सोमवार, 10 अगस्त 2026

सत्ता, पूंजी और 'अज्ञात' की ढाल

  सत्ता, पूंजी और 'अज्ञात' की ढाल


तिलदा-नेवरा से हसदेव तक: फर्जी ग्राम सभाओं का खेल और लीपापोती का पूरा सच

 कार्रवाई पंजी की दो पंक्तियाँ और लोकतंत्र पर डकैती: जब उद्योगपतियों को बचाने के लिए फाइलों में सिमट गया सच!

: विकास का ढोंग और कागजी लोकतंत्र

"मुँह में राम, बगल में छुरी" और "सैंया भय कोतवाल, तो डर काहे का!"—ये दो मुहावरे आज छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था पर सटीक बैठते हैं। ग्रामीण भारत में लोकतंत्र की सबसे प्राथमिक और पवित्र इकाई 'ग्राम सभा' को माना गया है, जिसे भारतीय संविधान और पंचायती राज अधिनियम के तहत स्थानीय विकास व औद्योगिक अनुमति का अधिकार प्राप्त है। लेकिन जब भारी-भरकम पूंजी और औद्योगिक हित सामने आते हैं, तो इस संवैधानिक अधिकार को एक बंद कमरे में कलम चलाकर कुचल दिया जाता है।

राजधानी रायपुर से महज़ कुछ दूरी पर स्थित तिलदा-नेवरा क्षेत्र का हालिया मामला इसका जीता-जागता प्रमाण है। कागजों पर एक 'जादुई ग्राम सभा' आयोजित कर ली गई, जिसकी जानकारी खुद गाँव वालों को तब हुई जब उद्योगपति जमीन और पर्यावरण मंजूरी का दावा करने लगे। यह केवल तिलदा का मामला नहीं है, बल्कि रायगढ़, हसदेव और बस्तर से लेकर पूरे प्रदेश में फैल चुके उस खतरनाक ढर्रे की मिसाल है, जहाँ जल-जंगल-जमीन की बलि चढ़ाने के लिए 'फर्जी ग्राम सभा' का शॉर्टकट अपनाया जा रहा है।

2. तिलदा का खेल: दो बड़े प्रोजेक्ट और कागजी हेरफेर

तिलदा-नेवरा क्षेत्र में दो बड़े और भारी प्रदूषण फैलाने वाले औद्योगिक प्रोजेक्ट्स को स्थापित करने की तैयारी चल रही थी:

1. ग्राम अल्दा: यहाँ 'बालाजी स्पंज एंड आयरन लिमिटेड' के विस्तार की योजना थी, जिसके पीछे राम प्रकाश गोयल, नवीन गोयल और प्रवीण गोयल जैसे बड़े औद्योगिक नाम जुड़े हैं।

2. ग्राम देवरी: यहाँ 'अग्रसेन स्टील एंड पावर लिमिटेड' द्वारा भारी-भरकम यूनिट लगाने की तैयारी थी, जिसके प्रमोटर्स बाबूलाल अग्रवाल और अमित अग्रवाल हैं।

नियमानुसार, किसी भी ग्रामीण इलाके में इस तरह के भारी उद्योग/प्रदूषणकारी संयंत्र लगाने से पहले स्थानीय ग्राम सभा से लिखित अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) लेना अनिवार्य है। ग्रामीणों को यह तय करने का अधिकार है कि उन्हें अपनी कृषि भूमि, पर्यावरण और स्वास्थ्य की कीमत पर उद्योग चाहिए या नहीं।

लेकिन आरोपों के मुताबिक, दोनों उद्योगपतियों ने जन-सुनवाई और जन-सहमति के लंबे रास्ते को दरकिनार कर 'शॉर्टकट' चुना। ग्राम सभा की कार्यवाही पंजी (Proceeding Register) में चालाकी से दो लाइनें जोड़ दी गईं और यह दिखा दिया गया कि ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से उद्योगों को एनओसी दे दी है। इसी फर्जी कागजी सहमति के आधार पर राज्य और केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में पर्यावरण मंजूरी की फाइलें दौड़ने लगीं।

3. तीन-सदस्यीय जांच रिपोर्ट का सच: खुलासा तो हुआ, पर कार्रवाई गायब

जब ग्रामीणों को इस धोखाधड़ी की भनक लगी, तो उन्होंने चुप रहने के बजाय विरोध का बिगुल फूंक दिया। पुलिस-प्रशासन के भारी दबाव और कुछ ग्रामीणों की गिरफ्तारियों के बावजूद जन-आंदोलन ठंडा नहीं पड़ा।

बढ़ते बवाल को देखते हुए प्रशासन को मजबूरन तीन-सदस्यीय जांच समिति का गठन करना पड़ा, जिसमें:

 जनपद सीईओ

 संबंधित क्षेत्र के तहसीलदार

 नायब तहसीलदार

शामिल थे। इस जांच समिति ने जब मूल फाइलों और पंजी का अवलोकन किया, तो वे हैरान रह गए। 30 जून 2025 को सौंपी गई इस जांच रिपोर्ट में साफ हो गया कि संबंधित तारीखों में वैसी कोई ग्राम सभा आयोजित ही नहीं हुई थी जैसी फाइलों में दिखाई गई थी और रजिस्टर में बाद में दो पंक्तियाँ जोड़कर कूटरचना (Forgery) की गई थी।

