इन दिनों शहर के प्रतिष्ठित अखबारों के कर्मचारियों में कालम राईटर बनने की होड़ मची हुई है। ऐसा ही एक कर्मचारी इन दिनों कालम लिखने लगे हैं। सूर्या का वॉट लगाकर हकीकत का चोला पहनने वाले की हकीकत अब राजधानी में भी चर्चा का सबब बनने लगी है। गबन तो नाम के अनुरूप ही सब कर रहे थे लेकिन धमकाकर पैसा वसूलने और विज्ञापन छपवाने मजबूर करने की कहानी को अब तक इसके मालिकों ने क्यों नहीं सुनी। यह तो वही जाने। लेकिन यह चर्चा जोरों पर है कि दूध देने वाली गाय की लात भी अच्छी लगती है। इस बीच इसके द्वारा रायपुर संस्करण को ठेका में लिए जाने का दावा है हकीकत तो मालिक ही जाने।
फिर रिपोर्टर फायदे में फोटोग्राफरों में असंतोष
सलीम अशरफी ने वक्फ बोर्ड का चेयरमेन बनाते ही ख़ुशी मनाई और कवरेज के लिए पहुंचे मिडिया कर्मियों को पांच-पांच सौ दिए फोटोग्राफर खुश थे किचलो कोई तो है जो दोनों को सामान समझता है लेकिन प्रेस जाते ही उनकी हवा निकल गई क्योकि रिपोर्टरों को विज्ञापन भी दिया गया था जिसका कमीशन ही हजारो बनता है लेकिन बेचारे कर क्या सकते है .
पत्रिका के गिलास का
जवाब क्राकरी से
राजस्थान पत्रिका के आने की चर्चा से नवभारत की बाल्टी तो सभी जानते हैं लेकिन नेशनल लुक भी अपने अस्तित्व को बचाने छटपटाना शुरु कर दिया है। दरअसल पत्रिका के द्वारा कांच का गिलास गिफ्ट करना कई को अपने अस्तित्व पर हमला नजर आने लगा है। नेशनल लुक भी अपना प्रसार बढ़ाने बाल्टी के अलावा क्रॉकरी सेट का लालच देने लगा है।
प्रदीप की वापसी तो
कई हुई इधर-उधर
फोटोग्राफी में नाम कमा चुके प्रदीप डडसेना की लम्बे समय बाद हरिभूमि में वापसी हो गई है इतने दिनों तक प्रदीप जी क्या कर रहे थे उन्हीं से लोग पूछ ले तो बेहतर होगा। इधर पत्रिका की आमद से पत्रकारों का भाव बढ़ गया है और भाव तभी बढ़ेगा जब वे इधर से उधर जाएंगे। ऐसे ही वरुण झा हरिभूमि से भास्कर चले गए तो सोनू पाण्डे ने इसे बैलेंस कर दिया। तो शशांक खरे को भास्कर रास आने लगा है।
और अंत में....
रजबंधा मैदान में सरकारी जमीन पर बनाए भवन में समवेत शिखर शिफ्ट हो रहा है मशीन भी लग गई है अब वे उस इंजीनियर को कोस रहे हैं जिन्होंने मशीन रुम तो बना दिया लेकिन कागज का रोल मशीन तक पहुंचाने में दिक्कत हो रही है और जब तक रोल नहीं पहुंचेगा अखबार कैसे छपेगा।
http://midiaparmidiaa.blogspot.in/
शनिवार, 31 जुलाई 2010
अछ्छा जीवन सभी का हक़
दलितों, पिछड़ों एवं कमजोर वर्गो को आरक्षण सर्वप्रथम 26 जुलाई 1902 को कोल्हापुर नरेश छत्रपति शाहूजी महाराज ने देना शुरू किया। शाहूजी ने आरक्षण विरोधियों के सामने आरक्षण का औचित्य एक उदाहरण द्वारा सिद्ब किया। आज के लोकतांत्रिक भारत में जहां हर नागरिक को बराबर अधिकार दिये गये हैं। हजारों वर्षो से शोषित और पिछाड़े गये वर्गो के विकास और उत्थान हेतु आवश्यक कदम उठाना वक्त की जरूरत है। यदि ये आरक्षण का लाभ लेकर आगे बढ़ते हैं तो देश आगे बढ़ेगा। आखिर अच्छा जीवन स्तर जीना सभी का हक है।
धमतरी जिला के पुलिस अधीक्षक श्री शेख आरिफ हुसान ने मुख्य अतिथि के रुप में आरक्षण के जनक एवं समानता के प्णेता कोल्हापुर के मराठा नरेश राजर्षि छत्रपति साहू जी महाराज की जयंती के शुभावसर पर भारतीय दलित साहित्य अकादमी के छत्तीसगढ़ राय स्तरीय गौरवपूर्ण सम्मेलन में पधारे साहित्यकारों,पत्रकारों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए ये शब्द कहे । सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए युवा समाजवीर श्री दिग्विजय सिंह कृदत्त ने शाहूजी महाराज के आदर्शो,कार्यो की प्वलित योति को वाला बनाने पर बल दिया। विशिष्ट अतिथि द्वय श्री पी. एसोब (आंध्प्देश) एवं श्री उधोराम चंदनिहा (पोंड़-पाण्डुका) ने भी सम्बोधित किया।
