गुरुवार, 17 सितंबर 2026

दीये की लौ में सुलगती सियासत:

 दीये की लौ में सुलगती सियासत: 'आशीर्वाद का दीया' अभियान पर छत्तीसगढ़ में घमासान



छत्तीसगढ़ की शांत फिज़ाओं में इन दिनों एक दीये की लौ से उपजा सियासी तूफ़ान बह रहा है। स्कूली बच्चों से लेकर प्रशासनिक अधिकारियों तक को इस अभियान में झोंके जाने के बाद, जगदलपुर से लेकर बिलासपुर तक विवाद की चिंगारियां साफ़ दिखाई दे रही हैं। 'आशीर्वाद का दीया' पहल, जिसे एक सांस्कृतिक और आस्था से भरे आयोजन के रूप में शुरू किया गया था, अब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का मुख्य केंद्र बन चुकी है।

आस्था या प्रशासनिक हुक्मशाही?

विवाद की सबसे बड़ी वजह इस आयोजन में सरकारी तंत्र का इस्तेमाल मानी जा रही है। बिलासपुर और जगदलपुर सहित राज्य के कई ज़िलों में इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए सरकारी शिक्षकों, तहसीलदारों और स्थानीय प्रशासनिक अमले को ज़िम्मेदारी सौंपी गई। सबसे ज़्यादा बहस इस बात पर छिड़ी कि मासूम स्कूली बच्चों को इस अभियान में शामिल कर दीये जलाने का निर्देश दिया गया। आलोचकों का तर्क है कि शैक्षणिक संस्थानों और प्रशासनिक मशीनरी का इस्तेमाल ऐसे अभियानों के लिए करना सीधे तौर पर नैतिकता और नियमों का उल्लंघन है।

भूपेश बघेल का हमला: "शिक्षा तंत्र का राजनीतिकरण"

पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस मामले पर सीधे तौर पर सरकार को घेरा है। उन्होंने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि सरकार अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए मासूम बच्चों और शिक्षकों का इस्तेमाल कर रही है। बघेल के अनुसार, स्कूलों में पठन-पाठन का माहौल बनाने के बजाय शिक्षकों को दीये जलाने के इंतजाम में लगा देना और बच्चों पर यह फरमान थोपना पूरी तरह से अनुचित है। विपक्षी दल इसे "आस्था का राजनीतिकरण" करार दे रहे हैं।

धरातल पर सुलगते सवाल

स्थानीय स्तर पर शिक्षकों और अभिभावकों में भी इस फरमान को लेकर अंदरूनी असंतोष देखा जा रहा है।

 शिक्षकों की चिंता: गैर-शैक्षणिक कार्यों में बार-बार ड्यूटी लगाए जाने से पढ़ाई प्रभावित हो रही है।

 अभिभावकों का ऐतराज: बच्चों को सरकारी आयोजनों और अभियानों का हिस्सा बनाए जाने पर सवाल उठ रहे हैं।

 प्रशासन का पक्ष: वहीं सरकार और सत्ता पक्ष का कहना है कि यह आयोजन जन-आस्था और सांस्कृतिक संवर्धन का हिस्सा है, जिसे अनावश्यक राजनीतिक रंग दिया जा रहा है।

बस्तर के जगदलपुर से लेकर न्यायधानी बिलासपुर तक, 'आशीर्वाद का दीया' केवल आस्था का प्रतीक नहीं रहा, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की सत्ता और विपक्ष के बीच एक नया युद्धक्षेत्र बन गया है। अब देखना यह होगा कि जनभावनाओं और राजनीति के इस उलझाव में दीये की यह लौ थमती है या विवाद की आग को और हवा देती है।