रविवार, 6 जून 2021

आ गये हैं भगवाधारी!

उत्तरप्रदेश सहित देश के 11 राज्यों में अगले साल यानी 2022 को होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा ने कमर कस ली है लेकिन सर्वाधिक दिलचस्प स्थिति उत्तरप्रदेश की है। जहां भगवाधारी योगी आदित्यनाथ की सत्ता है और यह ऐसी सत्ता है जिसके आगे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भी नहीं चलती कहा जाए तो गलत नहीं होगा।

ऐसे में मोदी और योगी के बीच विवाद इसलिए भी उठ खड़ा हुआ है क्योंकि भाजपा के भीतर भी योगी आदित्यनाथ प्रधानमंत्री के रेस में है। उत्तरप्रदेश में चल रहे विवाद की एक वजह यह भी मानी जाती है कि योगी आदित्यनाथ को लेकर भाजपा में जिस तरह का उत्साह है उसे गुजरात गैंग पचा नहीं पा रहे हैं। 

दरअसल कभी अपनी सुरक्षा को लेकर संसद में जार-जार रोने वाले योगी आदित्यनाथ का उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री बनना असाधारण घटना थी, क्योंकि योगी आदित्यनाथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पसंद कभी नहीं रहे और यदि चर्चाओं पर विश्वास करें तो योगी आदित्यनाथ ने भी समय-समय पर गुजरात गैंग को अपनी ताकत का अहसास कराने से परहेज नहीं किया, इसके लिए चाहे किसी की छवि खराब हो तब भी उन्होंने इसकी परवाह नहीं की।

कट्टर हिन्दुत्व का नया चेहरा के रुप में योगी आदित्यनाथ ने कब अमित शाह को पराजित किया इसकी तारीख बताना मुश्किल है लेकिन कभी नरेन्द्र मोदी के विकल्प माने जाने वाले अमित शाह की जगह योगी आदित्यनाथ कभी का ले चुके हैं। तब गुजरात गैंग का बौखलाना स्वाभाविक है और यह मौका दिया पंचायत चुनाव के परिणाम ने। भाजपा की पंचायत चुनाव में बुरी गत बनते ही गुजरात गैंग सक्रिय हो गया लेकिन कहा जा रहा है कि योगी की कट्टर हिन्दू वाली छवि के आगे गुजरात गैंग को एक बार फिर मुंह की खानी पड़ी।

योगी आदित्यनाथ ने जिस तरह से जातिवाद चलाकर ब्राम्हणों के खिलाफ कार्रवाई की है यह भी भाजपा के लिए बेचैन कर देने वाला है। उत्तरप्रदेश में ब्राम्हण वोट का अपना प्रभाव है और योगी आदित्यनाथ के बारे में कहा जाता है कि ब्राम्हणों से उनका बैर बहुत पुराना है और यही वजह है कि सत्ता में आने के बाद उन्होंने परशुराम जयंती पर दिये जाने वाले शासकीय अवकाश को रद्द कर दिया ताकि ठाकुर लॉबी खुश हो सके।

कोरोना काल में भी योगी आदित्यनाथ की कार्यपद्धति को लेकर सवाल उठते रहे। विभिन्न राज्यों में फंसे उत्तरप्रदेश के छात्रों को लाने में योगी आदित्यनाथ ने जिस तरह से मोदी सरकार पर दबाव बनाया उसके बाद ही दूसरे राज्यों में अफरा-तफरा मची और कोरोना नियंत्रण में दिक्कतें आई। ताजा मामला तो गंगा में बहती लाशें, श्मशान में चिंताओं की लाईन है जिसके चलते सरकार की छवि बिगड़ी है लेकिन मोदी और योगी के बीच चल रहे इस लड़ाई में गुजरात गैंग असहाय है और भाजपा के कुंठित हिन्दु अभी से नारा लगाने लगे हैं- 

आ गये हैं भगवाधारी

राज तिलक की करो तैयारी।

शुक्रवार, 4 जून 2021

क्या ये नरसंहार नहीं है साहेब!

