गुरुवार, 3 मार्च 2016

एक बहस पत्रकारिता पर...

अब इस पत्रकारिता का क्या करोगे? जिसे देखो वही गरियाने लगा है। लोगों की उम्मीद बढ़ी है। इस उम्मीद में खरा उतरना मुश्किल होता जा रहा है। अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे पहले भी कम नहीं थे परन्तु सरकार का पहले इतना दबाव नहीं होता था। तब अखबार का मतलब एक मिशन होता थआ। परन्तु समय बदला। सरकार और कार्पोरेट सेक्टर ने विज्ञापन का ऐसा दबाव बनाया कि इसके झांसे में सभी आ गये। सिर्फ यही नहीं तय होने लगा कि खबरे कौन सी छपनी है बल्कि यह भी तय होने लगा कि खबरें कैसे बनाई जाए। खबरों का इस्तेमाल शार्प शूटर की तरह होने लगा।
बड़े कार्पोरेट सेक्टर के लिए मीडिया मुनाफा कमाने का व्यवसाय बन गया और इलेक्ट्रानिक मीडिया के आने के बाद जिस तरह की क्रांति आई उससे पत्रकारिता के मूल उद्देश्य ही बिखर कर रह गया। जो दिखता है वह बिकता है का खेल शुरु हुआ और यह उस स्तर तक जा पहुंचा जहां अवसाद के अलाला कुछ नहीं बचा। अपने नंगे पन पर गर्व करते मीडिया पर लोगों का कितना गुस्सा है यह कहीं भी महसूस किया जा सकता है।
कौन पत्रकार नाम कमाना नहीं चाहता और कौन मेहनत करना नहीं चाहता। सारे पत्रकार सहज भाव से अव्यवस्था के खिलाफ कलम चलाना चाहते हैं। हर अव्यवस्था पर शब्दों के प्रहार से वह सिर्फ हंगामा ही नहीं खड़ा करना चाहता बल्कि अव्यवस्था को मिटा देना चाहता है। परन्तु सबको मनचाही स्थिइत नहीं मिलती। कुछ पत्रकार जरुर क्यारी में लगे गुलाब की तरह अपनी सुंगध बिखरने में सफल हो जाते हैं परन्तु यह सब इतना आसान नहीं होता। कोई आंख तरेर खड़ा होता है। कोई नोटों की गड्डियां लिये खड़ा होता है और अब तो सरकारी पदों में बैठे लोगों में भी संयम नहीं रहा। सीधे जेल भिजवाने की धमकी तो किसी के मुंह से सीधी सुनी जा सकती है और फिर अखबार खोलने वाले भी तो दुकानदार हो गये हैं। लाखों करोड़ों की मशीन लगाकर कोई सरकार से पंगा क्यों ले? अखबार की आड़ में माफियागिरी भी करनी है। चिटफंड कंपनी चलानी है, जमीन लेनी है कोल ब्लॉक से लेकर सरकारी ठेका भी तो लेना दिलाना है।
पत्रकारिता के प्रति आम लोगों का गुस्सा यूं ही नहीं बढ़ा है। इसके पीछे दुकानदारी की वह सोच है जो सरकार के भ्रष्ट तंत्र के साथ खुद वैतरणी पार लगाकर सात पुश्तों की की व्यवस्था कर लेना चाहता है। वह दिन लद गये जब पत्रकार मरियल सा पायजामा कुर्ता या खद्दर पहने समाज सेवा के लिए जाना जाता था। मोहल्ले से लेकर शहर में उसकी इज्जत होती थी। हर पीडि़त पक्ष बेधड़क अपनी व्यथा कह देता था। अच्छे-अच्छे पुलिस के अधिकारी भी पत्रकारों के सामने आने से कतराते थे। परन्तु जमाना बदल गया है। तेजी से बदला है अब कलम की विवशता आंखों में साफ पढ़ी जा सकती है यह अलग  बात है कि अब इन पानीदार आंखों को देखने की फुर्सत किसी के पास नहीं है वह तो बस पत्रकारिता में आये इस बीमारी को ही देखकर अपनी भड़ास निकालने में सुकून महसूस करता है।
पत्रकारिता का एक और मिजाज है। वह कभी कभी उत्साही हो जाता है और जिसकी परिणिति बस्तर जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले पत्रकारों की स्थिति से साफ समझा जा सकता है जहां सरकारी पदों पर बैठे लोगों के पास जनविरोधी कानून जैसे हथियार के अलावा कुचलने या जेल में भेजने के सारे सामान होते हैं। राजधानी तक उनकी आवाज कैसे पहुंचे। यह भी प्रश्न खड़ा है। प्रश्न तो राजधानी के पत्रकारों और पत्रकारिता पर भी उठने लगे है परन्तु वे सौभाग्यशाली होते है कि उनके पास बंधी बंधाई तनख्वाह है।
परन्तु अभिव्यक्ति की आजादी पर मंडरा रहे खतरों के बाद भी सरकारी तंत्र और माफियाओं के गठजोड़ से मचे लूट के बाद भी क्यारियों के गुलाब की तरह पत्रकारिता का सुंगध कायम है पीडि़तों के लिए न्याय का दरवाजा खोलता है और अव्यवस्था के खिलाफ हंगामा खड़ा करता है। भले ही क्या करोगे ऐसा पत्रकारिता के शब्द ताकतवर दिखाई पड़ रहे हो परन्तु वह ताकतवर कतई नहीं है। पत्रकारिता आज भी खामोश नहीं है उसके कलम में धार कायम है स्याही जरुर फीकी हो गई है परन्तु अभी इतनी फीकी नहीं हुई है कि इसे पढ़ा न जाए। स्याही गाढ़ी जरुर होगी। समय लगेगा।

सोमवार, 12 अक्टूबर 2015

शक्ति स्वरूपा जगदम्बा...


प्रतिवर्ष दुर्गोत्सव मनाया जाता है। गांव, शहर, मोहल्ले और यहां तक कि घर-घर में माँ के हर रूप की पूजा होती है। चौक चौराहों पर माता की प्रतिमा स्थापित किए जाते हैं। मंदिरों में ज्योति कलश व जंवारा स्थापित ही नहीं होते बल्कि माता की सेवा में ढोलक के थाप पर गीत गूंजते हैं। मेहमूद या फैज़ल के संगीत की थाप पर डांडिया की गूंज आकाश में दूर-दूर तक सुनाई पड़ती हैं। याद किया जाता है माँ के स्वरूप को, याद किया जाता है माँ की महिमा और भारतीय संस्कृति तथा उत्सव की वजह को।
भारतीय जीवन में नारी सा पूज्यनीय कोई और नहीं है। यही वजह है कि कई प्रांतों में माता-पिता आज भी अपनी पुत्री का चरण स्पर्श करते हैं और विवाह पश्चात उनके घर का अन्न-जल ग्रहण नहीं करते। नारी पूज्यनीय है, देवी है और उनकी शक्ति का सर्वत्र गुणगान करते नहीं थकते। नारी सावित्री बनकर अपने पति का जीवन लाने यमराज से लड़ जाती है। राधा बनकर पूरी सृष्टि में प्रेम का संचार करती है, मीरा बनकर वह सब कुछ त्याग करने तैयार रहती है तो रानी लक्ष्मी बाई बनकर देश को आजादी दिलाने तत्पर हो जाती है, वह कृष्ण की मां बनकर यशोदा मैय्या हो जाती है तो राम की मां बनकर कौशल्या माता बन जाती है, नारी में मां का स्वरूप अवर्णित है। मां के दूध से सिर्फ जीवन नहीं मिलता वह लहु में घुलकर हमारे भीतर शक्ति का संचार करती है। शक्ति हमारे भीतर है, धर्म हमारे भीतर है। धर्म हमें राह दिखाता है और शक्ति इस राह की कठिनाई को दूर करती है।  शक्ति हमारा विश्वास है। विश्वास का प्रतीक गणेश जी है इसलिए हम हर साल गणेशोत्सव भी मनाते हैं। वे विध्नहर्ता हैं, हमारा विश्वास है। यही विश्वास लिये हम अपने पूर्वजों का आशीर्वाद लेने के बाद माता की शक्ति को ग्रहण करते हैं। विश्वास के बाद शक्ति ही हमारी सांस्कृतिक धरोहर है। शक्ति का दुरुपयोग न हो, मां यही तो सिखाती है।
शक्ति के अनेक रूप है इसलिए वह महामाया है, वह शक्तिशाली होते हुए भी शीतल है इसलिए छत्तीसगढ़ में गांव-गांव में शीतला माता विराजती हैं। पूरे नौ दिन माता की सेवा में गीत गाये जाते हैं, वह जननी है इसलिए जंवारा बोया जाता है। उत्सव हमारे प्राण वायु है, उत्सव हमें एक होने की प्रेरणा देता है। उत्सव हमें समझाता है जीव मात्र एक है, इसलिए माता का वाहन सिंह है। हम फल पुष्प चढ़ाते हैं, उपवास रखते हैं, सिर्फ फलाहार करते हैं। यह उत्सव हमें सबक देता है कि ईश्वर और प्रकृति के सामने सब एक हैं। मनुष्य को बचाना है तो प्रकृति को बचाना जरूरी है। इसलिए देवी-देवताओं ने अपने वाहनों, पूजा अर्चना में प्रकृति को जोड़कर रखा।
