60 साल पुराने राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर एक ऐसा फैसला आया जिसकी उम्मीद कतई नहीं की गई थी। लेकिन जिस तरह से आजादी के लिए बंटवारा स्वीकार किया गया उसी तरह अमन के लिए भी बंटवारा स्वीकार किया गया। तथ्य अब भी चिख रहे हैं। गवाहों के मुंह पर ताला जड़ दिया गया और तीनों पक्षकारों को विवादित जमीन बांट दी गई।
आम तौर पर जमीन विवाद पर जब भी फैसला हुआ है तब जमीन एक पक्ष को ही गया है। भाई बंटवारे को छोड़ दें तो यह फैसला न्यायालयीन इतिहास में नई ईबादत के साथ पढ़ी जाएगी। हालांकि अब भी दो पक्ष इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाने आतुर हैं और नैसर्गिक न्याय तार-तार होता दिख रहा है। दरअसल राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद का जिस तरह से भाजपा ने राजनैतिक फायदे के लिए इसका इस्तेमाल किया उसके बाद तो इस विवाद को लेकर आम लोगों में चिढ़ सी हो गई थी। सभी चाहते थे जैसा भी हो, जो भी हो इसका निपटारा हो जाए। जज की कुर्सी पर बैठे तीनों लोग भी आम लोगों की भावना को समझ रहे थे और देश हित की जिम्मेदारी भी उन पर यादा हावी रही तभी तो ऐसा फैसला आया जो वास्तव में न्याय की नई ईबादत के रुप में हमेशा पढ़ी जाएगी।
ऐसा नहीं है कि सिर्फ बंटवारे का निर्णय हुआ है। दो मजहबों में बढ रही दूरियों को भी कम करने का इस निर्णय ने हिन्दुस्तान को एक मजबूत राष्ट्र के रुप में स्थापित करने की चेष्टा भी की है। मेरी इस बात से कई लोग असहमत भी हो सकते हैं लेकिन जब भी ऐसे विवाद हो उसे तूल देने की बजाय सरकार को आगे बढ़कर फैसले लेने चाहिए। मुगल सल्तनत और अंग्रेजों की गुलामी ने इस देश को कई हिस्सों में बांट दिया है। धर्म-जाति की लड़ाईयों ने भले ही कुछ राजनैतिक दलों को लाभ पहुंचाया हो लेकिन यह सब तत्कालीन रहा है। दूरगामी तो सिर्फ नुकसान ही हुआ है।
धर्म और जाति के झगड़ों से अब भी रोज लोग मर रहे हैं और सिर्फ लोग नहीं मरते हैं परिवार समाज और राष्ट्र मरता है। यही हुआ है। इस लड़ाई के जिम्मेदार वे नेता है जिन पर देश में सुकून-अमन कायम करने की जिम्मेदारी है। अयोध्या से इस देश को या भाजपा को या सुन्नी बोर्ड को क्या मिला यह तो वही जाने लेकिन इस झगड़े ने क्या खोया यह सबके सामने हैं। इलाहाबाद के लखनऊ बेंच का फैसला नि:संदेह स्वागत योग्य है और इस फैसले के परिपेक्ष्य में धर्म को लेकर विवादित सभी जमीनें मामले खत्म कर देने चाहिए और जो लोग इस फैसले को नहीं मानते उस विवादित जगह को सरकार को अधिग्रहण कर स्कूल-अस्पताल बना देना चाहिए।
ये दो स्थल ऐसे हैं जहां हर धर्म के लोग एक साथ बैठते हैं अपनी तकलीफें बांटते हैं। ताकि फिर कोई भाजपा या सुन्नी बोर्ड इस देश के लोगों को मरवाने की कोशिश न करे। अयोध्या का फैसला राम-रहिम की मर्जी से हुआ है वे भी चाहते हैं कि धर्म की लड़ाई बंद हो जाए और इसलिए देश के दूसरे हिस्सों का विवाद भी ऐसा ही सुलझ जाए क्योंकि बगैर उनकी मर्जी का पत्ता भी नहीं खड़कता।
http://midiaparmidiaa.blogspot.in/
सोमवार, 4 अक्टूबर 2010
दिशा कॉलेज को बचाने का मतलब...
