण बनना चाहता है और न ही कोई भी अपने पुत्र का नाम ही विभिषण रखना चाहता है ऐसे में ग्वालियर के महाराजा ज्योतिरादित्य को उसके मुंह के सामने ही मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री का विभिषण कहना? क्या बतलाता है आसानी से समझा जा सकता है। कांग्रेस में उपेक्षा और अपमान की जिस पीड़ा का ज्योतिरादित्य ने जिक्र करते हुए भाजपा प्रवेश की वजह बताई वह सम्मान उन्हें मुंह पर ही विभिषण के रुप में मिलने पर कैसा महसूस हुआ होगा यह तो वही जाने लेकिन राजनीति के विश्लेषक भी इस संबोधन से हैरान है।
हालांकि राजनीति के बारे में कहा जाता है कि यहां कोई स्थाई दोस्त और दुश्मन नहीं होता। सब कुछ परिस्थितिजन्य होता है। लेकिन एक बात तो तय है कि मोदी-शाह की जोड़ी ने मध्यप्रदेशथ में कांग्रेस को जो फटका दिया है उसकी पीड़ा से मुक्ति आसान नहीं है। हम इसी जगह पर कितनी बार लिख चुके हैं कि देश के राजनैतिक दलों ने जिस तरह से लूट मचाई है वह किसी संगठित गिरोह से कम नहीं है। असल मुद्दों से ध्यान भटकाकर जिस तरह से इन दिनों नफरत की दीवार खड़ा किया जा रहा है उससे कौन बच पा रहा है। यही वजह है कि सिंधिया के भाजपा प्रवेश से कांग्रेसियों ने भी असाधारण रुप से विषवमन करना शुरु कर दिया, कोई उनकी गद्दारी के इतिहास बताने लगा तो कोई खून और डीएनए तक पहुंच गया। इस तरह का विषवमन से क्या हासिल होगा। जिस पार्टी को गांधी के सिद्धांत पर चलने वाली पार्टी बताकर सत्ता के मजे लिया जाता रहा वह सिर्फ एक सिंधिया के छोड़कर जाने से शब्दों की हिंसा के रुप में फूट पड़ा। यह कांग्रेस के उन नेताओं के लिए भी चिंतन का विषय होना चाहिए जो गांधी के अहिंसक आंदोलन से देश को आजादी दिलाने तक की सफर का गुणगान करते हैं।
सिंधिया का भाजपा में क्या होगा यह भविष्य के गर्भ में हैं यदि सिंधिया को गांधी परिवार के आगे अपनी महत्वाकांक्षा पूरी होते नहीं दिख रही थी तो भाजपा में भी उनकी राह आसान नहीं है। भाजपा की बागडोर सिर्फ संघ के हाथों में नहीं है बदली हुई राजनैतिक परिस्थितियों में मोदी-शाह की जोड़ी ने संघ के मिथक को तोड़ दिया है। संघ भले ही हाशिये में नहीं गया हो लेकिन उसकी मौजूदगी पूरी तरह से गायब है। सत्ता की ताकत के आगे जब देश की संवैधानिक संस्थाओं की साख को लेकर सवाल उठने लगे हैं तब भला संघ की साख की चिंता किसे होगी और वह कहां बच सकेगी।
यकीन मानिए आज सांसद-विधायक होना ही बड़ी बात नहीं है बल्कि सत्ता की धूरी होना बड़ी बात है यही वजह है कि आज किस पार्टी में विचारधारा बच पाई है। संघ के जिस स्वयंसेवकों की सादगी की चर्चा गाहे-बगाहे की जाती रही है उनके सत्ता से नजदीकियों के बाद उनकी सादगी का कहां कोई अर्थ रह गया है। संघ के प्रचारकों के खान-पान और सादगी की कहानियां सिर्फ सत्ता पाते तक ही सिमट गया है नहीं तो नरेन्द्र मोदी स्वयं संघ के प्रचारक रहे हैं, प्रधानमंत्री बनने से पहले उनकी सादगी के कितने ही किस्से सुनाए गए लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद क्या हुआ। नौ लाख की सूट का जिक्र न भी करें तो चश्में-घड़ी जूते की सच्चाई कौन नहीं जानता।
इस देश ने शाी जी जैसे प्रधानमंत्री भी देखे हैं और मोरारजी देसाई जैसे प्रधानमंत्री भी। जवाहरलाल नेहरु तो शुरु से ही रहीसी में रहे लेकिन इस सच को कोई कैसे नकार सकता है कि राम मनोहर लोहिया के व्यंग्य के बाद वे भी अपने को सादगी के साथ ढालने लगे थे।
ऐसे में जब पूरी सत्ता ही पैसों की ताकत के आगे नतमस्तक होने लगी हो तब भला सिंधिया का भाजपा में जाने का क्या मायने है और फिर जब कांग्रेस की ताकत बढ़ेगी तब सिंधिया नहीं आयेंगे इसकी भी क्या गारंटी  है? शायद इसी सत्ता की ताकत की वजह से जब शिवराज सिंह ने ज्योतिरादित्य को मुंह में विभिषण कहा तो कांग्रेसी उपेक्षा और अपमान की पीड़ा से आहत सिंधिया विभिषण के मायने ढंढते हुए स्वयं को संघ का सबसे बड़ा भक्त मान रहे होंगे?

