सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

केवल वोट देने तक प्रजातंत्र-केयूर भूषण



स्वास्थ्य ठीक रहा तो आदिवासी हिंसा पर गांधी विचार यात्रा...
चुने हुए जनप्रतिनिधियों का बजाय प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री ही सत्ता
पीड़ा रहित समाज की स्थापना के लिए गांधीवाद ही विकल्प

कांग्रेस गांधीवाद से पूरी तरह दूर सिर्फ जयंति या निर्वाण दिवस ही...
आजादी की लड़ाई की विशेषता नैतिकता लेकिन आज इसकी कमी...
जनता को गांधीवाद पर विश्वास अन्ना हजारे आंदोलन में झलक से स्पष्ट
वैसे तो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के पथ पर चलने वालों की इस देश ही नहीं पूरी दुनिया में कमी नहीं है। गांधी के बताये मार्ग पर चल कर कुछ कर गुजरने की चाह भरना किसे नहीं है। छत्तीसगढ़ में भी गांधीवादी विचारधारा को जीने वालों की कमी नहीं है और इनमें से प्रमुख नाम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी केयूर भूषण का भी है। 1 मार्च 1928 को दुर्ग जिला के छोटे से गांव जांता में जन्में केयूर भूषण महात्मा गांधी के आलोक से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपना सारा जीवन इसी पथ पर होम कर दिया। 82 वर्षीय केयूर भूषण जहां कांग्रेस के गांधीवाद से भटकने से दुखी है वहीं समाज में बढ़ती हिंसा से आहत है। वे वर्तमान व्यवस्था को गांधीवाद से बदल कुछ करने की सोच ही नहीं रखते बल्कि वे यह कहने से भी नहीं हिचकते कि वर्तमान में प्रजातंत्र सिर्फ वोट देने तक ही रह गया है। वे कहते हैं चुनकर आने वाले जनप्रतिनिधियों की बजाय सत्ता केवल प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के पास रह गई है। सत्ता का केन्द्रीयकरण हो गया है जिसकी वजह से आम लोग दुखी है। वे नक्सली हिंसा पर भी आहत है। वे कहते हैं कि आदिवासियों की हितों के लिए हिंसा का जो वातावरण बना है उनका गांधीवाद ही एक मात्र हल है। आदिवासी हित के नाम पर नक्सली व पुलिस दोनों ही हिंसा पर आमदा है। वे इस उम्र में हम मामले में कुछ न कर पाने की पीड़ा समेटे कहते हैं कि स्वास्थ्य ठीक हुआ तो शीघ्र ही गांधी विचार यात्रा निकालकर सरकार और नक्सलियों को बिठाकर हिंसा खतम करूंगा। वे नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी के संबंध पर पूछे सवाल पर कहा कि सत्ता में वहीं आयेगा जो सर्वधर्म समभाव रखता हो। अन्ना हजारे के आन्दोलन की झलक से सबको समझ जाना चाहिए कि गांधीवाद से सबको समझ जाना चाहिए गांधीवाद से सबको समझ जाना चाहिए कि गांधीवाद और उनका मार्ग ही प्रासंगिक है और इसी में देश का हित है अन्यथा जिस तेजी से सरकार और उनके लोग विकास की लकीर खींच रहे है उनसे यह डर सताने लगा है कि हम