बुधवार, 2 जून 2021

प्रधानमंत्री का शौक सबसे बड़ी चीज...

 

सेन्ट्रल विस्टा के निर्माण को जब केन्द्र सरकार ने अतिआवश्यक सेवा घोषित कर दिया है तब न्यायालय का फैसला तो वही होना था जिसका अंदेशा था, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उन लोगों में से है जो अपनी शौक के आगे किसी को ठहरने नहीं दे सकते, भले ही वे खुद मजाक बन जायें या देश के लोगों की हालत खराब हो जाए। भले ही उनके फैसलों से लोगों की जान गई हो या देश आर्थिक बदहाली की ओर चला गया हो वे अपनी शौक के आगे किसी की नहीं सुनते, अपवाद नौ लाख वाले सूट को छोड़ कर।

ऐसे में सेन्ट्रल विस्टा की बात करने से पहले पाठकों को स्मरण दिलाना जरूरी है कि वे गरीब घर के हैं और उन्होंने चाय तक बेची है, शायद यह गरीबी की वजह से वे अपनी शौक पूरी नहीं कर पाये थे और आज जब सत्ता के सर्वोच्च पद पर है तो एक-एक करके अपनी सभी शौक पूरा कर रहे हैं। मोदी जी के कपड़े और जैकेट का शौक तो उनके चहेते लोगों के उपहार से ही पूरा हो जाता है, चश्मा और दो ढाई लाख का पेन भी शायद उनके चाहने वाले ही पूरा कर देते हैं, खानपान का शौक मोदी जी को कितना है मशरुम काजू का आटा वगैरह-वगैरह किसी से छिपा ही नहीं है। तब सरकारी संपत्ति यानी सरकारी खर्चे से जो शौक पूरा किया गया है उस पर चर्चा इसलिए भी जरूरी है क्योंकि जनता को तय करना है कि यह शौक कितना शानदार है और राजा का शौक निराला तो होता ही है, इतिहास राजाओं के शौक के किस्से से अटा पड़ा है। 

सेन्ट्रल विस्टा के बारे में बताने से पहले प्रधानमंत्री मोदी के उन शौक को भी जानना जरूरी है जो वे प्रधानमंत्री बनते ही पूरा करने लगे, इसे उनके समर्थक समय की जरूरत भी कह सकते है लेकिन इससे पहले देश के प्रधानमंत्री एक बंगले में रहते थे लेकिन नरेन्द्र मोदी के लिए पांच बंगले मिलाकर एक बंगला बनाया गया कल्याण मार्ग भी नाम जोरदार है। इसके बाद पूर्व प्रधानमंत्री के काफिले में शामिल बीएमडब्ल्यू 7 को बदला गया और इसके बदले रेंज रोवर का काफिला खरीदा गया, चूंकि बीएमडब्ल्यू सीरिज सेडान है और सामने सीट में बैठने वाले जनता को ठीक से नहीं दिखते थे और नरेन्द्र मोदी को फोटो शोटो और दिखने दिखाने का शौक है शायद इसलिए वाहनों का काफिला ही बदल दिया गया। ऐसा मानने वाले मोदी विरोधी ही है जबकि समर्थक इसे जरूरत ही बता रहे हैं। इसमें सरकार का कितना खर्च हुआ सुरक्षा कारणओं से बताना उचित नहीं है। 

लेकिन सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री को अमेरीका से होड़ भी करना है इसलिए एयर इंडिया वन खरीदा गया आठ हजार चालीस करोड़ का खर्च होना बताया जा रहा है। चूंकि शौक से बड़ी चीज दुनिया में कुछ नहीं है और शौक यदि सरकारी खजाने से पूरी हो तो फिर यह समय भी जरूरत के रुप में प्रचारित किया जाता है। यह अलग बात है कि देश में आज भी ईलाज के अभाव में लोग दम तोड़ रहे हैं, बेरोजगारी और महंगाई ने आम लोगों का जीवन नारकीय कर दिया है लेकिन हौसला इस व्यक्ति का नहीं तोडऩा है क्योंकि ये न होगा तो हिन्दुतत्व खतरे में पड़ जायेगा, ऐसा इन दिनों वाट्अप युनिवर्सिटी के विद्यार्थी जोर-शोर से कह रहे हैं। सेन्ट्रल विस्टा को लेकर नवभारत टाईम्स के खुलासे के अनुसार सेन्ट्रल विस्टा में प्रधानमंत्री का जो बंगला बनेगा वह 15 करोड़ में बनेगा, जिसमें सभी तरह का आधुनिक सुविधा होगी, यह किसी महल से कम नहीं होगा और पुराने जमाने के राजा महाराजाओं की तर्ज पर इसके किले के भीतर परींदा भी पर नहीं मार सकता।

खर्च कितना भी होगा शौक के आगे कुछ नहीं है, हम यह नहीं कहेंगे कि इस भीषण महामारी में  इसकी क्या जरूरत है क्योंकि शौक से बड़ी चीज न देश है और न ही धर्म है।

मंगलवार, 1 जून 2021

होशियार! अच्छे दिन तो यही है...

 

गलत आदमी भी कितना सही, और मूर्ख आदमी भी कितना ताकतवर हो सकता है इसका अंदाजा किसे था, लेकिन अच्छे दिन की लालच ने सब कुछ उलट दिया था। नरसंहार के इस भयावह दौर के बाद भी यदि सत्ता की जिम्मेदारी से इतर लोग धर्म और राष्ट्रवाद के चक्कर में पड़े थे। तो इसका मतलब साफ है कि पिछले कई दशकों से नफरत का जो बीज बोया जा रहा था वह फलने फूलने लगा है। 

इतिहास गवाह है कि जिस भी राष्ट्र ने धर्म और राष्ट्रवाद को ज्यादा महत्व दिया वे न केवल पिछड़ गये बल्कि बर्बादी की राह को अग्रसर हुए। ऐसे में कोरोना की महामारी ने जो तांडव मचाया है उसे दूसरे देशों की तुलना करना सिर्फ लोगों को भ्रम में डालना है। हैरानी तो इस बात की है कि सत्ता अब भी लोगों की भावनाओं के साथ खेलने में लगी है, देश का आर्थिक ढांचा पूरी तरह से गड़बड़ा गया है। और आर्थिक ढांचे के गड़बड़ाने की वजह से महंगाई और बेरोजगारी अपने चरम पर है। लोगों का जीना दूभर होता जा रहा है लेकिन सत्ता को अपनी रईसी बरकरार रखने आज भी सेन्ट्रल विस्टा की जरूरत हैं और अपनी छवि चमकाने के लिए हिन्दू-मुस्लिम ही चाहिए।

यह ठीक है कि कोरोना वैश्विक महामारी है लेकिन वैश्विक चेतावनी को नजर अंदाज करना, क्या सत्ता की लापरवाही नहीं है, कोरोना से मौत के आंकड़े को छुपाने की कोशिश क्यों की गई। क्या सरकार के पास इस बात का जवाब है कि इस देश में कोरोना की बदइंजामी के चलते आक्सीजन के अभाव में कितने लोगों की मौत हुई, दवाई के अभाव में कितने लोग मर गए, सरकार की नासमझी के लाकडाउन के चलते कितने मजदूर सड़कों में मर गए, भूख और आर्थिक बदहाली के चलते कितने परिवार बरबार हो गए, कितने बच्चे अनाथ हो गए और किसी भी महामारी या आपदा से निपटने के लिए क्या योजना है?

हम जब कहते हैं कि गलत आदमी भी कितना सही, और मूर्ख आदमी भी कितना ताकतवर हो सकता है तो इसका मतलब साफ है कि भावनाएं और आस्था के विभत्स खेल ने देश में असुर प्रवृत्ति को ही बढ़ावा दिया है। जिसका दुष्परिणाम नरसंहार के रुप में देश भुगत रहा है। क्या इस देश की सत्ता की आंख तब भी नहीं खुलती है जब हमारे बाद पैदा हुआ बंग्लादेश हमें हर मामले में पीछे छोड़ देता है। भूखमरी और खुशहाली के इंडेक्स में हम यदि पाकिस्तान से भी पीछे चले जाते हैं तो फिर जीत किसी हो रही है।

और यह सब सत्ता की नासमझी की वजह से हो रही है क्योंकि सत्ता को आज भी इस बात की समझ नहीं है कि सरदार पटेल की बड़ी मूर्ति बना देने से नेहरु का कद छोटा नहीं हो जाता। आधुनिक भारत के निर्माण में जिन लोगों ने अपना सबकुछ होम कर दिया उनकी आलोचना ही नासमझी और मूर्खता है तब अच्छे दिन कैसे आ सकता है। चुनाव जीतना अलग बात और देश चलाना बिल्कुल अलग बात है साहेब।

सोमवार, 31 मई 2021

ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण-3


आजादी के बाद की सत्ता जानती थी कि नफरत के ध्वजारोहण ने हिन्दू-मुस्लिम एकता को क्षति पहुंचाने का प्रयास आगे भी जारी रहेगा, इसलिए ऐसे संगठनों पर प्रतिबंध भी लगाये गए।

