शुक्रवार, 15 जनवरी 2021

प्रदूषण की मार...


 

एक तरफ छत्तीसगढ़ की राजधानी को खूबसूरत बनाने की कोशिश हो रही है तो दूसरी तरफ हवा में घुलते जहर ने आम लोगों की तकलीफे बढ़ा दी है। ठंड में यह तकलीफ और भी बढ़ जाती है, इसके पीछे जिस तरह का खेल पर्यावरण विभाग के अफसर कर रहे है वह रायपुर को प्रदूषित शहर बनाने की न केवल कोशिश है बल्कि सरकार के लिए एक गंभीर चुनौती है।

रायपुर से लगे औद्योगिक ईकाईयों में जिस तरह से नियम कानून की धज्जियां उड़ाई जा रही है वह हैरान कर देने वाली है, कुछ पैसे बचाने के नाम पर हो रहे इस खेल के पीछे न केवल पर्यावरण विभाग के अफसर शामिल है बल्कि राजनेताओं का भी वरदहस्त हासिल है। हालांकि यह सब प्रदेश के सभी क्षेत्रों में हो रहा है लेकिन राजधानी से जो उद्योगों में यह सारी सीमाएं लांघने लगी है।

न केवल वायु प्रदूषण बल्कि जल प्रदूषण भी बेतहाशा हो रहा है। विकास के इस अंधानुकरण दौर में आम आदमी का जीना मुहाल है। छत्तों में जमते काले धुंए के कण ने कई तरह की गंभईर बीमारियों को न्यौता दिया है ऐसे में क्लीन सिटी-ग्रीन सिटी के सपनों का क्या होगा।

हैरान करने वाली बात तो यह है कि इस प्रदूषण और उनसे हो रही तकलीफों की शिकायत के बाद न तो कार्रवाई की जाती है और न ही संज्ञान में ही लिया जाता है।

औद्योगिक प्रदूषण के चलते राजधानी में दमा एलर्जी और दूसरी बीमारियों के मरीजों में बेतहाशा वृद्धि हो रही है और इस खेल में पक्ष-विपक्ष की एका भी चौंकाती है कि क्या राजनेताओं की रईसी के आगे आम आदमी के जीवन का कोई मूल्य नहीं है।

भाजपा जब सत्ता में थी तो उसके विधायक भी कई बार सवाल उठाते रहे हैं और आज जब कांग्रेस सत्ता में है तो कांग्रेसी विधायक सवाल उठा रहे है लेकिन इन सवालों का जवाब पर्यावरण विभाग में बैठे अफसरों की चुप्पी के आगे शून्य हो जाता है।

गुरुवार, 14 जनवरी 2021

मोदी सत्ता की कहानी...


 

किसान आंदोलन को लेकर देश भर में जिस तरह का माहौल बनता जा रहा है उससे भले ही मोदी सत्ता ने आंखे मूंद ली हो लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने विश्वास का संकट तो खड़ा कर ही दिया है। ऐसे में किसान आंदोलन क्या मोड़ लेगा यह कहना मुश्किल है।

किसानों ने जिस तरह से कड़ा रूख अख्तियार किया है उससे सत्ता की सभी कोशिश विफल होने लगी है। आंदोलन में मौजूद एक किसान का वीडियो जिस तरह से वायरल हो रहा है वह सत्ता की बेचैनी बढ़ा सकती है।

इस वीडियो में एक किसान एक होशियार छात्र की कहानी सुनाते हुए कहता है कि यह सत्ता चुनाव जीतने के लिए हर मुद्दे को हिन्दू-मुस्लिम और राष्ट्रवाद से जोड़ देता है। किसान एक छात्र की प्रतिभा की कहानी भी सुनाता है और बताता है कि कैसे एक छात्र ने गाय का निबंद याद कर लिया और अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया।

छात्र के गाय के निबंध से खुश शिक्षक ने बाकी छात्रों को उलाइना दी तो बाकी छात्रों ने कहा कि इस छात्र को गाय के निबंध के अलावा दूसरा कोई निबंध नहीं आता तो शिक्षक ने उस छात्र से रेल यात्रा पर निबंध लिखने कहा-

छात्र ने रेल यात्रा पर निबंध लिखा - एक बार वह रेल यात्रा पर निकला, मौसम सुंदर था, थोड़ी देर में रेल एक गांव से गुजरा, तो गांव के बाहर गाय घास चर रही थी। गाय हमारा पालतू पशु है उसके चार पैर होते है...... फिर उसने गाय का निबंध लिख मारा।

शिक्षक हैरान उसने फिर उससे कहा कृष्ण भगवान पर निबंध लिखो.....

