रविवार, 7 मार्च 2021

किसानों के सौ दिन...

 

किसानों के आंदोलन को सौ दिन पूरे हो गये है लेकिन सरकार को इससे कोई मतलब भी है यह दिखाई नहीं देता? इसका मतलब क्या है? क्या मोदी सत्ता ने यह तय कर लिया है कि उसे चुनाव जीतने आता है और वह ऐसे किसी भी आंदोलन की परवाह नहीं करेगी? इसका मतलब साफ है कि किसानों का आंदोलन अभी और लंबा चलने वाला है। वैसे भी केन्द्र की पूरी सत्ता इन दिनों पांच राज्यों में होने वाली चुनाव में व्यस्त है तब किसानो के आंदोलन का क्या होगा?

सवाल यह भी है कि यदि मोदी सत्ता 2 मई को आने वाले चुनाव परिणाम में जीत जाती है, तब किसान क्या आंदोलन समाप्त कर देंगे? ऐसा भी नहीं है तब आने वाले दिनों में किसान आंदोलन का रुख क्या होगा? क्या किसान अब पांच राज्यों में जाकर भाजपा के खिलाफ माहौल बनायेंगे? अडानी-अंबानी के बहिष्कार को और गति देंगे या इसके बाद खुद चुनाव लड़ेंगे। यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि किसान आंदोलन अब गांव-गांव तक पहुंचने लगा है।  यहां तक कि गांवों में भाजपा के सांसद विधायक और दूसरे नेताओं को किसानों के बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में आंदोलन को लेकर जो परिस्थितियां बन रही है वह देश को किस दिशा में ले जायेगी कहना कठिन है।

मोदी सत्ता ने साफ कर दिया है कि न वे तीनों कानून को वापस लेंगे और न ही एमएसपी को कानूनी दर्जा ही देंगे। इसके बाद भी यदि किसान आंदोलन कर रहे हैं और आंदोलन को गांव-गांव तक पहुंचा रहे है तो फिर सवाल यही है कि आने वाले दिनों में यह आंदोलन का स्वरुप क्या होगा?

हमने पहले ही कह दिया है कि जिस तरह से किसानों ने पंजाब, हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश में भाजपा से जुड़े नेताओं का बहिष्कार कर रहे हैं वैसा बहिष्कार यदि दूसरे राज्यों में होने लगे तब क्या होगा? क्या तब भी सरकार अपने कार्पोरेट मित्रों के भरोसे चुनाव जीत जायेगी।

कहना कठिन है क्योंकि किसानों की रणनीति को लेकर साफ है कि आगे वे कार्पोरेट घरानों का ही नहीं सत्ताधारी दल के नेताओं का भी बहिष्कार की रणनीति को विस्तार देने में लगे हैं। तब क्या भाजपा पांचों राज्यों में चुनाव हार जायेगी। क्योंकि चुनाव होने वाले राज्यों में भी तो बड़ी संख्या में किसान है?

सवाल कई है लेकिन एक बात तो तय है कि किसान आंदोलन लंबा ही नहीं चलेगा बल्कि वह भविष्य की राजनीति की दिशा भी तय करेगा और इतिहास में भी दर्ज होगा!

शुक्रवार, 5 मार्च 2021

हिटलर की राह...

 

क्या भारत में लोकतंत्र खतरे में है? क्या देश के प्रधानमंत्री की राह हिटलरी हो चली है? क्या असहमति के स्वर को दबाने सरकारी तंत्र का दुरुपयोग किया जा रहा है? ये ऐसे सवाल है जिसे फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट से बल मिलता है।

दुनिया में लोकतंत्र को लेकर अपनी रिपोर्ट में फ्रीडम हाउस ने जिस तरह से अमेरिका और भारत सहित दुनिया के कई देशों में लोकतंत्र में गिरावट बताया है उसके बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि भारत आखिर किस दिशा में जा रहा है। हालांकि इस रिपोर्ट पर अमेरिका के विदेश सचिव ने सहमति जताई है लेकिन भारत भर में इस रिपोर्ट से सन्नाटा छाया हुआ है। यही कोई वाहवाही की रिपोर्ट होती तो अब तक भक्त, वाट्सअप यूनिर्वसिटी और आईटी सेल तारीफों के कसीदे गढ़ते रहते लेकिन रिपोर्ट मोदी सत्ता की करतूतों पर सवाल उठा रहा है तो सन्नाटा है।

सन्नाटे और चुप्पी में वे लोग भी हैं जो कल तक किसान आंदोलन के समर्थन में खड़े थे, फिल्मी हस्तियां, कलाकार, साहित्यकारों की इस रिपोर्ट पर चुप्पी ने ही साबित कर दिया है कि सत्ता का भय किस कदर हावी है। रिपोर्ट की एक-एक बातें न केवल महत्वपूर्ण है बल्कि यह बताती है कि वर्तमान सत्ता ने लोकतांत्रिक मूल्यों को किस तरह तोड़ा है।

ऐसे में नागरिकता कानून से लेकर जेएनयू और वर्तमान में चल रहे किसान आंदोलन को लेकर सरकार भूमिका को स्पष्ट करती है। सीबीआई, ईडी और आयकर की कार्रवाई को लेकर विपक्ष पहले ही आरोप लगाते रही है कि ये सब विरोध के स्वर को दबाने मोदी सत्ता का औजार है। अनुराग और तापसी के यहां मारे गये आयकर छापे भी इसी ओर चुगली करते हैं।

भारत की आंशिक आजादी को लेकर फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट को लेकर इतिहास को पलटने की जरूरत है कि आजादी की लड़ाई में कौन खड़ा था, कैसे मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने झूठ और अफवाह का सहारा लिया गया ?

ऐसी कितनी ही रिपोर्ट फाइलों में बंद है जो साफ कहता है कि दंगा होता नहीं करवाया जाता है, गढ़ा जाता  है? ऐसे कितने ही सवाल उठाये गये जो गैर जरूरी थे, जिसमें सिवाय नफरत के अलावा कुछ नहीं था।

ऐसे में आज तक फ्रीडम हाउस ने भारत के लोकतंत्र में आई गिरावट को लेकर जब रिपोर्ट प्रकाशित की है तब आम आदमी को सोचना होगा कि आखिर इस देश में किसकी जरूरत है।

क्या नेताजी सुभाष बाबू की वकालत सिर्फ इसलिए की जाती रही ताकि बीस साल तक तानाशाही शासन की मंशा के समर्थक है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि चालीस और पचास के दशक में बहुत से देश आजाद हुए जिनमें से अधिकांश देशों में राजशाही या तानाशाही सत्ता का उदय हुआ। भारत में भी कई राजा  इसके समर्थक थे लेकिन गांधी-नेहरु की सोच ने इस देश में लोकतंत्र की नींव रखी। 

ऐसे में सवाल यही है कि गांधी-नेहरु का विरोध करते-करते हम इतने अलोकतांत्रिक हो चले है कि इस देश में ही लोकतंत्र खतरे में आ रहा है।

गुरुवार, 4 मार्च 2021

गलतियों का पुलिंदा...

 

राहुल गांधी जब कहते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाया गया आपातकाल एक गलती थई तो इसके मायने साफ है कि राहुल में गलत को गलत कहने का साहस है वे जानते है कि यह देश झूठ और नफरत से तरक्की नहीं कर सकता और न ही जनता को ज्यादा दिनों तक मूर्ख ही बनाया जा सकता। सत्ता में बने रहने के लिए कोई झूठ, अफवाह और भ्रम का सहारा तो ले सकता है लेकिन इससे देश का भला नहीं होने वाला।