आर्थिक गुलाम न हो जाए। गांधीवादी चिंतक केयूर भूषण कांग्रेस की टिकिट पर 1980 से लेकर 1989 तक रायपुर लोकसभा के सांसद रहे। अपनी गांधीवादी छवि के लिए प्रसिद्ध केयूर भूषण को सन् 2001 में छत्तीसगढ़ शासन के द्वारा सद्भावना पुरस्कार भी दिया गया। हरिजन उद्धार से लेकर उनके कार्यों को लोग आज भी याद करते नहीं थकते यही नहीं जब पंजाब जल रहा था तब भी केयूर भूषण ने पंजाब में शांति बहाली के लिए अपनी भूमिका से पीछे नहीं हटे थे। सादगी के साथ पूरा जीवन बीताने वाले केयूर भूषण ने हिन्दी व छत्तीसगढ़ी में कई किताबें लिखी है। स्वतंत्रता आन्दोलन के महापुरूषों पर उन्होंने काफी कुछ लिखा है और पीड़ा रहित समाज के निर्माण को लेकर वे आज इस उम्र में भी चल पड़ते है।
स्वतंत्रता के लिए देश के महान नेताओं के संघर्ष को याद करते हुए वे वर्तमान विषन्नावस्था को लेकर मुखरित हो उठते हैं। वे कहते हैं कि हमने विज्ञान और तकनीक की सहायता से प्रगति तो की है लेकिन भौतिक उपलब्धियों की जगमगाहट में नैतिक मूल्य और भारतीय परम्परा खो सी गई है संकट से निकालने वाले महापुरूषों के चले जाने से हम भटक गए है जबकि स्वतंत्रता की पूरी लड़ाई की विशेषता नैतिकता रही है।
केयूर भूषण जी यह कहने से भी नहीं चुकते कि स्वतंत्रता पश्चात भारतीय जीवन का परिस्कार करने के लिए हमें उन बंधनों को तोड़ फेंकना था जिनसे हम बंधे है। विनोबाजी से लेकर कई लोगों ने इन बंधनों को तोडऩे का प्रयास किया। दुर्भाग्य से वे उन्हें पूर्णतया समाप्त नहीं कर पाये। वह खरपतवार आज बढ़कर सब तरफ फैल गई है और आज सारा देश उन विकृतियों से आक्रांत हो रहा है। वे कहते है कि राजनीति में अवसरवादिताओं की संख्या बढ़ी है और इन्हें निकाल फेकने की जरूरत आ पड़ी है ऐसे लोगों को निकाल फेंकने की जरूरत आ पड़ी है ऐसे लोगों को निकालने में कुर्बानी भी देनी पड़े तो पीछे नही हटुंगा। वे कहते है कि ऐसे ही लोगों की वजह से राजनीति अछूत कहलाने लगी है वे युवाओं से आव्हान भी करते है कि युवाओं को अपने महापुरूषों के बताये मार्ग पर चलकर नये व्यवस्था गढऩा चाहिए। केयूर भूषण जी का कहना है कि महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज, स्वालंबन, अन्तयोदय और नैतिकता की दुहाई तो सब देते है उनकी जयंती व निर्वाण दिवस भी खूब आयोजित होते है लेकिन जब तक गांधी के बताये मार्ग के अनुरूप सत्ता नहीं होगी आम आदमी तिरस्कृत होता रहेगा। आज गांधीवाद को लेकर आन्दोलन की जरूरत है। जनता चाह भी रही है जिसकी झलक अन्ना हजारे के आंदोलन में दिखा भी है। छोटे रूप में छत्तीसगढ़ में इस तरह का आन्दोलन करना चाहता हूं। गांधी विचार मंच इसलिए बना भी है। उन्होंने कहा कि राजनीति की वजह से आज हिंसा का वातावरण बन रहा है। कांग्रेस भी गांधी के रास्ते से दूर हुई है। नक्सली हिंसा और पुलिस हिंसा बढ़ी है। गांधी जा रहते तो आदिवासियों के हित के लिए जरूर आगे आते। सरकार और नक्सली दोनों आदिवासी हित की बात करते है लेकिन दोनों ही हिंसा का रास्ता अपनाए हुए है। गांधी की विचारधारा के अनुरूप जब तक ग्राम स्वराज, स्वालंबन और अत्योदय के आधार पर सरकार काम नहीं करेगी सत्ता का विकेन्द्रीकरण नहीं होगा यह स्थिति सुधर रही सकती। आदिवासी क्षेत्रों में यह स्थिति यहां की संपदा की वजह से है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नजर इन संपदाओं पर है। इसके चलते आदिवासी उजाड़े जा रहे है या वे पलायन कर रहे हैं।  भ्रष्टाचार आखरी स्तर तक पहुंच गया है। सिस्टम बदलना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज हर कोई राज सत्ता हासिल करने के लिए आम आदमी का उपयोग कर रहा है। आरएसएस और भाजपा की नजर बहुसंख्यक वोट बैंक पर है। जबकि इस देश में सर्वधर्म एकता की भावना है सत्ता का लाभ आम आदमी को मिलना ही चाहिए और सरकार उसी की बने जो इन भावना को जीता है। कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष का नाम लेती है लेकिन काम नहीं करती है और इन दोनों की रजनीति में जनता पीस रही है।
स्वतंत्रता संग्राम सैनिक एवं गांधीवादी चिन्तक
जन्म : एक मार्च 1928, ग्रामा जाँता, जिला दुर्ग
पुरस्कार : छत्तीसगढ़ शासन का पं. रविशंकर शुक्ल सद्भावना पुरस्कार 2001 से सम्मानित जन प्रतिनिधित्व : सन् 1980 से सन् 1989 तक रायपुर लोकसभा से संसद सदस्य
प्रकाशित कृति: 1. लहर (छत्तीसगढ़ी कविता संग्रह)
2. कुल के मरजाद (छत्तीसगढ़ी उपन्यास)
3. कहां बिलागे मोर धान के कटोरा (छत्तीसगढ़ उपन्यास)
4. नित्य प्रवाह (प्रार्थना एवं भजन)हिन्दी
5. कालू भगत (छत्तीसगढ़ी  कहानी संग्रह)
6. छत्तीसगढ़ के नारी रत्न
7. मोर मयारूक गाँव (छत्तीसगढ़ी कहानी संग्रह)
8. हीरा के पीरा (छत्तीसगढ़ी निबंध संग्रह)
9. पथ (विभूतियों को समर्पित काव्य संग्रह)
संपादन : 1. साप्ताहिक छत्तीसगढ़ 2. साप्ताहिक छत्तीसगढ़ संदेश 3. त्रैमासिक हरिजन सेवा (नई दिल्ली) 4. मासिक अन्त्योदय (इंदौर) अप्रकाशित छत्तीसगढ़ी साहित्य : 1. डोंगराही रद्दा (कहानी संग्रह) 2. लोक-लाज(उपन्यास) 3. समें के बलिहारी (उपन्यास) 4. आंसू म फिले अचरा (कहानी संग्रह)
    अप्रकाशित: 1. उनका युग (लेखमाला-स्व. इंदिराजी के युव के संदर्भ हिन्दी साहित्य में) 2. राजीव गांधी का अंतरमन 3. अंकुर (हिन्दी कवितायें तथा किशोर साहित्य) 4. सम सामयिक लेखों का संग्रह 5. छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की जीवनगाथा
    संपर्क : 247, सुन्दर नगर, रायपुर (छत्तीसगढ़) 492001 फोन नं. -0771-2243524

गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

कुकुर ह गंगा जाही त पतरी ल कोन चाटही...


छत्तीसगढ़ म एक ठिन कहावत हे के कुकुर ह गंगा जाही त पतरी ल कोन चाटही। ए कहावत ल कोन केहे रीहिस, काखर बर केहे रीहिस। कोनो नई जानय फेर आजकल  ए कहावत के अड़बड़ जोर हे। आम आदमी पार्टी के नेता केजरीवाल अऊ समाज सेवक अन्ना हजारे के आन्दोलन ह कई झन के नींद ल उड़ा दे हे।
राजनीति में आय बदमाश चोर लुटेरा मन के नींद उड़ गे हे। अऊ अब कई झन अइसे गोठियावत हें जानो मानों ओखर मन ले बड़े हरीशचंद कोनो नहीं हे।
आम आदमी पार्टी ह राजनीति के नवा परिभाषा गढ़त हावय। ए राजधानी वाला मन ह आज ले सुरता करथे के एक झन बदमाश बालकृष्ण अग्रवाल ह कइसे बड़े-बड़े विज्ञापन छपवा के कहे रीहिस के वो ह अब सुधर गे हे फेर न तो ओखर करम ह सुधरीस न तो ओखर गुण ह बने होईस। बालकृष्ण अग्रवाल ह अपन ल बने बताय बर का का काम नहीं करीस। बड़े बड़े नेता मन संग उठईया बईठया बालकृष्ण अग्रवाल ल कोनो भुलाही।
वइसने दिल्ली म जब भाजपा ह देखीस के आम आदमी पार्टी के चारो मुड़ा जोर हे त कहे लागीस के हमन ह खरीद फरोख्त के राजनीति नहीं करन त कांग्रेस के राहुल गांधी ह काहत घुमत हे के आम आदमी पार्टी ले सीखबों।
आज के राजनीति के खेल म सबला मतवईया कांग्रेस के नेता ह जब सुधरे के बात करथे त कतकोन झन ल हंसी आ जथे। उही हाल भाजपा के होगे हावय तभे त आम आदमी पार्टी ह जोर मारत हे।
अवईया लोकसभा चुनाव बर जम्मो पार्टी ह तैयारी करत हावय अऊ जनता जनहित के तीर जाय बर अपन आप ल दुध के धुले बतावत हे। दुसर के पाप ल अइसे गिनावत हे जानो मानो ए मन ह कुछुच नहीं करे हे। तभे त वो दिन गांव के बइठका म जब चोरी के मामला आइस त जीवराखन ह कही दिस देख गा चोरी चोरी हे एक रूपया के हांवय चाहे सौ रूपया के सजा बरोबर होना चाही। अऊ पंच मन ल जीवराखन के बात ल मानेच ल पड़ीस।
अइसने कोनो पार्टी ह लाख काहय के अब तक जेन होगे तउन होगे आगु अइसने नहीं होही, कोनों नहीं पतीयाने वाला हे। सब के रंग ढंग ल देख डारे हावय। कहावत घलो हे चोर चोरी ले जाए हेराफेरी ले नहीं जावय।

बुधवार, 25 दिसंबर 2013

सोचना पड़ेगा....


 दिल्ली में आई राजनैतिक विपदा से राजनैतिक दलों की चिंता बड़ा दी है। आम आदमी पार्टी को मिले 28 सीट ने पूरे देश में नई बहस छेड़ दी है कि क्या उन पार्टियों को सरकार बनाने ऐसे पार्टियों से समर्थन लेना चाहिए जो चुनाव में एक दूसरे के खिलाफ खड़े थे।  यह बहस का मौका इसलिए भी आया क्योंकि सामने लोकसभा चुनाव है और इस वजह से हर दल तेरी कमीज से मेरी कमीज ज्यादा सफेद के दिखावे पर काम कर रही है वरना पिछले दो दशक के राजनैतिक हालत ऐसे कभी नहीं रहे। जिसे जहां जैसे मौका मिला राज्यों से लेकर केन्द्र तक सरकारें बनाई बिगाड़ी गई और आज जब लोकसभा चुनाव सिर पर है तो केन्द्र की सत्ता का मोह उन्हें खरीद फरोख की राजनीति से अचानक दूर कर दिया है। राजनैतिक दलों की चिंता यही है कि लोकसभा चुनाव में भी यही स्थिति रही तो क्या होगा ? क्योंकि जिस राह पर आम आदमी पार्टी ने कदम बढ़ाया है और इसका परिणाम दिल्ली विधानसभा के चुनाव में आया है वहीं समर्थन लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को मिलने की संभावना से इंकार करना मुश्किल हो गया है। सड़ चुकी राजनैतिक व्यवस्था में आम आदमी पार्टी की सोच ने आम आदमी को यह सोचने मजबूर कर ही दिया है कि आखिर कांग्रेस और भाजपा में कितना अंतर रह गया है। राज्यों से लेकर केन्द्र तक के कांग्रेस और भाजपा नेताओं की न तो गलबहियां छुपी है और न ही वोट बैंक की राजनैति ही छिप सका है। एक दूसरे के खिलाफ भ्रष्ट्राचार को लेकर आवाज उठाने वाले सत्ता पाते ही कार्रवाई से कैसे दूर भागते है और जनता इस खेल में स्वयं को ठगा सा महसूस करने लगी है। यही वजह है कि जब आम आदमी पार्टी का गठन हुआ तो उसे नजर अंदाज वाले भी दिल्ली के चुनाव परिणाम से न केवल भौचक है बल्कि लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की संभावना से चिंतित है। पिछले दो दशकों की राजनीति में हम किसी से कम नहीं की तर्ज पर काम करने वाली कांग्रेस और भाजपा में आए इस तत्कालीन परिवर्तन का दूरगामी परिणाम अभी आना शेष्ज्ञ है लेकिन यह तो तय है  िकआम आदमी पार्टी ने अच्छे-अच्छे को आईना दिखा दिया है। लालवत्ती के धौस और सरकारी बंगलों के रूतबे से दूर रहने के फैसले से राज्यों में बैठी सरकारों के मंत्री चितिंत हो गए है यदि ऐसे में विधायक व सांसद निधि को लेकर आम आदमी की सोच को अमली जामा पहनाया गया तो राजनैतिक दादागिरी तो खत्म होगी ही भ्रष्टाचार और स्वेच्छाचारिता पर भी विराम लगेगा। जब-जब मंत्रियों के बंगलों पर होने वाले खर्चों की खबरें आएंगी आम आदमी पार्टी और भी मजबूत होगा। गाली देने वालों के साथ सत्ता सुख या सत्ता सुख के लिए मुद्दों की अनदेखी भी आम आदमी को हताश नहीं करेगा। आम आदमी पार्टी क्या भाजपा-कांग्रेस का विकल्प हो सकती है। लोगों को सोचना पड़ेगा।

मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

आप ने कर दी सपने खाक...


आम आदमी पार्टी बनाते ही दिल्ली की सत्ता तक पहुंचे केजरीवाल को ल
ेकर जितनी चिंता समर्थन कर रही कांग्रेस को है उससे कही ज्यादा चिंता भाजपा को है।
आम आदमी पार्टी ने लोकसभा चुनाव लडऩे का एलान कर दिया है और वह इस देश में कांग्रेस-भाजपा के बाद तीसरी पार्टी बनकर चुनाव लड़ेगी। इससे पहले तीसरा मोर्चा बनाकर चुनाव लडऩे की कवायद होते रही है लेकिन इस बार हो रहे लोकसभा चुनाव का नजारा ही अलग होगा।
कांग्रेस और भाजपा जहां अपने अपने साथियों के साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी तो आम आदमी अपने दम पर चुनाव लड़ेगी।
दिल्ली के चुनाव परिणाम यदि लोकसभा चुनाव में भी दोहराया गया तब कांग्रेस और भाजपा का क्या होगा? आज तक कांग्रेस और भाजपा दोनों ही पार्टियों क्षेत्रिय दलों को नहीं रोक पायी है ऐसे में आप का इनसे सीधे लड़ाई का परिणाम क्या होगा? क्या आप को वजह से कांग्रेस और भाजपा ही नहीं दूसरी पार्टियों को भी नुकसान होगा। ये तमाम सवाल अभी भले ही मायने नहीं रखते हो पर सच तो यह है कि सडऩे की कगार तक पहुंच चुकी राजनैतिक व्यवस्था में आप ने ताजा हवा का झोंका की तरह अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। दिल्ली विधानसभा के परिणाम से कांग्रेस के चेहरे पर भले ही भाजपा के सत्ता नहीं पाने का संतोष हो या भाजपा के चेहरे पर आप को लेकर मलाल हो पर सच तो यही है कि आप ने राजनीति में चली आ रही परम्परा को बदलने की कोशिश की है।
चुनाव जीतने के बाद अपनी मर्जी से विकास गढऩे की तुगलकी परम्परा को दिल्ली के लोगों ने तोडऩे में जो तेजी दिखाई है वहीं तेजी लोकसभा चुनाव में दिखाने की पहल के लिए आप तैयारी कर रही है। पूरे देश में यूपीए सरकार के खिलाफ भाजपा ने जो माहौल खड़ा किया है उस माहौल को जीत में हासिल करने में आप का रोढ़ा साफ दिखने लगा है और यदि दिल्ली में बैठी आप के फैसले अच्छे रहे तो फिर भाजपा को नुकसान उठाना पड़ेगा।
ऐसे में भाजपा भले ही कांग्रेस पर वार करते दिख रही है लेकिन भीतर खाने में आप की चिंता भी कम नहीं है।