उस अवसर पर शैक्षणिक, साहित्यिक व सामीजिक क्षेत्रों में विशिष्ट अवेदन के लिए श्रीमती चन्दि्का देवी देशलहरे, कांशीराम गायकवाड़, जेशू चन्द् सिंह, मनीराम पंकज, जगमोहन सिंह पैकरा, जनाब मोहम्मद हनीफ साकरीया, विनोद कुमार सिन्हा शमभूराम साहू, आर.डी.क्षीरसागर, पियुषकांत सिंघम, पूर्णेन्द् कुमार साहू, भुनेश्वर प्साद कुर्रे, कृष्णदत्त उपाध्याय, बी. एस. रावटे, शोभाराम बघेल, बालाराम सिन्हा, अलखराम यादव, राजा राम पटेल, सतीश चन्द्ाकर, सखाराम साहू, संतराम देवांगन, श्रीमती गुलाब विश्वकर्मा, रविन्द् बंनजारे, भगवान सिह साहू एन.पी. जोशी, डोमार सिंह साहू संवलराम
साहू, भुनेश्वर प्साद साहू, रामेश्वर सिंग सूर्यवंशी, सम्पत राम सारथी, श्रीमती गुलाब विश्वकर्मा ,रविन्द् बंजारे, भगवान सिंह साहू, एन.पी. जोशी,डोमार सिंह साहू, कंवलराम साहू, भुनेश्वर प्साद साहू, रामेश्वर सिंग सूर्यवंशी, सम्पत राम सारथी, श्रीमती नजमा खॉ, आर.मुत्थुस्वामी, बुद्बप्काश गायकवाड़, बृदावन यादव, कौषल प्साद साहू, तल्लीनपुरी गोस्वामी मोहनलाल सोनवानी एवं गुहाराम लहरे को प्ाईड ऑफ नेशन नेशनल अवार्ड-2010 से सम्मनित किया गया।
इसके अलावा दलित पिछड़े समाज के प्तिभावान छात्र छात्राओं-कु. किरण यादव कु. मधु चौहान, कु.गौरी चोपड़ा, कु. वीणाा वाल्मिकी, कु. सुभाषनी बंजारे, धर्मेद् गहरवार, अमित नागेश एवं अमित कुमार रामटेके को रजत पदक (चांदी का मैडल) व पाठय सामग्ी प्दान कर सम्मानित किया गया। अनुसूचित जाति विकास परिषद जिला धमतरी के सौजन्य से कु.आकांक्षा भारती, क. द्ोपती जोशी, कु. गायत्री धीवर, कु. सीमा सोनकर, कु.गणेशी धु्व, कु. ओमप्भा, कु. भगवती को स्कूल बैग, कापी, पेन प्दान किया गया।
कार्यक् म का सफल संचालन अकादमी के प्देशाध्यक्ष जी.आर. बंजारे वाला ने किया। कार्यक्म का शुभारंभ बैण्ड बाजे के रार्ष्ट्रीय गान के साथ हुआ। केकचंद बधेल, बुटुराम पूर्णे, नम्मूराम भोजवानी,आर. मुत्थुस्वामी प्ेम नजीर के द्वारा कविता पाठ प्स्तुत किया गया। प्ो.के. मुरारीदास, प्ेमलाल कुर्रे, प्काश सिंह बादल, भागचंद नागेश, पं.देवीदत्त उपाध्याय, डामनलाल सोनवानी, रांलाल रामटेके, शेखरलाल गहरवार सोमन ध्ुव, प्मोद यादव (शाबास इंडिया फेम) ने अतिथियों का पुष्पहार से स्वागत किया। कार्यक्रम के अंत में अकादमी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष श्री बद्रीप्रसाद गंगवीर के जन्म दिवस पर केक काटा गया।
इस अवसर पर तुलसीराम गहरवार, प्रेम सायमन, सी.एल. बंजारे, संतु यादव, अशोक टंडन, किशुन डांडे, अनिल बनारसी, पप्पू यादव ,दीपक सार्वा, महेश सिन्हा, उगेशराम बंसारे,श्रीमती सुमित्रा गंगवीर, श्रीमती सुशीला देवी वाल्मिकी, श्रीमती जे.उपाध्याय, प्रिती मेश्राम, सावित्री साहू, सरोज चौहान, नारायण राव शिन्दे, सूरज प्रसाद गुप्ता, दुष्यंत घोरपड़े, सोहनलाल डहरिया, मेहत्तर राम खापडर्े, श्रीराम डहरिया, फणेन्द्र कुमार साहू, एच.पी. देवांगन, शिवनारायण सोनी, कार्तिक राम पटेल, ललित साहू, टी.डी. सोनवानी, रमेश भालाधरे, एस.एल. कलिहारी, बी.आर. खोब्रागढ़े, बी.पी. वर्मा, रवि कुमार गंगवीर, श्वेता गंगवीर, जयंत कुमार, विश्वनाथ साहू, नसीमा, ममता देवांगन, विशाल सिंह ठाकुर, अमरदास बंजारे, सुशील बंजारे, विकास कुमार, सीमा गंगवीर, कु. भारती सोनवानी, श्यामलाल, दिलीप नाग, मुकेश प्रधान, त्रयम्बक हड़वदिया आदि लोगों की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।
इस अवसर पर अकादमी के छत्तीसगढ़ प्रदेश शाखा की ओर से परम्परागत् टोपी (नीली पगड़ी) व शाल पहनाकर मुख्य अतिथि श्री शेख आरिफ हुसैन का आत्मीय अभिनंदन किया गया।
धमतरी जिला के पुलिस अधीक्षक श्री शेख आरिफ हुसान ने मुख्य अतिथि के रुप में आरक्षण के जनक एवं समानता के प्णेता कोल्हापुर के मराठा नरेश राजर्षि छत्रपति साहू जी महाराज की जयंती के शुभावसर पर भारतीय दलित साहित्य अकादमी के छत्तीसगढ़ राय स्तरीय गौरवपूर्ण सम्मेलन में पधारे साहित्यकारों,पत्रकारों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए ये शब्द कहे । सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए युवा समाजवीर श्री दिग्विजय सिंह कृदत्त ने शाहूजी महाराज के आदर्शो,कार्यो की प्वलित योति को वाला बनाने पर बल दिया। विशिष्ट अतिथि द्वय श्री पी. एसोब (आंध्प्देश) एवं श्री उधोराम चंदनिहा (पोंड़-पाण्डुका) ने भी सम्बोधित किया।