4. जून 2025 से जून 2026: एक साल की लीपापोती और 'अज्ञात' की ढाल

सामान्य परिस्थितियों में, किसी सरकारी दस्तावेज में कूटरचना और धोखाधड़ी सिद्ध होने पर तत्काल जालसाजी और धोखाधड़ी की धाराओं के तहत नामजद एफआईआर दर्ज कर दोषियों को जेल भेजा जाना चाहिए था। लेकिन तिलदा मामले में उल्टी गंगा बहने लगी:

 रिपोर्ट आने के एक साल बाद तक चुप्पी: जून 2025 में जांच रिपोर्ट आने के बावजूद पूरे एक साल तक फाइल दबाकर रखी गई।

 'अज्ञात' के खिलाफ एफआईआर: जब ग्रामीणों का धरना-प्रदर्शन उग्र हुआ और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल समेत विपक्षी नेताओं ने गाँव में डेरा डालकर अल्टीमेटम दिया, तब जाकर 22 जून 2026 को पुलिस एफआईआर दर्ज करने पर सहमत हुई।

 राजनीतिक प्रशासनिक संरक्षण: एफआईआर तो दर्ज हुई, लेकिन उसमें उद्योगपतियों या जिम्मेदार अधिकारियों का नाम डालने के बजाय मामला "अज्ञात" के खिलाफ दर्ज कर दिया गया।

यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस मामले में कंपनी के नाम, प्रमोटर्स के नाम, जांच समिति के दस्तखत और कूटरचना का तरीका पूरी तरह साफ है, उसमें आरोपी 'अज्ञात' कैसे हो सकता है? बिना उद्योगपतियों की मिलीभगत और शीर्ष राजनीतिक-प्रशासनिक शह के ग्राम सभा पंजी में दो पंक्तियाँ कौन जोड़ेगा? क्या इसमें उद्योग मंत्रालय, गृह मंत्रालय या स्थानीय प्रशासन की मौन सहमति शामिल है?

5. पर्यावरण मंत्रालय का ब्रेक और राज्य का पैटर्न

भले ही राज्य स्तर पर इस मामले को दबाने की कोशिशें हुईं, लेकिन जैसे ही फर्जी ग्राम सभा और कूटरचना का यह मामला केंद्रीय पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय तक पहुँचा, केंद्रीय अधिकारियों ने फिलहाल पर्यावरण मंजूरी देने से साफ इनकार कर दिया और फाइल लौटा दी।

हालाँकि, केंद्रीय स्तर पर फाइल रुकने से खतरा टला नहीं है, क्योंकि छत्तीसगढ़ में यह कोई अकेला मामला नहीं है:

 हसदेव अरण्य: हसदेव के जंगलों में कोल खदानों को अनुमति दिलाने के लिए कई गांवों में फर्जी ग्राम सभा के प्रस्ताव पारित करने के गंभीर आरोप लंबे समय से लगते रहे हैं।

 रायगढ़ औद्योगिक बेल्ट: रायगढ़ के वनांचल व ग्रामीण इलाकों में स्पंज आयरन और पावर प्लांटों के लिए जमीनों के अधिग्रहण में ग्राम सभाओं को दरकिनार करने की शिकायतें आम हैं।

 बस्तर: बस्तर में भी खदानों और औद्योगिक इकाइयों की स्थापना के दौरान ग्रामीणों और जल-जंगल-जमीन आंदोलनकारियों का मुख्य आरोप फर्जी एनओसी का ही रहा है।

6. निष्कर्ष: सवाल जो व्यवस्था से पूछे जाने चाहिए

तिलदा-नेवरा का यह मामला सिर्फ दो कंपनियों या दो गांवों का नहीं है; यह 'डबल इंजन' सरकार के काम करने के तरीके और लोकतंत्र के जमीनी ढाँचे पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।

1. यदि जांच समिति की रिपोर्ट में फर्जीवाड़ा साबित हो चुका है, तो एक साल बीत जाने के बाद भी नामजद गिरफ्तारियाँ क्यों नहीं हुईं?

2. 'अज्ञात' के नाम पर एफआईआर दर्ज करके किस-किस मंत्री या अधिकारी को बचाने की कोशिश हो रही है?

3. क्या औद्योगिक निवेश की आड़ में ग्रामीणों के संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों की इस तरह बलि दी जाती रहेगी?

जब तक फर्जी ग्राम सभा के इस पूरे नेक्सस (उद्योगपति-अधिकारी-नेता) पर सख्त नामजद आपराधिक कार्रवाई नहीं होती, तब तक यह लड़ाई अधूरी है। लोकतंत्र की रक्षा कागजी दावों से नहीं, बल्कि दोषियों को सलाखों के पीछे भेजने से ही संभव होगी।

वीडियो देखें 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें