सोमवार, 14 जून 2021

राम नाम की लूट...

 

राम मंदिर निर्माण के नाम पर जिस तरह से भ्रष्टाचार करने की खबरें आ रही है, वह हैरान कर देने वाला है। हालांकि राम के नाम पर न तो दुकानदारी नई है और न ही लूट-मार की कहानी ही नहीं है लेकिन ताजा मामले में जिस तरह से राम मंदिर निर्माण ट्रस्ट पर दो करोड़ की जमीन  को दस मिनट के भीतर 18 करोड़ में खरीदी की गई वह साफ संकेत देता है कि राममंदिर ट्रस्ट में बैठे लोग किस तरह से मंदिर निर्माण की आड़ में अवैध रुप से पैसा कमाने में लगे हैं।

दरअसल आस्था के नाम पर जिस तरह खेल चल रहा है वह न तो समाज हित में है और न ही धर्म के हित में ही है। ताजा मामला एक ऐसे जमीन घोटाले और साजिश की ओर संकेत करते हैं जो लोगों की आस्था पर प्रहार है। वैसे तो राम मंदिर निर्माण के मुद्दे में जब से संघ और भाजपा ने हस्तक्षेप किया तभी से पैसों के हिसाब किताब को लेकर सवाल उठते रहे हैं, पिछली बार हुए हजार करोड़ से उपर के चंदे का कोई हिसाब किताब नहीं दिया गया और इस बार भी बीस हजार करोड़ से अधिक रकम इकट्ठा हुआ है।

ऐसे में जिस तरह से जमीन घोटाले की खबर सामने आई है उसके बाद ट्रस्ट से जुड़े लोगों की भूमिका और नियत पर सवाल उठ रहे हैं। इस घोटाले का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ट्रस्ट से जुड़े लोगों ने राम के नाम पर किस तरह से लूट मचा रखी है। चूंकि पूरे प्रकरण का दस्तावेज सार्वजनिक हो गया है तब ट्रस्ट निर्माण करने वालों की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं।

राम के नाम पर इस तरह से कोई घोटाला करेगा यह सोचा ही नहीं जा सकता था लेकिन पूरे प्रकरण में जिस तरह का खेल खेला गया उसमें सत्ता की भागीदारी से भी इंकार नहीं किया जा सकता। ट्रस्ट के सचिव चंपत राय और ट्रस्ट के एक सदस्य अनिल शर्मा के मिलीभगत से केवल दस मिनट में जमीन की कीमत 2 करोड़ से बढ़कर 18 करोड़ हो गई और हैरानी तो यह है कि जमीन खरीदने के लिए स्टाम्प की खरीदी भी जमीन बिकने के दस मिनट पहले ही कर ली गई। यानी जिस जमीन को दो करोड़ में खरीदा जाना था उसे 18 करोड़ में खरीदने के लिए स्टाम्प दो करोड़ में खरीदने के पहले ही खरीद लिया गया। यही नहीं दोनों ही खरीदी बिक्री में ट्रस्ट के सदस्य अनिल शर्मा और अयोध्या के मेयर गवाह भी बन गए।

ऐसे में सवाल यह है कि मोदी सत्ता ने जो ट्रस्ट बनाई है वह क्या कर रही है। हालांकि संघ और भाजपा पर राम के नाम पर राजनीति करने और  लोगों की आस्था से खिलवाड़ करने का आरोप पहले भी लगता रहा है लेकिन इस जमीन घोटाले में रजिस्ट्री के दस्तावेज सामने आने के बाद सब कुछ साफ होने लगा है। देखना है कि इस घोटाले को दबाने के लिए सत्ता का प्रभाव कहां तक जाता है।

शनिवार, 12 जून 2021

शराब में सराबोर भूपेश सरकार...

 

शराब बंदी को लेकर सत्ता में आई भूपेश सरकार के राज में अब गांव-गांव में शराब की नदियां बहने लगी है। अवैध शराब कारोबारियों को जिस तरह से प्रश्रय दिया जा रहा है वह चिंतनीय है। अवैध शराब के खेल में जिस तरह से माफिया, पुलिस और नेताओं की मिलीभगत भी सामने आने लगी है। 

ऐसे में छत्तीसगढ़ के गांव-गांव की शांति छिन गई है और परिवार के परिवार बर्बादी की कगार पर है लेकिन सत्ता को शराब से होने वाली कमाई ही दिखाई दे रहा है। महासमुंद की रेल पटरी में जिस तरह की लाशें बिछी वह क्या आगे भी बिछती रहेगी। यह सवाल इसलिए है क्योंकि  अवैध शराब के कारोबारियों के शिकंजे में पूरा छत्तीसगढ़ फंस चुका है। बेमचा की उमा और उसकी पांच बेटियों की आत्महत्या का मामला भले ही कुछ दिनों बाद भूला दी जाए लेकिन सच तो यही है कि शराबी पति या शराबियों की वजह से न केवल घरेलु हिंसा बढ़ी है बल्कि अपराध में भी बढ़ोत्तरी हुआ है। सामाजिक ताने-बाने भी टूट रहे हैं और परिवार भी बिखर रहा है।

ऐसे में शराबबंदी की पहल कांग्रेस ने इसलिए की थी क्योंकि रमन सरकार में शराब की नदिया बहने लगी थी, थाने दस-दस हजार में बिकने की चर्चा थी और डॉ. रमन सिंह दारु वाले बाबा कहलाने लगे थे। शराब से परेशान छत्तीसगढ़ के लोगों ने कांग्रेस के वादे पर भरोसा किया और कांग्रेस प्रचंड बहुमत से जीत भी गई। कहा जाता  है कि शराब बंदी के वादे की वजह से महिलाओं ने कांग्रेस को एकतरफा वोट दिया था लेकिन  ढाई साल बाद भी भूपेश सरकार ने शराब बंदी की बात तो दूर इसके लिए न तो कोई सामाजिक जागरुकता ही चलाई और न ही कोई सरकारी स्तर पर ही पहल हुआ उल्टे अवैध शराब के कारोबारियों को प्रश्रय दिए जाने की खबर आने लगी है।

राजधानी रायपुर में ही किस तरह के लोग अवैध शराब का कारोबार कर रहे हैं यह किसी से छिपा नहीं है और इन लोगों की सत्ता से नजदिकियां भी किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में सरकार यदि शराब में डूब गई है कहा जाए तो गलत नहीं होगा जबकि यह किसी से छिपा नहीं है कि पिछले ढाई साल में सत्ता का शराब को लेकर क्या मापदंड है। जबकि सत्ता चाहे तो चरणबद्ध ढंग से भी शराब बंदी कर सकती है। यह ठीक है कि जिन राज्यों में शराबबंदी है वहां भी अवैध शराब बन रहे है लेकिन जागरुकता अभियान और चरणबद्ध ढंग से इसे अमलीजामा तो पहनाया ही जा सकती है।

शुक्रवार, 11 जून 2021

देश की पूरी दुनिया में बेइज्जती कर दी मोदी ने...

 

क्या देश के प्रधानमंत्री को झूठ बोलना चाहिए? क्या ये झूठ बोलने का संस्कार उन्हें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से मिला है? क्या देश में वैक्सीन  को लेकर प्रधानमंत्री के बयान झूठ का पुलिंदा है।

सवाल बहुत से हैं, लेकिन जब देश का प्रधानमंत्री बात-बात पर झूठ बोले तो न केवल देश को शर्मिन्दा होना पड़ता है बल्कि पूरी दुनिया में्  देश की बेइज्जती भी होती है। ताजा मामला प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का वह बयान है जिससे पूरी दुनिया में भारत की न केवल थूथू होने लगी है बल्कि यहां के वैज्ञानिक भी अपमानित महसूस कर रहे हैं।

हालांकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पहली बार झूठ नहीं बोले है और न ही उनकी हरकत से पहली बार ही देश शर्मसार हुआ है। इनसे पहले भी वे लगातार कई बार झूठ बोल चुके हैं, कोरोना की दूसरी लहर के नरसंहार को लेकर तो पूरी दुनिया में भारत की छवि को धक्का लगा है। लेकिन इस बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कोरोना वैक्सीन को लेकर जिस तरह से अपनी पीठ थपथपाते हुए कहा कि भारत को विदेशों से वैक्सीन प्राप्त करने में दशकों लग जाता था, पोलियो, चिकनपाक्स, हेपेटाइटीस बी हो देशवासियों को दशकों लग जाते थे। प्रधानमंत्री ने जिस अहंकार के साथ यह बात कही उससे साफ है कि उन्हें इस देश के वैक्सीन के न तो इतिहास की जानकारी है और न ही यहां के वैज्ञानिकों की क्षमता का ही पता हैं।

प्रधानमंत्री के इस कथन से दूसरे देशों में भारत की जो छवि बनी वह किसी बेइज्जती से कम नहीं है, भारत को जिस तरह से असहाय बताया गया वह प्रधानमंत्री को न तो शोभा देता है और न ही इससे भारत की छवि ही बनती है। वैक्सीन को लेकर प्रधानमंत्री मोदी बेशक अपना पीठ थपथपाते लेकिन सच तो यह है कि भारत में वैक्सीन 1948 से ही बनने लगा था, वैक्सीन के मामले में भारत दुनिया के कई देशों की वैक्सीन देता है और वैक्सीनेशन में तो भारत का नाम 1995 में ही गिनिज बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्ड में दर्ज हो चुका है। 

तब प्रधानमंत्री का इस तरह से वैक्सीन को लेकर की गई दावे का झूठ अब सामने आ गया है। दुनिया के कई देश कहने लगे है कि ये कैसा प्रधानमंत्री है जो अपनी देश के इतिहास से नावाकिफ है, अपने ही देश के वैज्ञानिकों का अपमान कर रहे हैं। बताया जाता है कि प्रधानमंत्री का यह वीडियो पूरी दुनिया में वायरल हो रहा है और भारत की क्षमता पर सवाल ही नहीं उठ रहे हैं बल्कि दुनियाभर में रह रहे भारतीयों को शर्मिन्दगी तक उठानी पड़ रही है। इसे लेकर कांग्रेस सहित कई दलों ने आपत्ति भी की है।

गुरुवार, 10 जून 2021

अर्थव्यवस्था की बर्बादी जानबूझकर की जा रही...

 

क्या मोदी सरकार अर्थव्यवस्था की बर्बादी जानबूझकर कर रही है, क्या मोदी सरकार कुछ चंद ऐसे लोगों के हाथों में पूंजी सौंपना चाहती है जो उनके इशारे पर चले?

आप कहेंगे ऐसे कैसे हो सकता है? कोई सरकार अपनी अर्थव्यवस्था क्यों बर्बाद करेंगी, देश की पूंजी कुछ गिने चुने हाथों में क्यों सौंपेगी? इससे उन्हें क्या लाभ है। फिर वह सत्ता जो अपने को घोर धार्मिक और राष्ट्रवादी बताते नहीं थकती। वह यह सब क्यों करेगी। तो इसका सीधा सा जवाब है कि सत्ता में लंबे समय तक बने रहने के लिए मोदी सरकार यह सब जानबूझकर कर रही है, कहा जाए तो गलत इसलिए भी नहीं होगा क्योंकि यह वह फार्मूला है जो आज से सत्तर साल पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक संचालक ने प्रस्तुत की थी।

आप यकीन नहीं करेंगे तो संघ के सरसंघ चालक गुरुजी गोवलकर की पुस्तक  'वी आर अवर नेशनहुड डिफाइंडÓ को पढ़ लीजिए। इसे पढ़ोगे तो समझ जाओगे कि अर्थव्यवस्था की कमर तोडऩे का मकसद क्या है। यह गुरुजी गोवलकर की पुस्तक में विस्तार से बताया गया है। गोवलकर ने लिखा है कि सत्ता में हमेशा बने रहने के लिए 95 प्रतिशत देश की अर्थव्यवस्था को बर्बाद करना जरूरी है। गोवलकर के नियम के अनुसार 95 प्रतिशत देशवासियों को गरीब बनाया जाता है और चंद गुलाम किस्म के लोगों को शक्तिशाली बनाया जाता है ऐसा हो जाने से सत्ता हमेशा हमेशा के लिए हथियाया जा सकता है।

अब आप सोचेंगे कि मोदी सरकार ने क्या किया है तो फिर बीते सात साल को बारिक से देखना होगा कि देश की अर्थव्यवस्था क्यों बर्बाद हुई, इसमें मोदी सत्ता की क्या भूमिका रही। तो मोदी सत्ता के आने के बाद क्या हुआ इसे समझने की जरूरत है। शुरुआत नोट बंदी से हुई कहा  जाए तो गलत नहीं होगा, इससे लोगों की जमा पूंजी पर क्या असर पड़ा यह किसी से छिपा नहीं है, फिर जीएसटी से मध्यम वर्ग के व्यापारियों  की कमर टूटने लगी। बैकों का एनपीए बढऩे लगा, सरकारी उपक्रम बेचा जाने लगा, रोजगार खत्म किया जाने लगा, दंगों से खरबों रुपये की सरकारी संपत्ति को नुकसान होता है यह भी कौन नहीं जानता।

इसके अलावा बीते सात सालों में संविधान को कमजोर किया गया, श्रम कानून को बदलकर उद्योगों का हित साधा गया, छोटे व्यापार की बजाय बड़े व्यापार को प्रश्रय दिया गया, यस बैंक का डूबना, जेट एयरवेज, आईएल एंड एफएस, बीएसएनएल, एयर इंडिया, वोडाफोन समेत कई कंपनी बर्बादी के कगार पर पहुंच गई। यदि संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट को माने तो 2016 से 2018 तक रोज 1095 अमीर भारतीय भारत छोड़कर विदेशों में बस रहे हंै। इसकी वजह से देश का अरबों-खरबों रुपया विदेश चला गया।

बीते 7 सालों में कई कंपनियां बंद हो गई, कई डिफाल्टर हो गयेे और चंद लोग तमाम मुश्किल के बाद भी पूंजी बढ़ाते रहे, वैसे तो गुलाम उद्योगपति कौन है यह किसी से छिपा नहीं है। जिन उद्योगपतियों ने सत्ता की नहीं सुनी, उन्हें भारत से निकल जाने दिया गया, और जो सुनी वे  अडानी, अंबानी, रामदेव सहित कई नाम आप गिन सकते है। अर्थव्यवस्था की इस बदहाली पर सरकार चुप है, वह आरबीआई का रिजर्व पैसा निकाल लिया है, चार लाख नई करेंसी छापने की खबर का मतलब भी जानना चाहिए क्योंकि इससे करेंसी की वैल्यू कम होना तय है और डॉलर  सौ रुपये के पार हो जायेगा।

तब देखना होगा कि क्या गोवलकर के किताब 'वी आर अवर नेशनहुड डिफाइंडÓ की अर्थव्यवस्था लागू की जा रही है। गोवलकर अपनी किताब में लिखतेे हैं अच्छे प्रशासन को यह तय करना चाहिए कि उनके राज्य में जनता की कमाई कम से कम हो और ज्यादा धनवान हो तो नियंत्रण कठिन होता है इसलिए पंूजी दो चार हाथों से ज्यादा न हो। अब आप बीते सात सालों को परखें और तय करे कि सत्ता क्या कर रही है।

बुधवार, 9 जून 2021

फिर ममता ने भाजपा को पटकनी दी...

 

पश्चिम बंगाल में मिली पराजय के बाद भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह से तृणमूल कांग्रेस पर प्रहार शुरु किया है इसके जवाब में जब तृणमूल सामने आई तो भाजपा की बोलती बंद हो गई है, राज्यपाल जगदीप धनखड़ के कारनामों की पोल खुलते ही पूरी भाजपा बचाव की मुद्रा में आ गई है जबकि बंगाल भाजपा में बवाल मच गया है, राज्यपाल के कारनामें की खबर से दिल्ली भी सकते में है और अब वह ममता पर प्रहार के लिए नए तरीके ढंूढ रही है।

यह बात किसी से छिपा नहीं है कि बंगााल में तृणमूल कांग्रेस ने ऐतिहासिक जीत दर्ज कर न केवल मोदी शाह की बोलती बंद कर दी बल्कि चुनाव परिणाम के बाद हुए हिंसा ने भाजपा में हताशा भर दी है। हालत यह है कि भाजपा के कई दिग्गज वापस टीएमसी में जाने न केवल छटपटा रहे है बल्कि कई नेता तो ममता बैनर्जी से अपनी गलतियों के लिए माफी तक मांग रहे हैं। परिणाम से हताश भाजपा ने यहां चुनाव बाद हुए हिंसा को पहले तो हिन्दू-मुस्लिम करने की कोशिश की लेकिन सच सामने आते ही लोकतंत्र के लिए खतरनाक बताने लगे लेकिन जब बंगाल की राजनैतिक हिंसा पर उठे सवाल ने भाजपा की बोलती बंद कर दी। चूंकि कोरोना काल की लापरवाही के चलते पूरे देश में जिस तरह  का नरसंहार हुआ है उससे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की छवि को गहरा आघात लगा है, जबकि बेरोजगारी और महंगाई ने आम आदमी का जीवन नारकीय बना दिया है। लेकिन मोदी सत्ता को इससे ज्यादा जरूरी काम है और वो काम है हिन्दू-मुस्लिम और विरोधियों को किनारे लगाना। और यह दोनों ही काम बंगाल में फेल हो चुका है। इधर मोदी सत्ता की करतूत से नाराज टीएमसी ने भी भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

ताजा मामला राज्यपाल जगदीप धनखड़ का है। किसी राजनैतिक दल की तरह काम करने के आरोपों के बीच राज्यपाल पर जिस तरह से आरोप लगे है वह न केवल भाजपा के लिए असहनीय है बल्कि संघ के संस्कार पर भी सवाल उठा रहे हैं। टीएमसी की फायर ब्रांड सांसद महुआ मोहत्रा ने राज्यपाल जगदीप धनखड़ को इस बार निशाने पर लेते हुए राज्यपाल के करतूतों की फाईल खोलने का दावा किया है। महुआ मोहत्रा ने राजभवन में राज्यपाल के द्वारा की गई नियुक्ति की सूची जारी करते हुए कहा है कि राजभवन में राज्यपाल ने अपने रिश्तेदारों और परिचितों की नियुक्ति कर माफी मांगने और दिल्ली लौट जाने की सलाह तक दे दी है।

महुआ मोहत्रा का दावा है कि राज्यपाल के ओएसडी शेखावत को धनखड़ के बहनोई के बेटे, रूचि दुबे ओएसडी को पूर्व एडीसी दीक्षित की पत्नी, प्रशांत दीक्षित पूर्व एडीसी के भाई हैं। वलिकर, किशन धनखड़ सहित कई नाम गिनाकर मोहत्रा ने सीधा हमला किया है। यही नहीं महुआ मोहत्रा ने तो यहां तक कहा है कि संघ के पालतु लोगों को अलग-अलग राज्यों में राज्यपाल बनाकर प्रधानमंत्री ने राज्यपाल की गरिमा गिरा दी है। ममता ने भाजपाा को पटकनी दी...

पश्चिम बंगाल में मिली पराजय के बाद भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह से तृणमूल कांग्रेस पर प्रहार शुरु किया है इसके जवाब में जब तृणमूल सामने आई तो भाजपा की बोलती बंद हो गई है, राज्यपाल जगदीप धनखड़ के कारनामों की पोल खुलते ही पूरी भाजपा बचाव की मुद्रा में आ गई है जबकि बंगाल भाजपा में बवाल मच गया है, राज्यपाल के कारनामें की खबर से दिल्ली भी सकते में है और अब वह ममता पर प्रहार के लिए नए तरीके ढंूढ रही है।

यह बात किसी से छिपा नहीं है कि बंगााल में तृणमूल कांग्रेस ने ऐतिहासिक जीत दर्ज कर न केवल मोदी शाह की बोलती बंद कर दी बल्कि चुनाव परिणाम के बाद हुए हिंसा ने भाजपा में हताशा भर दी है। हालत यह है कि भाजपा के कई दिग्गज वापस टीएमसी में जाने न केवल छटपटा रहे है बल्कि कई नेता तो ममता बैनर्जी से अपनी गलतियों के लिए माफी तक मांग रहे हैं। परिणाम से हताश भाजपा ने यहां चुनाव बाद हुए हिंसा को पहले तो हिन्दू-मुस्लिम करने की कोशिश की लेकिन सच सामने आते ही लोकतंत्र के लिए खतरनाक बताने लगे लेकिन जब बंगाल की राजनैतिक हिंसा पर उठे सवाल ने भाजपा की बोलती बंद कर दी। चूंकि कोरोना काल की लापरवाही के चलते पूरे देश में जिस तरह  का नरसंहार हुआ है उससे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की छवि को गहरा आघात लगा है, जबकि बेरोजगारी और महंगाई ने आम आदमी का जीवन नारकीय बना दिया है। लेकिन मोदी सत्ता को इससे ज्यादा जरूरी काम है और वो काम है हिन्दू-मुस्लिम और विरोधियों को किनारे लगाना। और यह दोनों ही काम बंगाल में फेल हो चुका है। इधर मोदी सत्ता की करतूत से नाराज टीएमसी ने भी भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

ताजा मामला राज्यपाल जगदीप धनखड़ का है। किसी राजनैतिक दल की तरह काम करने के आरोपों के बीच राज्यपाल पर जिस तरह से आरोप लगे है वह न केवल भाजपा के लिए असहनीय है बल्कि संघ के संस्कार पर भी सवाल उठा रहे हैं। टीएमसी की फायर ब्रांड सांसद महुआ मोहत्रा ने राज्यपाल जगदीप धनखड़ को इस बार निशाने पर लेते हुए राज्यपाल के करतूतों की फाईल खोलने का दावा किया है। महुआ मोहत्रा ने राजभवन में राज्यपाल के द्वारा की गई नियुक्ति की सूची जारी करते हुए कहा है कि राजभवन में राज्यपाल ने अपने रिश्तेदारों और परिचितों की नियुक्ति कर माफी मांगने और दिल्ली लौट जाने की सलाह तक दे दी है।

महुआ मोहत्रा का दावा है कि राज्यपाल के ओएसडी शेखावत को धनखड़ के बहनोई के बेटे, रूचि दुबे ओएसडी को पूर्व एडीसी दीक्षित की पत्नी, प्रशांत दीक्षित पूर्व एडीसी के भाई हैं। वलिकर, किशन धनखड़ सहित कई नाम गिनाकर मोहत्रा ने सीधा हमला किया है। यही नहीं महुआ मोहत्रा ने तो यहां तक कहा है कि संघ के पालतु लोगों को अलग-अलग राज्यों में राज्यपाल बनाकर प्रधानमंत्री ने राज्यपाल की गरिमा गिरा दी है।

मंगलवार, 8 जून 2021

फटकार के बाद मोदी...

 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का वैक्सीनेशन को लेकर दिया गया बयान को कुछ लोग देर आये दुरुस्त आये कह रहे हैं तो समर्थक वाह मोदी में लगे है लेकिन हकीकत में देखा जाये तो यह लातों के भूत बातों से नहीं मानते की कहावत को चरितार्थ करता है, सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह से दो हफ्ते में वैक्सीन और 35 हजार करोड़ का हिसाब मांगा था, वैक्सीन की दो कीमतों पर सवाल उठाया था और सरकार की तैयारी पूछा था उसके बाद आये इस निर्णय का सच तो यही है।

हैरानी की बा तो यह है कि जिस राष्ट्र के नाम संबोधन पर पूरी दुनिया की निगाह होती है उसमें भी कोई झूठ बोल दे, लफ्फाजी करे और अपनी लापरवाही की वजह से हुए नरसंहार पर आंख मूंद ले तो यह बेशर्मी की पराकाष्ठा के अलावा कुछ नहीं है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के झूठ की कहानी बताने से पहले यह बात आम लोगों को जान लेना चाहिए कि इस देश में गंगा में बढ़ती लाशें, चिताओं की लाईने और आक्सीजन तथा अव्यवस्था से हुई मौत न केवल सत्ता की लापरवाही के चलते हुई है बल्कि यह मोदी सत्ता के द्वारा किया गया नरसंहार है।

हम इसे सत्ता का नरसंहार इसलिए भी कहते हैं कि नमस्ते ट्रम्प और मध्यप्रदेश में सरकार बनाने के लोभ से शुरु हुई लापरवाही आज भी जारी है, सत्ता की लफ्फाजी और झूठ का कहर आम लोगों के दैनिक जीवन पर बुरी तरह टूटा है। जिस मुक्त वैक्सीन को लेकर आज मोदी समर्थक बेशर्मी से अपनी पीठ थपथपाने की कोशिश कर रहे हैं वे भी जान ले कि यदि सुप्रीम कोर्ट ने दो सप्ताह के भीतर जवाब देने सरकार को नहीं हड़काया होता तो सत्ता अभी भी उत्तरप्रदेश सहित सात राज्यों में होने वाले चुनाव की रणनीति के अलावा कुछ सोच ही नहीं सकती। और रणनीति भी झूठ नफरत और अफवाह पर टिकी हुई।

सुप्रीम कोर्ट के जिन सवालों की वजह से फ्री वैक्सीन की गई वह सवाल लोगों का जानना चाहिए। कोर्ट ने मोदी सत्ता से पूछा था कि जिस  35 हजार करोड़ संसद में लाया थआ वह 35 हजार करोड़ कहां कैसे खर्च किया जवाब दो, वैक्सीन की दो कीमत क्यों है, यदि पिछले साल से तैयारी थी तो ऑक्सीजन और दवाई के अभाव में लोग क्यों मरे, तैयारी थी तो वैक्सीन की कमी क्यों है, वैक्सीन को लेकर कहां क्या खर्च किया गया। ऐसे कितने ही सवालों को लेकर जह सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सत्ता को लानत भेजते हुए दो हफ्ते के भीतर जवाब देने कहा तब फ्री वैक्सीन का खेल शुरु हुआ है।

इस  संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी के झूठ से पहले बता दें कि मोदी सत्ता की तैयारी क्या थी, जब विशेषज्ञ ऑक्सीजन की जरूरत बता रहे थे तो मोदी सत्ता ऑक्सीजन विदेशों को बेच रही थी। जब दुनिया भर के देश 2020 में ही वैक्सीन खरीदने आर्डर दे रहे थे तो मोदी सत्ता असम-बंगाल में चुनाव जीतने की रणनीति बना रही थी, कोरोना की कमी होते ही दूसरे देशों को वैक्सीन बेची जा रही थी और दावा किया जा रहा था कि हमने कोरोना की लड़ाई जीत ली है और अब दुनिया को मदद करेंगे।

सत्ता की लापरवाही से हुए नरसंहार के बाद भी यदि कोई झूठ बोले तो सवाल उठना चाहिए कि क्या देश के प्रधानमंत्री को झूठ बोलना चाहिए। प्रधानमंत्री अब भी अपनी वाहवाही की भूख मिटाने झूठ बोलते है कि भारत ने दो वैक्सीन बनाई जबकि हकीकत यही है कि भारत ने  केवल कोवैक्सीन ही बनाई और यह कारनामा भारत टेक ने किया जबकि जिस कोविशील्ड को लेकर प्रधानमंत्री मोदी दावा करते हैं वह वैक्सीन आस्ट्राजेनिका आक्सफोर्ड का है और अदार पूनावाले का सिरम इंस्टीट्यूट ने लाइसेंस लेकर कोविशील्ड तैयार किया है। यानी आप देखेंगे कल स्पूतनिक, जानसन या दूसरी कंपनी का वैक्सीन यदि भारत में तैयार होने लगे तो क्या मोदी सत्ता इसी तरह का दावा करेंगी। लापरवाही के नरसंहार का जवाब तो सुप्रीम कोर्ट ने दो हफ्ते में मांगा है लेकिन सच आपके सामने है कि मोदी सत्ता तब जागी जब सुप्रीम कोर्ट हड़काया।

सोमवार, 7 जून 2021

ढाई साल का सच!

 

वैसे तो राजनीति में निश्चित कुछ भी नहीं होता है, तब ढाई-ढाई साल वाला फार्मूला क्या बला है? छत्तीसगढ़ में जब से कांग्रेस की सरकार आई है तभी से यह चर्चा जोरों पर रही कि भूपेश बघेल और सिंहदेव उर्फ बाबा के बीच ढाई-ढाई साल का बंटवारा हुआ है, और यह चर्चा अब तेज इसलिए हो गया है क्योंकि वर्तमान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का ढाई साल 17 जून को पूरा होने जा रहा है।

ऐसे में इस सच को आम लोगों को जानना भी जरूरी है कि आखिर यह ढाई साल क्या बला है और इसमें कितनी सच्चाई है। हैरानी तो लोगों को इसलिए भी है या ढाई-ढाई साल के चर्चे को बल इसलिए भी मिलता है क्योंकि इससे अब तक सीधे तौर पर नो मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कभी इंकार किया और न ही सिंहदेव ने ही कभी इसका सीधे समर्थन ही किया।

यदि दोनों नेता भूपेश बघेल और सिंहदेव इस फार्मूले को इंकार कर देते तो विवाद ही नहीं होता और यदि इस सवाल पर गोल-मोल जवाब  आ रहा है तो इसका मतलब साफ है कि यह फार्मूला कहीं न कहीं अस्तित्व में रहा है। तब सच का पड़ताल जरूरी है। तब सच क्या है?

पंद्रह साल के निर्वासन के बाद जब छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने भारी बहुमत से जीत दर्ज करने से पहले मुख्यमंत्री पद के दो दावेदार थे भूपेश बघेल और सिंहदेव! लेकिन बहुमत आते ही चरणदास महंत और ताम्रध्वज साहू भी मुख्यमंत्री की दौड़ में शामिल हो गए। एक अनार सौ बीमार की तर्ज पर जब मुख्यमंत्री बनने की होड़ मची तो किसी का किसी से समझौता मुश्किल हो गया। हालांकि तब भी मुकाबला भूपेश और सिंहदेव में ही था और दोनों पीछे हटने को तैयार नहीं थे।

जैसा कि कांग्रेस में अमूमन होता है लड़ाई के फैसला का निर्णय हाईकमान पर छोड़ दिया गया, और दो की लड़ाई में तीसरे को फायदे की न केवल उम्मीद ही बढ़ गई बल्कि हाईकमान ने भी साफ कह दिया कि जीत का श्रेय भूपेश बघेल और सिंहदेव को है लेकिन दोनों एक नहीं हो पा रहे हैं तो फिर उनका निर्णय ही सर्वोपरि होगा और हाईकमान के इस फैसले पर सभी यानी चारों दावेदार राजी भी हो गये।

अब सुनिये इस ढाई साल का सच। जिससे न भूपेश बघेल इंकार करते हैं न ही सिंहदेव उर्फ बाबा ही सीधे इंकार करते हैं। दरअसल ढाई साल का इस सच से कांग्रेस हाईकमान ने पहले ही दिन कह दिया था कि ये तुम लोग जानो। तुम लोग मतलब भूपेश बघेल और सिंहदेव। अब असल कहानी में आते हैं, हाईकमान पर निर्णय छोड़ दाऊ, बाबा और महंत लौटने लगे और अभी वे हवाई अड्डे पर पहुंचे ही थे कि ताम्रध्वज साहू के नाम पर मुहर लगने की खबर ने इस ढाई साल के फार्मूले की नींव रखी, उल्टा पैर लौटे भूपेश बघेल, सिंहदेव और चरणदास महंत ने सीधे राहुल गांधी यानी हाईकमान से कहा कि हमारे बीच सहमति बन गई है कि भूपेश बघेल को मुख्यमंत्री बनाया जाए। राहुल गांधी को सहमति का फार्मूला भी समझाया गया लेकिन कहते हैं राहुल गांधी ने साफ कह दिया कि इस फार्मूले को आप लोग जानो, अभी क्या करना है। तीनों का समवेत स्वर गूंजा भूपेश बघेल। और भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बन गये।

फार्मूले और सहमति का स्टाम्प पेपर तो है नहीं कि चुनौती दी जा सके और जब तक सीधे-सीधे दाऊ, बाबा और महंत कुछ नहीं कहेंगे यह कोई जान भी नहीं सकता कि आखिर सच क्या है, और जनता जान भी गये तो इसे लागू करवाने वाला हाईकमान को जानना ही नहीं मानना जरूरी है और हाईकमान जब किसी को कभी भी हकाल सकता है तो इस फार्मूले का मतलब ही क्या है।