उस अवसर पर शैक्षणिक, साहित्यिक व सामीजिक क्षेत्रों में विशिष्ट अवेदन के लिए श्रीमती चन्दि्का देवी देशलहरे, कांशीराम गायकवाड़, जेशू चन्द् सिंह, मनीराम पंकज, जगमोहन सिंह पैकरा, जनाब मोहम्मद हनीफ साकरीया, विनोद कुमार सिन्हा शमभूराम साहू, आर.डी.क्षीरसागर, पियुषकांत सिंघम, पूर्णेन्द् कुमार साहू, भुनेश्वर प्साद कुर्रे, कृष्णदत्त उपाध्याय, बी. एस. रावटे, शोभाराम बघेल, बालाराम सिन्हा, अलखराम यादव, राजा राम पटेल, सतीश चन्द्ाकर, सखाराम साहू, संतराम देवांगन, श्रीमती गुलाब विश्वकर्मा, रविन्द् बंनजारे, भगवान सिह साहू एन.पी. जोशी, डोमार सिंह साहू संवलराम
साहू, भुनेश्वर प्साद साहू, रामेश्वर सिंग सूर्यवंशी, सम्पत राम सारथी, श्रीमती गुलाब विश्वकर्मा ,रविन्द् बंजारे, भगवान सिंह साहू, एन.पी. जोशी,डोमार सिंह साहू, कंवलराम साहू, भुनेश्वर प्साद साहू, रामेश्वर सिंग सूर्यवंशी, सम्पत राम सारथी, श्रीमती नजमा खॉ, आर.मुत्थुस्वामी, बुद्बप्काश गायकवाड़, बृदावन यादव, कौषल प्साद साहू, तल्लीनपुरी गोस्वामी मोहनलाल सोनवानी एवं गुहाराम लहरे को प्ाईड ऑफ नेशन नेशनल अवार्ड-2010 से सम्मनित किया गया।
इसके अलावा दलित पिछड़े समाज के प्तिभावान छात्र छात्राओं-कु. किरण यादव कु. मधु चौहान, कु.गौरी चोपड़ा, कु. वीणाा वाल्मिकी, कु. सुभाषनी बंजारे, धर्मेद् गहरवार, अमित नागेश एवं अमित कुमार रामटेके को रजत पदक (चांदी का मैडल) व पाठय सामग्ी प्दान कर सम्मानित किया गया। अनुसूचित जाति विकास परिषद जिला धमतरी के सौजन्य से कु.आकांक्षा भारती, क. द्ोपती जोशी, कु. गायत्री धीवर, कु. सीमा सोनकर, कु.गणेशी धु्व, कु. ओमप्भा, कु. भगवती को स्कूल बैग, कापी, पेन प्दान किया गया।
कार्यक् म का सफल संचालन अकादमी के प्देशाध्यक्ष जी.आर. बंजारे वाला ने किया। कार्यक्म का शुभारंभ बैण्ड बाजे के रार्ष्ट्रीय गान के साथ हुआ। केकचंद बधेल, बुटुराम पूर्णे, नम्मूराम भोजवानी,आर. मुत्थुस्वामी प्ेम नजीर के द्वारा कविता पाठ प्स्तुत किया गया। प्ो.के. मुरारीदास, प्ेमलाल कुर्रे, प्काश सिंह बादल, भागचंद नागेश, पं.देवीदत्त उपाध्याय, डामनलाल सोनवानी, रांलाल रामटेके, शेखरलाल गहरवार सोमन ध्ुव, प्मोद यादव (शाबास इंडिया फेम) ने अतिथियों का पुष्पहार से स्वागत किया। कार्यक्रम के अंत में अकादमी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष श्री बद्रीप्रसाद गंगवीर के जन्म दिवस पर केक काटा गया।
इस अवसर पर तुलसीराम गहरवार, प्रेम सायमन, सी.एल. बंजारे, संतु यादव, अशोक टंडन, किशुन डांडे, अनिल बनारसी, पप्पू यादव ,दीपक सार्वा, महेश सिन्हा, उगेशराम बंसारे,श्रीमती सुमित्रा गंगवीर, श्रीमती सुशीला देवी वाल्मिकी, श्रीमती जे.उपाध्याय, प्रिती मेश्राम, सावित्री साहू, सरोज चौहान, नारायण राव शिन्दे, सूरज प्रसाद गुप्ता, दुष्यंत घोरपड़े, सोहनलाल डहरिया, मेहत्तर राम खापडर्े, श्रीराम डहरिया, फणेन्द्र कुमार साहू, एच.पी. देवांगन, शिवनारायण सोनी, कार्तिक राम पटेल, ललित साहू, टी.डी. सोनवानी, रमेश भालाधरे, एस.एल. कलिहारी, बी.आर. खोब्रागढ़े, बी.पी. वर्मा, रवि कुमार गंगवीर, श्वेता गंगवीर, जयंत कुमार, विश्वनाथ साहू, नसीमा, ममता देवांगन, विशाल सिंह ठाकुर, अमरदास बंजारे, सुशील बंजारे, विकास कुमार, सीमा गंगवीर, कु. भारती सोनवानी, श्यामलाल, दिलीप नाग, मुकेश प्रधान, त्रयम्बक हड़वदिया आदि लोगों की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।
इस अवसर पर अकादमी के छत्तीसगढ़ प्रदेश शाखा की ओर से परम्परागत् टोपी (नीली पगड़ी) व शाल पहनाकर मुख्य अतिथि श्री शेख आरिफ हुसैन का आत्मीय अभिनंदन किया गया।
शुक्रवार, 30 जुलाई 2010
अतिक्रमण तोड़ने का आदेश निकल गया लेकिन मंत्री ने रुकवा दी...