छात्र ने पुन: अपनी प्रतिभा दिखलाई- भगवान कृष्ण का जन्म अष्टमी को जेल में हुआ वे नंदबाबा के घर में रहने लगे वहां वे गाय चराने जाते थे गाय पालतू पशु है उसके चार पैर होते है....।

शिक्षक हैरान लेकिन निबंध गलत भी नहीं कहा जा सकता था।

किसान का कहना था तो ऐसी ही है इस सत्ता की प्रतिभा। मुद्दे कुछ भी हो वह देशद्रोह, हिन्दू-मुस्लिम में हर मामले को ले ही आता है। अब किसानों को खालिस्तानी नक्सली कह रहे है तो फिर उनके साथ बैठक क्यों कर रहे हैं? यह वीडियो जिस तरह से वायरल होने लगा है उससे सत्ता को लेकर कई तरह के सवाल खड़ा होने लगा है ऐसे में कानून वापस नहीं लेने को किये जा रहे छल-प्रंपच से भी किसानों में आक्रोश है।

बुधवार, 13 जनवरी 2021

विश्वास का संकट...


 

सुप्रीम कोर्ट में किसान आंदोलन को लेकर जो फैसला दिया है उसे लेकर आने वाली प्रतिक्रिया ने एक बार फिर विश्वास का संकट खड़ा कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने तीनो ंकानून के अमल पर रोक लगाते हुए कमेटी गठित कर दी है। और यही से सवाल उठा है कि इस फैसले से क्या सरकार को राहत नहीं मिली है।

हमने कल ही कह दिया था कि यह समर्पण का स्वर है, समर्पण की ध्वनि साफ सुनाई पड़ रही है क्योंकि किसानों ने जब साफ कह दिया है कि तीनों कानून को वापस लिये बगैर वे घर नहीं लौटने वाले है। और कृषि जब राज्य का अधिकार है तब इस तरह का कानून बनाना किस तरह से उचित है!

ये सच है कि सुप्रीम कोर्ट ने आंदोलन को लेकर सरकार के खिलाफ तीखे प्रहार किये हैं लेकिन यह भी सच है कि कमेटी में जिन सदस्यों को लिया गया है उनमें से चार सदस्य तो किसान कानून के समर्थक है।

ऐसे में आंदोनकारी किसानों के गुस्से को जायज ही कहा जाना चाहिए कि आखिर जो लोग पहले से ही इन तीनों कानून के समर्थन में है वे किस तरह से न्याय करेंगे। और जब कमेटी ही पक्षधर हो तो फिर न्याय कैसे निष्पक्ष होगा।

पिछले वर्षों में जिस तरह से विरोध के स्वर को देशद्रोह की संज्ञा दी जाने लगी है वह हैरान कर देने वाला है कि आखिर हम किस तरह का देश बना रहे हैं।

सवाल यह नहीं है कि अटार्नी जनरल ने आंदोलन को खालिस्तानी मदद बताया है? और न ही सवाल यह है कि आंदोलन को लेकर किसान क्या सोचते है। सवाल तो यही है कि क्या सत्ता के खिलाफ होने वाले हर बड़े आंदोलन को देशद्रोही करार देने का प्रचलन चल पड़ा है और क्या यह गंभीर बात नहीं है।

फिलहाल किसानों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले से असहमति जता दी है और ऐसे में भले ही सरकार के लिए यह फैसला राहत भरा है लेकिन इससे विश्वास का संकट तो खड़ा हो ही गया है।

ऐसे में यह शेर याद आना चाहिए-

मेरा मुनसिब ही मेरा कातिल है

क्या मेरे हक में फैसला देगा।

मंगलवार, 12 जनवरी 2021

मी लार्ड... ये समर्पण ध्वनि है...!


 

किसान आंदोलन को लेकर जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने बीच का रास्ता निकालने की वकालत की वह हैरान कर देने वाला है। और कई तरह के सवाल भी खड़ा करने वाला है। आखिर सुप्रीम कोर्ट ने बीच का रास्ता निकालने की वकालत करने की बजाय आंदोलन को लेकर कोई बड़ा फैसला करने से क्यों हिचक रही है। सवाल यह नहीं है कि सरकार के रवैये को लेकर सुप्रीम कोर्ट भी जब नाराज है तो वह सीधे कानून को गलत क्यों नहीं कह देती और न ही सवाल आंदोलन में शामिल बूढ़े-बच्चों या महिलाओं का है।

सवालतो यही है कि आखिर सुप्रीम कोर्ट को किस बात का इंतजार है। क्या संविधान में मिले आम आदमी के अधिकारों की रक्षा नहीं की जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह से महिलाओं और बच्चों की बात कही है, उससे सवाल यह उठता है कि सुप्रीम कोर्ट यह कैसे भूल सकती है कि किसानी के कार्य में घर का एक-एक सदस्यों का भागीदारी होती है, हल जोतने से लेकर कटाई में और खेत में खाना पहुंचाने की स्थिति में परिवार के बच्चे महिलाएं शरीक होती है।

सवाल यह नहीं है कि सरकार आंदोलन को खत्म करने के तरीके ढंूढ रही है जबकि सुप्रीम कोर्ट को इस सवाल को ध्यान में रखना चाहिए कि आखिर जो विपक्ष संसद में संशोधन की मांग कर रही थी उसे अनसुना कर चोर दरवाजे से कानून बनाने की कोशिश क्यों हुई फिर संसद में संशोधन से इंकार करने वाली सरकार आंदोलन के बाद संशोधन के लिए क्यों तैयार हो गई है।

यानी इस देश में बहुमत का दम्भ भरने वाली सरकार को आंदोलन से ही झुकाया जा सकता है।

ऐसे कितने ही सवाल है जो सुप्रीम कोर्ट को ही कटघरे में खड़ा कर रही है? आखिर सुप्रीम कोर्ट क्यों नहीं कह रही है कि कानून गलत है उसे लागू करने का तरीका गलत है। सवाल कई है, और यही हाल रहा तो सुप्रीम कोर्ट की विश्वसनियता पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगेगा।

यह समर्पण ध्वनि है

साफ दिख रहा है 

किसानों का दर्द

लेकिन सत्ता को इससे

क्या लेना देना

वर्तमान भूत और

भविष्य को कुचलने

की कोशिश का

एहसास उन्हें भी है

जो न्याय की वकालत करते है

लेकिन राजा के पीछे

खड़ी चतुरंगी सेना

को सत्ता से मोह है

और न्याय ठिठक सा गया है।

राजा के मन की बात

न समझ में आये

तब भी ताली बजानी पड़ती है

क्योंकि यह समर्पण ध्वनि है

दौर है, समर्पण ध्वनि है।

सोमवार, 11 जनवरी 2021

धर्म-राष्ट्रवाद और रंगभेद



आस्ट्रेलिया में क्रिकेट खेल रहे भारतीय खिलाडिय़ों को जिस रह से रंगभेदी टिप्पणी से दो चार होना पड़ा और उसके बाद जिस तरह की प्रतिक्रिया आई है यह सब सभ्य होने का दावा करने वाले समाज के लिए चिंता का विषय है। यूरोप अमेरिका सहित कई देशों में नस्ल को लेकर आज भी विवाद उतने ही गहरे है जितने एशियाई देशों में धर्म और जाति को लेकर विवाद है।

दरअसल कट्टरपंथियों की अपनी जमात है जिन्हें मानवता से ज्यादा खुद की चिंता होती है। और अपने को श्रेष्ठ कहलाने के फेर में ये लोग झूठ-अफवाह का सहारा लेकर नफरत के न केवल बीज बोते है बल्कि कुर्तकों के खाद पानी से उन्हें संचित करते रहते हैं।

पढ़े लिखे और सबसे सभ्य कहलाने का दावा करने वाले देशों में जिस रह से रंगभेद और धर्म को लेकर आये दिन तमाशा खड़ा कर प्रताडि़त करने का उपक्रम किया जाता है वह हैरान कर देने वाला है।

भारतीय खिलाडिय़ों के साथ यह व्यवहार पहली बार नहीं हुआ है पहले भी इस तरह की टिप्पणी से भारतीय खिलाड़ी अमानित होते रहे हैं और यह सबका अंत होते नहीं दिख रहा है।

यही हाल धार्मिक और जातिय श्रेष्ठता का हाल है। झूठ और अफवाह की चासनी में जिस तरह से नफरत परोसे जाते हैं वह मानवता को शर्मसार तो करता ही है, यह सोचने को भी मजबूर करता है कि सभ्यता की परिभाषा क्या होनी चाहिए।

भारत में राजनैतिक स्वार्थ के लिए आजादी के बाद से ही राष्ट्रवाद धर्म और जाति को श्रेष्ठ साबित करने के प्रयास में नफरत के जो बीज बोए गये उससे देश को न केवल आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा बल्कि एकता अखंडता को भी नष्ट करने की कोशिश हुई।

हाल ही में हुए दो आंदोलनों का जिक्र करना जरूरी है कि किस तरह से वर्तमान सत्ता और उससे जुड़े लोगों ने आंदोलन से जुड़े लोगों की राष्ट्रभक्ति पर सवाल उठाये। याद किजीए जब नागरिक बिल को लेकर शहर-दर-शहर शाहीन बाग बनने लगे तो इस आंदोलन में शामिल होने वालों को गद्दार, देशद्रोही और न जाने किस-किस तरह से गालियां दी गई। कोरोना के कारण आंदोलन समाप्त हो गया। लेकिन कट्टरपंथियों ने जिस तरह से शाहीन बाग के आंदोलनकारियों को गालियां दी वह हमारी राक्षसी प्रवृत्ति को ही उजागर करता है।

यही हाल किसान आंदोलन को लेकर हुआ। कट्टरपंथियों की जमात ने आंदोलनरत किसानों को गद्दार साबित करने जिस तरह से झूठ-प्रपंच का सहारा लिया वह शर्मसार कर देने वाला था। अपनी बात को सही साबित करने मुसलमानों के चेहरे बनाये गये, आईटीसेल ने किसान आंदोलन के दौरान नमाज पढ़ते मुसलमानों का वीडियो बनाकर यह बताने की कोशिश की कि कैसे मुसलमान किसान आंदोलन में शामिल है जबकि इस देश में मुसलमान भी बड़ी संख्या में किसान है।

हम यहां सत्ता के अहंकार को लेकर कुछ नहीं कहेंगे लेकिन सच यही है कट्टरपंथियों की जमात ने न केवल अपना नुकसान किया है बल्कि समाज और देश को भी शर्मसार करते रहे हैं।

दरअसल यह एक तरह का अपराध है जो मानवता का ही नहीं देश का दुश्मन है।

रविवार, 10 जनवरी 2021

इंतजार 26 जनवरी का...


 

किसान आंदोलन को लेकर सरकार के साथ अगली बैठक की तारीख भले ही 15 जनवरी बताई जा रही हो लेकिन सच तो यही है कि अब देश को उस 26 जनवरी का इंतजार करना चाहिए जिस दिन किसान राजपथ पर होंगे।

जिस तरह से 8 जनवरी की बैठक का नतीजा कुछ नहीं निकला और किसानों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने से इंकार कर दिया उससे एक बात तो साफ है कि किसान कृषि बिल को वापस लिये बिना मानने वाले नहीं है और न ही उन्हें न्यायालय पर भी वर्तमान दौर में भरोसा रह गया है या यह कहे कि न्यायालयीन व्यवस्था पर भी इस सरकार के रहते बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा हो गया है।

दरअसल झूठ और सिर्फ झूठ बोलकर सत्ता हासिल करने और नफरत की राजनीति के बीच जब देश का प्रधानमंत्री और गृहमंत्री का ध्यान सरकार चलाने की बजाय पार्टी को जीताने में ज्यादा रूचि लेने लगे तो संवैधानिक संस्थाओं को राजनैतिक होने से कैसे रोका जा सकता है और न ही सत्ता को मनमर्जी करने से ही कोई रोक सकता है।

बीते 6 सालों में मोदी सत्ता ने देश की हालत को जिस तरह से बनाया है उसके बाद विरोध का मतलब तब और कुछ नहीं रह जाता जब वह चुनाव दर चुनाव जीत ही रहा है। ऐसे में 70 के दशक को याद करना होगा जब आंदोलनों ने तब के विरोध को दबाने आपातकाल का सहारा लेते हुए विरोधियों को जेलों में ढूंस दिया था। और तब विरोधियों ने चुनावी राजनीति का हिस्सा बन सत्ता को चुनौती दी थी। इसी तरह से आंदोलन की वजह को जब सत्ता ने गलत करार दिया था तब आम आदमी पार्टी का उदय हुआ था।

इसका मतलब क्या वर्तमान में भी इसी तरह के हालात बनने लगे हैं। आप भले ही इससे सहमत न हो लेकिन सच तो यही है कि जिस तरह से किसान आंदोलन को लेकर सरकार ने अडिय़ल रूख अख्तियार किया है उसके बाद जय किसान- टैक्टर निशान के हालात बनते जा रहे हैं।

जिन लोगों को अब भी लगता है कि किसान आंदोलन गलत है वे जान ले कि पिछले 6 साल में सत्ता ने देश का वह हाल कर दिया है कि उसके लिए कृषि बिल को वापस लेने का मतलब आर्थिक बदहाली की ओर एक कदम और बढ़ाना रह गया है। कृषि बिल वापस होता है तो सत्ता की रईसी पर असर पड़ेगा और नहीं लेती है तो किसान मर जायेंगे।

आखिर इस हालात के लिए जिम्मेदार कौन है। ऐसे में यदि जिन लोगों को लगता है कि 15 जनवरी को सब कुछ ठीक हो जायेगा उन्हें 15 नहीं 26 जनवरी का इंतजार करना चाहिए क्योंकि किसानों ने यदि यह सब तय कर लिया है और सत्ता अड़ी हुई है तो जो कुछ 26 जनवरी को होगा वह इस देश के इतिहास में दर्ज होने वाला है।

शुक्रवार, 8 जनवरी 2021

कट्टरपंथियों की जमात...


 

अमेरिका में ट्रम्प समर्थकों ने जिस तरह से हिंसक वारदात की है, उससे कई सवाल खड़े हो गये हैं। भारतीय परिपेक्ष्य में भी इसे सोचने समझने की जरूरत है क्योंकि भारत में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो ट्रम्प की सत्ता के समर्थक रहे हैं और आज भी उन्हें भारत का मित्र साबित करने में लगे रहते हैं।

दरअसल कट्टरपंथियों की सत्ता का पूरी दुनिया में यही हाल है। जहां लड़ाई श्रेष्ठता की हो वहां यह सब होना लाजिमी है। दूसरी विचारधारा को खत्म करने की मंशा ही सच से मुंह फेरना है।

हाल के वर्षों में जिस तरह से नफरत की राजनीति की शुरुआत हुई है उससे भारतीय जनमास को झिकझोर कर रख दिया है। सामाजिक ताना बाना पर भी इसका दुष्प्रभाव देखा जा रहा है। सत्ता के लिए नफरत की राजनीति कट्टरपंथियों का हथियार हैं और वे नफरत फैलाने के लिए जिस तरह से झूठ भ्रम और अफवाह फैलाते हैं उससे समाज में हिंसा बढ़ती है।

अमेरिका में जो कुछ हुआ वह अचानक नहीं हुआ क्योंकि लोकतंत्र में कट्टरता की उम्र लंबी नहीं होती। यह बात भारत के भी उन कट्टरपंथियों को समझ लेना चाहिए जो सत्ता के लिए झूठ अफवाह और भ्रम का सहारा लेने से पीछे नहीं हटते। इससे न केवल सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो रहा है बल्कि इसका असर आर्थिक स्थिति पर भी पड़ रहा है।

मैं  आज भी हैरान हो जाता हूं कि जो धर्म या समाज अपने को श्रेष्ठ साबित करने में कट्टर हैं उन धर्म और समाज की खुद की स्थिति शर्मनाक है। अनेक जातियों और फिरकों में बंटे लोग जब स्वयं की एका की बात करते हैं लेकिन मौका आने पर अपनी जाति को सर्वश्रेष्ठ बताने हिंसा पर उतारू हो जाते हैं।

ये लोग अपनी श्रेष्ठता साबित करने जिस तरह से दूसरे पक्ष के इतिहास को उधेड़ते हैं वे लोग भूल जाते हैं कि उनके अपने इतिहास में भी उससे दुष्ट लोगों की कमी नहीं है लेकिन सत्ता के लिए वे इस हद तक नीचे गिर जाते हैं कि उन्हें देश से कोई सरोकार नहीं होता।

ऐसे ही एक कट्टरपंथी ने एक दिन अचानक कह दिया कि वे मांसाहारी को हिन्दू नहीं मानते जबकि सच तो यह है कि उसके परिवार के लोगों में से कई मांसाहारी है। इसी तरह एक ब्राम्हण ने कह दिया कि मांस खाने वाले ब्राम्हण नहीं है लेकिन भारत में ऐसे कई प्रांतों के ब्राम्हण है जो मांस का भक्षण करते है।

कट्टरपंथियों की वजह से ही हिंसा बढ़ी है। खाप पंचायत से लेकर ऐसे कई उदाहरण और दंगे हैं जो कट्टरपंथियों की घृणा की पराकाष्ठा है।

इसलिए भारत को भी अमेरिका में हुई घटना को लेकर चिंतित होना चाहिए।