सोमवार, 23 दिसंबर 2013

जयचंद-मीरजाफर के जय होवय...


चुनाव होगे, सरकारो बनगे फेर हरईया मन के दुख ल कोनों नहीं समझत हे। बपरी रेणुका सिंह ह रो रो के कतका कलपे रीहिस के वोला भाजपाच के मन ह हरवाईन हे। मुख्यमंत्री घलो ह वोखर पीरा ले पिघल गे     रीहिस अऊ अइसन मन के खिलाफ कार्रवाई करे के बात करे रीहिस फेर आज तक रेणुका ह रोवत हे अऊ जयचंद अऊ मीरजाफर मन ह सरकार बने के खुशी मनावत हे।
इही हाल राजनांदगांव जिला ले लेके बस्तर अऊ सरगुजा म हे। हरईया ह हार गे अऊ पार्टी के घलो सरकार बन गे अब का करे बर हे। भीतरघात करईया मन के सूची अतेक लम्बा हे के  ओमन ल पार्टी ले निकाल दीही त लोकसभा चुनाव के का होही।
अइसने होथे जीतने वाला दल ह अपन भीतरघाती मन ल भुला जाथे अऊ सरकार बने के खुशी म मगन हो जथे। अऊ हरईया मन ह दु चार दिन जोर लगाथे अऊ तहां ले ए सोच के कलेचुप बइठ जथे के अगला चुनाव आही त महु ह मजा चखाहुं।
सत्ताबाजी दल के जब ए हाल हे त जेखर सत्ता नहीं आय हे तेखर त गोठेच बाल झन कर उहां त नीतईया घलो ह खुश नहीं हे। सत्ता आही त का का करबो कहीके सोचे रीहिन फेर सत्ता नहीं मिलीस त मुंह मसोस के रही गे।
इहों भीतरघाती मन ह सीना तान के चलत हे अऊ गोठियावत हे के कइसे कइसे करम करे बर पड़ीस हे। कांग्रेस म त अइसनेच होथे। प्रदेश अध्यक्ष चरणदास महंत ल हटाय ल पड़ गे नवा प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल ल बना दिन।
भूपेश बघेल के प्रदेश अध्यक्ष बने ले अजीत जोगी ह उपरे ऊपर भले बने काहत हे फेर भीतरे भीतर जी ह कतका जरत हे तेन ल ो जानत हे अऊ ओखर जी ह जातर हे। तभे त कही दिस मे हा लोकसभा चुनाव नहीं लड़व।
अजीत जोगी ह लोकसभा नहीं लड़ही त कांग्रेस के का बिगड़ही तउन ल कोनो नहीं जानय फेर एक बात त तय हे के जोगी लडय़ चाहे झन लडय़ कांग्रेस ल छत्तीसगढ़ म खोयबर कुछु नहीं हे। पा जही त वाहवाही जरूर मिलही। अऊ कांग्रेस तीर नेता मन के घलो कमी नहीं हे एक एक सीट ले दस-दस झन दावेदार बाइठे हे जोगी नहीं लड़ही त कोनो अऊ लड़ही।
आज कल त खुला बात अऊ भीतरघात के जमाना हे तभे त भीतरघाती जयचंद मीर जाफर मन के जगह जगह पूछ होवत हे।

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

कब चेतहु...


अभी जादा दिन नहीं बीते हे आंख फोड़वा कांड ल। फेर लागथे न तो सरकार चेते हे अऊ न डाक्टर मन चेतने वाला हे तभे त शिविर लगा लगा के मनमाने आपरेशन करत हे अऊ आम लोगन ल झंझट म डारत हे।
सिमगा म नसबंदी शिविर म फेर अइसने लपर-झपर के मामला सामने आय हे। तीस बिस्तर वाला अस्पताल म शिविर लगा के 52 झन माई लोगन के आपरेशन कर दिन। अऊ ए दरी घलों के बेवास्था नहीं करीन, आधा झन ल भुईयां म सोय ल पड़ीस, जाड़ के दिन म मे सब ह अतीयाचार वो हम त अऊ काय हे।
वो त पार्षद ल पता चलीस अऊ हल्ला गुल्ला मचीस त आनन भानन म दरी वरी मंगवाय गीस। सीएमओ ह त ए लंदर फंदर काम बर स्वास्थ्य केन्द्र ल दोसी बताये पल्ला झाड़ लीस। फेर अइसने कब तक चलही तेखर जवाब कखरो तीर नहीं हे।
सरकार ह हर स्वास्थ्य केन्द्र ल शिविर लगा के नसबंदी अऊ आंख के आपरेशन करे ल केहे हे फेर डॉक्टर मन ह हड़बड़ी म एकेच दिन म मनमाने आपरेशन कर देथे। यहु नहीं देखय के हड़बड़ी म गड़बड़ी होवत हे अऊ ओखर मन के करनी ल आम आदमी ल मरे ल पड़त हे।
पउर बालोद म अइसने आंखी के आपरेशन बर शिविर लगाय रीहिस, कतेक झन के आंखी फुट गे। हल्ला मचीस त दु चार डॉक्टर मन ल सस्पेंड कर दिन अउ डॉक्टर मन हल्ला गुल्ला मचाईन त मामला के लीपा-पोती कर दिन।
छत्तीसगढ़ म स्वास्थ्य सेवा के बुरा हाल हे। सरकारी अस्पताल के त भगवानेच ह मालिक हे डॉक्टर हे त दवई नहीं हे अऊ ले दे के शिविर करवात हे तउनों ह गड़बड़ सड़बड़ चलत हे। उपर ले नवा नवा नियम अलग चलत हे। डॉक्टर मन ह अपन घर ले दुकान चलावत हे अऊ दवई कंपनी ले पइसा खाके मांहगी दवई लिखत हे।
अतका लुट मचे हे के झन पूछ कहात हे। उपर ले मजबूरी ए हे के गांव गांव म झोला छाप डॉक्टर मन छछल गे हे। का दवई देवत हे का ईलाज करत हे तेखर ठिकाना नहीं हे। अइसने में छत्तीसगढ़ के का कइसन विकास होही कोनों नई जानय।
सरकार ह जब ले 35 हजार रूपया के ईलाज के बात करे हे तब ले डॉक्टर मन के लुट ह अऊ बाढ़ गे हे। कहु कछु बीमारी बता के सीधा बच्चादानी ल निकाल लेवत हे। अइसन डॉक्टर मन के चिंहारी घलो होगे फेर एखर मन के कुछु नहीं बिगड़ीस। सरकार ह काखर अइसन मन उपर कड़ा कार्रवाई नहीं करय कोनों नहीं जानय।
जतका मुंह ततका बात। फेर एक बात महुं ल कहना है के जब तक लापरवाही बरतने वाला मन उपर कड़ा कार्रवाई नहीं होही। ए लंदर-फंदर चलत रही अऊ आम लोगन मन मरत रही।

गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

तहीं इज्जत नहीं करबे त दूसर ल का परे हे...