शुक्रवार, 20 मार्च 2020

भाजपा प्रवेश के फायदे...

भाजपा
कमल के भाजपा प्रवेश की खबर उस दिन अखबार की सुर्खियां बंटोर रही थी, जो भी सुनता हतप्रभ रह जाता। आश्चर्य में तो उसके मित्र केवल कृष्ण भी था। अखबार पढ़ते ही उसकी बेचैनी बढ़ गई थी, ठीक है कमल को आजकल उसकी पार्टी तवज्जों नहीं दे रही थी लेकिन पार्टी ने उसे क्या कुछ नहीं दिया था। यहां तक की कमल की पहचान ही इसी पार्टी से थी। और फिर उसने चुनाव में पूरी भाजपा के खिलाफ विषवमन भी किया था। भाजपा के खिलाफ उसके तीखे तेवर से पार्टी के कई नेता असहज भी हो जाते थे यही वजह है कि उसके भाजपा प्रवेश ने पूरे क्षेत्र को हैरानी में डाल दिया था। हैरान तो केवल कृष्ण भी था यही वजह है कि वह जल्द से जल्द कमल से मिलकर अपनी बेचैनी और जिज्ञासा दूर कर लेना चाहता था।
वह जल्दी से तैयार भी हुआ लेकिन पता चला कि कमल तो दिल्ली में है और एक दो दिन बाद ही लौटेगा। उसने उसे फोन लगाया लेकिन फोन किसी अन्य ने उठाया और बताया कि वे पार्टी प्रमुख के साथ बैठक कर रहे हैं। दो दिन बाद भी मौसम का तेवर वही था, मार्च-अप्रैल के महीने में भी धूप अपने तेज पर था। और केवल कृष्ण की जिज्ञासा थी या मौसम सचमुच गर्म था कहना मुश्किल है लेकिन प्रदेश की राजनैतिक फिजा का मिजाज बेहद गर्म था। शहर कमल के स्वागत में सज चुका था, कल तक जो लोग कमल के मुर्दाबाद के नारे लगाते थे वे आज जिंदाबाद के नारे लागने की होड़ में थे। 
केवल कृष्ण को तो कमल के इस बात पर हैरानी हो रही थी कि उपेक्षा के कारण ही उसने भाजपा प्रवेश किया है। वह समझ नहीं पा रहा था कि 15 दिन पहले तक मोदी सरकार की नीतियों ही नहीं खुद प्रधानमंत्री मोदी के स्टाईल का उपहास उड़ाने वाला कमल को अचानक क्या हो गया कि वह देश का भविष्य उनके हाथों में सुरक्षित जैसी बात कहने लगा।
खैर, मौसम ने मिजाज बदला, दिन की तेज धूप के बनी स्थिति शाम होते हवा ठंडी होने लगी और बूंदा-बांदी भी, होली का उत्साह अब भी आम लोगों में था, सड़क पर पी खाकर लुढ़कने वाले अपने में व्यस्त थे, फिर आम स्वागत सत्कार में भीड़ जुटाने वालों ने भी खूब दिल खोलकर खर्च किया था। जैसे-तैसे केवल कृष्ण जब कमल के घर पहुंचा तो भीड़ हटने लगी थी, और जब कमल भी सोने जाने का ईजाजत लेने लगा तो रात के बारह बज चुके थे लेकिन केवल कृष्ण अपनी जिज्ञासा को दूर करने इतना उतावला और बेचैन था कि उसने अकेले में बात करने की ईच्छा जता दी।