सत्ता सचेत थी, नेहरु सचेत थे, सरदार वल्लभ भाई पटेल भी सचेत थे, इसलिए इनके रहते तक नफरत का खेल कुचल दिया गया। ये जहां भी जाते दंगा करवाते थे। लेकिन जब सरकारे सचेत हो तो हर मुश्किल घड़ी से निपटा जा सकता है। धर्म और जाति का सहारा लेकर सत्ता में आने के उपाय जारी थे। लेकिन जिस देश में विवेकानंद, सुभाष बाबू, भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद जैसे लोग सर्वधर्म सद्भाव रखते हो वहां धार्मिक कुंठा के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। लेकिन हिटलर की तर्ज पर झूठ को बार-बार परोसा जाने लगा। ताकि झूठ और अफवाह सच लगे।

भगत सिंह से मिलने कोई नहीं गया, जब देश का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ है तो भारत हिन्दू राष्ट्र क्यों नहीं, सुभाष बाबू की मौत का रहस्य पता नहीं कितने ही झूठ परोसे गए और फिर भी सत्ता नहीं मिली तो नेहरु मुसलमान थे, या हर वे नेता को मुसलमान बताये जाने लगे जो अल्पसंख्यकों और मुसलमानों के पक्ष में खड़ा होने लगे। 70 के दशक में ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण के लिए नई जमीन तलाश की जाने लगी। क्योंकि चीन और पाकिस्तान से युद्ध की वजह से भारत की आर्थिक स्थिति पर प्रभाव पड़ा था लेकिन जब इंदिरा ने बैकों का सरकारीकरण, पंचवर्षीय योजना सहित पोखरण भी कर डाला तो एक बार फिर ज्ञान पर ध्वजारोहण का मंसूबा फेल गया।

लेकिन आपातकाल का वह दौर जिससे सारे राजनैतिक दल डरे हुए थे, इंदिरा गांधी की ताकत अहंकार में परिवर्तन होने लगा था, बेरोजगारी और महंगाई मुंह खोले खड़ा था तब हिन्दू कुंठा लिये लोगों ने अपना झंडा-डंडा चिन्ह सब दांव पर लगा दिया। और स्वयं को बचाने उनके साथ हो गये जो कांग्रेस के विरोधी थे। कांग्रेस के विरोधी दल भी यह नहीं समझ पाये कि कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं होती। लेकिन सत्ता आते ही जब कुंठित हिन्दू एक बार फिर सिर उठाने लगा तो सरकार ही चली गई।

दरअसल हिन्दू कुंठा की यह एक तरह की रणनीति थी, 47 से लेकर 77 तक के सफर में वह जान चुका था कि इस देश में सिर्फ हिन्दुत्व के नाम पर वोट नहीं बटोरे जा सकते? इसलिए उन दलों के सहारे उस क्षेत्रों से भी चुनाव जीता गया जहां उनकी जीत कभी नहीं हो सकती थी। क्योंकि उनके लिए अब भी संविधान गलत था, उनके लिए झंडा में तीन रंग अशुभ था और राष्ट्रगीत भी गलत था। यही स्पष्ट है कि संघ ने अपने मुख्यालय में तिरंगा फहराने से परहेज किया। लेकिन इंदिरा गांधी के खौफ और सत्ता की चाहत ने सब कुछ अनदेखी किया।

नफरत के नए-नए बीज लाकर रोपण किया जाने लगा, कभी गौ हत्या के नाम पर तो कभी कश्मीर में धारा 370 के नाम पर। राम मंदिर तो एक मुद्दा था ही। लेकिन 77 में सत्ता आते ही पोल खुल गई, सरकार गई लेकिन उन्होंने अपनी ताकत बढ़ा ली थी, लेकिन सरकार नहीं चला पाने के दाग से कोई नहीं बच सका और 80 में एक बार फिर इंदिरा गांधी सत्ता सीन हुई। ये वह दौर था जब छोटे राज्यों के निर्माण को लेकर आंदोलन की हवा चलने लगी, राम मंदिर और धारा 370 को लेकर अफवाहों को हवा दी गई, पंजाब में खालिस्तान की मांग तेज हो गई, बेरोजगारी-महंगाई भी सिर उठाने लगा, एक बार फिर विपक्ष सत्ता के लिए ताकत लगाने लगा लेकिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या ने विपक्ष के मंसूबे पर पानी फेर दिया। नफरत की हवा तो इंदिरा गांधी ने पहले ही निकाल दी थी। कांग्रेस सत्तासीन हुई, लेकिन यह नेहरु-शाी और इंदिरा वाली कांग्रेस नहीं थी, यह राजनीति के अनाड़ी माने जाने वाले राजीव गांधी वाली कांग्रेस थी जो बगैर राजनीति के जनसेवा के लिए तत्पर रहने वाली थी, इसने केन्द्र से गांव तक पैसा पहुंचाने की स्थिति को भी नहीं छिपाया, न ही 84 के दंगे की वजह को ही छुपाया।