 

इतिहास में यह बात भी दर्ज होगा कि जब भीषण महामारी में देवभूमि के लोग दाना-दाना के लिए तरस रहे थे, गंगा में लाशें बह रही थी, श्मशान में चिताओं की लम्बी लाईनें थी, लोग आक्सीजन के अभाव में मर रहे थे, चारों तरफ सत्ता की लापरवाही से नरसंहार हो रहा था, तब देश की मौजूदा मोदी सरकार अपनी रईसी बरकरार रखने टैक्स पर टैक्स वसूल रही थी, राज्य वैक्सीन के लिए तरस रहे थे बल्कि प्रधानमंत्री सेन्ट्रल विस्टा में अपना महल बनाने में व्यस्त थे।

कोरोना के इस भीषण महामारी में जब आम आदमी बेरोजगारी और महंगाई की मार से नारकीय जीवन जीने मजबूर है तब सत्ता न केवल वैक्सीन पर टैक्स घटाने तैयार नहीं बल्कि सरकार का पैसा बचाने निजी अस्पतालों को फायदा पहुंचाने आम आदमी पर आर्थिक बोझ डाल रही है। पूरा देश इन दिनों वैक्सीन की कमी से जूझ रहा है, सरकारी अस्पतालों में यदि वैक्सीन उपलब्ध नहीं है और निजी अस्पतालों में वैक्सीन उपलब्ध है तो इसका मतलब क्या है? इसका मतलब साफ है कि सरकार केवल अपने फायदे देख रही है, जनता आर्थिक बोझ से मरे तो मरे।

सरकार की करतूतों की वजह से सुप्रीम कोर्ट बेहद नाराज है और अब तो उसने मोदी सत्ता से सीधे पूछ लिया कि आखिर वैक्सीन के लिए रखे वह 35 करोड़ का क्या किया? हालांकि इसका जवाब न केन्द्र देने वाला है और न ही न्यायालय ही इस सरकार को चेतावनी देने या लानत भेजने के अलावा ही कुछ कर सकती है।

आयेगा तो मोदी ही, हौसला मत टूटने देना इस मोदी का ब्रम्हा लेकर छवि चमकाने वालों को भी इस भीषण महामारी में टैक्स और रईसी दिखाई नहीं देने वाला है। तब कांग्रेस की बड़ी नेता श्रीमती सोनिया गांधी का मोदी सत्ता को लेकर किया गया प्रहार को याद करना चाहिए कि सरकार चलाना बच्चों का खेल नहीं है। वैसे भी जिन लोगों ने जीवनभर झूठ, अफवाह और नफरत की राजनीति की हो उनसे आपदा के समय भी बेहतरी की उम्मीद बेमानी है। तब क्या हाथ पर हाथ बांधकर कर 2024 का इंतजार करना चाहिए। 

क्योंकि इस सत्ता ने जिस तरह से संघीय ढांचे पर प्रहार कर संवैधानिक संस्थाओं की साख का बट्टा बिठा दिया है उसके बाद इस देश में क्या बचा रह सकता है। शिक्षा और स्वास्थ्य तो कैसे भी आम आदमी की पहुंच से दूर है, सत्ता की लापरवाही ने इस भीषण महामारी में लोगों का जीवन बर्बाद कर दिया है ऐसे में सरकारी अस्पतालों में वैक्सीन की अनुलब्धता क्या एक तरह का नरसंहार नहीं है, क्योंकि जब सारी दुनिया अपने-अपने देश के लिए वैक्सीन खरीद रही थी तब भी मोदी सत्ता अपनी रईसी और छवि बनाने में लगी थी। 

तब एक ही नारा एक ही राग होना चाहिए 'गद्दी छोड़ो।Ó

गुरुवार, 3 जून 2021

हौसला मत टूटने देना...

 

जब से मोदी सत्ता की लापरवाही के चलते इस देश में नरसंहार की तस्वीरे आई है एक नये तरह से सत्ता की छवि चमकाने का उपक्रम शुरु हो गया है, ट्रोल आर्मी और वॉट्सअप युनिर्वसिटी ने एक नया खेल शुरु कर दिया है वह खेल है ''हौसला मत टूटने देना इस मोदी का भले ही पेट्रोल दो सौ हो जाए, खाने का तेल तीन सौ हो जाए नहीं तो हिन्दू खत्म हो जायेंगे ये देश इस्लामी देश बन जायेगाÓÓ।

कोरोना की इस भीषण महामारी में भी यदि सत्ता सोचती है कि वह इस नरसंहार के बाद भी अपनी रईसी बरकरार रखने और छवि चमकाने में इन ट्रोल आमी  और वॉट्सअप युनिर्वसिटी के भरोसे कामयाब हो जायेगी तो वह क्या गलत सोचती है क्योंकि नफरत के बीज इस गहरे तक बोया गया है कि कोई हिन्दू-मुस्लिम के अलावा सोच भी नहीं पा रहा है।

पहले कार्यकाल की घोर नाकामी के बाद भी मोदी सरकार दूसरी पारी के लिए जीत गई तो इसकी वजह सिर्फ और सिर्फ हिन्दू मुस्लिम है ऐसे में यदि 2024 में मोदी सरकार को आने से कौन रोक सकता है। हिन्दू-मुस्लिम की राजनीति का प्रभाव को लेकर भले ही भारतीय जनता पार्टी सीधी बात न करे लेकिन सच तो यही है कि इस खेल ने देश की बर्बादी की राह तो तैयार कर दी है। सत्ता की लापरवाही के चलते हो रहे नरसंहार पर न्यायालय की लगातार लताड़ और लानत के बाद भी सत्ता की बेशर्मी बढ़ते ही जा रही है, न्यायालय ने जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल मोदी सत्ता के लिए किया है वह किसी भी व्यक्ति के लिए डूब मरने वाली बात है लेकिन सत्ता को इन सबसे कोई मतलब नहीं है। 

कोरोना की महामारी से मरने वालों में हिन्दुओं की संख्या ही लाखों में है तब आने वाले दिनों में जब प्रतिशत में मुस्लिम आबादी बढ़ते दिखाई देगी तो वह सत्ता के लिए वोट पाने का जरिया बनेगा। नरसंहार सिर्फ बीमारी से ही नहीं हो रहा बल्कि बेरोजगारी भी इसमें मदद कर रही है। मोदी सरकार के आने के बाद करोड़ लोगों से अधिक की नौकरी चली गई। इंडियन इकानामी के ताजा आंकड़े बेहद डरावने है लेकिन सत्ता को इससे मतलब नहीं।

इसके अलावा बढ़ती महंगाई भी लोगों को मौत के नजदीक ढकेल रही है। महंगाई को रोक पाने में सरकार बुरी तरह असफल हो चुकी है और मध्यम वर्ग तेजी से गरीब होते जा रहे हैं। किसान तो वैसे भी मर रहे हैं। लेकिन सरकार की प्राथमिकता आज भी सेन्ट्रल विस्टा और उस जैसे प्रोजेक्ट है जो रईसी का नया इतिहास गढ़ लेना चाहती है। इसके बाद भी यदि हौसला न टूटने देना का खेल, खेल छवि चमकाने की कोशिस हो रही है तो उसमें यह भी जोड़ देना चाहिए कि फिक्र न करे राम मंदिर के बाहर पर्याप्त भीख मिलेगी।

बुधवार, 2 जून 2021

प्रधानमंत्री का शौक सबसे बड़ी चीज...

 

सेन्ट्रल विस्टा के निर्माण को जब केन्द्र सरकार ने अतिआवश्यक सेवा घोषित कर दिया है तब न्यायालय का फैसला तो वही होना था जिसका अंदेशा था, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उन लोगों में से है जो अपनी शौक के आगे किसी को ठहरने नहीं दे सकते, भले ही वे खुद मजाक बन जायें या देश के लोगों की हालत खराब हो जाए। भले ही उनके फैसलों से लोगों की जान गई हो या देश आर्थिक बदहाली की ओर चला गया हो वे अपनी शौक के आगे किसी की नहीं सुनते, अपवाद नौ लाख वाले सूट को छोड़ कर।