कमल बिल्कुल बड़े नेताओं की तरह केवल कृष्ण के कंधे पर हाथ रखकर उसे भीतर ले आया और मुस्कुराते हुए पूछा- कैसा रहा मेरा फैसला? 
केवल कृष्ण ने इतना ही कहा क्या भाजपा में तुम्हारी हैसियत वैसे ही रहेगी, क्या पार्टी प्रमुख से तुम्हे वैसा ही स्नेह मिलेगा, फिर दलबदल का दाग जो लगा है वह कैसे धुलेगा? पता नहीं केवल कृष्ण ने एक ही सांस में कितने सवाल कर बैठा।
लेकिन कमल भी कच्चा खिलाड़ी नहीं था, उसने केवल कृष्ण के कांधे को थपथपाते हुए हंसने लगा। केवल कृष्ण कुछ और सवाल करता इससे पहले कमल ने कहा सब बताऊंगा लेकिन चलो पहले कुछ खा लेते है। डायनिंग टेबल सज चुका था घर के लोगों के चेहरे में जो खुशी दिख रही थी  उससे स्पष्ट था कि नई पार्टी को लेकर उनके मन में कोई संशय नहीं है और वे कमल के निर्णय से खुश है। 
रोटी का टुकड़ा मुंह में डालते-डालते केवल कृष्ण ने जब कहा कि तुमने यह निर्णय सोच समझकर लिया है या भावावेश मेंं? कमल ने कहा सब सोच लिया है। भाजपा में जाने के फायदे बहुत थे और आज के दौर में यह जरूरी है। कमल यही नहीं रुका बल्कि बोलते चला जा रहा था, भाजपा में जाने का सबसे बड़ा फायदा तो यह है कि तुम्हारे राष्ट्रभक्ति पर कोई उंगली नहीं उठायेगा, दूसरा फायदा यह है कि अभी चार साल सत्ता का सुख मिलेगा तीसरा फायदा यह है कि आप हिन्दू हो जाओगे चौथा फायदा यह है कि आप आम लोगों की समस्या पर ध्यान नहीं दोगे तब भी आपकी निष्क्रियता पर कोई सवाल नहीं करेंगा और बगैर काम करे आप हिन्दू-मुस्लिम के सहारे चुनाव जीत जाओगे। वहां भी पार्टी प्रमुख को खुश रखना पड़ता था यहां भी पार्टी प्रमुख से संबंध बनाकर रखना पड़ेगा। कमल फायदा गिनाते जा रहा था और केवल कृष्ण अवाक होकर उसकी बात सुने जा रहा था। 
अचानक केवल ने कहा रात बहुत हो गई है वह चलता है। लेकिन कमल बोले जा रहा था। केवल चुपचाप उठकर बाहर निकल आया। सड़के सुनी थी, कहीं-कहीं पी-खाकर लुढ़कने वालों की टोली अपने में मशगुल थे और अंधेरा घना होता जा रहा था।

गुरुवार, 19 मार्च 2020

अंधेरा घना है कहना मना है!