बच्चों से भरी बस पलटी, कई बस कंडम
पिछले दिनों जेल रोड में दिशा कॉलेज की बस पलट गई। हालांकि इस घटना से सवार छात्रों को यादा चोटें नहीं आई लेकिन प्रशासन ने इस मामले के रफा-दफा में जिस तरह की तेजी दिखाई है वह कई संदेहों को जन्म देता है।
घटना की वजह बस का पट्टा टूट जाना है। ऐसे में कॉलेज प्रबंधन के खिलाफ कार्रवाई की बजाय बस चालक के खिलाफ ही मामूली धारा लगा दी गई। वास्तव में इस मामले में बस चालक से यादा दोषी कॉलेज प्रबंधक है क्योंकि बस पलटने की वजह बस का कंडम होना है। हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक दिशा कॉलेज की कई बसें बेहद पुरानी है और रंग रोगन कर इसे चलाया जा रहा है। लगता है प्रशासन को किसी बड़ी घटना का इंतजार है।
पिछले दिनों जेल रोड में दिशा कॉलेज की बस पलट गई। हालांकि इस घटना से सवार छात्रों को यादा चोटें नहीं आई लेकिन प्रशासन ने इस मामले के रफा-दफा में जिस तरह की तेजी दिखाई है वह कई संदेहों को जन्म देता है।
घटना की वजह बस का पट्टा टूट जाना है। ऐसे में कॉलेज प्रबंधन के खिलाफ कार्रवाई की बजाय बस चालक के खिलाफ ही मामूली धारा लगा दी गई। वास्तव में इस मामले में बस चालक से यादा दोषी कॉलेज प्रबंधक है क्योंकि बस पलटने की वजह बस का कंडम होना है। हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक दिशा कॉलेज की कई बसें बेहद पुरानी है और रंग रोगन कर इसे चलाया जा रहा है। लगता है प्रशासन को किसी बड़ी घटना का इंतजार है।
रविवार, 3 अक्टूबर 2010
छत्तीसगढ़ में दागी व विवादास्पद आईएएस अफसरों का जमावड़ा...
भ्रष्टाचार का चौतरफा आरोप, कार्रवाई नहीं
छत्तीसगढ़ में कार्यरत अधिकांश आईएएस अफसरों पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं भारतीय प्रशासनिक सेवा के इन अधिकारियों की विवादास्पद छवि के चलते जनता के करोड़ों रुपए डकारे जा रहे हैं। पदों का दुरुपयोग खुलेआम किया जा रहा है और डॉ. रमन सरकार इन बेकाबू होते अफसरों के खिलाफ कार्रवाई करना तो दूर उन्हें संरक्षण देने में आमदा है।
छत्तीसगढ़ में जिस तरह से लूट-खसोट मची है वह भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के दामन में एक बदनुमा दाग बनकर सामने आने लगा है और एक बारगी तो सीधे सरकार से गठजोड़ दिखाई देने लगा है। हालत यह है कि बेहिसाब संपत्ति के मालिक इन अफसरों पर अंकुश लगाने में सरकार पूरी तरह विफल है। सर्वाधिक चर्चित अफसरों में इन दिनों बाबूलाल अग्रवाल का नाम सबसे ऊपर है। उनके साथ तो सीधे सीएम हाउस से गठजोड़ की खबर है जबकि अन्य अफसरों में विवेक ढांड का नाम भी सामने आया है। कहा जाता है कि रायपुर के इस अफसर ने अपने पद का दुरुपयोग इतनी चालाकी से किया है कि अच्छे-अच्छे नटवर लाल भी फेल हो जाए ताजा मामला तो उनके स्वयं के दुकान सजाने व गृहनिर्माण मंडल के बंगले को रेस्ट हाउस के लिए किराए से देने का है।
मालिक मकबूजा कांड में फंसे नारायण सिंह को किस तरह से पदोन्नति दी जा रही है यह किसी से छिपा नहीं है जबकि सुब्रत साहू पर तो धमतरी कांड के अलावा भी कई आरोप है। दूसरे चर्चित अफसरों में सी.के. खेतान का नाम तो आम लोगों की जुबान पर चढ ग़या है। बारदाना से लेकर मालिक मकबूजा के आरोपों से घिरे खेतान साहब पर सरकार की मेहरबानी के चर्चे आम होने लगे हैं।