ऐसे में सेन्ट्रल विस्टा की बात करने से पहले पाठकों को स्मरण दिलाना जरूरी है कि वे गरीब घर के हैं और उन्होंने चाय तक बेची है, शायद यह गरीबी की वजह से वे अपनी शौक पूरी नहीं कर पाये थे और आज जब सत्ता के सर्वोच्च पद पर है तो एक-एक करके अपनी सभी शौक पूरा कर रहे हैं। मोदी जी के कपड़े और जैकेट का शौक तो उनके चहेते लोगों के उपहार से ही पूरा हो जाता है, चश्मा और दो ढाई लाख का पेन भी शायद उनके चाहने वाले ही पूरा कर देते हैं, खानपान का शौक मोदी जी को कितना है मशरुम काजू का आटा वगैरह-वगैरह किसी से छिपा ही नहीं है। तब सरकारी संपत्ति यानी सरकारी खर्चे से जो शौक पूरा किया गया है उस पर चर्चा इसलिए भी जरूरी है क्योंकि जनता को तय करना है कि यह शौक कितना शानदार है और राजा का शौक निराला तो होता ही है, इतिहास राजाओं के शौक के किस्से से अटा पड़ा है। 

सेन्ट्रल विस्टा के बारे में बताने से पहले प्रधानमंत्री मोदी के उन शौक को भी जानना जरूरी है जो वे प्रधानमंत्री बनते ही पूरा करने लगे, इसे उनके समर्थक समय की जरूरत भी कह सकते है लेकिन इससे पहले देश के प्रधानमंत्री एक बंगले में रहते थे लेकिन नरेन्द्र मोदी के लिए पांच बंगले मिलाकर एक बंगला बनाया गया कल्याण मार्ग भी नाम जोरदार है। इसके बाद पूर्व प्रधानमंत्री के काफिले में शामिल बीएमडब्ल्यू 7 को बदला गया और इसके बदले रेंज रोवर का काफिला खरीदा गया, चूंकि बीएमडब्ल्यू सीरिज सेडान है और सामने सीट में बैठने वाले जनता को ठीक से नहीं दिखते थे और नरेन्द्र मोदी को फोटो शोटो और दिखने दिखाने का शौक है शायद इसलिए वाहनों का काफिला ही बदल दिया गया। ऐसा मानने वाले मोदी विरोधी ही है जबकि समर्थक इसे जरूरत ही बता रहे हैं। इसमें सरकार का कितना खर्च हुआ सुरक्षा कारणओं से बताना उचित नहीं है। 

लेकिन सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री को अमेरीका से होड़ भी करना है इसलिए एयर इंडिया वन खरीदा गया आठ हजार चालीस करोड़ का खर्च होना बताया जा रहा है। चूंकि शौक से बड़ी चीज दुनिया में कुछ नहीं है और शौक यदि सरकारी खजाने से पूरी हो तो फिर यह समय भी जरूरत के रुप में प्रचारित किया जाता है। यह अलग बात है कि देश में आज भी ईलाज के अभाव में लोग दम तोड़ रहे हैं, बेरोजगारी और महंगाई ने आम लोगों का जीवन नारकीय कर दिया है लेकिन हौसला इस व्यक्ति का नहीं तोडऩा है क्योंकि ये न होगा तो हिन्दुतत्व खतरे में पड़ जायेगा, ऐसा इन दिनों वाट्अप युनिवर्सिटी के विद्यार्थी जोर-शोर से कह रहे हैं। सेन्ट्रल विस्टा को लेकर नवभारत टाईम्स के खुलासे के अनुसार सेन्ट्रल विस्टा में प्रधानमंत्री का जो बंगला बनेगा वह 15 करोड़ में बनेगा, जिसमें सभी तरह का आधुनिक सुविधा होगी, यह किसी महल से कम नहीं होगा और पुराने जमाने के राजा महाराजाओं की तर्ज पर इसके किले के भीतर परींदा भी पर नहीं मार सकता।

खर्च कितना भी होगा शौक के आगे कुछ नहीं है, हम यह नहीं कहेंगे कि इस भीषण महामारी में  इसकी क्या जरूरत है क्योंकि शौक से बड़ी चीज न देश है और न ही धर्म है।

मंगलवार, 1 जून 2021

होशियार! अच्छे दिन तो यही है...

