बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

विकास का मतलब सिर्फ अमीरों व शहरों को सुविधा...

छत्तीसगढ़ में बैठी सरकार के लिए विकास के मायने सिर्फ और सिर्फ शहरों व अमीरों को सुविधा देना रह गया है। डॉ. रमन सिंह और उसकी पूरी सरकार भले ही विकास के दावे करते रहे लेकिन गांव वालों के लिए आज भी विकास दुरह सपना बस है।
क्या सरकार बता पाएगी कि इन 7 वर्षों में सड़क पर जितने खर्च किए है उसके मुकाबले किसानों के खेतों में पानी पहुंचाने की कितनी व्यवस्था हुई है। किसान इन दिनों सरकार की करतूतों को लेकर आंदोलित है। कृषि मंत्री चंद्रशेखर साहू छत्तीसगढ़ियां व किसान होते हुए भी कुछ नहीं कर रहे हैं वे कुछ करना भी चाहे तो कुर्सी का मोह उन्हें कुछ करने नहीं दे रहा है। छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए मौत का वारंट जारी करने का दावा करने वाले किसान नेता भी अपनी ढुलमुल नीति और स्वार्थ में लगे हैं। वे सरकार को किसान विरोधी तो बताते हैं लेकिन अपने को राजनैतिक उद्देश्य से दूर रखने भाजपा के खिलाफ कुछ भी करने से अपने को अलग करते हैं। सर्वत्र स्वार्थ ने इस नए नवेले छत्तीसगढ़ को विकास से दूर कर दिया है। पेड़ के नीचे विधानसभा लगाने का दावा करने वाले नेता अब नई राजधानी के निर्माण में अरबों रुपया खर्च कर रहे हैं। अधिकाधिक सुविधा जुटाने की कोशिश में लगे नौकरशाहों के साथ मिलकर शहरी विकास की ओर अधिक ध्यान दिया जा रहा है।
लगातार जोत की जमीन कम होते जा रही है। कभी राजधानी के नाम पर तो कभी शहर और कस्बों के नाम पर या तो उद्योगों के विस्तार के लिए खेती की जमीनें किसानों से छिनी जा रही है। कौड़ियों के मोल किसानों की जमीनों को उद्योगों को दिया जा रहा है और इसे ही विकास बताये जा रहे हैं। दरअसल सीधे-साधे छत्तीसगढ़ियों के साथ जिस तरह से सरकार खेल रही है वह अत्यंत दुर्भाग्यशाली है और नए नवेले राय के विकास को सालों पीछे ढकेलने वाली है।
हमने लगातार यह जानने की कोशिश की कि आखिर ग्रामीण विकास के लिए सरकार की नीति क्या है लेकिन जितने खर्च शहरों के विस्तार और सड़कों के विस्तार पर सरकार का ध्यान है उसके मुकाबले 2 फीसदी भी सरकार की रूचि नहीं हैं। छत्तीसगढ ग़ांवों का प्रदेश है यहां की एक बड़ी आबादी गांवों पर निर्भर है ऐसे में गांवों में सुविधा नहीं देने का क्या मतलब लगाना चाहिए। यदि सरकार का दावा विकास है तो क्या उनके पास इस सवाल का जवाब है कि सिर्फ सड़कें बना देने से गांवों का विकास हो जाता है बल्कि गांवों तक सड़क बनाने का मतलब शोषण के नए रास्ते खोलना है। पानी के अभाव में किसानी से त्रस्त किसानों को रुपयों का लालच देकर जमीन खरीदने की एक बड़ी साजिश तो नहीं है? ताकि अपने घर से बेघर हो सके।
किसानों से चुनाव पूर्व किए गए 270 रुपए बोनस का वादा निभाने की बात तो दूर नलकूप खनन पर प्रतिबंध लगा दिया गया ताकि बिजली न देना पडे। चांपा-जांजगीर जैसे सिंचित क्षेत्रों की जमीनें उद्योगों को बिजली बनाने कौड़ियों के मोल दी जा रही है। ऐसे में किसानों का आंदोलन कर रहे लोगों को जिला बदर की तैयारी करते प्रशासनिक अमले क्या प्रदेश को नई दिशा देना चाहते हैं यह तो सरकार को ही बताना होगा।