आज़ादी के बाद हमें संभलना था। इन उत्सवों के माध्यम से हमें सबको जोड़कर चलना था। मंदिर में हीरे-मोती चढ़ाने वाले भी पहुंचते हैं और खाली हाथ दर्शन करने वाले भी आते हैं। देवी-देवताओं ने कभी भेद नहीं किया। परन्तु भेद करना हमने शुरू किया। हमारे स्वार्थ ने मानव-मानव में अंतर किया। यह अंतर मिटना चाहिए। छत्तीसगढ़ की नारी बलशाली है। वह खेतों में भी उतनी ही सिद्धत से काम करती है जितना वह जंवारा विसर्जन के लिए समर्पित होती है। यहां बेटियों में भेद नहीं है, यहां कोख में बेटियां नहीं उजाड़ी जाती। इसलिए छत्तीसगढ़ महतारी है। महतारी यानी मां, मां यानी जननी। जननी भेद नहीं करती बल्कि वह कमजोर बच्चों पर ज्यादा ध्यान देती है।
मां की माया अपरंपार है। इसलिए वह महामाया है। नई पीढ़ी यह सब नहीं जानती। इसमें इनका दोष नहीं है। हमने ही इन्हें नहीं बताया। विदेशीपन की दौड़ शुरु कर दी। इस आधे अधुरे दौड़ में न वह विदेशी ही बन सका न ही अपनी संस्कृति और संस्कार से ही परिचित हो सका। वह विज्ञान की जाल में उलझ गया। उसे वही ठीक लगा जो       विज्ञान कहता है। परन्तु विज्ञान वही कहता है जो वह जानता है। विज्ञान आस्था को नहीं जानता। कण-कण में भगवान को वह अभी भी ठीक से नहीं जान सका। इसलिए नई पीढ़ी दुर्गोत्सव तो मना रहा है परन्तु विदेशी तौर तरीकों से। ऐसे में न संस्कार बचेगा न संस्कृति। सब गड़बड़ हो जायेगा।
आधा अधूरा रिश्ता या समझ हमेशा ही तकलीफ देता है। आज वहीं हो रहा है। जरूरत है तो काम ले लो वरना प्रवेश पर ही पाबंदी लगा दो। ईश्वर पाबंदी से परे है यह सब जानते हैं परन्तु जाति धर्म की खाई चौड़ी हो गई है। हम जगत जननी जगदम्बा का उत्सव तो मना रहे हैं परन्तु जननी की सहनशीलता से कुछ नहीं सीख रहे हैं।
उत्सव हमारी संस्कृति है। मनुष्य को मनुष्य से जोडऩे का माध्यम है। उन्हेंं समझने का साधन है। उत्सव से राष्ट्रीय स्वरूप विकसित होता है। देवी-देवताओं का प्रकृति से लगाव हमें नई सीख देती है। ताकि हम संस्कार के नए बगीचे तैयार कर सकें। परन्तु क्या ऐसा हो रहा है? हम उत्सव मना तो रहे हैं, अपने तौर-तरीकों से। जगत जननी जगदम्बा के आगे संगीत की थाप पर डांडिया खेला जा रहा है। ढोलक की थाप पर सेवा गीत गाये जा रहे हैं, पर श्रद्धा और विश्वास कम होता जा रहा है। शक्ति का दुरुपयोग हो रहा है, पर माँ सब चुपचाप देख रही है। महिषामर्दन होगा... जरूर होगा...।