 

गलत आदमी भी कितना सही, और मूर्ख आदमी भी कितना ताकतवर हो सकता है इसका अंदाजा किसे था, लेकिन अच्छे दिन की लालच ने सब कुछ उलट दिया था। नरसंहार के इस भयावह दौर के बाद भी यदि सत्ता की जिम्मेदारी से इतर लोग धर्म और राष्ट्रवाद के चक्कर में पड़े थे। तो इसका मतलब साफ है कि पिछले कई दशकों से नफरत का जो बीज बोया जा रहा था वह फलने फूलने लगा है। 

इतिहास गवाह है कि जिस भी राष्ट्र ने धर्म और राष्ट्रवाद को ज्यादा महत्व दिया वे न केवल पिछड़ गये बल्कि बर्बादी की राह को अग्रसर हुए। ऐसे में कोरोना की महामारी ने जो तांडव मचाया है उसे दूसरे देशों की तुलना करना सिर्फ लोगों को भ्रम में डालना है। हैरानी तो इस बात की है कि सत्ता अब भी लोगों की भावनाओं के साथ खेलने में लगी है, देश का आर्थिक ढांचा पूरी तरह से गड़बड़ा गया है। और आर्थिक ढांचे के गड़बड़ाने की वजह से महंगाई और बेरोजगारी अपने चरम पर है। लोगों का जीना दूभर होता जा रहा है लेकिन सत्ता को अपनी रईसी बरकरार रखने आज भी सेन्ट्रल विस्टा की जरूरत हैं और अपनी छवि चमकाने के लिए हिन्दू-मुस्लिम ही चाहिए।

यह ठीक है कि कोरोना वैश्विक महामारी है लेकिन वैश्विक चेतावनी को नजर अंदाज करना, क्या सत्ता की लापरवाही नहीं है, कोरोना से मौत के आंकड़े को छुपाने की कोशिश क्यों की गई। क्या सरकार के पास इस बात का जवाब है कि इस देश में कोरोना की बदइंजामी के चलते आक्सीजन के अभाव में कितने लोगों की मौत हुई, दवाई के अभाव में कितने लोग मर गए, सरकार की नासमझी के लाकडाउन के चलते कितने मजदूर सड़कों में मर गए, भूख और आर्थिक बदहाली के चलते कितने परिवार बरबार हो गए, कितने बच्चे अनाथ हो गए और किसी भी महामारी या आपदा से निपटने के लिए क्या योजना है?

हम जब कहते हैं कि गलत आदमी भी कितना सही, और मूर्ख आदमी भी कितना ताकतवर हो सकता है तो इसका मतलब साफ है कि भावनाएं और आस्था के विभत्स खेल ने देश में असुर प्रवृत्ति को ही बढ़ावा दिया है। जिसका दुष्परिणाम नरसंहार के रुप में देश भुगत रहा है। क्या इस देश की सत्ता की आंख तब भी नहीं खुलती है जब हमारे बाद पैदा हुआ बंग्लादेश हमें हर मामले में पीछे छोड़ देता है। भूखमरी और खुशहाली के इंडेक्स में हम यदि पाकिस्तान से भी पीछे चले जाते हैं तो फिर जीत किसी हो रही है।

और यह सब सत्ता की नासमझी की वजह से हो रही है क्योंकि सत्ता को आज भी इस बात की समझ नहीं है कि सरदार पटेल की बड़ी मूर्ति बना देने से नेहरु का कद छोटा नहीं हो जाता। आधुनिक भारत के निर्माण में जिन लोगों ने अपना सबकुछ होम कर दिया उनकी आलोचना ही नासमझी और मूर्खता है तब अच्छे दिन कैसे आ सकता है। चुनाव जीतना अलग बात और देश चलाना बिल्कुल अलग बात है साहेब।

सोमवार, 31 मई 2021

ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण-3


आजादी के बाद की सत्ता जानती थी कि नफरत के ध्वजारोहण ने हिन्दू-मुस्लिम एकता को क्षति पहुंचाने का प्रयास आगे भी जारी रहेगा, इसलिए ऐसे संगठनों पर प्रतिबंध भी लगाये गए।

सत्ता सचेत थी, नेहरु सचेत थे, सरदार वल्लभ भाई पटेल भी सचेत थे, इसलिए इनके रहते तक नफरत का खेल कुचल दिया गया। ये जहां भी जाते दंगा करवाते थे। लेकिन जब सरकारे सचेत हो तो हर मुश्किल घड़ी से निपटा जा सकता है। धर्म और जाति का सहारा लेकर सत्ता में आने के उपाय जारी थे। लेकिन जिस देश में विवेकानंद, सुभाष बाबू, भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद जैसे लोग सर्वधर्म सद्भाव रखते हो वहां धार्मिक कुंठा के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। लेकिन हिटलर की तर्ज पर झूठ को बार-बार परोसा जाने लगा। ताकि झूठ और अफवाह सच लगे।