ताजा मामला जे. मिंज का है माध्यमिक शिक्षा मंडल के एमडी श्री मिंज पर रायपुर में अपर कलेक्टर रहते हुए जमीन प्रकरणों में अनियमितता बरतने का आरोप है। सरकारी जमीन को बड़े लोगों से सांठ-गांठ कर गड़बड़ी करने के मामले में उन्हें नोटिस तक दी जा चुकी है। एम.के. राउत पर तो न जाने कितने आरोप हैं जबकि अब तक ईमानदार बने डी.एस. मिश्रा पर भी आरोपों की झड़ी लगने लगी है। अजय सिंह, बैजेन्द्र कुमार, सुनील कुजूर तो आरोपों से घिरे ही है। आरपी मंडल के खिलाफ तो स्वयं भाजपाई मोर्चा खोल चुके हैं लेकिन वे भी महत्वपूर्ण पदों पर जमें हुए हैं। जबकि अनिल टूटेजा पर तो हिस्ट्रीशिटरों के साथ पार्टनरशिप के आरोप लग रहे हैं। कहा जाता है कि देवेन्द्र नगर वाले इस शासकीय सेवा से जुड़े अपराधी को हर बार बचाने में अनिल टुटेजा की भूमिका रहती है।
अधिकांश आईएएस की करतूतों का कच्चा चिट्ठा सरकार के पास है आश्चर्य का विषय तो यह है कि जब भाजपा विपक्ष में थी तब इनमें से अधिकांश अधिकारियों की करतूत पर मोर्चा खोल चुकी है लेकिन सत्ता में आते ही इनके खिलाफ कार्रवाई तो दूर उन्हें महत्वपूर्ण पदों से नवाजा गया। बताया जाता है कि आईएएस और मंत्रियों के गठजोड़ की वजह से करोड़ों रुपए इनके जेब में जा रहा है। यहां तक कि जांच रिपोर्टों को भी रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया है। बहरहाल छत्तीसगढ़ में बदनाम आईएएस अफसरों का जमावड़ा होता जा रहा है और सरकार भी इनकी करतूत पर आंखे मूंदे है।
छत्तीसगढ़ में कार्यरत अधिकांश आईएएस अफसरों पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं भारतीय प्रशासनिक सेवा के इन अधिकारियों की विवादास्पद छवि के चलते जनता के करोड़ों रुपए डकारे जा रहे हैं। पदों का दुरुपयोग खुलेआम किया जा रहा है और डॉ. रमन सरकार इन बेकाबू होते अफसरों के खिलाफ कार्रवाई करना तो दूर उन्हें संरक्षण देने में आमदा है।
छत्तीसगढ़ में जिस तरह से लूट-खसोट मची है वह भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के दामन में एक बदनुमा दाग बनकर सामने आने लगा है और एक बारगी तो सीधे सरकार से गठजोड़ दिखाई देने लगा है। हालत यह है कि बेहिसाब संपत्ति के मालिक इन अफसरों पर अंकुश लगाने में सरकार पूरी तरह विफल है। सर्वाधिक चर्चित अफसरों में इन दिनों बाबूलाल अग्रवाल का नाम सबसे ऊपर है। उनके साथ तो सीधे सीएम हाउस से गठजोड़ की खबर है जबकि अन्य अफसरों में विवेक ढांड का नाम भी सामने आया है। कहा जाता है कि रायपुर के इस अफसर ने अपने पद का दुरुपयोग इतनी चालाकी से किया है कि अच्छे-अच्छे नटवर लाल भी फेल हो जाए ताजा मामला तो उनके स्वयं के दुकान सजाने व गृहनिर्माण मंडल के बंगले को रेस्ट हाउस के लिए किराए से देने का है।
मालिक मकबूजा कांड में फंसे नारायण सिंह को किस तरह से पदोन्नति दी जा रही है यह किसी से छिपा नहीं है जबकि सुब्रत साहू पर तो धमतरी कांड के अलावा भी कई आरोप है। दूसरे चर्चित अफसरों में सी.के. खेतान का नाम तो आम लोगों की जुबान पर चढ ग़या है। बारदाना से लेकर मालिक मकबूजा के आरोपों से घिरे खेतान साहब पर सरकार की मेहरबानी के चर्चे आम होने लगे हैं।