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2015

जीवंत दस्तावेज



'मैं और मेरा प्रेस क्लब राजधानी रायपुर के पत्रकारों का जीवंत दस्तावेज है, इतिहास की गवाही है। पूरे देश में प्राय: हर शहर में प्रेस क्लब है। परन्तु प्रेस क्लब पर लिखी यह पहली पुस्तक है। जिसमें कौशल तिवारी ने प्रेस क्लब से अपने संबंधों को रेखांकित तो किया ही है। पत्रकारिता के मूल्यों व आदर्शों के उच्चमाप दण्ड पर प्रकाश डालने की कोशिश की है।
रायपुर प्रेस क्लब की अपनी गरिमा है। यहां की सदस्यता आज भी गौरव की बात है। विषम और विकराल होते समय में जब बाजारवाद से कोई नहीं बच सका है। पत्रकारिता के मूल्यों को लेकर सर्वत्र चिंता है ऐसे में यह पुस्तक नई पीढ़ी के लिए धरोहर की तरह है। पुस्तक की जीवंतता और तथ्यों का लाभ नई पीढिय़ों को मिलेगा यह निश्चित है।
अगली सदी पत्रकारिता की संवेदनशीलता और मापदंड की होगी या बाजारवाद की काली छाया, जहां संवेदना का मतलब सिर्फ पैसा होग? यह सोचने में क्या नुकसान है। कोई भी एक चीज हावी होगा तो दूसरा कमजोर होगा। यह न हो इसलिए रुक कर विचार कर लिया जाए। इतिहास की पलें हमें राह दिखाती है। और इतिहास का पुर्वालोकण हमें सही दिशा दिखाता है।
प्रस्तुत पुस्तक का यह प्रथम संस्करण है, तथापि सूचना के अभाव में कुछ छूट गया है और आने वाले संस्करण में इसका परिमार्जन किया जा सकता है। वरिष्ठ पत्रकारों के जीवन वृत्त और प्रेस क्लब की ऐतिहासिक तवय पुस्तक में संकलित हुआ है जो निश्चित ही सुखद है।

डॉ. सुधीर शर्मा
अध्यक्ष, हिन्दी विभाग
कल्याण स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भिलाई (दुर्ग)

बुधवार, 7 अक्टूबर 2015

मंगलवार, 8 सितंबर 2015

शनिवार, 11 अप्रैल 2015

चार में सेंट्रल रिसर्च लैब तक नहीं बना सकी सरकार


प्रशासनिक आतंकवाद का नमूना...
विशेष प्रतिनिधि
रायपुर। प्रदेश में प्रशासनिक आतंकवाद के चलते राजधानी स्थित डॉ. भीमराव अंबेडकर अस्पताल में प्रस्तावित सेंट्रल रिसर्च लैब चार साल बीत जाने के बाद भी स्थापित नहीं हो पाया है। हालत यह है कि इस ओर न तो स्वास्थ्य मंत्री का ध्यान है और न ही मुख्यमंत्री  का कोई दबाव काम आ रहा है।
मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया के निर्देश पर यहां मेकाहारा में सेंट्रल रिसर्च लैब स्थापित किया जाना है और इसके लिए सारी औपचारिकताएं पूरी भी कर ली गई है। लेकिन प्रशासनिक तत्परता की वजह से अभी तक लैब का काम शुरू नहीं हो पाया है जबकि इंडियन काउंसिल आॅफ मेडिकल रिसर्च सेंटर ने इसके लिए 6 करोड़ रुपए अनुदान की स्वीकृति भी दे दी है।
प्रदेश के इस सबसे बड़े अस्पताल को सर्वसुविधायुक्त बनाने की बात तो की जाती है लेकिन सुविधाओं के लिहाज से यहां पर्याप्त व्यवस्था के अभाव में मरीजों व उनके परिजनों को भटकना पड़ता है। हालत यह है कि संैपलों की जांच के लिए मेडिकल कालेज से लेकर अस्पताल तक के चक्कर लगााने पड़ते हैं।
बताया जाता है कि इसी को देखते हुए अस्पताल में सेंट्रल रिसर्च लैब स्थापित करने का प्रस्ताव था लेकिन प्रशासनिक लचरता की वजह से चार साल में भी लैब स्थापित नहीं हो पाया है। हालांकि सरकार द्वारा इसके लिए नोडल अधिकारी की नियुक्ति कर दी गई है लेकिन इसके आगे कुछ भी नहीं किया गया।
सूत्रों के मुताबिक सेंट्रल रिसर्च लैब में पैथालॉजी, बायोकेमेस्ट्री व माइक्रो बायोलॉजी विभाग का एक साथ संचालन किया जाना है। इसके चलते माइक्रो बायोलाजी विभाग से संबंधित जांच के सैंपल आज भी मेडिकल कालेज में ही कलेक्ट किया जाता है।
इधर इस संबंध में हमारे सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री व स्वास्थ्य मंत्री ने इस बारे में कई बार पत्र लिखा है लेकिन प्रशासनिक अफसरों के रवैये के कारण ही सेंट्रल लैब की स्थापना में देर हो रही है. जानकारी के मुताबिक राज्य सरकार ने सेंट्रल लैब की स्थापना को मंजूरी देने के बाद भी प्रशासनिक आतंकवाद के चलते ही इसमें विलंब होता जा रहा है।