तालाब पर हुआ है अतिक्रमण
छत्तीसगढ़ सरकार के मंत्रियों की करतूतें थमने का नाम नहीं ले रहा है। एक तरफ मुख्यमंत्री पानी बचाने आंदोलन का आगुआ बने हैं दूसरी तरफ उन्हीं के मंत्री तालाब पाटने वाले को बचा रहे हैं। मामला सरजूबांधा तालाब पाटने का है। इस पर हुए अतिक्रमण को तोड़ने का आदेश तक हो गया है लेकिन अतिक्रमणकारी नवल किशोर अग्रवाल की पहुंच दमदार मंत्री तक है इसलिए निगम भी हाथ पर हाथ धरे बैठा है।
प्राप्त जानकारी के मुताबिक लोहार चौक निवासी नवल किशोर अग्रवाल के द्वारा टिकरापारा स्थित सरयूबांधा तालाब में कब्जा किया है। इनके द्वारा यहां किए लम्बे चौड़े कब्जे में प्रिटिंग प्रेस चलाने की भी खबर है। बताया जाता है कि जब इसकी खबर पार्षद सतनाम सिंह को हुई और लोगों ने पार्षद से शिकायत करते हुए कार्रवाई की मांग की तो पार्षद ने इसकी शिकायत निगम आयुक्त से की।
इधर इस मामले में जोन 6 के तत्कालीन कमिश्नर ने 1 जून 2010 को पुलिस अधीक्षक को पत्र लिखकर नवल किशोर अग्रवाल के कब्जे को हटाने पुलिस बल की मांग की। बताया जाता है कि जैसे ही अतिक्रमण हटाने की जानकारी नवल किशोर अग्रवाल को हुई उन्होंने दमदार मंत्री से एप्रोच किया और बताया जाता है कि दमदार मंत्री ने न केवल जोन कमिश्नर को हड़काया बल्कि पुलिस को भी फोन कर बल नहीं उपलब्ध कराने कह दिया।
इधर विभागीय मंत्री से भी नवलकिशोर अग्रवाल के संबंध की चर्चा है और लेन देन की चर्चा के बीच यह भी चर्चा है कि निगम ने अब इस अतिक्रमण को हटाने से पल्ला झाड़ लिया है। बताया जाता है कि इस मामले को लेकर टिकरापारा में जबरदस्त आक्रोश है। एक तरफ प्रदेश के मुखिया पानी बचाने की नाटकबाजी में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं शिवनाथ नदी का इंजीनियर की तरह हवाई सर्वेक्षण में लाखों रुपए फूंके जा रहे हैं और दूसरी तरफ राजधानी में तालाब पाटने में मंत्रियों की रूचि है। ज्ञात हो कि आमापारा स्थित कारी तााब को भी इसी दमदार मंत्री की वजह से पाटा जा रहा है जबकि तेलीबांधा से लेकर पुरानीबस्ती के तालाबों पर अतिक्रमण की अपनी कहानी है।
बहरहाल सरयूबांधा तालाब के कब्जे हटाने का मामला पूरे शहर में चर्चा का विषय है। चर्चा यह भी है कि मुख्यमंत्री पानी बचाने के लिए भाषणबाजी बंद कर अपने मंत्रियों की करतूतों पर लगाम लगाए तो राजधानी के कई तालाब व बगीचे बच सकते हैं।
छत्तीसगढ़ सरकार के मंत्रियों की करतूतें थमने का नाम नहीं ले रहा है। एक तरफ मुख्यमंत्री पानी बचाने आंदोलन का आगुआ बने हैं दूसरी तरफ उन्हीं के मंत्री तालाब पाटने वाले को बचा रहे हैं। मामला सरजूबांधा तालाब पाटने का है। इस पर हुए अतिक्रमण को तोड़ने का आदेश तक हो गया है लेकिन अतिक्रमणकारी नवल किशोर अग्रवाल की पहुंच दमदार मंत्री तक है इसलिए निगम भी हाथ पर हाथ धरे बैठा है।
प्राप्त जानकारी के मुताबिक लोहार चौक निवासी नवल किशोर अग्रवाल के द्वारा टिकरापारा स्थित सरयूबांधा तालाब में कब्जा किया है। इनके द्वारा यहां किए लम्बे चौड़े कब्जे में प्रिटिंग प्रेस चलाने की भी खबर है। बताया जाता है कि जब इसकी खबर पार्षद सतनाम सिंह को हुई और लोगों ने पार्षद से शिकायत करते हुए कार्रवाई की मांग की तो पार्षद ने इसकी शिकायत निगम आयुक्त से की।
इधर इस मामले में जोन 6 के तत्कालीन कमिश्नर ने 1 जून 2010 को पुलिस अधीक्षक को पत्र लिखकर नवल किशोर अग्रवाल के कब्जे को हटाने पुलिस बल की मांग की। बताया जाता है कि जैसे ही अतिक्रमण हटाने की जानकारी नवल किशोर अग्रवाल को हुई उन्होंने दमदार मंत्री से एप्रोच किया और बताया जाता है कि दमदार मंत्री ने न केवल जोन कमिश्नर को हड़काया बल्कि पुलिस को भी फोन कर बल नहीं उपलब्ध कराने कह दिया।
इधर विभागीय मंत्री से भी नवलकिशोर अग्रवाल के संबंध की चर्चा है और लेन देन की चर्चा के बीच यह भी चर्चा है कि निगम ने अब इस अतिक्रमण को हटाने से पल्ला झाड़ लिया है। बताया जाता है कि इस मामले को लेकर टिकरापारा में जबरदस्त आक्रोश है। एक तरफ प्रदेश के मुखिया पानी बचाने की नाटकबाजी में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं शिवनाथ नदी का इंजीनियर की तरह हवाई सर्वेक्षण में लाखों रुपए फूंके जा रहे हैं और दूसरी तरफ राजधानी में तालाब पाटने में मंत्रियों की रूचि है। ज्ञात हो कि आमापारा स्थित कारी तााब को भी इसी दमदार मंत्री की वजह से पाटा जा रहा है जबकि तेलीबांधा से लेकर पुरानीबस्ती के तालाबों पर अतिक्रमण की अपनी कहानी है।
