रविवार, 20 जनवरी 2013

थाने से लेकर सड़क तक दुव्र्यवहार ...


छत्तीसगढ़ पुलिस के द्वारा आम लोगों से दुव्र्यहार की कोशिश सिर्फ थाने तक ही सीमित नहीं है वह सड़कों परभी बड़े ही अभद्र ढंग े पेश आती है । जनता से व्यवहार सुधारने के लिए अफसरों ने भाषण दिया अैर पुलिस को गुस्सा आ जाता है । आखिर वे गाली गलौज न करे तो फिर पुलिस से कौन डरेगा । और पुलिस से लोग डरेंगे नहीं तो फिर वर्दी पहनने का मतलब ही क्या रह गया है ।
सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाने निकले पुलिस वालों को तो अपने प्रदर्शन का बहाना चाहिए जब कानून का रखवाला ही कानून तोड़े तो तमाश देखने के अलावा क्या बचता है ।
हर साल सड़क सुरक्षा सप्ताह के नाम पर पुलिस का प्रदर्शन से सरकार को भी मतलब नहीं रह गया है । सुरक्षा सप्ताह क ेनाम पर सड़कों को घेर कर पंडाल लगाना और फिर यातायात के नियमों का बोर्ड लगाकर वसूली करना तो अब शगल बन चुका है । इस बार तो सुरक्षा सप्ताह के नाम पर लगाये गये पंडालों में फिल्मी गीत भी खूब बजाये गए । बस स्टैण्ड के पास लगे पंडाल में बज रहे फिल्मी धुन पर जब एक शराबी थिरकने लगा तो पुलिस वाले भी मजा लेने लगे ।
आखिर मजा लेने के लिए ही तो फिल्मी गीत बजाये जा रहे थे । अब लोग पुलिस पर हंसे या न हंसे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता वैसे भी पुलिस वाले जानते है कि उनकी छवि आम लोगों में इ तरह बैठ गई है कि लोग तो उन पर हंसेगे ही तब क्यों न हंसने वाला काम ही कर लिया जाए ।
और यातायात सुधार सप्ताह तो हर साल आता ही है । फिर लोगों को भी मालूम है कि सप्ताह भर में कोई सुधर नहीं सकता ह। जब खुद नहीं सुधर पा रहे हैं तो लोगों को उम्मीद करना ही बेमानी है ।
पुलिस जानती है कि यह चुनावी साल है और चुनावी में सरकार उनसे क्या चाहती है इसलिए सरकार के हिसाब से चलना है यानी सांप भी मर जाए और लाटी भी न टूटे । यही वजह है कि अपराधियों को पकड़ कर कौन मंत्रियों से पंगा ले । तभी तो डॉ. बाढिया हो या मन्नू नत्थानी सभ्ी मजे से शहर में घूम रहे हैं । जनता को बरडालाने संपत्ति $फुर्क करने की हवा फैलाते रहो । करना कुछ नहीं है ।
Óयादा हल्ला मचे तो पुलिस बल की कमी का रोना रो दो । वैसे भ पुलिस को बचाने का काम सरकार का हो गया है । तभी तो बढ़ते अपराध पर नेता ही कह देते हैं कि राजधानी में अपराध तो बढेंग़े ही । आखिर थानों में पोस्टिंग वैसे ही नहीं होती है । बगैर पैसों का कुछ नहीं होता ।
तभी तो थाने में बढ़ते दुव्र्यवहार पर कोईवाई नहीं होती । हर थानेदार अपनी मर्जी का मालिक हो गया है । चाहा तो रिपोर्ट लिखेंगे और रिपोर्ट लिखेंगे तो अपनी मनमर्जी का धारा लगाते रहेंगे ।
अब पीडि़त बोलता रहे उनके साथ लूट हुई है मोवा थाने में चोरी ही लिखी जायेगी आप अफसरों के चक्कर लगाते थक कर चुप बैठ ही जाओंगे ।
चलते-चलते
पुलिस ने जमीन विवाद को निपटाने अलग सेल बना रखा है । सेल में बैठे लोग आने वाली शिकायतों के लिए मेहनत भी कर रहे है लेकिन अस्सी फीसदी मामले में कार्रवाई करने से उनके हाथ पांव फूलने लगते हैं । अब तो वे सत्ता बदलने की राह ताक रहे हैं ताकि कार्रवाई में अडग़ा डालने वाले मंत्री के परिवार को मजा चखा सकें ।

शनिवार, 19 जनवरी 2013

आखिर इलेक्ट्रानिक वाले अलग हो ही गये ...


यह तो होना ही था । आखिर ग्लैमर से भरे इलेक्ट्रानिक मीडिया कब तक प्रिंट मीडिया के दबदबे पर चुप रहती । इलेक्ट्रानिक मीडिया इस बात पर लंबे समय से नाराज थे कि आजकल हर नेता - अधिकारी इलेक्ट्रानिक मीडिया के ग्लैमर के आगे नतमस्तक है तब भला प्रेस क्लब में पिं्रट मीडिया का दबदबा क्यों नहीं है ।
दरअसल प्रेस क्लब को प्रिंट मीडिा के वरिष्ठ पत्रकारों ने अपने खूब पसीना से सींचा है और सीनियरों की मेहहनत की वजह से ही रायपुर प्रेस क्लब का नाम सम्मान से लिया जाता है । ऐसे में प्रेस क्लब की गरिमा बनाये रखने की जिम्मेदारी भी कम नहीं है ।
ऐसा नहीं है कि प्रेस क्लब को तोडऩे की यह पहली कोशिश है पहले भी ऐसी कोशिश होते रही है लेकिन वरिष्ठों की प्रभावी भूमिका से तोडऩे का मसूंबा कभी पूरा नहीं हुआ ।
पुसदकर नेतागिरी की ओर
प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष अनिल पुसदकर ने पत्रकारिता छोड़ दिया है या नहीं यह तो तय नहीं है लेकिन इन दिनों बे फिरसे राजनीति करने लगे है और केजरीवाल की पार्टी आम आदमी पार्टी के रायपुर का मीडिय़ा संभाल रहे हैं । यानी लड़ाई चालू आहे ।
सिमटती दूनिया-छिटकती खबरें...
कांकेर जिले के नइहरपुर ब्लॉक के आदिवासी कन्या आश्रम में हुई बलात्कार ने समूचे छत्तीसगढ़ को झकझोर कर रख दिया । घटना के विरोध में चप्पा-चप्पा बंद रहा । पर इतनी बड़ी खबर का नेशनल मीडिया में स्थान हैरान कर देने वाला है ।
नेशनल मीडिया की इस तरह की भूमिका को लेकर कमोबेश सभी राÓयों में जनमानस में नाराजगी है । काहे का नेशनल ! दिल्ली में बैठने भर से कोई नेशनल मीडिया बन जाता है ? ऐसे कितने ही आक्रोश के स्वर सुनाई पड़ते हैं ।
दरअसल संचार क्रांति के इस दौर में जैसे-जैसे दुनिया मोबाईल और इंटरनेट में सिमटती जा रही है । वैसे-वैसे खबरों की जानकारी बढ़ते जा रही है । ऐसे में समाचार पत्र या खबरिया चैनल की भूमिका भी बदली है । और व्यापार बाद हावी हुआ है । और जब व्यापार की सोच के साथ खबरें परोसी जाती है तब उन खबरों को ही प्राथमिकता दी जाती है जहां से विज्ञापन अधिक मिलते है या जहां प्रसार अधिक होता है ।
नेशनल ही नहीं राÓयों की राजधानी में बैठे मीडिया का भी यही रवैया है । खबरों की अधिकता और जगह की कमी की वजह के अलावा व्यापारिक फायदे ने कई बार खबरों के साथ अन्याय तो किया ही है पाठकों की सोच को भी बदला है । जब पूरे मामले का दारोमदार वे राÓय सरकार के ऊपर छोड़ते है तो खुद क्षमा क्यों मांगते हैं और अगर वे यह साफ करने की कोशिश करते हे कि उन्हौंने माननीय आधार पर क्षमा मांगा है तो क्या मानवीय आधार का क्षेत्रफल उनके क्षमा मांगने तक विस्तारित है, या सिमित है ? बात यह भी है कि अगर वे मान लेते है कि इस आरपी एफ कार्यवाही दौरान निर्दोष मारे गए है तो क्या देश गृहमंत्री के पद पर सुशोशित चिदंबरम द्वारा एक भी निर्दोष के मौत बाद केवल क्षमा मांग लेना भी उचित प्रतीत होता है ? देखा जाए तो अपने तरह का यह पहला मामला है जब किसी निर्दोष सोचना है कि काश इस मुद्धे पर चिदंबरम खामोश ही रहते तो कितना अ'छा होता, पर चिदंबरम भी क्या करें ना बोले तो क्यूं और अब बोल दिए तो क्यों ?
दरअसल उक्त विषय में जाग्रत पार्टी के लामबंदी बाद चिदंबरम ने कहा है कि अगर इसमें निर्दोष लोग मारे गए है तो वह इसके लिए मानवीय आधार पर क्षमा मांगते है ! उन्हौंने यह भी कहा है कि कानून व्यवस्था राÓय का विषय है यह भी कहते है कि इस पर अन्तिम फैसला लेने का हक सरकार का है सवाल यह है कि राÓयों की बड़ी खबरों को लेकर आम पाठकों का नेशनल मीडिया के प्रति जो सोच है । कमाबेश वही सोच राÓयों की राजधानी की मीडिया के प्रति ब्लाक या जिला के पाठकों का है ।
यही वजह है कि नेशलन मीडिया पर राÓयों की राजधानी की मीडिया के प्रति लोगों का आक्रोश बढ़ा है । हालांकि यह भी सच है कि कई बार बड़ी खबरों की जानबुझकर उपेक्षा की जाती है ।
और अंत में ...
सूचना के अधिकार के तहत जूटाये गए साक्ष्य पर जब एक पत्रकार ने खबर बनाने की सोची तो अखबार के संपादक ने अपने स्लोगन सुनाते हुए पत्रकार को ही फटकार लगा दी । यानी स्लोगन में मित्र यूं ही नहीं है ।

शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

जब चमड़ी मोटी हो जाये ...


भले ही कादर खान ने एक फिल्म में राजनीति का मतलब राक्षस की तरह जनता को निगलने वाला तिकड़म बाज मजाक में कहा हो लेकिन इन दिनों राजनीति का यही मतलब निकलने लगा है । तभी तो नेता नाम से ही लोगों में गुस्सा दिखने लगता है । राजनीति में बढ़ती गंदगी और उसमें तैरते हुए मुस्कुराते नेताओं के चेहरे देखकर आम आदमी के मुंह से गालियां निकलने लगती है । भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले खुद भ्रष्ट हो गये हैं और भारतीय संस्कृति की हुहाई देने वाली पार्टी की सरकार और उनके नेताओं को अश£ील डांंस देखने में मजा आता है । छत्तीसगढ़ में सत्ता में बैठी रमन सरकार की करतूतों से हिन्दुत्व और संस्कृति की बात करने वाले भले ही हैरान न हो लेकिन आम आदमी हैरान हे ।
एक तरफ जब कांकेर में आदिवासी बालिकाओं के साथ हुए दुष्कर्म से लोगों में आक्रोश है तो दूसरी तरफ प्रदेश सरकार के मंत्री व प्रशासन के जिम्मेदार अफसर मैनपाट कार्निवाल के नाम पर अश£ील डांस का मजा ले रहे थे । भारतीय संस्कृति की दुहाई देने वाल ेभाजपाई नेताओं ने जिस तरह से विदेशी बालाओं के डांस पर तालियां बजाई वह शर्मनाक हे । भले ही कलेक्टर अपनी सफाई में इसे विदेशी पर्यटकों को लुभाने की कोशिश कह रहे हो लेकिन कार्यक्रम में मौजूद महिलाओं के लिए यह कतई सहज नहीं था । वैसे भी छत्तीसगढ़ की संस्कृति में ऐसी अश£ीलता का कहीं स्थान नहीं है लेकिन भारतीय संस्कृति की दुहाई देते नहीं थकने वाली भाजपा की सरकार को तो सत्ता में आने के बाद ऐसी ही अश£ीलता में मजा आता है तभी तो राÓयोत्सव में करीना कपुर के ठुमके लगवाये जाते है और परिवार सहित फोटो खिचवाये जाते हैं ।
नगर निगम में नेता प्रतिषक्ष सुभाष तिवारी और आरडीए उपाध्यक्ष प्रफुल्ल विश्वकर्मा की उपस्थिति में भी अश£ील डांस के कार्यक्रम पर भी पार्टी खामोश रहती है तो इसका मतलब साफ है ।
वैसे राजनीति का यह सिद्धांत है कि जो कहते हैं वह करते नहीं । शायद यही वजह है कि सत्ता में आने के पहले हल्ला मचाये जाने वाले मुद्दे सत्ता से आते ही भुला दिये गये । शिक्षा कर्मियों के संविलियन या किसानों को 270 रूपये बोनस देने की बात यदि छोड़ भी दिया जाए तो धर्मशास्त्र के विपरित पांचवा कुंभ राजिम बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ा गया । भारतीय धर्म को लेकर लंबा चौड़ा भाषण देने वालों के इस कृत्य का शंकराचार्य ने ीाी कड़ा प्रतिवाद किया लेकिन इससे सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ा । फर्क तो रोगदा बांध बेचने या कोयले की कालिख के बाद भी नहीं पड़ा इसलिए तो कहते हैं कि जब नेताओं की चमड़ी मोटी हो जाये तो उन्हें इस बात की कोइ्र परवाह नहीं होती कि उनके बारे में जनता क्या सोचेगी । सत्ता और पैसे के दंभ नेतो अ'छे-अ'छों को दुष्कर्म के दल-दल में धकेल दिया है
यही वजह है कि कांकेर में आदिवासीय ब"िायों के साथ हुए दुष्कर्म के बाद रमेश बैस जैसे वरिष्ठ सांसदों के बयान दुर्भाग्य पूर्ण आते हैं तो कई भाजपाई नेता अपना अपा खो देते है । प्रदेश के मुखिया को इस मामले के दोषी लोगों को जल्द सजा की मांग करने वालों में राजनीति दिखलाई देता है । जबकि स"ााई यह हे कि सरकार अपने आप कुछ करेगी यह भरोसा ही नहीं है तभी तो गर्भाशय कांड के जैसे जघन्य अपराध करने वालों का निलंबन समाप्त हो जाता है । उद्योगों को जमीन देने किसानों पर लाठियां बरसाई जाती है और मिलावट खोर को पकडऩे वाले पुलिस अफसर को छुट्टी पर भेज दिया जाता है ।
अब तो लोगों का यह भरोसा उठ ही गया है कि सरकार अपने मन से कुछ करेंगी । लोगों को लगने लगा है कि न्याय तभी मिलेगा जब लोग सड़क पर आयेंगे अन्यथा मोटी चमड़ी पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा ।

गुरुवार, 17 जनवरी 2013

प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं आफ़त में अस्तित्व..


अपनी साफ़ सुथरी छवि और कांग्रेस की आपसी गुटबाजी की वजह से दूसरी बार सत्ता में आई रमन सरकार इन दिनों चौतरफ़ा विरोध के चलते अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। एक तरफ़ कोयले की कालिख का कलंक धुलने का नाम नही ले रहा है तो दूसरी तरफ़ उद्योगों के लिए खेती की जमीन बांध और सरकारी जमीन देने से लोगों में बेहद आक्रोश है।
इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटी भाजपा को पहला झटका तो तभी लग गया था जब मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह पर राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन गड़करी के करीबी माने जाने वाले संचेती बंधुओं को पानी के मोल भटगाँव कोल ब्लॉक ही नहीं दिया बल्कि 49 फ़ीसदी शेयर होने के बाद भी उन्हे एम डी बना दिया गया। कैग ने इस कोल ब्लॉक के आबंटन पर न केवल कड़ी आपत्ति की बल्कि 1052 करोड़ क नुकसान भी गिना दिया।
एक तरफ़ जब पूरी भाजपा भाजपा कोल ब्लॉक  आबंटन को लेकर मनमोहन सरकार को घेर रही थी, वहीं दूसरी तरफ़ रमन सरकार की वजह से उन्हे बैकफ़ुट पर आना पड़ा। कोयले की इस कालिख पर छत्तीसगढ के अन्य भाजपा नेता रमेश बैस करुणा शुक्ला ने भी सरकार को आड़े हाथों लिया लेकिन हाईकमान के दबाव पर विरोध के स्वर दबा दिए गए।
हांलाकि सरकार पर रोगदा बांध बेचने से लेकर उद्योगों के लिए खेती की जमीन बरबाद करने का आरोप भी है। उद्योगों को फ़ायदा पहुंचाने फर्ज़ी जनसुनवाई से लेकर बाल्को चिमनी कांड को लेकर भी रमन सरकार कटघरे में खड़ी दिखाई दी लेकिन बहुमत के दम पर मामले को दबा तो दिया गया लेकिन लोगों में अब भी आक्रोश है और यही हाल नई राजधानी और कमल विहार योजना से प्रभावितों का है।

रमन सरकार के लिए आदिवासी व सतनामी समाज का गुस्सा भी मुसीबत भरा है। सतनामी समाज के गुस्से के आगे तो सरकार घुटने टेकते नजर आ रही है।  कुतुब मिनार ऊंचा जैतखंभ का उद्घाटन भी नहीं हो पा रहा है। जबकि सर्व आदिवासी समाज अपने उपर हुए पुलिस लाठी चार्ज से नाराज है।  ऐसे में कांकेर आदिवासी आश्रम में हुए दुष्कर्म ने आग में घी का काम किया है।
समाज ही नहीं शिक्षाकर्मियों ने तो रमन सरकार से आर-पार की लड़ाई शुरु कर दी है। चुनावी घोषणा पत्र को संकल्प का नाम देकर शिक्षा कर्मियों के संविलियन को नकारने से भाजपा की ही मुसिबत बढी है और ऐसे में मिशन 201& मे हैट्रिक बनना तो दूर अस्तित्व पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
मिशन 1& में जुटी भाजपा के लिए सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वह सत्ता के लिए राम को छोडऩे का आरोप पोंछ नहीं पा रही है। और अब भारतीय संस्कृति पर कुठाराघात का आरोप लगने लगा है। संस्कृति की दुहाई देने वाले लाल बत्तीधारी कभी मैनपाट कार्निवल में विदेशी बालाओं के अश्लील डांस पर तालियाँ बजाते दिख रहे हैं तो कभी बिहार की संस्कृति की दुहाई देकर अश्लील डांस में ठुमके लगाते दिखते हैं। राÓयोत्सव में करीना कपूर को बुलाने को लेकर भी भाजपा निशाने पर है।
इन दिनों प्रदेश में रमन सरकार के इस चौतरफ़े विरोध में  मंत्रियों की दबी जुबान भी चर्चा में है। कोइ इसे सत्ता का दंभ कह रहा है तो कोई इसे बौखलाहट बता रहा है। लेकिन एक बात तो तय है कि मंत्रियों की बेलगाम होती जुबान ने भी भाजपा की किरकिरी करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। रामविचार नेताम जैसे मंत्री जहां विरोध पर कुत्ते कहते हैं तो  सांसद रमेश बैस को बड़े लोगों से बलात्कार समझ के लायक है। राजेश मूणत तो गुस्से में आपा खो कर गाली गलौज पर करने लगते हैं तो गृहमंत्री को ग्रह नक्षत्र का दोष दिखता है।
बात यहीं खत्म नहीं हो जाती। अब तो बढते चौतरफ़ा विरोध के चलते सीएम रमन सिंह की सभा में काले कपड़े पहनकर जाने पर ही अघोषित प्रतिबंध लगा दिया गया है।  14 जनवरी को राजनांदगाँव में मुख्यमंत्री के कार्यक्रम तो काले कपड़े पहनकर आने वालों न केवल रोका गया बल्कि मोजे, टाई, स्वेटर, काले कोट तक उतरवाए गए।इमरजेंसी का विरोध करने व मीसाबंदियों को पेंशन देने वाली सरकार की क्या यह अघोषित इमरजेंसी नहीं है।
बहरहाल मिशन 1& में हैट्रिक का सपना संजोए रमन सरकार के4 खिलाफ़ चौतरफ़ा विरोध का जो माहौल तैयार हुआ है वह बना रहा तो भाजपाईयों के लिए मुश्किल हो जाएगी।

सोमवार, 14 जनवरी 2013

अपनी पीठ थपथपाने में मजा आता है..


.यह तो अपनी पीठ थपथपाने नहीं तो और क्या है । राजधानी सहित पूरे प्रदेश में बलात्कार हत्या लूट चोरी सहित अन्य अपराध बढ़े हैं । पुलिस वाले जगह-जगह पिटे जा रहे हैं । राजेश शर्मा, डॉ. बाठियां, मन्नू नत्थानी से लेकर कितने ही अपराधी पुलिस की पकड़ से दूर है । थानों में लूट की जगह चोरी की रपट लिखी जा रही है । बलात्कार पीडि़त की रिपोर्ट नहीं लिखी जा रही है । जुआ-सट्टा और छेडख़ानी से आम आदमी परेशान है? नक्सलियों की समानांतर सरकार चल रही है लेकिन पुलिस अपनी उपलब्धि बताने में लगी है ।
डीजीपी से लेकर पुलिस कप्तानों में होड़ मची है ।  कि नाकाम्याबी इस प्रचार के धुंध में दब जाये । और पूरे छत्तीसगढ़ पुलिस का यही रवैया है । अचानक पकड़ में आये मामले पर इतना हाय तौबा मचाया जा रहा है कि असफलता व पुलिसिया अत्याचार को लोग भूल जाये ।
यह सच है कि राजधानी में राजनैतिक दबाव पुलिस को झेलने पड़ रहे हैं । इसके अलावा बल की कमी और वीआईपी ड्यूटी से थानों में विवेचना का काम प्रभावित हुआ है लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि पुलिस की छवि वसूली बाज के रूप में सामने आई है । इन दिनों पूरे प्रदेश भर में अपनी काम्याबी के झंडे गाडऩे का दौर चल रहा है । राÓय सरकार से लेकर महापौर तक अपनी उपलब्धियों गिनाते नहीं थक रहे हें ऐसे में भला चार साल से राजधानी की कप्तानी संभाल रहे एस एस पी दीपांशु काबंरा भी कहां चुकने वाले थे । इसलिए वे भी अपने जिले की पुलिसिया उपलब्धि बताने में जुट गए । जैसे की अक्सर होता है यदि किसी झूठ को बार-बार बोला जाये तो वह सच लगने लगता है । यही हाल छत्तीसगढ़ पुलिस का है ।
अचानक बिल्ली के भाग से छींका टूर जाये तो उसे इतना प्रचारित करो कि असफलता भूल जाये अपराधियों के पहुंच के आगे अधिकारी नतमस्तक हैं और माफिया राज जैसी स्थिति बनने लगी है ।
जिस क्राईम ब्रांच की काम्याबी के कसीदे गड़े जा रहे हैं उस पर तो गृहमंत्री तक को भरोसा नहीं है । राजधानी का ऐसा कोई मोहल्ला नहीं है जहां अवैध शराब नहीं बिक रहे है । जुआ-सट्टा खुले आम चल रहा है । अपराध की इस पहली सीढी की कमाई से ही पुलिस के कई थाने चल रहे है ।
अवैध शराब पकडऩे और उसके विवेचना में पुलिस फिसड्डी साबित हुई है । अवैध शराब  के मामले जरूर पकड़े गए लेकिन अवैध शराब कहां से आया इसका खुलासा कभी नहीं हुआ और यही आकर पुलिस का सारा कस बल समाप्त हो जाता है कहा जाय तो गलत नहीं होगा ।
ठेकेदारों से मिली भगत का यह खेल बदस्तुर जारी है चाहे अपने को कितना ही तुर्रभटवां बताने वाले पुलिस कप्तान आये लेकिन किसी अवैध शराब को सोर्स को नहीं हुआ । न ही शराब के खिलाफ खड़े होने वाले मंत्री व विधायकों ने ही कभी किसी पुलिस कप्तान से नहीं पूछा कि आखिर वे अवैध शराब सप्लाई करने वालों को क्यों नहीं पकड़ रहे है ।
चलते चलते...
स्मार्ट कार्ड मामले में सरकार को चुना लगाने वाले डॉ. बाठियां इन दिनों पुलिस पकड़ से बाहर हैं तो इसकी वजह पुलिस की असफलता नहीं बल्कि एक अफसर की उपलब्धि है जिसके दबाव के आगे बाकी बेबस है ।

रविवार, 13 जनवरी 2013

सब तरफ है हाहाकार अपने में मस्त सरकार


अब तो सब तरफ लोग एक ही बात बोल रहे हैं कि छत्तीसगढ़ में सरकार नाम की चीज हीन ही है । लचर कानून व्यवस्था, बढ़ते अपराध,प्रशासनिक आतंकवाद ने यहां जिसकी लाठी उसकी भैस के कहावत को ही चरितार्थ किया है । पहले कोयला घोटाला, ने जहां छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय स्तर पर शर्मसार किया था अब आदिवासी मासूम ब"ाों के साथ बलात्कार की घटना से छत्तीसगढ़ एक बार फिर शर्मसार हुआ है । सरकार के द्वारा भ्रष्टाचारियों और अपराधियों को सीधे संरक्षण मिलने की वजह से अवांछनीय तत्तों के जहां हौसले बुलंद हुए हैं वहीं आम लोगों का जीना दूभर होता जा रहा है ।
छत्तीसगढ़ में अपने 9 साल पूरा कर चुकी रमन सरकार का पूरा ध्यान इन दिनों हैट्रिक की है लेकिन यह रास्ता आसान नहीं है । इसकी वजह सरकार की वह कार्यशैली है जिसकी वजह से न केवल छत्तीसगढ़ को देशभर में शर्मनाक स्थिति से गुजरना पड़ रहा है बल्कि आम लोग सरकार से त्रस्त हो गए है । सरकार की नीति भले ही तिकड़म बाजी से चुनाव जीतने की हो लेकिन वास्तविकता तो यहीं है कि रमन राज में जहां भ्रष्टाचारियों को खुले आम संरक्षण मिला है । आपराध में बडतेतरी हुई है । उद्योगों की करतूतों पर कार्रवाई की बजाय परदा डाला गया है वहीं चुनाव पूर्व जनता से किये वादे को पूरा करने में भी सरकार पूरी तरफ से असफल रही है । जिस साफ छवि और चावंल योजना के सहारे भाजपा ने पिछला चुनाव जीता था । इस बार इसी साफ छवि पर कोयले की कालिख साफ दिखने लगी है ।
सीएजी की रिपोर्ट में सरकार के हजारों करोड़ों के भ्रष्टाचार ही उजागर नहीं हुए है बल्कि इस बात का भी खुलासा हुआ है कि भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों परभी सरकार ने ठोस कार्रवाई नहीं की है ।
अब तो नौकरशाहों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि इस सरकार में जो सबसे Óयादा भ्रष्ट रहेगा उसे ही महत्वपूर्ण पद मिलेंगे । आर्थिक अपराध ब्यूरों ने जिस पैमाने पर भ्रष्ट अफसरों के मामले छापा मारकर सामने लाये हैं । उस मुकाबले में सरकार ने कार्रवाई नहीं की ।
बाबूलाल अग्रवाल का मामला हो या इंजीनियरों का मामला हो । स्वास्थ्य घोटाले का मामला हो या जंगल में व्याप्त भ्रष्टाचार का मामला हो । सरकार ने कभी भी कड़ी कार्रवाई नहीं की ।
सूत्रों का कहना हे कि रमन राज में अपराध बढऩे की एक बड़ी वजह अपराधियों के खिलाफ, भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करना है । सरकार के इस रवैये की वजह से अपराधिक प्रवृति के लोगों में यचह भावना घर कर गई है कि कुछ भ कर लो कार्रवाई तो होनी नहीं है और पैसों के दम पर इस सरकार में कुछ भी किया जा सकता हे ।  तभी तो बाबूलाल हो या ब्लाक शिक्षा अधिकारी चाडंक सभी महत्वपूर्ण पदों पर हैं। लोगों के गर्भाशय निकालने वाले भी मजे में है तो आंख फोडऩे वालों पर भी कुछ नहीं किया गया । न मन्नू नत्थानी पकड़ा जायेगा न डॉ. बाडियां को पकडऩे की कोशिश ही होगी । राजकुमार नायडू जैसे आरोपियों को पुलिस पकडऩे में दस साल लगा देती है जबकि वह इस दौरान ड्यूटी करता रहा ।
ब्रदी जैसे मिलावट खोरों को बचाने ईमानदार अधिकारियों को प्रताडि़त किया जाता है तो आत्महत्या के लिए मजबूर करने वाले मंत्री न पुलिस अधिकारी का भी कुछ नहीं बिगड़ता जबकि मृत्युपर्व लिखे पत्र में साफ वजह लिखी जाती है । जमीनों पर अवैध कब्जा, जंगल का जंगल साफ करने वाले उद्योगपतियों को बिजली-पानी और यहां तक कि टैक्सों में भी छूट दी जाती है जबकि गांव-गली में अवैध शराब बेचने वाले शराब माफियाओं के साथ गलबहियां की जाती है ।
ऐसे में अपराधिक तत्वों के हौसले बुलंद नहीं होंगे तो क्या होगा ।
चुनाव जीतने के लिए जारी घोषणा पत्र को संकल्प का नाम देने के बाद भी उसे पूरा नहीं किया जाता उपर से संकल्प याद दिलाने वाले किसानों व शिक्षा कर्मियों पर लाठियां भांजी गए तो हालात कहां पहुंच गए है आसानी से समझा जा सकता है ।
आदिवासी आश्रम में ब"िायों से बलात्कार के मामले में लीपा पोती होती है तब भी दिल्ली गैगरैप पर हल्ला मचाने वाली भाजपा खामोश रहती है ।
गरीब आदिवासी छात्राओं से सामूहिक गैंगरेप क े इस Óवंलतशील मामले ने पूरे देश को शर्मशार करते हुये सुर्खियाँ बटोर चुका आदिवासी बाहुल कांकेर जिले में इस घटना के विरोध में सामाजिक संगठन,छात्र-छात्राऐं सडकों पर उतरते हुये रमन सरकार के विरोध में मुखर होते नजर आने लगे है।

शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

रावण सा भाई ...


इन दिनों दिल्ली रेप कांड के बाद पूरे देश में महिलाओं पर अत्याचार को लेकर वैचारिक क्रंाति चल रही है । महिला अत्याचार के खिलाफ चल रहे इस जंग से हर कोई अपने को जोड़ रखा है । और सोशल साईट्स ने इस वैचारिक क्रांति को संबल प्रदान किया है । जितने लोग उतनी बातें । और इन बातों में पुलिस-नेता के अलावा समाज के उस वर्ग के प्रति भी आक्रोश साफ दिखाई दिया जो लोग थोड़ी सी झंझट से बचने दूसरे की सहायता करने से स्वयं को किनारे कर लेते हैं ।
 सवाल सिर्फ दामिनी का नहीं है । सवाल बढ़ते यौन अपराधों का है । सवाल पुलिस की चूक का नहीं है सवाल स्वयं की जिम्मेदारी का है । सड़क पर तडफ़ते लोगों को क्या सिर्फ इसलिए पुलिस के भरोसे छोड़ा जाना चाहिए कि पुलिसिया पूछताछ में झंझट बहुत है ।
क्या कानून सख्त कर देने से अपराध रूक जायेगा ? बल्कि कानून की सहायता करने से अपराध रूकेगा । एक गुण्डा पुरे मोहल्ले पर इसलिए भारी पड़ता है क्योंकि हम तब तक आवाज नहीं उठाते जब तक हमारे साथ गलत न हो । दूसरे पर हो रहे अत्याचार की अनदेखी की वजह से ही अपराध बढ़े है । और यही सच है ।
हर घटना के बाद या घटना के दौरान जनता मौजूद होती है और जनता अपनी जिम्मेदारी निभा ले तो अपराधियों के हौसले पस्त हो जायेंगे । ये ठीक है कि पुलिसिया करतूत भी अपराध बढऩे की बड़ी वजह है लेकिन हमने कब अपनी जिम्मेदारी निभाई है ? यह स्वयं लोगों को अपने आप से पूछना चाहिए ।
संघ प्रमुख मोहन भागवत हो या भाजपाई मंत्री कैलाश विजयवर्गीय, राष्ट्रपति के बेटे अमिजीत हो या फिर कोई और हो । इस मामले में उनके विचार हैरान कर देने वाले है । मर्यादा की पाठ पढ़ाना, पहनावे पर फब्तियां कसना, समर्पण की बात करना या भारत-इंडिया की दुहाई देना सत्य से मुंह मोडऩा है । शायद कैलाश विजयवर्गीय को यह जानकारी नहीं होगी कि सीता ने यदि लक्ष्मण रेखा पार की थी तो उसकी वजह एक साधु की सहायता करना हयेय था और बलात्कार सिर्फ शहरों में नहीं होते गांवो में भी बदस्तुर जारी है ।
इसलिए घटना की निंदा करने या फिर समाज को इस अपराध से मुक्त करने के प्रयास की बजाय महिलाओं के प्रति अपनी मानसिकता को प्रकट करना कतई उचित नहीं है । आज देश में तेजी से बदलाव आया है । बढ़ती मंहगाई के इस दौर में बेहतर जीवन के लिए महिलाएं रात तक काम कर रही है ऐसे में पुलिस के अलावा समाज की भी जिम्मेदारी बढ़ गई है ।
महिलाओं के प्रति सोच भी बदलने लगी है । आज हर व्यक्ति अपनी बेटियों को बेहतर शिक्षा देना चाहते है और इसके लिए बड़े शहरों में भी भेज रहे है । तब भला भारत-इंडिया या लक्ष्मण रेखा जैसी बात कहां से आ गई ।
क्या समय के साथ मानसिकता बदलने की जरूरत नहीं है । क्या रेस्टरो या एकांत जगह पर एक युवक-युवती सिर्फ यौन ? संबंधों की वजह से ही मिलते है । इस तरह से चर्चा करने वालों को देखने वाले ऐसे कितने लोग है जो पहली बार में ही यह सोचते होंगे कि ये दोनों पढ़ाई, बिजनेस पर ही चर्चा कर रहे हैं ।
यह सच है कि मां-बहन, चाची,मौसी नानी-दादी के रिश्तों की बुनियाद संबंध पर ही आधारित है लेकिन बदलते दौर में बहुत कुछ बदला है और हमें जिस तरह से अपनी बेटियों को पढऩे या नौकरी करने की आजादी दी है अपनी मानसिकता को भी आजादी देनी होगी ।
यही वजह है कि अब तक जिस रावण का हर साल बुराई के प्रतिक के रूप में दहन किया जाता था आज उसी रावण में अ'छाई ढूंढी जाने लगी है । पर स्त्री के हरण का दाग भी कमजोर पडऩे लगा है । तभी तो सोशल साईट्स पर रावण जैसे भाई की बात होनी लगी है । एक ऐसा भाई जो अपनी बहन सुर्पनखा के लिए दुश्मन की पत्नी का तो हरण कर लेता है लेकिन उसे छूता भी नहीं है
क्या सचमुच महिलाओं पर हो रहे यौन उपीडऩ के बाद रावण जैसे भाई की जरूरत है ?