फिर लुटोत्सव मनाने में लगी सरकार

मोहन की लीला निराली
छत्तीसगढ़ियों की है लाचारी
संस्कृति विभाग फिर दलाली खाने सक्रिय
 भटगांव उपचुनाव निपटते ही प्रदेश सरकार ने एक बार फिर लुटोत्सव बनाम रायोत्सव की तैयारी में करोड़ों रुपए फूंकने की योजना बना ली है। इसके लिए बाहर के कलाकारों को करोड़ों रुपए देने की योजना भी बना ली है और इस काम में प्रदेश के दमदार माने जाने वाले मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के संस्कृति विभाग ने छत्तीसगढियां विरोधी रुख को एक बार फिर कायम रखते हुए जो तैयारी की है वह घोर आपत्तिजनक मानी जा रही है।
वैसे तो रायोत्सव के नाम पर लुटोत्सव मनाने की संस्कृति विभाग की परम्परा नई नहीं है। बाहर के बड़े कलाकारों को बुलाकर दलाली खाने में एक मंत्री की भाई की सक्रियता सदैव चर्चा में रही है। इस बार भी इस मंत्री भाई ने अभी से लाखों कमाने की रणनीति बना ली है और इसी के तहत इस लुटोत्सव को भव्य बनाने की तैयारी जोर-शोर से चल रही है। बताया जाता है कि पिछली बार तो एक बड़े कलाकार से दलाली को लेकर मंत्री भाई की न केवल इस कलाकार से बल्कि संस्कृति आयुक्त से भी ठन चुकी है और इस भाई को बर्दाश्त नहीं कर पाने वाले ने इस बार फिर एक होकर लुटोत्सव मनाने का निर्णय लिया है।
रायोत्सव में स्थानीय कलाकारों को जिस तरह से उपेक्षित किया जाता है उसे लेकर खूब हो-हल्ला मच चुका है और कई कलाकारों ने तो संस्कृति मंत्री पर छत्तीसगढ़ियां विरोधी होने का आरोप तक लगा चुके हैं। उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ में प्रतिभाओं की कमी नहीं है लेकिन इन प्रतिभाओं को जानबूझकर कम पारिश्रमिक दिया जाता है। जिन कवियों को प्रदेश के बाहर कार्यक्रम देने पर हजारों रुपए दिए जाते हैं उन्हें भी यहां पांच सौ हजार में निपटाने की कोशिश होती है जिसकी वजह से स्वाभिमानी कलाकार इस आयोजन से दूर रहते हैं। इस बार भी संस्कृति विभाग ने के.आर. रहमान से थीम सांग बनाने का निर्णय लिया है जबकि अमीर खान और अन्य बड़े स्टार कलाकारों को बुलाने की कोशिश हो रही है। इसके एवज में जमकर दलाली की कोशिश भी च रही है और इस बार यह तैयारी भी है कि झगड़े की बजाय दलाली बांट ली जाए क्योंकि पिछली बार झगड़े के चक्कर में मंत्रीजी की छिछालेदर हो चुकी है।
इधर छत्तीसगढ़ के कलाकारों ने छत्तीसगढियों की उपेक्षा का आरोप अभी से मढ़ना शुरु कर दिया है। इन कलाकारों का कहना है कि एक तरफ यहां की प्रतिभाओं का राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर पूछ-परख बढ़ी है तथा रायोत्सव जैसे कार्यक्रम में बाहरी प्रदेश के कलाकारों को बुलाने का औचित्य नहीं है। इन कलाकारों ने कहा कि यदि रायोत्सव के लिए थीम सांग बनवाना ही था तो राय सरकार स्थानीय कलाकारों से कह सकती थी जिससे इस मिट्टी की खुशबू को दूर-दूर तक ले जायी जा सकती है। उन्होंने संस्कृति विभाग के इस रुख की आलोचना करते हुए कहा कि यह सब मंत्री के इशारे पर हो रहा है ताकि छत्तीसगढ़ियों की उपेक्षा कर उन्हें हतोत्साहित किया जा सके।
कलाकारों ही नहीं कई लोगों ने चर्चा में कहा कि रायोत्सव के कार्यक्रम में केवल स्थानीय कलाकारों के कार्यक्रमों का प्रदर्शन होना चाहिए ताकि हम अपनी कला का प्रदर्शन से देश-दुनिया का ध्यान आकृष्ठ कर सके। यदि रायोत्सव जैसे कार्यक्रम में दूसरे प्रदेश के कार्यक्रम किए जाएंगे तो हमारे कलाकारों को और कब मौका मिलेगा। बहरहाल संस्कृति विभाग और संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल पर रायोत्सव बनाम लुटोत्सव को लेकर जिस तरह से छत्तीसगढियों की उपेक्षा का आरोप लग रहा है उससे आने वाले दिनों में गंभीर परिणाम आ सकते हैं।

सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

जोगी का बयान भारी पड़ा कांग्रेस को...

भटगांव में भाजपा का कब्जा बरकरार
 भटगांव विधानसभा के उपचुनाव में प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी का बड़बोलापन कांग्रेस प्रत्याशी के लिए भारी पड़ा बताया जाता है कि श्री जोगी के 2010 में सरकार बनाने के दावा वाले बयान की वजह से कांग्रेस को करारी शिकस्त मिली।
भटगांव विधानसभा के उपचुनाव में वैसे तो भाजपा ने रजनी त्रिपाठी को उतारकर पहले ही सहानुभूति वोट की तैयारी कर ली थी लेकिन कांग्रेस में एकजुटता के चलते भाजपा खेमे में बैचेनी छा गई थी। हालांकि भाजपा के चुनाव प्रभारी ने अपने कांग्रेसी समर्थकों के सहारे जीत हासिल करने में कोई कसर बाकी नहीं रखा था और कांग्रेसी भीतरघात के चक्कर में लगे रहे। इसी बीच अजीत जोगी का सरकार बनाने का दावा संबंधी बयान ने रही सकी कसर भी पूरी कर ली और टक्कर दे रही कांग्रेस इस बयान के बाद कोसो पीछे चली गई।
जोगी के इस बयान की कांग्रेसियों में जबरदस्त चर्चा रही और कहा जाता है कि यह बयान भीतरघात से भी खतरनाक साबित हुआ। जबकि इस बयान की तुलना कांग्रेस नेता राजेन्द्र तिवारी के उस बयान से की जाने लगी थी जिसमें श्री तिवारी ने अटल बिहारी वाजपेयी के पिता का नाम पूछ लिया था और धनेन्द्र साहू को खड़ाउ बताया था। बहरहाल श्रीमती रजनी त्रिपाठी की जीत से जहां रमन सिंह मजबूत हुए हैं वहीं कांग्रेसी खेमें में मायूसी बढ़ गई है।

फैसला जो नहीं हो सका...!