भगत सिंह से मिलने कोई नहीं गया, जब देश का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ है तो भारत हिन्दू राष्ट्र क्यों नहीं, सुभाष बाबू की मौत का रहस्य पता नहीं कितने ही झूठ परोसे गए और फिर भी सत्ता नहीं मिली तो नेहरु मुसलमान थे, या हर वे नेता को मुसलमान बताये जाने लगे जो अल्पसंख्यकों और मुसलमानों के पक्ष में खड़ा होने लगे। 70 के दशक में ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण के लिए नई जमीन तलाश की जाने लगी। क्योंकि चीन और पाकिस्तान से युद्ध की वजह से भारत की आर्थिक स्थिति पर प्रभाव पड़ा था लेकिन जब इंदिरा ने बैकों का सरकारीकरण, पंचवर्षीय योजना सहित पोखरण भी कर डाला तो एक बार फिर ज्ञान पर ध्वजारोहण का मंसूबा फेल गया।

लेकिन आपातकाल का वह दौर जिससे सारे राजनैतिक दल डरे हुए थे, इंदिरा गांधी की ताकत अहंकार में परिवर्तन होने लगा था, बेरोजगारी और महंगाई मुंह खोले खड़ा था तब हिन्दू कुंठा लिये लोगों ने अपना झंडा-डंडा चिन्ह सब दांव पर लगा दिया। और स्वयं को बचाने उनके साथ हो गये जो कांग्रेस के विरोधी थे। कांग्रेस के विरोधी दल भी यह नहीं समझ पाये कि कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं होती। लेकिन सत्ता आते ही जब कुंठित हिन्दू एक बार फिर सिर उठाने लगा तो सरकार ही चली गई।

दरअसल हिन्दू कुंठा की यह एक तरह की रणनीति थी, 47 से लेकर 77 तक के सफर में वह जान चुका था कि इस देश में सिर्फ हिन्दुत्व के नाम पर वोट नहीं बटोरे जा सकते? इसलिए उन दलों के सहारे उस क्षेत्रों से भी चुनाव जीता गया जहां उनकी जीत कभी नहीं हो सकती थी। क्योंकि उनके लिए अब भी संविधान गलत था, उनके लिए झंडा में तीन रंग अशुभ था और राष्ट्रगीत भी गलत था। यही स्पष्ट है कि संघ ने अपने मुख्यालय में तिरंगा फहराने से परहेज किया। लेकिन इंदिरा गांधी के खौफ और सत्ता की चाहत ने सब कुछ अनदेखी किया।

नफरत के नए-नए बीज लाकर रोपण किया जाने लगा, कभी गौ हत्या के नाम पर तो कभी कश्मीर में धारा 370 के नाम पर। राम मंदिर तो एक मुद्दा था ही। लेकिन 77 में सत्ता आते ही पोल खुल गई, सरकार गई लेकिन उन्होंने अपनी ताकत बढ़ा ली थी, लेकिन सरकार नहीं चला पाने के दाग से कोई नहीं बच सका और 80 में एक बार फिर इंदिरा गांधी सत्ता सीन हुई। ये वह दौर था जब छोटे राज्यों के निर्माण को लेकर आंदोलन की हवा चलने लगी, राम मंदिर और धारा 370 को लेकर अफवाहों को हवा दी गई, पंजाब में खालिस्तान की मांग तेज हो गई, बेरोजगारी-महंगाई भी सिर उठाने लगा, एक बार फिर विपक्ष सत्ता के लिए ताकत लगाने लगा लेकिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या ने विपक्ष के मंसूबे पर पानी फेर दिया। नफरत की हवा तो इंदिरा गांधी ने पहले ही निकाल दी थी। कांग्रेस सत्तासीन हुई, लेकिन यह नेहरु-शाी और इंदिरा वाली कांग्रेस नहीं थी, यह राजनीति के अनाड़ी माने जाने वाले राजीव गांधी वाली कांग्रेस थी जो बगैर राजनीति के जनसेवा के लिए तत्पर रहने वाली थी, इसने केन्द्र से गांव तक पैसा पहुंचाने की स्थिति को भी नहीं छिपाया, न ही 84 के दंगे की वजह को ही छुपाया।