मध्यप्रदेश के सियासी हमाम ने जिस तरह से होली के दिन सभी नेताओं को जिस तरह से नंगा किया है उससे एक बात तो तय है कि जनता की चिंता किसी को भी नहीं है हर पार्टी को हर हाल में सत्ता चाहिए और पार्टी ही क्यों हर विधायक और हर सांसद को सत्ता चाहिए। जनता किसी को भी जिताएं सत्ता उन्हीं के पास होगी जिसके पास पैसों की ताकत होगी। इसलिए राजस्थान हो महाराष्ट्र हो या छत्तीसगझढ़? सब जगह पूंजी की ताकत जनता के फैसले को समय आते ही पलट देगी।
इतिहास गवाह है कि अंग्रेजी सत्ता के बढ़ते अत्याचार के बाद भी उनके समर्थकों की कमी नहीं रही है। सत्ता की मलाई तब भी कुछ लोग मजे से खाते रहे और उन्हें जनता पर हो रहे अत्याचार की फिक्र नहीं रही। लेकिन लोकतंत्र की मजबूरी यह है कि हर पांच साल में सत्ता को जनता के पास जाना है, इसलिए अब जनता के फैसले को बदलने का नया रिवाज चल पड़ा है। सत्ता ने तय कर लिया है कि मर्जी उसकी चलेगी जनता जो भी फैसला देगा, सत्ता तो हर हाल में उसी की बनेगी। लेकिन यह पूरा सच नहीं है। 
याकिन मानिये पूरा सच इससे भी भयावह है। तब पूरा सच क्या यह नहीं है कि आज के विधायकों व सांसदों को हर हाल में सत्ता चाहिए! उनके लिए न पार्टी मायने रखते हैं और न ही नीति सिद्धांत। यही वजह है कि पूंजी का खेल चरम पर है। देशभर के सांसदों व विधायकों में 80 फीसदी से अधिक लोग करोड़ पति है और 60 फीसदी से अधिक पर आपराधिक प्रकरण दर्ज है।
जनता की हालत यह है कि वह वोट किसे दे क्योंकि राजनैतिक दलों के नेताओं में गठजोड़ इतना गहरा है कि वोट आप किसी को भी दे। अत्याचारियों या भ्रष्टाचारियों को कुछ नहीं होगा। मध्यप्रदेशथ हो या छत्तीसगढ़? दोनों ही जगह सत्ता बदली। कांग्रेस जब तक विपक्ष में रही शिवराज-रमन सरकार की करतूतों पर जोरदार लड़ाई लड़ी। सत्ता आते ही एक के बाद एक जांच कमेटी भी बनी लेकिन साल बीतने के बाद भी नतीजा क्या रहा? किसी भी मामले में कोई जेल नहीं गया। राज्यों की तो छोड़ दें मोदी सरकार ने ही किसे जेल भेज दिया। आप इसे न्यायालय की कमजोरी कहकर सत्ता का बजाव कर सकते हैं क्योंकि आपको यही यकीन दिलाया गया है कि भारतीय न्याय व्यवस्था कमजोर है। जबकि यह सच मानिये कि सरकार में बैठे लोग जिस तरह से एकजुट है उसे जनता का वोट भी अलग नहीं कर सकता।
इसलिए मध्यप्रदेश में सिंधिया का भाजपा में जाना फिर अन्य विधायकों का जाने पर जो लोग खुश हो रहे हैं या दुख जता रहे है उनका जनता से कोई लेना देना नहीं है। मीडिया की भूमिका भी इन दिनों नायाब हो चला है उसे भी हर हाल में पूंजी चाहिए इसलिए वह अपने को सत्ता के साथ खड़ा करते चले जा रही है तब यकीन मानिये आज यस बैंक गया है, कुछ सार्वजनिक कंपनियां बेची गई है। दो चार घपले घोटाले किये गये है कल पूरा देश घने अंधेरे में डूबा नजर आयेगा। लेकिन इस अंधेरे के खिलाफ कौन आवाज उठाये? विपक्ष? जी नहीं जब सत्ता की ताकत ही उद्देश्य हो तो आप उससे भी उम्मीद न करें क्योंकि वह भी पूंजी के ताकत के रास्ते सत्ता के साथ हो जायेगा। यहां नहीं मिलेगा तो वहां चला जायेगा और वहां के लोग न मिलने पर नई सत्ता के साथ आ जायेगे और जनता सिर्फ ताली बजायेगी अपने वोट का ताकत देख खुश होगी?

