सोमवार, 28 जून 2021

वे बेवकूफ बनते रहे और ये धोखा देते रहे...


ये इतना बड़ा सचा है जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि कोई तीन दशक से बेवकूफ बन रहे हैं, ठगे जा रहे है और कोई इन्हें इन तीन दशकों से धोखा दे रहे हैं। हम बात यहां कश्मीरी पंडितों का कर रहे हैं जिनका राजनैतिक शोषण की एक ऐसी कहानी है जो दुनिया में अपनी तरह का अजूबा मामला है। और कहा जाए कि कश्मीरी पंडित अब भी धोखा खाने तैयार है तो गलत नहीं होगा।

यही वजह है कि जब कल कश्मीर को लेकर बैठक हो रही थी तब भी कश्मीरी पंडितों का कोई प्रतिनिधि नहीं था और न ही बैठक में सरकार ने कश्मीरी पंडितों के पुर्नवास के लिए कोई योजना का जिक्र भी नहीं किया लेकिन यदि कश्मीरी पंडितों से पूछा जाए तो वह अब भी भाजपा को ही अपना रहनुमा बतायेंगे तो हैरान होने की बात नहीं है, क्योंकि भाजपा ने कश्मीरी पंडितों के अत्याचार का मुद्दा 1991 से लगातार देश-विदेश के हर मंच से किया है। अपने हर चुनावी घोषणा पत्र में भाजपा ने कश्मीरी पंडितों के पुर्नवास का वादा किया है नौकरी से लेकर दूसरा पैकेज का वादा किया जाता रहा है। लेकिन साढ़े 12 साल की सत्ता में भाजपा ने सिवाय राजनैतिक शोषणा के कश्मीरी पंडितों के लिए कुछ भी नहीं किया इसके बाद भी यदि कश्मीरी पंडितों को भाजपा से उम्मीद है तो इसका मतलब क्या हो सकता है।

कश्मीरी पंडितों के विस्थापन का इतिहास सिर्फ 31 साल पुराना है और तब केन्द्र में भाजपा के समर्थन में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार थी रातों रात एक लाख से अधिक कश्मीरी पंडितों को अपना सब कुछ छोड़़कर भागना पड़ा लेकिन भाजपा ने सत्ता नहीं छोड़ी, तब कश्मीर में राष्ट्रपति शासन था और राज्यपाल जगमोहन थे जो भाजपा के पसंद के थे। इसके बाद भी कश्मीरी पंडितों के साथ अत्याचार होते रहा, लेकिन भाजपा तब कुछ नहीं बोली।

हैरानी की बात तो यह है कि इसके बाद जब सत्ता चली गई तब अचानक 1991 में भाजपा कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार का मुद्दा अपनी चुनावी घोषणा पत्र में लेकर आयी और चूंकि यह उसके हिन्दू-मुस्लिम की राजनीति को सूट करती है इसलिए यह मुद्दा देश के हर राज्य में गूंजता रहा और कश्मीरी पंडित यह भूल गए कि यह सब अत्याचार किसके राज में हुआ तब से आज तक भाजपा कश्मीरी पंडितों का मुद्दा उठाते रही और कश्मीरी पंडित भाजपा को अपना रहनुमा मानते रहे।

2014 के बाद मोदी सत्ता ने भी कश्मीर पंडितों का मुद्दा उठाते रही लेकिन आप हैरान हो जायेंगे कि धारा 370 हटने के बाद भी भाजपा ने कश्मीरी पंडितों के लिए वादा के अलावा कुछ नहीं किया उसने कश्मीरी पंडितों के लिए उतनी भी नौकरी नहीं दी जितनी मनमोहन सरकार ने दी। मोदी सत्ता के आने के बाद भी कश्मीर में हालात नहीं सुधरे है और पिछले साल जिस तरह से घाटी में कश्मीर पंडितों की हत्या हुई है वह हैरान कर देने वाली है क्योंकि कश्मीर की पूरी सत्ता मोदी सत्ता के पास ही है।

तब सवाल यही उठता है कि क्या कश्मीरी पंडितों का मुद्दा भाजपा के लिए चुनावी फायदे का जरिया है। कश्मीरी पंडितों का राग अलाप वह पूरे देश में हिन्दू वोटों का ध्र्वीकरण करती है। सवाल तो कई है लेकिन देखना है कि अब कश्मीरी पंडितों की स्थिति क्या बनती है वे क्या सोचते है या क्या करते हैं। क्या वे अब भी खामोशी से अपनी पहचान के लिए तरसते रहेंगे!

