रविवार, 11 अक्टूबर 2026

अब बीजेपी की पत्रिका में जेन जी के लिए अपशब्द

 अब बीजेपी की पत्रिका में जेन जी के लिए अपशब्द 



देश में राजनीति के कई रंग देखने को मिलते हैं, लेकिन जब सत्ता और उसकी पत्रिकाएं भाषा की मर्यादा की सीमाओं को लांघने लगें, तो सवाल पूछना ज़रूरी हो जाता है। आज हम बात कर रहे हैं छत्तीसगढ़ से प्रकाशित होने वाली बीजेपी की मासिक पत्रिका 'दीप कमल' के सितंबर अंक की।

यह अंक 'पीएम मोदी विशेषांक' के रूप में छापा गया है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गुणों का बखान किया गया है। रामचरितमानस की चौपाइयों का सहारा लेकर सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेतृत्व की तारीफ की गई है। लेकिन इस तारीफ के आवरण में जिस तरह की भाषा और शब्दों का इस्तेमाल विपक्षी नेताओं, युवाओं और आंदोलनों के लिए किया गया है, उसने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है।


 पत्रिका के संपादकीय में दिल्ली में हुए जेन-जी (Gen-Z) के आंदोलनों और युवाओं का जिक्र इशारों-इशारों में किया गया है। लेकिन इसके लिए किन शब्दों का प्रयोग हुआ? संपादकीय में लिखा गया है कि "नालायक और निकम्मे तिलचट्टों (कॉकरोचों) के प्रति भी मोदी जी ने सदाशयता दिखाई है"।

सोचिए, जो युवा अपने अधिकारों, शिक्षा या रोज़गार के लिए आवाज़ उठाते हैं या आंदोलन करते हैं, उन्हें 'नालायक' और 'निकम्मा तिलचट्टा' कहा जा रहा है। लोकतांत्रिक देश में असहमति और आंदोलन का अपना स्थान होता है, लेकिन विरोध को इस तरह की शब्दावली से संबोधित करना सत्ता के अहंकार और संवाद की कमी को दर्शाता है।


बात यहीं खत्म नहीं होती। इस संपादकीय में मुख्य विपक्षी नेता राहुल गांधी को 'लिलजिला और पिलपिता' तक कह दिया गया है।

अब सवाल यह उठता है कि यह भाषा लिखी किसने है? छत्तीसगढ़ में छपने वाली इस पत्रिका के संपादक हैं पंकज झा। पंकज झा कोई साधारण पत्रकार या लेखक नहीं हैं, बल्कि वे राज्य के मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार भी हैं। जब संवैधानिक पद के करीब बैठा कोई व्यक्ति इस प्रकार का संपादकीय लिखता है, तो सवाल सीधा सरकार और उसकी मंशा पर उठता है।


शुरुआती दौर से ही जेएनयू और युवा आंदोलनों को लेकर बीजेपी के केंद्रीय व प्रांतीय नेताओं के बयान लगातार चर्चा में रहे हैं। चाहे देश के शीर्ष नेतृत्व के बयान हों या संगठन के अन्य नेताओं के—अक्सर युवा आंदोलनों और विचारधाराओं पर तीखे हमले किए गए हैं।

जब सत्ता में बैठे नेता या उनके सलाहकार संस्थाओं और युवाओं को लेकर ऐसा रुख अपनाते हैं, तो यह केवल एक बयान नहीं रहता, बल्कि यह एक राजनीतिक दृष्टिकोण बन जाता है। एक तरफ जहां पीएम मोदी के गुणों के गान के लिए धार्मिक ग्रंथों की चौपाइयों का सहारा लिया जाता है, वहीं दूसरी तरफ लोकतंत्र में सवाल पूछने वालों के लिए ऐसी भाषा का प्रयोग किया जाता है।


लोकतंत्र में किसी नेता की तारीफ करना या उनके योगदान को रेखांकित करना गलत नहीं है, लेकिन इसके लिए विरोधियों या युवाओं को नीचा दिखाना और अमर्यादित भाषा का सहारा लेना कितना सही है? क्या एक सरकारी/पक्षीय पत्रिका के संपादकीय में इस तरह की शब्दावली होनी चाहिए?