 60 साल पुराने राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर एक ऐसा फैसला आया जिसकी उम्मीद कतई नहीं की गई थी। लेकिन जिस तरह से आजादी के लिए बंटवारा स्वीकार किया गया उसी तरह अमन के लिए भी बंटवारा स्वीकार किया गया। तथ्य अब भी चिख रहे हैं। गवाहों के मुंह पर ताला जड़ दिया गया और तीनों पक्षकारों को विवादित जमीन बांट दी गई।
आम तौर पर जमीन विवाद पर जब भी फैसला हुआ है तब जमीन एक पक्ष को ही गया है। भाई बंटवारे को छोड़ दें तो यह फैसला न्यायालयीन इतिहास में नई ईबादत के साथ पढ़ी जाएगी। हालांकि अब भी दो पक्ष इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाने आतुर हैं और नैसर्गिक न्याय तार-तार होता दिख रहा है। दरअसल राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद का जिस तरह से भाजपा ने राजनैतिक फायदे के लिए इसका इस्तेमाल किया उसके बाद तो इस विवाद को लेकर आम लोगों में चिढ़ सी हो गई थी। सभी चाहते थे जैसा भी हो, जो भी हो इसका निपटारा हो जाए। जज की कुर्सी पर बैठे तीनों लोग भी आम लोगों की भावना को समझ रहे थे और देश हित की जिम्मेदारी भी उन पर यादा हावी रही तभी तो ऐसा फैसला आया जो वास्तव में न्याय की नई ईबादत के रुप में हमेशा पढ़ी जाएगी।
ऐसा नहीं है कि सिर्फ बंटवारे का निर्णय हुआ है। दो मजहबों में बढ रही दूरियों को भी कम करने का इस निर्णय ने हिन्दुस्तान को एक मजबूत राष्ट्र के रुप में स्थापित करने की चेष्टा भी की है। मेरी इस बात से कई लोग असहमत भी हो सकते हैं लेकिन जब भी ऐसे विवाद हो उसे तूल देने की बजाय सरकार को आगे बढ़कर फैसले लेने चाहिए। मुगल सल्तनत और अंग्रेजों की गुलामी ने इस देश को कई हिस्सों में बांट दिया है। धर्म-जाति की लड़ाईयों ने भले ही कुछ राजनैतिक दलों को लाभ पहुंचाया हो लेकिन यह सब तत्कालीन रहा है। दूरगामी तो सिर्फ नुकसान ही हुआ है।
धर्म और जाति के झगड़ों से अब भी रोज लोग मर रहे हैं और सिर्फ लोग नहीं मरते हैं परिवार समाज और राष्ट्र मरता है। यही हुआ है। इस लड़ाई के जिम्मेदार वे नेता है जिन पर देश में सुकून-अमन कायम करने की जिम्मेदारी है। अयोध्या से इस देश को या भाजपा को या सुन्नी बोर्ड को क्या मिला यह तो वही जाने लेकिन इस झगड़े ने क्या खोया यह सबके सामने हैं। इलाहाबाद के लखनऊ बेंच का फैसला नि:संदेह स्वागत योग्य है और इस फैसले के परिपेक्ष्य में धर्म को लेकर विवादित सभी जमीनें मामले खत्म कर देने चाहिए और जो लोग इस फैसले को नहीं मानते उस विवादित जगह को सरकार को अधिग्रहण कर स्कूल-अस्पताल बना देना चाहिए।
ये दो स्थल ऐसे हैं जहां हर धर्म के लोग एक साथ बैठते हैं अपनी तकलीफें बांटते हैं। ताकि फिर कोई भाजपा या सुन्नी बोर्ड इस देश के लोगों को मरवाने की कोशिश न करे। अयोध्या का फैसला राम-रहिम की मर्जी से हुआ है वे भी चाहते हैं कि धर्म की लड़ाई बंद हो जाए और इसलिए देश के दूसरे हिस्सों का विवाद भी ऐसा ही सुलझ जाए क्योंकि बगैर उनकी मर्जी का पत्ता भी नहीं खड़कता।

दिशा कॉलेज को बचाने का मतलब...

बच्चों से भरी बस पलटी, कई बस कंडम
पिछले दिनों जेल रोड में दिशा कॉलेज की बस पलट गई। हालांकि इस घटना से सवार छात्रों को यादा चोटें नहीं आई लेकिन प्रशासन ने इस मामले के रफा-दफा में जिस तरह की तेजी दिखाई है वह कई संदेहों को जन्म देता है।

घटना की वजह बस का पट्टा टूट जाना है। ऐसे में कॉलेज प्रबंधन के खिलाफ कार्रवाई की बजाय बस चालक के खिलाफ ही मामूली धारा लगा दी गई। वास्तव में इस मामले में बस चालक से यादा दोषी कॉलेज प्रबंधक है क्योंकि बस पलटने की वजह बस का कंडम होना है। हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक दिशा कॉलेज की कई बसें बेहद पुरानी है और रंग रोगन कर इसे चलाया जा रहा है। लगता है प्रशासन को किसी बड़ी घटना का इंतजार है।

रविवार, 3 अक्टूबर 2010

छत्तीसगढ़ में दागी व विवादास्पद आईएएस अफसरों का जमावड़ा...