बहरहाल सरयूबांधा तालाब के कब्जे हटाने का मामला पूरे शहर में चर्चा का विषय है। चर्चा यह भी है कि मुख्यमंत्री पानी बचाने के लिए भाषणबाजी बंद कर अपने मंत्रियों की करतूतों पर लगाम लगाए तो राजधानी के कई तालाब व बगीचे बच सकते हैं।
गुरुवार, 29 जुलाई 2010
गणित वालों को भी कम्पाउण्डर बना दिया
बाबूलाल अग्रवाल जब सचिव थे
जब बाबूलाल अग्रवाल स्वास्थ्य सचिव थे उन दिनों सीएमओ रही डॉ. किरण मल्होत्रा के कार्यकाल में हुई घपलेबाजी परत दर परत खुलने लगे हैं। पैसा लेकर ऐसे 10 लोगों को कम्पाउण्डर बना दिया जो गणित संकाय के थे। जबकि विज्ञापन में बायो संकाय मांगा गया था।
आम लोगों के जीवन की देखरेख के लिए बने स्वास्थ्य विभाग में रमन सरकार की क्या मंशा रही है यह साफ तौर पर यहां हुई घपलेबाजी की परतें खुलने से सामने आने लगी है। स्वास्थ्य जैसे गंभीर विभाग में यह घपलेबाजी तब हुई जब वे व्यक्ति स्वास्थ्य सचिव थे जिन्हें सरकार ने आयकर विभाग के छापे के बाद बहाली में एक मिनट की भी देर नहीं की।
इस बार जो मामला सामने आया है वह विभाग द्वारा कम्पाउण्डर (फार्मेसिस्ट) के पदों पर भर्ती का है। वैसे तो यहां संविदा नियुक्ति से लेकर अनुकम्पा नियुक्तियां तक पैसे लिए बिना नहीं की जाती। बताया जाता है कि जब डॉ. किरण मल्होत्रा सीएमओ थी तब फार्मेसिस्ट में भर्ती का विज्ञापन निकाला गया था। विज्ञापन में जो शर्ते थी उसके मुताबिक बायोलॉजी के विद्यार्थी ही इसके लिए पात्र हो सकते थे लेकिन कहा जा रहा है कि जब नियुक्तियां दी गई तो 10 ऐसे लोगों को नौकरी दी गई जो गणित संकाय से थे। मामले की तब शिकायत भी हुई लेकिन उच्चस्तरीय लेन-देन कर मामला दबा लिया गया। एक बार यह मामला फिर खुलने लगा है और शीघ्र ही जांच कमेटी बनाए जाने की चर्चा है।
वैसे कर्मचारियों का कहना है कि यदि यहां की जांच करानी है तो उच्च स्तरीय कमेटी बनानी चाहिए जो सचिव बाबूलाल अग्रवाल और डॉ. किरण मल्होत्रा के कार्यकाल की जांच करें। कर्मचारियों का दावा है कि यदि इन दोनों अधिकारियों के कार्यकाल की जांच हुई तो कई लोग जेल के सलाखों के पीछे जाएंगे। शायद यही वजह है कि हर बार जांच की मांग तो होती है लेकिन पूरे मामले को दबा दिया जाता है। बहरहाल स्वास्थ्य विभाग के घपले परत दर परत खुलते जा रहे हैं और सरकार की इस ओर अनदेखी को लेकर आम लोगों में बेहद तीखी प्रतिक्रिया है।
जब बाबूलाल अग्रवाल स्वास्थ्य सचिव थे उन दिनों सीएमओ रही डॉ. किरण मल्होत्रा के कार्यकाल में हुई घपलेबाजी परत दर परत खुलने लगे हैं। पैसा लेकर ऐसे 10 लोगों को कम्पाउण्डर बना दिया जो गणित संकाय के थे। जबकि विज्ञापन में बायो संकाय मांगा गया था।
आम लोगों के जीवन की देखरेख के लिए बने स्वास्थ्य विभाग में रमन सरकार की क्या मंशा रही है यह साफ तौर पर यहां हुई घपलेबाजी की परतें खुलने से सामने आने लगी है। स्वास्थ्य जैसे गंभीर विभाग में यह घपलेबाजी तब हुई जब वे व्यक्ति स्वास्थ्य सचिव थे जिन्हें सरकार ने आयकर विभाग के छापे के बाद बहाली में एक मिनट की भी देर नहीं की।
इस बार जो मामला सामने आया है वह विभाग द्वारा कम्पाउण्डर (फार्मेसिस्ट) के पदों पर भर्ती का है। वैसे तो यहां संविदा नियुक्ति से लेकर अनुकम्पा नियुक्तियां तक पैसे लिए बिना नहीं की जाती। बताया जाता है कि जब डॉ. किरण मल्होत्रा सीएमओ थी तब फार्मेसिस्ट में भर्ती का विज्ञापन निकाला गया था। विज्ञापन में जो शर्ते थी उसके मुताबिक बायोलॉजी के विद्यार्थी ही इसके लिए पात्र हो सकते थे लेकिन कहा जा रहा है कि जब नियुक्तियां दी गई तो 10 ऐसे लोगों को नौकरी दी गई जो गणित संकाय से थे। मामले की तब शिकायत भी हुई लेकिन उच्चस्तरीय लेन-देन कर मामला दबा लिया गया। एक बार यह मामला फिर खुलने लगा है और शीघ्र ही जांच कमेटी बनाए जाने की चर्चा है।
वैसे कर्मचारियों का कहना है कि यदि यहां की जांच करानी है तो उच्च स्तरीय कमेटी बनानी चाहिए जो सचिव बाबूलाल अग्रवाल और डॉ. किरण मल्होत्रा के कार्यकाल की जांच करें। कर्मचारियों का दावा है कि यदि इन दोनों अधिकारियों के कार्यकाल की जांच हुई तो कई लोग जेल के सलाखों के पीछे जाएंगे। शायद यही वजह है कि हर बार जांच की मांग तो होती है लेकिन पूरे मामले को दबा दिया जाता है। बहरहाल स्वास्थ्य विभाग के घपले परत दर परत खुलते जा रहे हैं और सरकार की इस ओर अनदेखी को लेकर आम लोगों में बेहद तीखी प्रतिक्रिया है।
बुधवार, 28 जुलाई 2010
सजायाफ्ता को बर्खास्त करने की बजाय बहाल कर दिया

ऐसी दमदारी तो सिर्फ
बृजमोहन के विभाग में ही
ऐसी दमदारी तो प्रदेश के दमदार माने जाने वाले मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के विभाग में ही हो सकती है। जिस व्यक्ति को घूस लेने के आरोप में सजा सुनाई गई हो उसे बर्खास्त करने की बजाय शिक्षा विभाग ने बहाल कर दिया और अब जब मामला मुख्यमंत्री के जिले का हो तो क्या कहना।
मामला जिला शिक्षा अधिकारी के पद पर कवर्धा में रहे नेतराम वर्मा का है। नेतराम वर्मा को एंटी करप्शन ब्यूरो ने 31 जुलाई 2001 को दो हजार रुपए रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार किया था। नेतराम वर्मा ने नरेन्द्र कुमार मिश्रा को पदोन्नति देने पैसे की मांग की थी।
इस मामले में 21 जुलाई 2008 को कवर्धा के विशेष न्यायाधीश ने नेतराम वर्मा को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की अलग-अलग घटनाओं के तहत दोषी पाते हुए क्रमश: 6 माह और एक साल के सश्रम कारावास और दस हजार रुपए की सजा सुनाई थी। यह सजा साथ-साथ चलना था। सजा के बाद एंटी करप्शन ब्यूरों ने शिक्षा विभाग को पत्र लिखकर नेतराम वर्मा को बर्खास्त करने की गुजारिश की।
आश्चर्य का विषय तो यह है कि शिक्षा विभाग ने इस घूसखोर अधिकारी को बर्खास्त करने की बजाय इन्हें कोरिया जिले में प्राचार्य बना दिया। इस संबंध में जब संचालक लोक शिक्षण संचालनालय के.आर. पिस्दा से बात की तो उन्होंने कहा कि उनकी बहाली का निर्णय शासन स्तर पर किया गया है। इस संबंध में जब पतासाजी की तो विभाग में उच्च स्तर पर लेन-देन की चर्चा सामने आई और मंत्री पर भी आरोप लगाए गए।
दुनिया में अपनी तरह का मिसाल कायम करने वाले इस कारनामें से शिक्षा जैसे पवित्र संस्थानों की स्थिति का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। इस मामले में मंत्री बृजमोहन अग्रवाल से संपर्क की कोशिश की गई लेकिन वे उपलब्ध नहीं थे।
मंगलवार, 27 जुलाई 2010
मत्स्य में भी चम्पू की चौधराहट

हाईकोर्ट द्वारा खारिज करने के बाद भी पदोन्नति दी जा रही
यह सरकार की मनमानी है या विभागीय मंत्री चन्द्रशेखर साहू का दंभ यह तो आम लोग ही जाने लेकिन कलेक्टर से लेकर संचालक तक ने जिन्हें अनुभव प्रमाण पत्र देने से मना कर दिया और हाईकोर्ट ने संविलियन की याचिका खारिज कर दी इन लोगों को न केवल परमानेंट नौकरी दी जा रही है बल्कि उन्हें प्रमोशन देने की तैयारी भी की जा रही है।
मामला मछली पालन विभाग का है। इस विभाग में चल रहे भ्रष्टाचार की कहानी तो अलग ही है लेकिन जिस तरह से उच्च स्तर पर यहां मनमानी चल रही है वह अंयंत्र कहीं देखने को नहीं मिलेगा। आश्चर्य का विषय तो यह है कि यहां चल रहे मनमानी को कृषि मंत्री चन्द्रशेखर साहू का समर्थन प्राप्त बताया जा रहा है। बताया जाता है कि यहां एजेंसी के कर्मचारियों को जिस तरह से संविलियन किया गया वहीं से गड़बड़ी शुरू हुई।
सूत्रों के मुताबिक बी.के. शुक्ला और एम.डी. त्रिपाठी एजेंसी में मत्स्य पालन प्रसार कर्मचारी के रूप में पहले पदस्थ थे। इसके बाद जब एजेंसी बंद हुई तो इन्हें विभाग में संविदा कर्मी के रूप में रख लिया गया। इसके बाद इनका संविलियन का प्रयास हुआ और उच्च स्तर पर लेन-देन कर संविलियन कर दिया गया।
बताया जाता है कि लोकसेवा आयोग के द्वारा चयन के समय जब इन दोनों कर्मचारियों के नाम सामने आये तो कलेक्टर ने अनुभव प्रमाण पत्र देने से मना कर दिया चूंकि तब एजेंसी का चेयरमेन कलेक्टर होता है इसलिए अनुभव प्रमाण पत्र के अभाव में इनका चयन नहीं होना था। लेकिन सूत्रों के मुताबिक शुक्ला-त्रिपाठी की जोड़ी ने तब तत्कालीन संचालक एस.एन. चटर्जी से सांठ-गांठ कर अनुभव प्रमाण पत्र हासिल कर लिया और इस मामले में बड़ी रकम के लेन-देन की चर्चा है।
चूंकि एजेंसी के कर्मचारी मत्स्य विभाग का कर्मचारी नहीं हो सकता इसलिए संविलियन का मामला हाईकोर्ट चला गया और हाईकोर्ट ने 2242005 के द्वारा शुक्ला त्रिपाठी के संविलियन संबंधी मामला खारिज कर दिया। लेकिन इस मामले को छिपा दिया गया और इन्हें जानबूझकर शासन के कर्मचारियों को मिलने वाला समस्त लाभ दिया गया। इधर इतने लफड़े के बाद भी इन दोनों को पदोन्नति देने की तैयारी की जा रही है। बताया जाता है कि इस मामले में कृषि मंत्री की रूचि से रायपुर ही नहीं राजनांदगांव में भी जबरदस्त चर्चा है।
हमारे राजनांदगांव संवाददाता के मुताबिक एजेंसी के कर्मचारियों की संविलियन और पदोन्नति के मामले को लेकर यहां जबरदस्त चर्चा है और बताया जाता है कि कृषि मंत्री ने इन दोनों कर्मचारियों की शिकायत पर खामोशी ओढ़ ली है। बहरहाल मछली पालन विभाग में चल रहे इस घपले बाजी में मंत्री चन्द्रशेखर साहू का नाम सामने आने से जबरदस्त हड़कम्प है और आने वाले विधानसभा में भी यह मामला रंग ला सकता है।
यह सरकार की मनमानी है या विभागीय मंत्री चन्द्रशेखर साहू का दंभ यह तो आम लोग ही जाने लेकिन कलेक्टर से लेकर संचालक तक ने जिन्हें अनुभव प्रमाण पत्र देने से मना कर दिया और हाईकोर्ट ने संविलियन की याचिका खारिज कर दी इन लोगों को न केवल परमानेंट नौकरी दी जा रही है बल्कि उन्हें प्रमोशन देने की तैयारी भी की जा रही है।
मामला मछली पालन विभाग का है। इस विभाग में चल रहे भ्रष्टाचार की कहानी तो अलग ही है लेकिन जिस तरह से उच्च स्तर पर यहां मनमानी चल रही है वह अंयंत्र कहीं देखने को नहीं मिलेगा। आश्चर्य का विषय तो यह है कि यहां चल रहे मनमानी को कृषि मंत्री चन्द्रशेखर साहू का समर्थन प्राप्त बताया जा रहा है। बताया जाता है कि यहां एजेंसी के कर्मचारियों को जिस तरह से संविलियन किया गया वहीं से गड़बड़ी शुरू हुई।
सूत्रों के मुताबिक बी.के. शुक्ला और एम.डी. त्रिपाठी एजेंसी में मत्स्य पालन प्रसार कर्मचारी के रूप में पहले पदस्थ थे। इसके बाद जब एजेंसी बंद हुई तो इन्हें विभाग में संविदा कर्मी के रूप में रख लिया गया। इसके बाद इनका संविलियन का प्रयास हुआ और उच्च स्तर पर लेन-देन कर संविलियन कर दिया गया।
बताया जाता है कि लोकसेवा आयोग के द्वारा चयन के समय जब इन दोनों कर्मचारियों के नाम सामने आये तो कलेक्टर ने अनुभव प्रमाण पत्र देने से मना कर दिया चूंकि तब एजेंसी का चेयरमेन कलेक्टर होता है इसलिए अनुभव प्रमाण पत्र के अभाव में इनका चयन नहीं होना था। लेकिन सूत्रों के मुताबिक शुक्ला-त्रिपाठी की जोड़ी ने तब तत्कालीन संचालक एस.एन. चटर्जी से सांठ-गांठ कर अनुभव प्रमाण पत्र हासिल कर लिया और इस मामले में बड़ी रकम के लेन-देन की चर्चा है।
चूंकि एजेंसी के कर्मचारी मत्स्य विभाग का कर्मचारी नहीं हो सकता इसलिए संविलियन का मामला हाईकोर्ट चला गया और हाईकोर्ट ने 2242005 के द्वारा शुक्ला त्रिपाठी के संविलियन संबंधी मामला खारिज कर दिया। लेकिन इस मामले को छिपा दिया गया और इन्हें जानबूझकर शासन के कर्मचारियों को मिलने वाला समस्त लाभ दिया गया। इधर इतने लफड़े के बाद भी इन दोनों को पदोन्नति देने की तैयारी की जा रही है। बताया जाता है कि इस मामले में कृषि मंत्री की रूचि से रायपुर ही नहीं राजनांदगांव में भी जबरदस्त चर्चा है।
हमारे राजनांदगांव संवाददाता के मुताबिक एजेंसी के कर्मचारियों की संविलियन और पदोन्नति के मामले को लेकर यहां जबरदस्त चर्चा है और बताया जाता है कि कृषि मंत्री ने इन दोनों कर्मचारियों की शिकायत पर खामोशी ओढ़ ली है। बहरहाल मछली पालन विभाग में चल रहे इस घपले बाजी में मंत्री चन्द्रशेखर साहू का नाम सामने आने से जबरदस्त हड़कम्प है और आने वाले विधानसभा में भी यह मामला रंग ला सकता है।
सोमवार, 26 जुलाई 2010
आदमखोर की राह
राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी वास्तव में महात्मा थे। तभी तो उनकी कही बात आज भी प्रासंगिक है। गांधी की जय जयकर अब भी होती है और होती रहेगी लेकिन उन्हें मानने वाले भी उनकी बातों पर एक फीसदी भी नहीं चलते ।
देश के लिए लंगोट में निकलकर उन्होंने भारतीयता की पहचान विश्व स्तर पर बनाई थी उनके कार्यो का लोहा आज भी उनके विरोधी मानते है। गांधी के देश में गांधी अनुयायी इस तरह हो जायेंगे किसी ने कल्पना नहीं की थी। जनता की गाढ़ी कमाई को मिल बैठकर खाने की रणनीति की शुरूआत तो उसी दिन शुरू हो गई थी जब देश सेवा का दावा करने वाले सांसद-विधायकों ने अपने लिए वेतन-भत्तों के लिए कानून बना लिया।
पता नहीं इन्हें वेतन देने की सोच के पीछे कौन लोग थे लेकिन मेरा दावा है कि इसके पीछे वेतन भोगी कर्मचारी-अधिकारी जरूर रहे होंगे जिन्हें डर था कि यदि शेर को मानव खून नहीं मिलेगा तो वह आदम खोर नहीं बन सकेगा और जब नेता को वेतन की बीमारी लग जायेगी तो वह पैसों के पीछे भागेगा और नौकरशाह की राह आसान हो जायेगी। यही वजह है कि अब भी लोग अंग्रेजों के शासन व्यवस्था की तारीफ करते नहीं थकते।