लेकिन सवाल अब भी गलती स्वीकार करने की है तो गुजरात की गलती को गिनना शुरु कर दीजिए जिसे वे कभी स्वीकार नहीं करेंगे और न ही नोटबंदी, जीएसटी का गलत इम्पीयरेंशन को ही गलत मानेंगे वे तो बिना बुलाये अमेरिका जाने और पाकिस्तान जाकर बिरयानी खाने को भी गलत नहीं मानेंगे और तो और बढ़ती महंगाई-बेरोजगारी को ही गलत कहा जायेगा। विरोध के स्वर को देशद्रोही और जेएनयू के सच को भी वे गलत नहीं मानेंगे, आज इनकी गलती गिनते जाईये, आप इनके झूठ भी गिन सकते है जो ये कभी स्वीकार करने की साहस नहीं कर पायेंगे?

तब सवाल यही उठता है कि लोकतंत्र में क्या चुनाव जीतने ही महत्वपूर्ण हो चला है, जनसरोकार का कोई मतलब ही नहीं  रह गया, सुविधानुसार एनआरसी का खेल खेलो और जन सरोकार से टेक्स तब तक वसूलते रहो जब तक वह दम न तोड़ दे।

संवैधानिक संस्थानों के बजट को लेकर भी सवाल उठने लगे है तो सीबीआई, सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग के बजट में पिछले 6 सालों में लगभग दो गुणा बढ़ोत्तरी क्या दर्शाती है। क्या संस्थागत ढांचों को अपने अनुरूप करने की मंशा क्या नहीं दिखती, सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ट जज गोगोई की राज्यसभा में नियुक्ति क्या गलत होने की चुगली नहीं करती?

ऐसे कितने ही सवाल है जो गलत फैसलों की ओर साफ इशारा करती है। किसानों को आतंकवादी और किसान आंदोलन को देशद्रोही बता देना क्या गलत नहीं है?

लेकिन इन गलतियों को स्वीकार करने का साहस किसमें है। ऐसे में राहुल गांधी के इमरजेंसी को लेकर वर्तमान में तुलना करने वाला बयान कई मायने में महत्वपूर्ण है।

आखिर इमरजेंसी क्यों लगी? इलाहाबाद के जस्टिस सिंहा ने दो बातों का जिक्र कर फैसला सुनाया था। जनप्रतिनिधि कानून 123/7 के तहत दो आरोप लगाये गये। पहला आरोप था जिसमें रायबरेली सभा के लिए सरकारी विभाग बिजली खीची गई उसके लिए सरकारी विभाग ने मदद की दूसरा आरोप था पीएमओ से जुड़े अधिकारी कपूर का सरकारी प्रचार में सहयोग कर रहे थे।

ऐसे में क्या यह वर्तमान में नहीं हो रहा है? लेकिन अब इन मामलों में न कोर्ट को कोई मतलब है न चुनाव आयोग का। ऐसे में यदि राहुल जब इमरजेंसी और वर्तमान दौर का जिक्र करते हैं तो साफ है कि सत्ता ने लोकतंत्र की खाल का जूता बनाकर पहन लिया है और संवैधानिक संस्था बजट के भार में दब गये है तब सवाल यही है कि गलती कैसे स्वीकार की जा सकती है क्योंकि नैतिकता से बड़ा चुनाव जीतना है।

बुधवार, 3 मार्च 2021

किसान आतंकवादी?

 

किसान आंदोलन को लेकर जिस तरह से सत्ता पक्ष का रूख रहा है और किसानों को जिस तरह से भला बुरा कहते हुए आतंकवादी बताया गया, क्या यह सब आने वाले दिनों में भूला दिया जायेगा। सिर्फ असहमति के स्वर को दबाने किसी को राष्ट्रद्रोही या आतंकवादी करार देना क्या उचित है।

22 साल की दिशा को किस तरह से देशद्रोही करार देने की कोशिश हुई उसे भले ही लोग भूल जाये लेकिन दिशा उन्हें भी तब तक याद आयेगी जब सरकार की मनमानी के खिलाफ खड़ा होने वाला कोई लड़का या लड़की पर सरकार यही रूख अख्तियार करेगा।