शनिवार, 26 जून 2021

कश्मीर न नीयत न विश्वास

 

धारा 370 हटने के बाद केन्द्र की मोदी सत्ता ने जम्मू कश्मीर के नेताओं के साथ बैठक की। बैठक में जिस तरीके से कश्मीर के नेताओं ने केन्द्र की नियत पर सवाल उठाते हुए अविश्वास की लकीर खीची है उसका परिणाम क्या होगा अभी कहना जल्दबाजी होगी लेकिन इस बैठक  के बाद जो सवाल उठे हैं उसके बाद तो मोदी सरकार की नियत पर ही सवाल उठने लगे हैं। ये सवाल सिर्फ कश्मीर के नेता ही नहीं उठा रहे हैं बल्कि सालों भाजपा का साथ देने वाले कश्मीरी पंडित भी सवाल उठा रहे हैं।

सवाल यह नहीं है कि मोदी सत्ता ने बैठक उन लोगों के साथ क्यों की जिन्हें कैद करके रखा गया था या जिन्हें गलत कहते रही है। सवाल यह है कि क्या केन्द्र सरकार सचमुच कश्मीर की भलाई के लिए कार्य करना चाहती है तो फिर उसने कश्मीरी पंडितों के लिए धारा 370 हटने के बाद क्या किया, धारा 370 हटने के बाद कश्मीर के विकास के लिए क्या किया, और आगे वह क्या करना चाहती है। 

बैठक में जिस तरह से कश्मीरी नेताओं ने आक्रोश व्यक्त किया और मोदी सत्ता की नियत पर सवाल उठाये उसके बाद भी बैठक में मोदी सत्ता ने कश्मीर की शांति के लिए कोई योजना को सामने क्यों नहीं लाया। बैठक में केन्द्र ने क्यों नहीं बताया कि विस्थापित कश्मीरी पंडितों को किस तरह से पुर्नवास करेगी और चुनाव कब करायेगी। ऐसे में क्या यह नहीं माना जाए कि केन्द्र ने बैठक इसलिए बुलाई क्योंकि कश्मीर के हालात को लेकर अंतर्राष्ट्रीय मंच में सवाल उठने लगे थे, नेताओं को जेल में ढूंसने, इंटरनेट सेंवा बंद करने, रोजगार व्यवसाय ठप्प होने और लोगों का जीवन मुश्किल हो जाने का सवाल अमेरिका के उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने  उठाये थे जिससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की थू-थू होने लगी थी।

या फिर अगले साल होने वाले उत्तरप्रदेश के चुनाव को ध्यान में रखकर यह बैठक बुलाई गई थी। हो सकता है क्योंकि भाजपा की राजनीति में कश्मीर, पाकिस्तान और हिन्दू-मुस्लिम ही केन्द्र में रहा है तब सवाल यह है कि बैठक में कश्मीरी नेताओं के स्वर को उत्तरप्रदेश के चुनाव में इस्तेमाल किया जाए। तब सवाल यही है कि आखिर केन्द्र सरकार कश्मीर को लेकर कोई ठोस योजना क्यों नहीं बना रही है। जो कश्मीरी पंडित भाजपा पर इतना भरोसा करती है धारा 370 हटने के साल भर बाद भी उनके पुर्नवास के लिए केन्द्र ने कुछ भी पहल क्यों नहीं किया।

अब इस बैठक के बाद जो सबसे बड़ा सवाल है कि क्या भारतीय जनता पार्टी आगे भी कश्मीर को चुनाव मुद्दा बनाकर भुनाएगी। सवाल कई है लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि यदि भारत सरकार के प्रति कश्मीरियों में विश्वास नहीं जगेगा तो फिर ऐसे बैठकों का क्या मतलब है।

शुक्रवार, 25 जून 2021

मोदी का कद नापते योगी...

 

उत्तरप्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर राजनैतिक दलों की सक्रियता बढ़ गई है। देश व प्रदेश की सत्ता में काबिज भारतीय जनता पार्टी के लिए सत्ता में वापसी बढ़ी चुनौती है। लेकिन जिस तरह से उत्तरप्रदेश और दिल्ली में ठन गई है वह हैरान करने वाली इसलिए है क्योंकि भाजपा को अनुशासन वाली पार्टी कही जाती है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चाहते हैं कि उत्तरप्रदेश में भाजपा उसके ईशारे पर चले लेकिन उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नजर 2024 है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित पूरे गुजरात गैंग की नींद उड़ गई है। दरअसल उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ का कद इतना बढ़ गया है कि वहां नरेन्द्र मोदी का कद छोटा पडऩे लगा है। और उत्तरप्रदेश में जो कुछ चल रहा है वह सिर्फ कद की लड़ाई है।