बुधवार, 18 मार्च 2020

अपना काम बनता भाड़ में जाए जनता...


पूरे देश में इस समय राजनीति जिस तरह से चल रही है उसके एक ही मायने है कि राजनैतिक दल ही नहीं विधायकों व सांसदों को भी हर हाल में सत्ता की मलाई चाहिए? आम लोगों से दूर होते न्याय से किसी को लेना देना नहीं है पहले चुनाव जीतने किसी दल का सहारा लो फिर सत्ता की मलाई के लिए नीति सिद्धांत त्याग कर सत्ता की ताकत के साथ खड़े हो जाओं। ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे दिग्गज के भाजपा प्रवेश का तो यही मतलब निकाला जा सकता है।
बात ज्योतिरादित्य सिंधिया से ही शुरु किया जाना चाहिए। अठ्ठारह साल के राजनैतिक सफर में दस साल मंत्री और 17 साल सांसद रहने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया की गिनती कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में होते रही है। माधवराव सिंधिया के बाद जिस तरह से श्रीमती सोनिया गांधी के स्नेह और सानिध्य में ज्योतिरादित्य का राजनैतिक सफर शुरु हुआ था और कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में गिनती होने लगी थी उसके बाद कोई कल्पना ही नहीं कर सकता था कि वे सिर्फ एक लोकसभा का चुनाव हारने के बाद कांग्रेस से विदा हो जायेंगे।
इस अप्रत्याशित कदम ने कांग्रेस की राजनीति में भूचाल तो लाया ही है यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या नेताओं के लिए पद और सत्ता ही महत्वपूर्ण है और राजनैतिक पार्टियों में अब सिद्धांत और नीति कोई मायने नहीं रखते। दरअसल माधव राव सिंधिया ने मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सत्ता लाने में जो मेहनत की और भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ जिस तरह के तेवर दिखाये, खासकर प्रधानमंत्री मोदी को लेकर उनकी तल्ख टिप्पणी के बाद कोई सोच भी नहीं सकता था कि वे भाजपा में चले जायेंगे और मोदी के रहते उनका भाजपा प्रवेश हो सकता है।
लेकिन आवश्यकता ही अविष्कार की जननी है के प्राकृतिक सिद्धांत ने राजनीति के विपरित ध्रुव को ऐसा जोड़ा की राजनीति की परिभाषा ही बदल गई और सिंधिया जैसे दिग्गज कांग्रेसी भी यदि भाजपाई हो जाए तो फिर किस पार्टी के सिद्धांत पर बहस की जाए! और भरोसा किया जाए। जो सत्ता में है उन्हें हर हाल में सत्ता में बने रहना है और जो सत्ता में है उन्हें हर हाल में सत्ता चाहिए की नीति निर्धारित हो चुकी है तो फिर इससे क्या फर्क पड़ता है कि सरकार किसी की भी रहे। क्योंकि इसके बाद तो न व्यापम घोटाले मायने रखेंगे न नान घोटाले? बेरोजगारी, आर्थिक मंदी, किसानों पर अत्याचार किसी भी बात का कोई मतलब ही नहीं रह जाता। चुनाव जीतने के लिए किए गए वादों का ही मतलब है न कोई घोषणा का ही मतलब है। जिसके पास पूंजी की ताकत होगी वह उसे सत्ता की ताकत बनाकर सब कुछ हासिल कर ही लेगा।
पैसों की ताकत के दम पर विधायकों को अपने पाले में कर लो और सत्ता की एक चाबी अपने हाथ में रख लो। ज्योतिरादित्य खुद चुनाव हार गये लेकिन उनके पास पूंजी की जो ताकत है उसके चलते 22 विधायक उनके साथ है और जिसके पास भी ये 22 विधायक होंगे उनके लिए सिद्धांत नीति का क्या मतलब रहेगा आसानी से समझा जा सकता है। ऐसे में मध्यप्रदेश की जनता किसी को भी चुन ले या किसी भी प्रदेश की जनता किसी को भी चुन ले इसका क्या मायने होगा?

ये क्या हो रहा है कप्तान साहेब!


पीडि़तों को प्रताडऩा, अपराधियों से सेटिंग
छत्तीसगढ़ की राजधानी में पुलिस का हाल बुरा है। वर्दी की आड़ में कमाई का जरिया बना चुके विभिन्न थानों में पीडि़तों की जहां सुनवाई नहीं हो रही है वहीं अपराधियों से सांठ-गांठ कर मामले को रफा-दफा करने का खेल खुले आम चल रहा है। हालत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पीडि़तों को मुख्यमंत्री और राज्यपाल से गुहार लगाना पड़ रहा है तो मुख्यमंत्री को चेतावनी देनी पड़ रही है।
नेहा की सुनवाई कब?
होटल गिरिराज की डायरेक्टर नेहा पुरोहित का जीना दूभर हो गया है। अपराधियों के हौसले इतने बुलंद है कि उनकी शिकायतों को पुलिस नजरअंदाज कर देती है। उनकी बिटिया से छेड़छाड़ होती है। सीसीटीवी के सबूत भी पुलिस के सामने कोई मायने नहीं रखता और अपराधिक तत्व थाने में घुसकर पुलिस के सामने नेहा से बदतमीजी करते है। पुलिस नेहा की शिकायत पर रिपोर्ट लिखना तो दूर उल्टे उसी के खिलाफ रिपोर्ट लिखना तो दूर उल्टे उसी के खिलाफ रिपोर्ट लिख देती है। हालत यह है कि वे राज्यपाल तक से न्याय की गुहार लगा चुकी है लेकिन कुछ नहीं हुआ। हालांकि वह परिवारवाद दायर करने की मन बना चुकी है लेकिन थानों की स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पुलिस किस तरह दबंगों का साथ देती है। इस मामले का एक पहलू यह भी है कि उसकी लड़ाई सम्पत्ति को लेकर अपने भाई से ही है और पुलिस खुलकर अपराधियों का साथ दे रही है।
शराब लॉबी से सेटिंग
पिछले दिनों पुलिस ने हरियाणा से ट्रक में आई 22 लाख की शराब जब्त करने के लिए अपनी पीठ थपथपाने में व्यस्त रही और जनता भी पुलिस की इस कार्रवाई की सराहना कर रही है लेकिन इस घटनाक्रम का दूसरा पहलू यह है कि शराब मंगाने वाले मुख्य आरोपी अभी भी पुलिस के गिरफ्त से बाहर है। रसूखदार माने जाने वाले इस अपराधी को गिरफ्तारी से बचाने में पुलिस के आला अधिकारी ही नहीं कांग्रेस के कुछ नेता भी लगे हैं। सूत्रों की माने तो सौदेबाजी का बड़ा खेल चल रहा है। बताया जाता है कि एक विशेष व्यवसायिक वर्ग से जुड़े इस शराब माफिया से दस लाख रुपये लिए जाने का हल्ला है हालांकि हमारे सूत्रों का कहना है कि अभी सेटिंग का खेल चल रहा है।
शराब की अवैध बिक्री को लेकर प्रदेश में जिस तरह का खेल आम चर्चा का विषय बना हुआ है और मुख्यमंत्री से लेकर डीजी तक बिफरे हुए हैं उसके बाद भी थाना या सीएसपी स्तर पर सेटिंग की खबरों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि पुलिस के हौसले किनते बुलंद हैं।
आरोपी को भगा दिया
तीसरा मामला नकली हवा कारोबार से जुड़ा है। मुखबिर की सूचना पर पिछले दिनों देवपुरी के एक गोदाम में छापा मारकर दो दर्जन कार्टून नकली दवाओं का जब्त तो किया गया लेकिन सूत्रों का दावा है कि जब्ती के दौरान वहां मौजूद मुख्य आरोपी श्रवण कुमार मंधानी उर्फ शिशुपाल को पुलिस के एक सिपाही ने महज पांच हजार लेकर भगा दिया। यही नहीं जिन निजी दवा दुकानों को यह दवाईयां बेची गई है उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा रही है।
बहरहाल ये तीन घटनाएं बताती है कि पुलिस की कार्यप्रणाली राजधानी में कैसे चल रही है और सिका दुष्परिणाम क्या होगा? क्या इससे सरकार की बदनामी नहीं होगी?