सबसे पहले तो नेताओं और अधिकारियों को जो वेतन दिया जाता है उसे समझना जरूरी है। दरअसल शासन के पास पैसा आने के मोटे तौर पर दो ही साधन है। पहला साधन संपदा से और दूसरा साधन है आम लोगों पर लगाया जाने वाला टैक्स। इन्ही राशि से वेतन दिये जाते हैं।
एक गरीब से गरीब आदमी भी टैक्स देता है और इसे किस तरह से हमारे रक्षक दुरूपयोग कर रहे हैं किसी से छिपा नहीं है। नेताओं को जनप्रतिनिधि कहना ही बेमानी है क्योंकि वह चुनाव जरूर जीतता है लेकिन उसे उसके काम के बदले वेतन दी जाती है और वेतन लेने वाला मालिक नहीं नौकर होता है और लोकतंत्र का दुर्भाग्य है कि वेतन लेने वाला नौकर तय करता है कि मालिक किस तरह से जिन्दगी जिए। यह तो आ बैल मुझे मार वाली कहावत को ही चरितार्थ करता है। आम आदमी यह सोचकर विधायक-सांसद बनाते है कि ये लोग उनका स्तर सुधारेंगे लेकिन आजादी के 60 साल बाद भी लोगों को न पीने का पानी उपलब्ध है न चिकित्सा या शिक्षा सुविधा ही उपलब्ध है।
वेतन भोगी नेताओं-अधिकारियों का रहन-सहन आम आदमी से ऊचा होता जा रहा है और जो लोग अपना पेट काटकर इन्हें काम पर रखा है वे लोग नारकीय जीवन जीने मजबूर हैं। क्या यह हमारे सांसदों-विधायकों का दायित्व है कि संसद में बैठकर वे चोर-चोर मौसेरे भाई की तर्ज पर केवल अपने हितों का कानून बनाये और जनता को प्रताड़ित करें।
हमारी लड़ाई इस व्यवस्था को बदलने की है हम चाहते हैं कि जनप्रतिनिधि कहलाने वाले वेतन व पेंशन से परहेज करें और जिस दिन जनप्रतिनिधि ऐसा कर पायेंगे वे भ्रष्टाचार को रोक लेंगे तब अकेले वेतन पाने वालों से वे काम ले सकेंगे अन्यथा मिल बांटकर खाने की रणनीति में आदमखोर होती व्यवस्था में रोज नए आदमखोर शेर पैदा होंगे जो अपनी भूख ही मिटाएगा। जनता जाये भाड़ में।
देश के लिए लंगोट में निकलकर उन्होंने भारतीयता की पहचान विश्व स्तर पर बनाई थी उनके कार्यो का लोहा आज भी उनके विरोधी मानते है। गांधी के देश में गांधी अनुयायी इस तरह हो जायेंगे किसी ने कल्पना नहीं की थी। जनता की गाढ़ी कमाई को मिल बैठकर खाने की रणनीति की शुरूआत तो उसी दिन शुरू हो गई थी जब देश सेवा का दावा करने वाले सांसद-विधायकों ने अपने लिए वेतन-भत्तों के लिए कानून बना लिया।
पता नहीं इन्हें वेतन देने की सोच के पीछे कौन लोग थे लेकिन मेरा दावा है कि इसके पीछे वेतन भोगी कर्मचारी-अधिकारी जरूर रहे होंगे जिन्हें डर था कि यदि शेर को मानव खून नहीं मिलेगा तो वह आदम खोर नहीं बन सकेगा और जब नेता को वेतन की बीमारी लग जायेगी तो वह पैसों के पीछे भागेगा और नौकरशाह की राह आसान हो जायेगी। यही वजह है कि अब भी लोग अंग्रेजों के शासन व्यवस्था की तारीफ करते नहीं थकते।
सबसे पहले तो नेताओं और अधिकारियों को जो वेतन दिया जाता है उसे समझना जरूरी है। दरअसल शासन के पास पैसा आने के मोटे तौर पर दो ही साधन है। पहला साधन संपदा से और दूसरा साधन है आम लोगों पर लगाया जाने वाला टैक्स। इन्ही राशि से वेतन दिये जाते हैं।
एक गरीब से गरीब आदमी भी टैक्स देता है और इसे किस तरह से हमारे रक्षक दुरूपयोग कर रहे हैं किसी से छिपा नहीं है। नेताओं को जनप्रतिनिधि कहना ही बेमानी है क्योंकि वह चुनाव जरूर जीतता है लेकिन उसे उसके काम के बदले वेतन दी जाती है और वेतन लेने वाला मालिक नहीं नौकर होता है और लोकतंत्र का दुर्भाग्य है कि वेतन लेने वाला नौकर तय करता है कि मालिक किस तरह से जिन्दगी जिए। यह तो आ बैल मुझे मार वाली कहावत को ही चरितार्थ करता है। आम आदमी यह सोचकर विधायक-सांसद बनाते है कि ये लोग उनका स्तर सुधारेंगे लेकिन आजादी के 60 साल बाद भी लोगों को न पीने का पानी उपलब्ध है न चिकित्सा या शिक्षा सुविधा ही उपलब्ध है।
वेतन भोगी नेताओं-अधिकारियों का रहन-सहन आम आदमी से ऊचा होता जा रहा है और जो लोग अपना पेट काटकर इन्हें काम पर रखा है वे लोग नारकीय जीवन जीने मजबूर हैं। क्या यह हमारे सांसदों-विधायकों का दायित्व है कि संसद में बैठकर वे चोर-चोर मौसेरे भाई की तर्ज पर केवल अपने हितों का कानून बनाये और जनता को प्रताड़ित करें।
हमारी लड़ाई इस व्यवस्था को बदलने की है हम चाहते हैं कि जनप्रतिनिधि कहलाने वाले वेतन व पेंशन से परहेज करें और जिस दिन जनप्रतिनिधि ऐसा कर पायेंगे वे भ्रष्टाचार को रोक लेंगे तब अकेले वेतन पाने वालों से वे काम ले सकेंगे अन्यथा मिल बांटकर खाने की रणनीति में आदमखोर होती व्यवस्था में रोज नए आदमखोर शेर पैदा होंगे जो अपनी भूख ही मिटाएगा। जनता जाये भाड़ में।
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