हालांकि उत्तरप्रदेश की राजनीति को जानने वाले बताते है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उत्तरप्रदेश में अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया है, संगठन से लेकर सत्ता तक अपने लोगों को बिठा दिया है यहां तक कि राज्यपाल आनंदी बेन को बिठाया गया लेकिन योगी आदित्यनाथ काबू में नहीं रह गया। दरअसल यह हर कोई जानता है कि दिल्ली का सफर उत्तरप्रदेश से होकर जाता है और जब पूरी भाजपा में मोदी के बाद योगी का प्रचार हो तो गुजरात गैंग की बेचैनी स्वाभाविक है।

कहा जाता है कि नरेन्द्र मोदी की ताकत और रवैये को लेकर संघ की बेहद नाराज है और अब तो संघ ने भी योगी का खुलकर समर्थन कर दिया है लेकिन पार्टी में पूंजी के सहारे पकड़ रखने वाले गुजरात गैंग को पूरा विश्वास है कि वह आगे भी अपनी मनमानी चलाएगी। ऐसे में टकराव भले ही ऊपर से कम दिखाई दे रहा हो लेकिन भीतर खाने में यह बड़े रुप में महसूस किया जा सकता है।

बताया जाता है कि जिस तरह का खेल हो रहा है या सरकार की अक्षमता सामने आई है उसे लेकर संघ बेहद नाराज है और योगी का समर्थन इसी नाराजगी का नतीजा  है। हालांकि मोदी गुट इससे अनजान नहीं है इसलिए वह योगी को कमजोर करने या अपने दबाव में रखने का उपाय कर रही है यानी मोदी की नजर 2022 है तो योगी की नजर 2024 है।

बुधवार, 23 जून 2021

नासमझ सत्ता निष्ठुर सत्ता!

 

अभी महिने भर भी नहीं हुआ है जब केन्द्र की मोदी सरकार ने न्यायालय से कहा था कि सेन्ट्रल विस्टा में बन रहे प्रधानमंत्री के महल (आवास) के लिए पैसे की कोई कमी नहीं है और कोरोना से निपटने, टीकाकरण के लिए पर्याप्त पैसे है लेकिन महिना भी नहीं बीता कि उसने कोरोना से मृत लोगों को मुआवजा के लिए चार लाख नहीं होने का रोना रो दिया।

ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि मोदी सत्ता की प्राथमिकता क्या है, सचमुच उसे इस देश की समझ नहीं है या फिर वह इतनी निष्ठुर हो चुकी है कि उसे आम लोगों की तकलीफे से कोई लेना देना नहीं है।

यह सवाल इसलिए उठाये जा रहे हैं क्योंकि मोदी सत्ता की करतूत से हम देश के लोगों को अनेकों बार परेशानियों का सामना करना पड़ा है, लोगों की बेहिसाब मौते हुई है और कोरोना तो सीधे-सीधे मोदी सत्ता की लापरवाही का नरसंहार साबित हो चुका है। नासमझी और निष्ठुरता को सिलसिलेवार ढंग से देखना हो तो नोटबंदी की लाईने और इसकी वजह से डेढ़ सौ मौतों से शुरु हुआ सफर अब भी जारी है कोरोना को लेकर लापरवाही का नमस्ते ट्रम्प और मध्यप्रदेश में सरकार बनाने का लोभ को कोई कैसे भूल सकता है, फिर अचानक लॉकडाउन की नासमझी भरे फैसले से सड़कों में भूखे-प्यारे चलते मजदूर और सड़कों में उनकी मौत क्या सत्ता की नासमझी और निष्ठुरता नहीं है। दूसरी लहर में मौतों का तांडव, चिताओं की लम्बी लाईन, ऑक्सीजन की कमी, गंगा में बहती लाशे, सार्वजनिक क्षेत्र की बीस कंपनियों को बेच देना, रिजर्व बैंक के रिजर्व फंड का इस्तेमाल और सेन्ट्रल विस्टा, तीन हजार करोड़ की मूर्ति, आठ हजार करोड़ का खुद का विमान, प्रधानमंत्री के काफिले की गाडिय़ों का बदलाव से लेकर मोदी सरकार के किसी भी फैसले को देख लीजिए उसके पीछे सत्ता की नासमझी, लापरवाही और निष्ठुरता ही नजर आयेगी।

तब क्या मोदी सत्ता ने यह जान लिया है या मान लिया है कि हिन्दू-मुस्लिम और राष्ट्रवाद का रोग इतना भयावह है कि वह चार लाख मुआवजा न दे और कुछ भी करे तब भी सत्ता उसकी जाने वाली नहीं है। कोरोना का नरसंहार और कोरोना के मृतकों को चार लाख नहीं देने की बात क्या सत्ता का अत्याचार नहीं है। मोदी सरकार के लिए भले ही चार लाख रुपया कोई मायने नहीं रखता हो लेकिन इस बात को समझना होगा कि जिनके परिवार में कोरोना से मौत हुई है उनके लिए चार लाख रुपए क्या मायने रखते हैं, जिन्होंने ईलाज में लाखों रुपए गंवा देने के बाद भी जान नहीं बचा पाये उनके लिए चार लाख क्या मायने रखते हैं। शायद नरेन्द्र मोदी को परिवार और उसके दुख और परेशानी का अंदाजा नहीं होगा कि उनके लिए चार लाख के क्या मायने है।

ऐसे में सवाल यही है कि अपनी रईसी और अपना अहंकार बरकरार रखने करोड़ों-अरबों रुपए खर्च करने को तैयार सत्ता आखिर चार लाख  रुपए के लिए मना क्यों कर रही है जबकि लोकतंत्र में सत्ता तो जनता के हित के लिए बनी होती है।

मंगलवार, 22 जून 2021

श्री राम मंदिर चंदा का बंदरबाँट

 https://youtu.be/_1XJRSl-0ME

संघ का करतूत अयोध्या में दिखा...?

 

श्रीराम के नाम पर ठेकेदारी करने वालों को प्रभु राम ने पूंजी-सत्ता सब सौंप दी है लेकिन उनकी नियत अब भी साफ नहीं है और अब तक श्रीराम मंदिर निर्माण के नाम पर जिस तरह की धोखाधड़ी, छल, चंदाखोरी और दूसरे मामले सामने आने लगे हैं उसके बाद तो यह कहना मुश्किल हो गया है कि श्री राम के नाम पर लूट की प्रतिस्पर्धा नहीं चल रही है।

ताजा मामला तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट द्वारा खरीदी जा रही जमीनों की वैधानिक और राशि को लेकर मामला सामने आया है। पहले मामले में अयोध्या  के मेयर शामिल है तो दूसरे मामले में मेयर का भांजा शामिल है। संघ के चंपत राय की भूमिका तो किसी से छिपी ही नहीं है। हालत यह है कि संघ, भाजपा से जुड़े लोग कम कीमत पर जमीन खरीद कर मंदिर ट्रस्ट को ज्यादा कीमत में जमीन धड़ल्ले से बेच रहे है और राम के नाम पर सत्ता में काबिज लोगों को इसमें कुछ भी गलत नहीं दिखता। तब यह पैसों का बंदरबांट नहीं तो और क्या है।

अयोध्या के मेयर ऋषिकेश उपाध्याय के भांजे दीप नारायण ने दशरथ महल बड़ास्थान के महंत से जो जमीन बीस लाख में खरीदी उस जमीन को ट्रस्ट को ढाई करोड़ में बेच दी। दस्तावेज देखते ही पहली नजर में सब गड़बड़झाला दिख रहा है। राजस्व विभाग के अधिकारी भी इस रजिस्ट्री पर खुलेआम उंगली उठा रहे है लेकिन न ट्रस्ट की बेशर्मी रुक रही है और न ही सत्ता की बेशर्मी।

तब सवाल यही है कि जो संघ अपने को संस्कार, चरित्रनिर्माण और पता नहीं किस-किस तरह की नैतिकता सिखाने का दावा करता है वह क्या ऐसा ही संस्कार और चरित्र निर्माण करता है। हालांकि हमने पहले भी कहा है कि संघ ने जिस तरह से इस देश को धर्म के नाम पर नफरत में झोका है, राष्ट्रपिता की हत्या में शामिल होने क आरोपों के अलावा कितने ही आरोप संघ पर है और आजादी के बाद से अब तक संघ की गतिविधियों पर चार बार बंदिश भी लग चुका है तब सवाल यही है कि देश के लिए जरूरी क्या है।

श्रीराम जन्मभूमि के नाम पर चंदा हजम करने का आरोप न तो नया है और न ही भाजपा का झूठ ही नया नहीं है। पहले के चंदे का हिसाब आज तक नहीं हुआ और अब नये चंदे में जिस तरह के घपले सामने आ रहे है उसके बाद तो संघ के संस्कार पर सवाल उठना स्वाभाविक है।