नियत नहीं मजबूरी...


रमन सरकार ने निगम मंडल व आयोग के अध्यक्षों व सचिवों को सरकारी मकान देने पर रोक लगा दी है। निश्चित ही यह सराहनीय कदम माना जा सकता है लेकिन यदि इसमें यह भी जोड़ दिया जाता कि जिन मंत्रियों, सांसदों और विधायकों के पास राजधानी में स्वयं का मकान है उन्हें भी बंगले या मकान नहीं दिये जायेंगे तो यह सरकारी धन के दुरूपयोग रोकने में कारगर कदम होता। मगर अफसोस यह है कि यह सरकार की नियत नहीं बल्कि आर्थिक संकट से जूझने की मजबूरी है।
छत्तीसगढ़ जैसे नये राज्य में विकास की अपार संभावना है लेकिन सरकारी धन के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार के चलते विकास की रफ्तार धीमी पड़ गई है। हम यहां प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी के मंत्रिमंडल के सदस्यों को एक बार फिर याद करते हैं जिन्होंने मंत्री होने के बाद भी सरकारी बंगला लेने से मना कर दिया था। इसमें सत्यनारायण शर्मा, तरूण चटर्जी, धनेंद्र साहू, मो. अकबर, विधान मिश्रा जैसे मंत्री थे जिन्होंने सरकारी बंगला नहीं लिया था। लेकिन भाजपा की सरकार बनते ही राजधानी में जिन लोगों के बड़े बड़े मकान थे उन लोगों ने न केवल बंगले लिए बल्कि हर साल इस पर करोड़ों रूपए भी खर्च कर रहे हैं। मंत्रियों के बंगलों के रखरखाव में ही सरकार को हर साल करोड़ों रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं।
रमन सरकार में भ्रष्टाचार और सरकारी धन के दुरुपयोग को लेकर विपक्षी दलों व मीडिया  ने कई दफे आवाज उठाई लेकिन बहुमत के दम पर इस तरह की आवाज दबा दी गई।
पिछले दो कार्यकाल में निगम मंडल के अध्यक्षों व सचिवों ने सरकारी धन का जिस बेदर्दी से दुरुपयोग किया वह हैरान कर देने वाला है। आबंटित बंगले तक खरीद लिये गए और सरकार के मुख्यमंत्री इस ओर आंख मूंदे रहा।
हालांकि रमन सरकार के इस निर्णय से सरकारी धन का दुरुपयोग तो रुकेगा लेकिन यह सब सांप गुजरने के बाद लाठी पिटने की स्थिति है।
आर्थिक संकट से जूझ रही सरकार का यह निर्णय नियत की बजाय मजबूरी भरा कदम है यदि नियम है तो मंत्रियों व विधायकों व सांसदों के संबंध में कदम उठाये जाने चाहिए।
इधर इस निर्णय को लेकर भाजपा में असंतोष है तो आर्थिक संकट की वजह से लिए इस निर्णय पर यही कहा जा रहा है कि  सब कुछ लुटा के होश में आये तो क्या किया ?