ये देश न किसी धर्म विशेष का है और न ही किसी जाति विशेष का है। चुनाव जीतने धर्मों को बांटकर या जातियों को बिखेरकर सत्ता हासिल तो की जा सकती है लेकिन मनमानी बर्दाश्त नहीं की जायेगी।

ऐसे में दिल्ली बार्डर से शुरु हुआ किसान आंदोलन अब गांव-गांव में अपनी रफ्तार पकडऩे लगा है। जिन किसानों को सत्ता के मद में नेताओं और ट्रोल आर्मी ने आतंकवादी कहा है वह आने वाले समय में भाजपा को ही नहीं पूरे एनडीए को भारी पडऩे वाला है।

वैसे भी 2014 से असहमति के स्वर को देशद्रोही करार देने की ये परम्परा शुरु की गई है उसका दम किसान आंदोलन ने निकाल दिया है। असहमति के स्वर को नक्सली देशद्रोही बताने की परम्परा से सत्ता हासिल करने वाले यह भूल गये कि सत्ता किसी भी एक दल या व्यक्ति की जागीर नहीं है। लोकतंत्र में सरकारें आती जाती रहती है लेकिन यदि नफरत का पौधा बड़ा हो गया तो देश की तरक्की ही नहीं रुकेगी बल्कि विश्व में उसकी छवि भी खराब होगी।

पूरा इतिहास उठाकर देखा जाना चाहिए कि जिस भी शासक ने अपने धर्म या समाज को श्रेष्ठता की कसौटी में खरा उतारने नफरत का बीज बोया उन शासकों का इतिहास में नाम किस तरह लिया जाता है।

किसान आंदोलन अपने चरम पर पहुंचने वाला है। ऐसे में सरकार भले ही एमएसपी को लेकर यह कहने लगे कि एमएसपी रहेगा लेकिन सच तो यही है कि केन्द्रीय कृषि मंत्री ने किसानों की बैठक में स्पष्ट कह दिया है कि एमएसपी पर खरीदी करने की स्थिति में सरकार नहीं है। यानी दो तरह की बातें की जा रही है। हैरानी तो इस बात की है कि सत्ता संभालने के बाद मोदी सत्ता ने उद्योगपतियों को करोड़ों अरबों की छूट दी है लेकिन एमएसपी पर खरीदी से किसानों को होने वाले लाभ से वंचित रखा जा रहा है। चुनाव में स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट लागू करने के वादे के साथ सत्ता में आई मोदी सरकार अब रिपोर्ट को लागू नहीं कर पाने की मजबूरी बता रही है।

ऐसे में अब एक ही सवाल है कि क्या सत्ता ने असहमति के स्वर को दबाने राष्ट्रवाद का नया फार्मूला लागू कर दिया है कि जो भी किसान आंदोलन का समर्थन करेगा वह देशद्रोही है या आतंकवादी?

मंगलवार, 2 मार्च 2021

आयशा और स्त्री...


नदी जानती है स्त्री का दर्द, वह सभी का दर्द जानती है, इसलिए वह बाहें फैलाकर चलती है और आयशा भी शायद यह जानती थी, इसलिए उसने अपनी अंतिम यात्रा के लिए साबरमती को चूना। इससे पहले उसने अपने पिता से भी बात की। वह शायद अपने पिता पर भी बहुत भरोसा करती थी। बेटी का पिता से प्यार कौन नहीं जानता लेकिन पितृ सत्ता वाले समाज में वे भी असहाय रहे होंगे?