छत्तीसगढ़ राज बनगे अब छत्तीसगढ़ी भासा बर आंदोलन होवत हावय, विधानसभा ले लेके सड़क तक लड़ई चलत हे। स्कूल-कालेज म पढ़ाय के उदीम घलो होवत हावय फेर मामला ह हर घांव अटक जाथे।
कोनो भी राज के विकास बर उहां के भाखा-बोली के खास महत्व हे ए बात ल छत्तीसगढिय़ा मन ह कब समझही। जब तक अपन भाखा के इज्जत नहीं होही देश दुनिया म राज के इज्जत कइसे होही। गांव-गांव म रहवईया मन म हीन भावना आ जथे के वोला हिन्दी अऊ अंग्रेजी बने ढंग के नई अवय। अऊ जब कखरों म हीन भावना आ जथे त न वो ह बने ढंग के गोठियाय सकय न अपन परेशानी ल बताय सकय। तभे त अफसर मन तीर बोले म हिचकथे।
एखर सेती हमर मानना हे के जब तक छत्तीसगढ़ी ह सरकारी काम काज के भासा नहीं बनहीं छत्तीसगढिय़ा मन के विकास होना मुश्किल हे।
अतका छोटे से बात ल इहंा के नेता मन काबर नहीं समझय। वो मन काबर छत्तीसगढ़ी ले भागत हे। तउन समझ म नहीं आवय। वोट पाय बर छत्तीसगढ़ी बोलही अऊ जीत जही तहां ले मनमाने हिन्दी अंग्रेजी झाड़थे।
मोला हेमलाल के पीरा ह आज ले सुरता हे। बपरा ह नवा नवा सरपंच बने रीहिस। गांव के विकास के ओला अड़बड़ चिंता रीहिस। गांव के समस्या ल ले के मंत्री तीर गीस। मंत्री ह छत्तीसगढिय़ा हे फेर हेमलाल तीर अइसे हिन्दी झाड़त रीहिस के ओखर जी खिसियागे। सीधा सीधा कही दिस देख गा वोट मांगे बर आथस त छत्तीसगढ़ी म गोठियास आरस मंत्री बन गेस त तोर पॉवर हे अतेक बाढ़ गे। मोरेच तीर हिन्दी झाड़त हस अइसने तोर हाल रही त तोर नेतागिरी ह कब सिराही तहीं गम नहीं पावे।
उहां ले आके हेमलाल ह गांव वाला मन तीर अपन पीरा ल कतका नहीं गोठियाय रीहिस। अऊ आज हेमलाल के बात ह सिरतोकेच होगे। मंत्री ह चुनाव हार गे। ओखर अता पता नहीं हे।
रमन सरकार के हैर्टिक के शपथ ग्रहण म हिन्दी म हावथ लेवत देख आज मोला हेमलाल के गोठ-बात ह सुरता आगे। एक झन बृजमोहन अग्रवाल ल छोड़ कोनो छत्तीसगढ़ी म शपथ नहीं लीन। जेन बृजमोहन अग्रवाल ल सब झन परदेशिया कथे तेन ह छत्तीसगढ़ी म शपथ लीन अऊ जेन मन ह छत्तीसगढ़ी के नाम देश दुनिया म करना चाही तउन मन ह हिन्दी झाड़त रीहिन।
मैं ह हिन्दी भासा के विरोधी तो हंव न मोला हिन्दी बोलईया मन ले कोनो दिक्कत हे। हमर देश के भासा हे फेर मे हा अतका जानथौ के जेन ह अपन भासा के इज्जत नहीं करय वो भासा ह त समाप्त होही जथे ओखर संस्कृति ह घलो नस्ट हो जथे। अऊ वो ह इतिहास म पेढ़ के लइक रही जथे। जेन ह अपन भासा के इज्जत नहीं करय ओखर ईज्जत चलो कोनो नहीं करय।
अऊ इही हाल छत्तीसगढिय़ा नेता मन के रही त छत्तीसगढ़ के विकास कइसे होही। हमर जीयो अऊ जीयन दो के संस्कृति के का होही तेखर सेती समय रहत चेतावत हौ बाद म पछताय के सिवाय कुछु नहीं बाचहीं।