ताजा मामला जे. मिंज का है माध्यमिक शिक्षा मंडल के एमडी श्री मिंज पर रायपुर में अपर कलेक्टर रहते हुए जमीन प्रकरणों में अनियमितता बरतने का आरोप है। सरकारी जमीन को बड़े लोगों से सांठ-गांठ कर गड़बड़ी करने के मामले में उन्हें नोटिस तक दी जा चुकी है। एम.के. राउत पर तो न जाने कितने आरोप हैं जबकि अब तक ईमानदार बने डी.एस. मिश्रा पर भी आरोपों की झड़ी लगने लगी है। अजय सिंह, बैजेन्द्र कुमार, सुनील कुजूर तो आरोपों से घिरे ही है। आरपी मंडल के खिलाफ तो स्वयं भाजपाई मोर्चा खोल चुके हैं लेकिन वे भी महत्वपूर्ण पदों पर जमें हुए हैं। जबकि अनिल टूटेजा पर तो हिस्ट्रीशिटरों के साथ पार्टनरशिप के आरोप लग रहे हैं। कहा जाता है कि देवेन्द्र नगर वाले इस शासकीय सेवा से जुड़े अपराधी को हर बार बचाने में अनिल टुटेजा की भूमिका रहती है।
अधिकांश आईएएस की करतूतों का कच्चा चिट्ठा सरकार के पास है आश्चर्य का विषय तो यह है कि जब भाजपा विपक्ष में थी तब इनमें से अधिकांश अधिकारियों की करतूत पर मोर्चा खोल चुकी है लेकिन सत्ता में आते ही इनके खिलाफ कार्रवाई तो दूर उन्हें महत्वपूर्ण पदों से नवाजा गया। बताया जाता है कि आईएएस और मंत्रियों के गठजोड़ की वजह से करोड़ों रुपए इनके जेब में जा रहा है। यहां तक कि जांच रिपोर्टों को भी रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया है। बहरहाल छत्तीसगढ़ में बदनाम आईएएस अफसरों का जमावड़ा होता जा रहा है और सरकार भी इनकी करतूत पर आंखे मूंदे है।
लेबल:
आईएएस,
नारायण सिंह,
बाबूलाल अग्रवाल,
विवेक ढांड,
सी.के. खेतान,
सुब्रत साहू
जो है नाम वाला, वही तो बदनाम है!
छत्तीसगढ़ की राजधानी में इन दिनों बड़े व प्रतिष्ठित माने जाने वाले अखबारों ने नया खेल शुरु किया है । अपनी प्रतिष्ठा बचाने के फेर में 'नवभारत' ने तो जग हंसाई कर दी। पता नहीं यह मैनेजमेंट का दिमाग था या शहर को नहीं जानने वाले संपादक का। हुआ यूं कि सीजी-04 में नार्को टेस्ट की कहानी छापी गई और कहा गया कि इसमें एक मंत्री व अधिकारी को बैंक मैनेजर सिंहा को बचाने करोड़ रुपए का लेन देन का खुलासा हुआ है और जिन्हें यह नार्को टेस्ट की सीडी देखना है वे नवभारत आकर देख सकते हैं। अब जिन्हें छत्तीसगढ़ का ज्ञान न हो वह ऐसी बचकानी हरकत कर सकता है क्योंकि यहां के लोग सीडी देखने पहुंच गए। अब उन्हें बगैर सीडी दिखाए लौटाया जा रहा है। यदि यही हरकत छोटे अखबार वाले करते तो इसे ब्लैकमेलिंग की संज्ञा दे दी जाती? आश्चर्य तो यह है कि यह सीडी नवभारत में काम करने वाले ही नहीं देख पाए है? यानी फुल सेटिंग? वसूली? या इसे और नाम कमाने का या पेपर बेचने का फार्मूला क्या कहें।
क्या पत्रिका भी इसी राह पर
रायपुर की आवाज उठाने का दावा करने वाले नए नेवले अखबार ने अपनी आमद से दूसरे बड़े अखबारों को हिला जरूर दिया है लेकिन उसके तेवर फिलहाल दिखाई नहीं पड़ रहे हैं। खबरें नहीं गढ़ने का दावा तो बाद में ही पता चलेगा लेकिन फ्रंट पेज में फुल पेज विज्ञापन छाप कर उसने भी वहीं किया है जो दूसरे बड़े अखबार कर रहे हैं यानी गुड़ के भाई पा...!
सीनियर फोटोग्राफर जब डर गए...
पिछले दिनों डांस बार में भाजपा नेता प्रभाष झा के बेटे के साथ मारपीट के मामले में गिरफ्तार शिव सैनिक प्रमुख धनंजय सिंह परिहार को जब पुलिस ने अदालत में पेश किया तो सीनियर फोटोग्राफरों की हवा निकल गई। पहचान और संबंध था या डर ये तो वही जाने लेकिन सीनियरों ने जूनियरों को फोटो खींचने लगा दिया। स्वयं बचने लगे। केवल विनय शर्मा ही ऐसे थे जो फोटो खींचने पहुंचे। अब चर्चा इस बात की है कि कौन-कौन बार में डांस देख चुका है?
हिमांशु का खेल...
वैसे तो इस बंदे का कोई जवाब नहीं है चाहे कर्मचारियों पर दबाव बनाने की बात हो या मालिकों पर प्रेशर बनाने की। समय के अनुरूप दबाव बनाओं और अपना उल्लू सीधा करो? ऐसे में पत्रिका के दहशत पर अपना उल्लू सीधा कर लिया जाए तो बुराई क्या है?
रमन प्रिंट में
हिन्दुस्तान से प्रताड़ित होने वाले इलेक्ट्रानिक मीडिया का यह कैमरा मेन इन दिनों हरिभूमि का फोटोग्राफर बन गया है। अब वह इलेक्ट्रानिक मीडिया से यादा खुश है।
रामकुमार की जनसत्ता से छुट्टी
भास्कर को अपना ईमान समझने के बाद भी जब वहां से हटाए गए तो रामकुमार परमार ने जनसत्ता का रुख किया अब वे वहां से भी चले गए। कहां जाना है अभी तय नहीं है।
'पप्पू' भी होगा पास...
मौका सबका आता है। जब बड़े-बड़े लोग सुपर स्टार बन रहे हैं तो पप्पू पटेल भला क्यों पीछे रहें? दो फीट का पप्पू पटेल भी बहुत जल्द एक छत्तीसगढ़ी फिल्म में हीरो बनकर आ रहा है। डोंगरगढ़ और इसके आसपास के इलाकों में इस फिल्म की शूटिंग जोर-शोर से चल रही है। पप्पू पटेल को पूरा विश्वास है कि छत्तीसगढ़ के दर्शक उसे जरूर पसंद करेंगे।
और अंत में...
एआईसीसी के इस मेंबर ने इतना अवैध निर्माण कर लिया है कि उसे बचाने भाजपाई नेताओं से गिड़गिड़ाना ही पड़ेगा। अब जनसंपर्क वाले मजा लें तो लेते रहें।
क्या पत्रिका भी इसी राह पर
रायपुर की आवाज उठाने का दावा करने वाले नए नेवले अखबार ने अपनी आमद से दूसरे बड़े अखबारों को हिला जरूर दिया है लेकिन उसके तेवर फिलहाल दिखाई नहीं पड़ रहे हैं। खबरें नहीं गढ़ने का दावा तो बाद में ही पता चलेगा लेकिन फ्रंट पेज में फुल पेज विज्ञापन छाप कर उसने भी वहीं किया है जो दूसरे बड़े अखबार कर रहे हैं यानी गुड़ के भाई पा...!
सीनियर फोटोग्राफर जब डर गए...
पिछले दिनों डांस बार में भाजपा नेता प्रभाष झा के बेटे के साथ मारपीट के मामले में गिरफ्तार शिव सैनिक प्रमुख धनंजय सिंह परिहार को जब पुलिस ने अदालत में पेश किया तो सीनियर फोटोग्राफरों की हवा निकल गई। पहचान और संबंध था या डर ये तो वही जाने लेकिन सीनियरों ने जूनियरों को फोटो खींचने लगा दिया। स्वयं बचने लगे। केवल विनय शर्मा ही ऐसे थे जो फोटो खींचने पहुंचे। अब चर्चा इस बात की है कि कौन-कौन बार में डांस देख चुका है?
हिमांशु का खेल...
वैसे तो इस बंदे का कोई जवाब नहीं है चाहे कर्मचारियों पर दबाव बनाने की बात हो या मालिकों पर प्रेशर बनाने की। समय के अनुरूप दबाव बनाओं और अपना उल्लू सीधा करो? ऐसे में पत्रिका के दहशत पर अपना उल्लू सीधा कर लिया जाए तो बुराई क्या है?
रमन प्रिंट में
हिन्दुस्तान से प्रताड़ित होने वाले इलेक्ट्रानिक मीडिया का यह कैमरा मेन इन दिनों हरिभूमि का फोटोग्राफर बन गया है। अब वह इलेक्ट्रानिक मीडिया से यादा खुश है।
रामकुमार की जनसत्ता से छुट्टी
भास्कर को अपना ईमान समझने के बाद भी जब वहां से हटाए गए तो रामकुमार परमार ने जनसत्ता का रुख किया अब वे वहां से भी चले गए। कहां जाना है अभी तय नहीं है।
'पप्पू' भी होगा पास...
मौका सबका आता है। जब बड़े-बड़े लोग सुपर स्टार बन रहे हैं तो पप्पू पटेल भला क्यों पीछे रहें? दो फीट का पप्पू पटेल भी बहुत जल्द एक छत्तीसगढ़ी फिल्म में हीरो बनकर आ रहा है। डोंगरगढ़ और इसके आसपास के इलाकों में इस फिल्म की शूटिंग जोर-शोर से चल रही है। पप्पू पटेल को पूरा विश्वास है कि छत्तीसगढ़ के दर्शक उसे जरूर पसंद करेंगे।
और अंत में...
एआईसीसी के इस मेंबर ने इतना अवैध निर्माण कर लिया है कि उसे बचाने भाजपाई नेताओं से गिड़गिड़ाना ही पड़ेगा। अब जनसंपर्क वाले मजा लें तो लेते रहें।
लेबल:
जनसत्ता,
नवभारत,
भास्कर,
मीडिया पर मीडिया,
हरिभूमि
महात्मा गाँधी की प्रतिमा स्थापित
छत्तीसगढ़िया सेना ने राजधानी रायपुर के गाँधी मैदान में आदम कद प्रतिमा स्थापित की . यह जगह गाँधी मैदान तो कहलाता था लेकिन गाँधी के बगैर सुना था . कुबेर सपहा ने इसका उदघाटन प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री अजित प्रमोद कुमार जोगी के हाथों करवाया .
शनिवार, 2 अक्टूबर 2010
कौड़ी के मोल जमीन...
लगता है छत्तीसगढ सरकार सिर्फ अमीरों की सरकार बन कर रह गई है। मंत्री से लेकर अफसर तक केवल जेब गरम करने का काम कर रहे हैं और भ्रष्टाचार उजागर होने के बाद भी कार्रवाई नहीं की जाती। यही वजह है कि आर्थिक अपराध ब्यूरों में कितने ही मामले लंबित है। यदि अमीरों के हितचिंतक सरकार के पीछे सिर्फ यही वजह होती तो नकारा भी जा सकता था। वजह यह भी है कि विकास के नाम पर उद्योगपतियों को कौड़ी के मोल जमीनें दी जा रही है। सिर्फ ये दो वजह नहीं है। असली वजह तो अमीरों को दी जाने वाली कौड़ियों के मोल सरकार जमीनें हैं जो सरकारी अंधेरगर्दी का जीता जागता उदाहरण है।
पता नहीं सरकार किस तरह से कार्य करती है और अमीरों को कौड़ी के मोल जमीन देने की क्या मजबूरी है यह तो वहीं जाने लेकिन सरकार ऐसे लोगों को सरकारी जमीनें लीज पर कौडियों के भाव देती है जो कहीं पर भी व्यवसायिक दर पर जमीन खरीद करते हैं। कांग्रेस पर यह आरोप लगता रहा है और कांग्रेस ने अपनी सरकार के दौरान इस तरह की मनमानी की भी है लेकिन भाजपा भी यही करे तो फिर आम आदमी किससे उम्मीद करे। डॉ. रमन सिंह की सरकार ने राजधानी के मंडी क्षेत्र की बेशकीमती जमीन ऐसे लोगों को कौड़ियों के मोल दे दी जो न केवल अमीर हैं बल्कि राजधानी में कहीं भी जमीन खरीदने का माहदा रखते हैं।डॉ. कमलेश्वर अग्रवाल और डॉ. खेमका को कौड़ियों के मोल दी गई जमीनों को लेकर सरकार पर यह आरोप लगे कि इस सरकार ने गरीबों को 1 रुपया किलो चावल योजना सिर्फ इसलिए चलाया ताकि अमीरों को एक रुपया फीट जमीन देने का आरोप न लगे तो अतिशंयोक्ति नहीं होगी। डॉ. कमलेश्वर अग्रवाल को इस शहर में कौन नहीं जानता। भाजपा के नेता गौरीशंकर अग्रवाल के रिश्तेदार हैं इसी तरह डॉ. खेमका भी दमदार मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के भाई के रिश्तेदार हैं। शहर में अखबारों को भी बेशकीमती जमीनें राय सरकारों के द्वारा इसलिए कौड़ियों के मोल जमीनें दी जाती है ताकि स्वयं के पार्टी कार्यालय के लिए जमीनें ली जा सकें? और सरकारी जमीनों का बंदरबांट किया जा सके। शहर यातायात समस्या से जूझ रहा है। जीई रोड के पेट्रोल पम्प को हटाने जमीनें दी जा चुकी है लेकिन इन किमती जमीनों से कोई हटने तैयार नहीं है। सरेआम भू-उपयोग बदलकर पम्प की जमीन पर होटल बन गए और सरकार चोर-चोर मौसेरे भाई की तर्ज पर काम कर रही है। जबकि जनहित में ऐसे घने आबादी क्षेत्र की लीज रद्द कर पार्किंग की व्यवस्था की जा सकती है। लेकिन सरकार भी जानती है कि आम आदमी कभी नहीं बोलेगा और चोर-चोर मौसेरे भाई है इसलिए ऐसे मुद्दे कांग्रेस भी नहीं उठाएगी?
गुरुवार, 30 सितंबर 2010
डॉ. रमन साहब विकास कहां हुआ है...
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह यह कहते नहीं थकते कि उनके कार्यकाल में छत्तीसगढ़ का विकास हुआ है। दस साल छत्तीसगढ़ के निर्माण को हो गए इनमें से 7 साल से डॉ. रमन सिंह सत्ता में हैं। अजीत जोगी तो अपने तीन सालों के कार्यकाल को विकास की बुनियाद रखने की बात कहते हुए जिम्मेदारी से मुक्त होने की कोशिश करते हैं लेकिन डॉ. रमन का दावा कितना सार्थक है यह अब देखने की जरूरत है। वे कांग्रेस के 50 बनाम 5 से तुलना कर 'बेटर देन' की बात तो करते हैं लेकिन बेटर देन के चक्कर में 'गुड' कहीं नहीं है। सब तरफ भ्रष्टाचार की गंगोत्री बह रही है। अमीरों को अधिकाधिक सुविधा दिए जा रहे हैं। अपनी सुविधा बढ़ाने की कोशिश में पूरी सरकार और विपक्ष ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है लेकिन डॉ. रमन सिंह के इस सात सालों में आम आदमी को क्या मिला है?
बिसलरी से लेकर एक्वागार्ड का पानी पीने वाले इस सरकार के मंत्री से लेकर अधिकारियों ने क्या कभी सोचा है कि छत्तीसगढ़ के गांवों के लोगों को पीने का साफ पानी और सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध करा दें। शायद नहीं। डॉ. रमन सिंह ने यदि सात सालों में विकास का दावा किया है तो वे क्या बता पाएंगे कि इन वर्षों में कितने गांव में पीने का साफ पानी उपलब्ध कराया गया है या कितने गांवों के खेतों में पानी पहुंचाने की व्यवस्था की गई है। हमारा दावा है कि इसका जवाब ही सरकार के पास नहीं है। इसी तरह इन 7 वर्षों में कितने गांवों में चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई गई है। शिक्षा का तो भगवान ही मालिक है। आज भी छत्तीसगढ़ के ऐसे कई गांव है जहां के मीडिल और हाई स्कूल के छात्रों को कई किलोमीटर चलकर स्कूल जाना पड़ता है? जब गांव में पीने और सिंचाई का पानी हैं, चिकित्सा सुविधा नहीं है शिक्षा तक नहीं दिया जा रहा है तब सरकार के विकास का दावा कितना उचित है। जिस दिन सरकार छत्तीसगढ में यह बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करा देगी तब विकास की बात की जानी चाहिए। ऐसे में किसी भी सरकार को विकास का दावा नहीं करना चाहिए।
दरअसल डॉ. रमन सिंह ने विकास के दूसरे मायने ही निकाल रखा है। भारी भ्रष्टाचार आज सरकार की प्राथमिकता हो गई है। भ्रष्ट अधिकारियों की फौज करना उसकी आदत हो गई है। तभी तो बाबूलाल अग्रवाल जैसे आईएएस की बहाली हो जाती है। नारायण सिंह जैसे सजायाफ्ता आईएएस को प्रमोशन देने पूरा मंत्रिमंडल जुट जाता है और बाल्को जैसे अवैध कब्जाधारियों को पट्टा देने पूरी सरकार लग जाती है।
बिसलरी से लेकर एक्वागार्ड का पानी पीने वाले इस सरकार के मंत्री से लेकर अधिकारियों ने क्या कभी सोचा है कि छत्तीसगढ़ के गांवों के लोगों को पीने का साफ पानी और सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध करा दें। शायद नहीं। डॉ. रमन सिंह ने यदि सात सालों में विकास का दावा किया है तो वे क्या बता पाएंगे कि इन वर्षों में कितने गांव में पीने का साफ पानी उपलब्ध कराया गया है या कितने गांवों के खेतों में पानी पहुंचाने की व्यवस्था की गई है। हमारा दावा है कि इसका जवाब ही सरकार के पास नहीं है। इसी तरह इन 7 वर्षों में कितने गांवों में चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई गई है। शिक्षा का तो भगवान ही मालिक है। आज भी छत्तीसगढ़ के ऐसे कई गांव है जहां के मीडिल और हाई स्कूल के छात्रों को कई किलोमीटर चलकर स्कूल जाना पड़ता है? जब गांव में पीने और सिंचाई का पानी हैं, चिकित्सा सुविधा नहीं है शिक्षा तक नहीं दिया जा रहा है तब सरकार के विकास का दावा कितना उचित है। जिस दिन सरकार छत्तीसगढ में यह बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करा देगी तब विकास की बात की जानी चाहिए। ऐसे में किसी भी सरकार को विकास का दावा नहीं करना चाहिए।
दरअसल डॉ. रमन सिंह ने विकास के दूसरे मायने ही निकाल रखा है। भारी भ्रष्टाचार आज सरकार की प्राथमिकता हो गई है। भ्रष्ट अधिकारियों की फौज करना उसकी आदत हो गई है। तभी तो बाबूलाल अग्रवाल जैसे आईएएस की बहाली हो जाती है। नारायण सिंह जैसे सजायाफ्ता आईएएस को प्रमोशन देने पूरा मंत्रिमंडल जुट जाता है और बाल्को जैसे अवैध कब्जाधारियों को पट्टा देने पूरी सरकार लग जाती है।
उद्योगों को जमीन देने किसानों से जबरिया अधिग्रहण कराया जाता है और अपने ऐशो आराम के लिए नई राजधानी में सारे संसाधन जुटाये जाते हैं और कोई सरकार यह नहीं कहती कि नई राजधानी इसलिए बनाए जा रहे हैं ताकि अपने लिए ऐशोआराम के साधन जुटाए जाए बल्कि सरकार यह कहती है कि वह दुनिया में छत्तीसगढ क़ा नाम रोशन करने नई राजधानी में अरबों खरबों खर्च कर रहे हैं। जिस प्रदेश के आम लोगों को पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा उपलब्ध नहीं हो रहा हो वहां अरबों-खरबों की राजधानी बने और भ्रष्टाचार की गंगोत्री बहे वहां बजट का रोना घड़ियाली आंसू के सिवाय कुछ नहीं है।
लेबल:
नई आजादी,
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह
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