घटना हिला देने वाली है, लेकिन यह सिर्फ क्षणिक भावुकता तक ही सीमित रह जाता है। फिर शांत और और पितृ सत्ता की दबंगई में किसी आयशा का इंतजार होगा? पत्रकारिता के दौर में मेरे सामने कई घटनाएं हुई, हर घटना के बाद आक्रोश के बाद शांति फिर पुनरावृत्ति, भारतीय समाज की प्रवृत्ति हो चली है।

इस घटना में जितना आयशा का पति दोषी है शायद उससे ज्यादा वह समाज भी दोषी है जिसने औरत को पंगु बना दिया है। देखने में यह सिर्फ दहेज नजर आता है लेकिन इसकी जड़ ी दमन है जिस पर कोई नहीं बोलना चाहता? कोई प्रहार नहीं करता क्योंकि पितृ सत्ता के आगे कुछ बोलना धर्म परम्परा का मुखालफत करना है।

दहेज प्रताडऩा को लेकर मैने जितनी भी रिपोर्टिंग की तो पाया कि महिलाओं का शादी के बाद कोई अपना घर नहीं है और पति के छोड़ देने का खतरा उसके मत्थे हर मां-बाप भाई बहन यह कहकर मढ़ देते है कि बेटी डोली में ससुराल जाती है और उसकी अर्थी...!

खैर यह सवाल समाज के सभी तपको को उठना चाहिए कि आखिर ियां जी कैसे लेती है! वाकई में इनकी तो नदी में कूद जाने की परिस्थितियां हर पल मौजूद है।

हालांकि ियों को लेकर बदलाव आये है लेकिन आज भी मां-बाप, भाई-बहन शादी करके बेटी को ऐसे रवाना करता है कि जा अब तेरा इस घर से कोई नाता नहीं है तू सिर्फ मेहमान होगी। हक तो सारा बेटों का है, गरीब से गरीब आदमी भी अपना झोपड़ा बेटा को ही देता है, कई तो एक चवन्नी भी देना नहीं चाहते। यहां तक की अमीर आदमी बेटी को करोड़ों की सम्पत्ति में से कुछ देना नहीं चाहता।

मुस्लिम समाज में तो और भी अजीब परम्परा है वहां तो तलाक के सारे अधिकार ही मर्दो के पास है और औरत का अधिकार सिर्फ वह मेहर है जिसे चार लोग बैठकर तय करते है, इस दौर में भी मेहर पचास हजार रुपये तक ही तय होते है। इतनी महंगाई में मेहर इतना कम है कि दूसरे दिन ही उतनी राशि हाथ में रखकर रवाना कर दे।

कैसी विडम्बना है कि पिता विरासत में हिस्सा देना नहीं चाहता और पति मेहर देकर कभी भी खिसका दे। अब सोचिये कि कोई इस परिस्थिति में कैसे जीये?

उसे अकेले रहने की स्वतंत्रता नहीं है पिता हिस्सा देना नहीं चाहता। पिता कहता है ससुराल में ही रह पति कहता है मेहर पकड़ भाग जा? कहां जाए। यहां कोई धर्म का फर्क नहीं है औरतें हर जगह इसी तरह से प्रताडि़त और पीडि़त है। ये हो सकता है कि हिन्दू औरतों के मुकाबले मुसलमान औरते ज्यादा प्रताडि़त होगी या इससे उलट होगा। हालांकि इस्लाम के नियम में मुस्लिम औरतों के लिए यह सुविधा है कि वे ससुराल में पति के मां-बाप की सेवा करने बाध्य नहीं है लेकिन?

दरअसल इन सारी समस्याओं की जड़ सिर्फ पैसा है। ऐसे में यदि दहेज में चार बर्तन देने की बजाय यदि सम्पत्ति का मालिक बना दिया जाय तो मामला कुछ और होगा! शादी जीवन-मरण का समझौता तभी होगा जब दोनों पक्षों के पास पैसा होगा या गरीब लड़कियां अपने पैरों में खड़ होने की ताकत रखेंगी। यदि औरतों के पास पैसा होगा और किसी ने उसे छोड़ा तो जिस औरत की जेब में पैसा होगा उससे कौन शादी नहीं करेगा?

ऐसे में आयशा का नदी की गोद में समा जाना जारी रहेगा और हम हर विलाप के बाद फिर एक आयशा को देखते रह जायेंगे!

सोमवार, 1 मार्च 2021

चुनाव, स्टेडियम, जनसरोकार

 

निर्वाचन आयोग ने पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया है। किसान आंदोलन के दौर में हो रहे इस चुनाव का परिणाम क्या होगा? और इससे मोदी सत्ता को कोई फर्क पड़ेगा कहना कठिन है क्योंकि सत्ता की रईसी को कायम रखने का जो तरीका वर्तमान दौर में चल पड़ा है उससे जन सरोकार कोई मायने नहीं रखता।

जन सरोकार सामने रखता तो बंगाल को लेकर जो बवाल काटा जा रहा है उसका कोई मतलब ही नहीं होता। क्योंकि बंगाल में ममता बेनर्जी को लेकर जिस तरह के सवाल खड़ा किया जा रहा है वह राजनीति का महज एक हिस्सा है। बंगाल इस देश का ऐसा राज्य है जिसकी तुलना भाजपा शासित प्रदेशों से की जाये तो वह बीस ही बैठेगा।  जीडीपी ग्रोथ हो या कृषि उत्पादन, बेरोजगारी दर की ही बात कर ली जाये तो वह भाजपा शासित उत्तरप्रदेश, हरियाणा, बिहार से बेहतर स्थिति में है, तब सवाल यह है कि क्या ये सब चुनाव में मुद्दे बनेंगे।

बिल्कुल नहीं बनेंगे क्योंकि ये मुद्दे भाजपा को नुकसान पहुंचा सकते है। सवाल उठ सकता है कि बंगाल को यह किस दम पर बेहतर करने का दावा कर रहे है जबकि उसके द्वारा शासित प्रदेश उत्तर प्रदेश, हरियाणा में बेरोजगारी दर बंगाल के मुकाबले क्यों खराब है। पर केपिटल इंकम के मामले में भी बंगाल की स्थिति उत्तर प्रदेश -बिहार से बेहतर है।

ऐसे में क्या बंगाल में चुनाव का मुद्दा राष्ट्रवाद और धर्म नहीं होगा? यह सवाल भले ही गैर जरूरी लगे लेकिन सच तो यही है कि  इन राज्यों के चुनाव में भाजपा को सत्ता तक लाने के लिए यही एकमात्र मुद्दा है।

हम यह नहीं कहते कि किसान आंदोलन के इस दौर में भाजपा कृषि बिल को लेकर कोई मुद्दा छोड़ सकता है बल्कि यह देखना होगा कि किसान आंदोलन का इस चुनाव में क्या असर होगा। बढ़ती महंगाई भी मुद्दा बनेगा। पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमत का असर चुनाव में कितना पडेगा?

सत्ता की रईसी को लेकर जो लोग नाराज है वे कई तरह के मुद्दों को हवा दे सकते हैं लेकिन क्या सरदार वल्लभ भाई पटेल स्टेडियम का नाम गुपचुप ढंग से नरेन्द्र मोदी स्टेडियम किया जाना इन चुनाव का मुद्दा होगा?

हालांकि इस नामकरण को लेकर जब सवाल उठने लगे तो इसकी सफाई में केन्द्रीय मंत्री तो सामने आये ही ट्रोल आर्मी और वॉट्सअप युनिर्वसिटी के छात्र भी गांधी-नेहरु परिवार के नाम पर देशभर में चल रहे संस्थानों, सड़क चौक की सूची जारी कर दी। लेकिन वे जब अपनी ही सूची में फंसने लगे तो नेहरु के भारत रत्न को लेकर सवाल खड़ा करना शुरु कर दिया लेकिन नेहरु के भारत रत्न को लेकर सवाल खड़ा करने वाले यह भूल गये कि नेहरु को भारत रत्न तब के राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने बगैर केन्द्रीय सत्ता के सिफारिश की ही थी और उनके साथ सर्वपल्ली राधा कृष्णन सहित कई लोग थे जो तब सत्ता में थे।

लेकिन चुपचाप स्टेडियम का नामकरण कहीं वह डर तो नहीं है कि सत्ता जाने के बाद क्या होगा? खैर मामला कुछ भी हो लेकिन सोशल मीडिया में वायरल हो रहे इस मुद्दे में सबसे मजेदार मुद्दा हिटलर और सद्दाम हुसैन के द्वारा नामकरण को लेकर की जा रही तुलना है। ऐसे में इन राज्यों के चुनाव में एक बात तो तय है कि राजनीति जनसरोकार से दूर होता जा रहा है और चुनाव जीतने का मतलब सत्ता की रईसी को भोगना है। जन सरोकार कोई मायने नहीं रखता।

रविवार, 28 फ़रवरी 2021

कब्र खोदने में माहिर कांग्रेसी...

 

क्या कांग्रेस का अब महात्मा गांधी से वास्ता नहीं रहा या अब गांधई के नाम से चुनाव नहीं जीता जा सकता? यह सवाल इसलिए उठ खड़ा है क्योंकि मध्यप्रदेश कांग्रेस ने जिस बाबूलाल चौरसिया को कांग्रेस का सदस्य बनाया है वह गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का न केवल समर्थक रहे हैं बल्कि एक समय वे गोडसे का मंदिर बनाने की बात भी करते रहे हैं ऐसे गोडसे भक्त को कांग्रेस की सदस्यता देने का क्या मतलब है?

भाजपा ने तो एक सामान्य प्रतिक्रिया में कह दिया कि कांग्रेस का गांधी के सिद्धांत से कोई वास्ता नहीं रह गया है लेकिन इस प्रतिक्रिया के पीछे का सच क्या यह नहीं है कि चूंकि अब गांधी के नाम से वोट नहीं मिलने और सत्ता तक पहुंचने के लिए वोट चाहिए इसलिए बेमेल समझौते कांग्रेस की मजबूती है?

हालांकि बाबूलाल चौरसिया के कांग्रेस प्रवेश को लेकर कांग्रेस के भीतर भी विरोध के स्वर तेज होने लगे है लेकिन अब इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि बाबूलाल कांग्रेस में रहेंगे या नहीं रहेंगे। क्योंकि इस सच ने कांग्रेस के नेताओं का दिवालियापन उजागर कर ही दिया है। और ऐसे कब्र एक बार फिर खोद दिया है जिसकी गूंज से कांग्रेसी बिफरते रहेंगे?

दरअसल संघ और भाजपा के बढ़ते प्रभाव से कई कांग्रेसी इस हद तक विचलित हो गये है कि वे बिना गैती-फावड़ा के ही अपना कब्र खोदने आतुर नजरर आते हैं। खासकर चुनाव के समय वे अपनी हरकतों और जुबान से भाजपा को ऐसा मौका दे देते है जिससे कांग्रेस की मुसिबत ही नहीं बढ़ती बल्कि हंसी के पात्र बन जाते हैं।

अभिषेक मनु सिंघवी, सलमान खुर्शीद से लेकर दिग्विजय सिंह के बोल क्या अब भी नहीं गूंजते? मध्यप्रदेश उपचुनाव में तो कमलनाथ की महिला विधायक को लेकर की गई टिप्पणी ने भाजपा को सत्तासीन करने में पूरी मदद की। और अब जब पांच राज्यों में चुनाव होने जा रहा है तब बाबूलाल चौरसिया जैसे गोडसे भक्त का कांग्रेस प्रवेश क्या कांग्रेस के लिए मुसिबत खड़ी नहीं करेगा। अब कांग्रेस किस मुंह से गोडसे भक्तों की आलोचना करेगा। जबकि यह सर्वविदित है कि गोडसे भक्त आज भी महात्मा की तस्वीर से रक्त बहते देखने की चेष्टा करते रहते हैं।