भ्रष्टाचार का चौतरफा आरोप, कार्रवाई नहीं
 छत्तीसगढ़ में कार्यरत अधिकांश आईएएस अफसरों पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं भारतीय प्रशासनिक सेवा के इन अधिकारियों की विवादास्पद छवि के चलते जनता के करोड़ों रुपए डकारे जा रहे हैं। पदों का दुरुपयोग खुलेआम किया जा रहा है और डॉ. रमन सरकार इन बेकाबू होते अफसरों के खिलाफ कार्रवाई करना तो दूर उन्हें संरक्षण देने में आमदा है।
छत्तीसगढ़ में जिस तरह से लूट-खसोट मची है वह भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के दामन में एक बदनुमा दाग बनकर सामने आने लगा है और एक बारगी तो सीधे सरकार से गठजोड़ दिखाई देने लगा है। हालत यह है कि बेहिसाब संपत्ति के मालिक इन अफसरों पर अंकुश लगाने में सरकार पूरी तरह विफल है। सर्वाधिक चर्चित अफसरों में इन दिनों बाबूलाल अग्रवाल का नाम सबसे ऊपर है। उनके साथ तो सीधे सीएम हाउस से गठजोड़ की खबर है जबकि अन्य अफसरों में विवेक ढांड का नाम भी सामने आया है। कहा जाता है कि रायपुर के इस अफसर ने अपने पद का दुरुपयोग इतनी चालाकी से किया है कि अच्छे-अच्छे नटवर लाल भी फेल हो जाए ताजा मामला तो उनके स्वयं के दुकान सजाने व गृहनिर्माण मंडल के बंगले को रेस्ट हाउस के लिए किराए से देने का है।
मालिक मकबूजा कांड में फंसे नारायण सिंह को किस तरह से पदोन्नति दी जा रही है यह किसी से छिपा नहीं है जबकि सुब्रत साहू पर तो धमतरी कांड के अलावा भी कई आरोप है। दूसरे चर्चित अफसरों में सी.के. खेतान का नाम तो आम लोगों की जुबान पर चढ ग़या है। बारदाना से लेकर मालिक मकबूजा के आरोपों से घिरे खेतान साहब पर सरकार की मेहरबानी के चर्चे आम होने लगे हैं।
ताजा मामला जे. मिंज का है माध्यमिक शिक्षा मंडल के एमडी श्री मिंज पर रायपुर में अपर कलेक्टर रहते हुए जमीन प्रकरणों में अनियमितता बरतने का आरोप है। सरकारी जमीन को बड़े लोगों से सांठ-गांठ कर गड़बड़ी करने के मामले में उन्हें नोटिस तक दी जा चुकी है। एम.के. राउत पर तो न जाने कितने आरोप हैं जबकि अब तक ईमानदार बने डी.एस. मिश्रा पर भी आरोपों की झड़ी लगने लगी है। अजय सिंह, बैजेन्द्र कुमार, सुनील कुजूर तो आरोपों से घिरे ही है। आरपी मंडल के खिलाफ तो स्वयं भाजपाई मोर्चा खोल चुके हैं लेकिन वे भी महत्वपूर्ण पदों पर जमें हुए हैं। जबकि अनिल टूटेजा पर तो हिस्ट्रीशिटरों के साथ पार्टनरशिप के आरोप लग रहे हैं। कहा जाता है कि देवेन्द्र नगर वाले इस शासकीय सेवा से जुड़े अपराधी को हर बार बचाने में अनिल टुटेजा की भूमिका रहती है।

अधिकांश आईएएस की करतूतों का कच्चा चिट्ठा सरकार के पास है आश्चर्य का विषय तो यह है कि जब भाजपा विपक्ष में थी तब इनमें से अधिकांश अधिकारियों की करतूत पर मोर्चा खोल चुकी है लेकिन सत्ता में आते ही इनके खिलाफ कार्रवाई तो दूर उन्हें महत्वपूर्ण पदों से नवाजा गया। बताया जाता है कि आईएएस और मंत्रियों के गठजोड़ की वजह से करोड़ों रुपए इनके जेब में जा रहा है। यहां तक कि जांच रिपोर्टों को भी रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया है। बहरहाल छत्तीसगढ़ में बदनाम आईएएस अफसरों का जमावड़ा होता जा रहा है और सरकार भी इनकी करतूत पर आंखे मूंदे है।

जो है नाम वाला, वही तो बदनाम है!

छत्तीसगढ़ की राजधानी में इन दिनों बड़े व प्रतिष्ठित माने जाने वाले अखबारों ने नया खेल शुरु किया है । अपनी प्रतिष्ठा बचाने के फेर में 'नवभारत' ने तो जग हंसाई कर दी। पता नहीं यह मैनेजमेंट का दिमाग था या शहर को नहीं जानने वाले संपादक का। हुआ यूं कि सीजी-04 में नार्को टेस्ट की कहानी छापी गई और कहा गया कि इसमें एक मंत्री व अधिकारी को बैंक मैनेजर सिंहा को बचाने करोड़ रुपए का लेन देन का खुलासा हुआ है और जिन्हें यह नार्को टेस्ट की सीडी देखना है वे नवभारत आकर देख सकते हैं। अब जिन्हें छत्तीसगढ़ का ज्ञान न हो वह ऐसी बचकानी हरकत कर सकता है क्योंकि यहां के लोग सीडी देखने पहुंच गए। अब उन्हें बगैर सीडी दिखाए लौटाया जा रहा है। यदि यही हरकत छोटे अखबार वाले करते तो इसे ब्लैकमेलिंग की संज्ञा दे दी जाती? आश्चर्य तो यह है कि यह सीडी नवभारत में काम करने वाले ही नहीं देख पाए है? यानी फुल सेटिंग? वसूली? या इसे और नाम कमाने का या पेपर बेचने का फार्मूला क्या कहें।
क्या पत्रिका भी इसी राह पर
रायपुर की आवाज उठाने का दावा करने वाले नए नेवले अखबार ने अपनी आमद से दूसरे बड़े अखबारों को हिला जरूर दिया है लेकिन उसके तेवर फिलहाल दिखाई नहीं पड़ रहे हैं। खबरें नहीं गढ़ने का दावा तो बाद में ही पता चलेगा लेकिन फ्रंट पेज में फुल पेज विज्ञापन छाप कर उसने भी वहीं किया है जो दूसरे बड़े अखबार कर रहे हैं यानी गुड़ के भाई पा...!
सीनियर फोटोग्राफर जब डर गए...
पिछले दिनों डांस बार में भाजपा नेता प्रभाष झा के बेटे के साथ मारपीट के मामले में गिरफ्तार शिव सैनिक प्रमुख धनंजय सिंह परिहार को जब पुलिस ने अदालत में पेश किया तो सीनियर फोटोग्राफरों की हवा निकल गई। पहचान और संबंध था या डर ये तो वही जाने लेकिन सीनियरों ने जूनियरों को फोटो खींचने लगा दिया। स्वयं बचने लगे। केवल विनय शर्मा ही ऐसे थे जो फोटो खींचने पहुंचे। अब चर्चा इस बात की है कि कौन-कौन बार में डांस देख चुका है?
हिमांशु का खेल...
वैसे तो इस बंदे का कोई जवाब नहीं है चाहे कर्मचारियों पर दबाव बनाने की बात हो या मालिकों पर प्रेशर बनाने की। समय के अनुरूप दबाव बनाओं और अपना उल्लू सीधा करो? ऐसे में पत्रिका के दहशत पर अपना उल्लू सीधा कर लिया जाए तो बुराई क्या है?
रमन प्रिंट में
हिन्दुस्तान से प्रताड़ित होने वाले इलेक्ट्रानिक मीडिया का यह कैमरा मेन इन दिनों हरिभूमि का फोटोग्राफर बन गया है। अब वह इलेक्ट्रानिक मीडिया से यादा खुश है।
रामकुमार की जनसत्ता से छुट्टी
भास्कर को अपना ईमान समझने के बाद भी जब वहां से हटाए गए तो रामकुमार परमार ने जनसत्ता का रुख किया अब वे वहां से भी चले गए। कहां जाना है अभी तय नहीं है।
'पप्पू' भी होगा पास...
मौका सबका आता है। जब बड़े-बड़े लोग सुपर स्टार बन रहे हैं तो पप्पू पटेल भला क्यों पीछे रहें? दो फीट का पप्पू पटेल भी बहुत जल्द एक छत्तीसगढ़ी फिल्म में हीरो बनकर आ रहा है। डोंगरगढ़ और इसके आसपास के इलाकों में इस फिल्म की शूटिंग जोर-शोर से चल रही है। पप्पू पटेल को पूरा विश्वास है कि छत्तीसगढ़ के दर्शक उसे जरूर पसंद करेंगे।



और अंत में...
एआईसीसी के इस मेंबर ने इतना अवैध निर्माण कर लिया है कि उसे बचाने भाजपाई नेताओं से गिड़गिड़ाना ही पड़ेगा। अब जनसंपर्क वाले मजा लें तो लेते रहें।