देश 84 के रक्तपात से हिल चुका था, सिखों ने कांग्रेस से दूरी बना ली यह भी नहीं देखा कि इंदिरा ने तमाम प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रिपोर्ट के बाद भी सिख सुरक्षा गार्डों को नहीं हटाया था। सद्भावना समाप्त सी हो गई थी और इसे हवा देने का राजनैतिक प्रयास शुरु हो चुका था लेकिन राजीव गांधी ने नए भारत की नींव रख दी थी, आधुनिकीकरण और कम्प्यूटर क्रांति का दौर शुरु हो चुका था। मिस्टर क्लीन के नाम से मिल रही प्रसिद्धि में बाफोर्स आ गया। और सत्ता की चाह में विपक्ष एक बार फिर इतिहास को भूल गठबंधन में आ गया। (जारी...)

शनिवार, 29 मई 2021

देश को कहां ले जा रहे हो साहेब...

 

क्या सचमुच इस देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देश की समझ नहीं है या यह जनसंख्या कम करने की कोई साजिश है? यह सवाल इसलिए उठाये जा रहे है ताकि लोगों को यह पता तो चले कि आखिर इस देश की सत्ता पर काबिज सरकार की हकीकत का पता चल सके।

दरअसल यह सवाल इसलिए भी उठाये जा रहे हैं क्योंकि केन्द्र में जब से मोदी सरकार आई है, देश के माहौल में जो नफरत की हवा बहने लगी है उसका दुष्परिणाम सबके सामने है। मोदी सरकार ने वैसे तो दो सौ योजनाओं की घोषणा की है लेकिन वे सारी घोषणाएं हकीकत की धरातल पर बुरी तरह असफल रही है। स्मार्ट सिटी से लेकर आयुष्मान भारत योजना हो चाहे स्टार्टअप से लेकर उज्जवला योजना हो धरातल पर कहीं दिखाई नहीं देता। यहां तक कि खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा गोद लिये गांव की हालत देख लिजिए। 

ऐसे में कुछ ऐसे फैसलों पर भी निगाह जाती है जो साबित करने के लिए काफी है कि इस सरकार को देश की समझ ही नहीं है। नोटबंदी में डेढ़ सौ लोगों की मौत के अलावा भी कुछ हासिल हुआ हो तो जरूरत बताईयेगा। जीएसटी की असंगत से आज भी मध्यम श्रेणी के व्यापारी परेशान है। और कोरोना की लापरवाही ने तो लाखों लोगों की जान ले ली। अचानक लिये गए लॉकडाउन से कितने मजदूर सड़कों पर आ गये ये आंकड़े भले ही सरकार के पास न होने का दावा करे पर इससे हकीकत नहीं बदलने वाली। कोरोना की लापरवाही का यह आलम है कि दुनिया भर के देश वैक्सीन खरीदने का जुगाड़ कर रहे थे और हमारे देश की सत्ता लापरवाही का शतक पूरा करने में लगी थी।

लाशों का मंजर तो असहाय था ही अस्पतालों में बदइंतजामी और दवाइयों तथा आक्सीजन की कालाबाजारी ने सारी हदें पार कर दी। इस पर यदि सरकार को दोष न भी दे तो भूख से व्याकुल जनता और वैक्सीन के अभाव में छटपटाते लोगों की लाइनें क्या सत्ता को दिखाई नहीं दे रहा है। खाद्य तेल से लेकर जीवन के लिए जरूरी खाद्यानों की कीमत भी दिखाई नहीं दे तो फिर सत्ता की समझ क्या है। पेट्रोल-डीजल और गैस की बढ़ती कीमत भी क्या सरकार को दिखाई नहीं दे रहा है और इसकी कीमत बढऩे से महंगाई बढऩे की समझ भी सरकार के पास नहीं है तो फिर सरकार की समझ पर शक होना लाजिमी है। क्या सत्ता पाने झूठ-छल-प्रपंच अफवाह और नफरत फैलाने की समझ ही रह गई है इससे सत्ता तो मिल ही गई और आगे भी मिल जायेगी लेकिन देश की समझ कैसे होगी?