छत्तीसगढ़ में 'पुत्रमोह' की सियासत: क्या बदलेगा दशकों पुराना इतिहास या दोहराई जाएगी कहानी?
विशेष विश्लेषण | राजनीति
छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों एक सवाल फिज़ाओं में तैर रहा है—क्या राज्य को जल्द ही एक और 'सीएम सन' (मुख्यमंत्री का बेटा) बतौर प्रमुख नेता के रूप में स्थापित होता दिखेगा? पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के उनके जन्मदिन के अवसर पर दिए गए एक बयान ने प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है [01:41]। भूपेश बघेल ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पर तंज कसते हुए कहा था कि उनके बेटे चैतन्य बघेल ('बिट्टू') की राजनीति में आने की कोई मंशा नहीं थी, लेकिन जांच एजेंसियों और राजनीतिक घटनाक्रमों ने उन्हें नेता बनने पर मजबूर कर दिया [01:52]।
बघेल का यह बयान महज़ एक राजनीतिक तंज नहीं है, बल्कि इसे छत्तीसगढ़ की राजनीति में 'बिट्टू' की सियासी री-लॉन्चिंग के तौर पर देखा जा रहा है [02:12]। हालांकि, अगर छत्तीसगढ़ के राजनीतिक इतिहास के पन्नों को पलटें, तो मुख्यमंत्रियों के बेटों या परिजनों की राजनीति में एंट्री कोई नई बात नहीं है [02:34]।
इतिहास के पन्ने: सफलता और सीमाओं का लेखा-जोखा
1. पंडित रविशंकर शुक्ल का दौर और श्यामाचरण शुक्ल की सफलता
अविभाजित मध्य प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल के पुत्र श्यामाचरण शुक्ल राजनीति में आए और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे [00:19]। उनके दूसरे पुत्र विद्याचरण शुक्ल ने भी केंद्र की राजनीति में अपनी धाक जमाई [00:32]। हालांकि, श्यामाचरण शुक्ल के पुत्र अमितेश शुक्ल विधायक और मंत्री पद तक तो पहुंचे, लेकिन उससे आगे की राह आसान नहीं रही [03:13]।
2. सारंगढ़ राजपरिवार की अनूठी राजनीतिक विरासत
सारंगढ़ के राजा नरेशचंद्र सिंह के पुत्र संग्राम सिंह चुनावी राजनीति में खास मुकाम नहीं बना पाए [03:25], लेकिन उनकी पत्नी ललिता देवी और तीन पुत्रियों ने इतिहास रचा। ललिता देवी पुसौर सीट से निर्विरोध विधायक चुनी गईं [03:49]। उनकी बेटी कमला देवी विधायक और मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री बनीं, जबकि पुष्पा देवी (रायगढ़) और रजनीगंधा (महासमुंद) ने सांसद का सफर तय किया [04:02]।
3. मोतीलाल वोरा और अजित जोगी का दौर
मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे मोतीलाल वोरा के पुत्र अरुण वोरा विधायक तो बने, लेकिन मुख्यमंत्री स्तर की राजनीतिक सफलता उनसे दूर ही रही [04:37]।
छत्तीसगढ़ गठन के बाद प्रथम मुख्यमंत्री अजित जोगी के पुत्र अमित जोगी ने भारी मतों से अपनी पहली विधायकी जीती [05:00], लेकिन बाद के राजनीतिक घटनाक्रमों और उथल-पुथल के चलते उनकी राजनीतिक राह काफी चुनौतीपूर्ण हो गई [05:11]।
4. डॉ. रमन सिंह और अभिषेक सिंह
प्रदेश में 15 वर्षों तक मुख्यमंत्री रहे डॉ. रमन सिंह ने भी अपने पुत्र अभिषेक सिंह को राजनीति में उतारा [05:32]। अभिषेक सिंह राजनांदगांव से सांसद चुने गए, लेकिन पनामा पेपर्स और विभिन्न विवादों के बाद वे मुख्यधारा की चुनावी राजनीति की रेस में पीछे छूट गए [05:46]।
चैतन्य बघेल 'बिट्टू': लॉन्चिंग और भावी चुनौतियाँ
पाटन से छह बार के विधायक और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पुत्र चैतन्य बघेल की राजनीति में शुरुआत से बहुत सक्रिय रुचि नहीं थी [06:13]। लेकिन ईडी, सीबीआई और अन्य जांच एजेंसियों की कार्रवाई के बीच उनका नाम सुर्खियों में आया [06:40]।
अब सवाल यह उठता है कि क्या भूपेश बघेल अपने बेटे की राजनीतिक ताजपोशी अपने पारंपरिक गढ़ पाटन से कराएंगे, या फिर दुर्ग ज़िले की किसी अन्य सीट या बालोद-गुंडायदेही जैसे सुरक्षित क्षेत्र से उन्हें मैदान में उतारेंगे [07:00]?
आगे की राह कितनी आसान?
गुटबाज़ी और अंदरूनी समीकरण: कांग्रेस की मौजूदा राजनीति में अंदरूनी खींचतान और नए समीकरण बनते-बिगड़ते दिख रहे हैं [07:22]।
विरोधी खेमा: भूपेश बघेल की अपनी राजनीतिक शैली के कारण एक तरफ जहाँ उनका मजबूत जनाधार है, वहीं विरोधियों की संख्या भी कम नहीं है [07:41]। ऐसे में 'बिट्टू' के लिए राह केवल टिकट हासिल करने तक सीमित नहीं होगी, बल्कि जीत दर्ज करना भी एक बड़ी परीक्षा होगी [07:50]।
निष्कर्ष: क्या टूटेगा सालों पुराना रिकॉर्ड?
छत्तीसगढ़ की राजनीति का इतिहास गवाह है कि पंडित रविशंकर शुक्ल के बाद कोई भी अन्य मुख्यमंत्री अपने बेटों को सत्ता के शीर्ष शिखर (मुख्यमंत्री पद) तक पहुँचाने में सफल नहीं हो पाया है [00:19]। अधिकांश 'सीएम सन' केवल विधायक या सांसद बनने तक ही सीमित रह गए [00:42]।
ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भूपेश बघेल का यह नया दांव छत्तीसगढ़ की राजनीति में 'पुत्रमोह' और 'विरासत' की पुरानी पटकथा को बदलेगा, या फिर चैतन्य बघेल भी इतिहास के उसी ढर्रे पर आगे बढ़ेंगे

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