मंगलवार, 17 मार्च 2020

निगम मंडल के लिए धड़कने तेज़


बजट सत्र समाप्ति की ओर है वैसे-वैसे निगम मंडल में नियुक्ति चाहने वाले कांग्रेसियों की धड़कने तेज होने लगी है। गणेश परिक्रमा के इस दौर में किसे लालबत्ती नसीब होती यह तो मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को ही पता है लेकिन इस नियुक्ति को लेकर अधिकारियों की भी रूचि देखने को मिल रही है।
छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के साथ ही कांग्रेसियों में लालबत्ती पाने होड़ मची हुई है और सवा साल होते-होते कई कांग्रेसियों की नियुक्ति टलने की पीड़ा भी बाहर आने लगी है। लोकसभा चुनाव और नगरीय निकाय में चुनाव की वजह से नियुक्ति का मामला टलते रहा है और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की बजट सत्र के बाद नियुक्ति की घोषणा से कांग्रेसी खेमे में हलचल बढ़ गई है।
सूत्रों की माने तो संगठन से जुड़े नेताओं की रूचि इसमें अधिक है। संगठन से जुड़े एक नेता का कहना है कि संघर्ष करने के दिन अब खत्म हो गये है और संघर्ष के बाद मिली सत्ता का लाभ अब उन्हें मिलना चाहिए। बताया जाता है कि एक अनार सौ बीमार की तर्ज पर कई नेता लालबत्ती के लिए लग गये हैं। हालांकि वे जानते हैं कि नियुक्ति भूपेश बघेल को ही करना है इसके बावजूद वे दूसरे प्रभावशाली नेताओं की गणेश परिक्रमा से भी नहीं चुक रहे हैं। कांग्रेस के अदरूनी सूत्रों की माने तो संगठन के कई प्रभावशाली नेताओं की रूचि भी बड़े निगमों पर है। जिन निगमों को मलाईदार माना जाता है उसमें सबसे प्रमुख खनिज निगम, गृह निर्माण मंडल, बेवरेज कार्पोरेशन, पर्यटन मंडल के अलावा रायपुर विकास प्राधिकरण भी शामिल है और इन निगमों पर कांग्रेस के महामंत्री गिरिश देवांगन, कोषाध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल, प्रवक्ता शैलेष नीतिन त्रिवेदी, आरपी सिंह, अजय साहू के अलावा पुराने दिग्गज राजेन्द्र तिवारी, सुभाष धुप्पड़, गजराज पगारिया के अलावा दो दर्जन से अधिक दावेदार है। दौड़ में वैसे तो वे लोग भी शामिल है जो चुनाव के ठीक पहले कांग्रेस में शामिल हुए है लेकिन इन्हें लेकर कांग्रेस के भीतर खाने में भी विरोध के स्वर तेज हो रहे हैं।
हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों की माने तो निगम मंडलों में नियुक्ति को लेकर मुख्यमंत्री ने सूची को अंतिम रुप दे दिया है और सिर्फ घोषणा करना ही शेष है। हालांकि निगमों में नियुक्ति को लेकर चर्चा इस बात की भी है कि हाईकमान का हवाला देकर सूची को कुछ दिन और लटकाया जा सकता है। 
बहरहाल कांग्रेसियों की धड़कने तेज हो चुकी है और देखना है कि नियुक्ति के बाद इसकी प्रतिक्रिया क्या होगी।