देश 84 के रक्तपात से हिल चुका था, सिखों ने कांग्रेस से दूरी बना ली यह भी नहीं देखा कि इंदिरा ने तमाम प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रिपोर्ट के बाद भी सिख सुरक्षा गार्डों को नहीं हटाया था। सद्भावना समाप्त सी हो गई थी और इसे हवा देने का राजनैतिक प्रयास शुरु हो चुका था लेकिन राजीव गांधी ने नए भारत की नींव रख दी थी, आधुनिकीकरण और कम्प्यूटर क्रांति का दौर शुरु हो चुका था। मिस्टर क्लीन के नाम से मिल रही प्रसिद्धि में बाफोर्स आ गया। और सत्ता की चाह में विपक्ष एक बार फिर इतिहास को भूल गठबंधन में आ गया। (जारी...)

शनिवार, 29 मई 2021

देश को कहां ले जा रहे हो साहेब...

 

क्या सचमुच इस देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देश की समझ नहीं है या यह जनसंख्या कम करने की कोई साजिश है? यह सवाल इसलिए उठाये जा रहे है ताकि लोगों को यह पता तो चले कि आखिर इस देश की सत्ता पर काबिज सरकार की हकीकत का पता चल सके।

दरअसल यह सवाल इसलिए भी उठाये जा रहे हैं क्योंकि केन्द्र में जब से मोदी सरकार आई है, देश के माहौल में जो नफरत की हवा बहने लगी है उसका दुष्परिणाम सबके सामने है। मोदी सरकार ने वैसे तो दो सौ योजनाओं की घोषणा की है लेकिन वे सारी घोषणाएं हकीकत की धरातल पर बुरी तरह असफल रही है। स्मार्ट सिटी से लेकर आयुष्मान भारत योजना हो चाहे स्टार्टअप से लेकर उज्जवला योजना हो धरातल पर कहीं दिखाई नहीं देता। यहां तक कि खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा गोद लिये गांव की हालत देख लिजिए। 

ऐसे में कुछ ऐसे फैसलों पर भी निगाह जाती है जो साबित करने के लिए काफी है कि इस सरकार को देश की समझ ही नहीं है। नोटबंदी में डेढ़ सौ लोगों की मौत के अलावा भी कुछ हासिल हुआ हो तो जरूरत बताईयेगा। जीएसटी की असंगत से आज भी मध्यम श्रेणी के व्यापारी परेशान है। और कोरोना की लापरवाही ने तो लाखों लोगों की जान ले ली। अचानक लिये गए लॉकडाउन से कितने मजदूर सड़कों पर आ गये ये आंकड़े भले ही सरकार के पास न होने का दावा करे पर इससे हकीकत नहीं बदलने वाली। कोरोना की लापरवाही का यह आलम है कि दुनिया भर के देश वैक्सीन खरीदने का जुगाड़ कर रहे थे और हमारे देश की सत्ता लापरवाही का शतक पूरा करने में लगी थी।

लाशों का मंजर तो असहाय था ही अस्पतालों में बदइंतजामी और दवाइयों तथा आक्सीजन की कालाबाजारी ने सारी हदें पार कर दी। इस पर यदि सरकार को दोष न भी दे तो भूख से व्याकुल जनता और वैक्सीन के अभाव में छटपटाते लोगों की लाइनें क्या सत्ता को दिखाई नहीं दे रहा है। खाद्य तेल से लेकर जीवन के लिए जरूरी खाद्यानों की कीमत भी दिखाई नहीं दे तो फिर सत्ता की समझ क्या है। पेट्रोल-डीजल और गैस की बढ़ती कीमत भी क्या सरकार को दिखाई नहीं दे रहा है और इसकी कीमत बढऩे से महंगाई बढऩे की समझ भी सरकार के पास नहीं है तो फिर सरकार की समझ पर शक होना लाजिमी है। क्या सत्ता पाने झूठ-छल-प्रपंच अफवाह और नफरत फैलाने की समझ ही रह गई है इससे सत्ता तो मिल ही गई और आगे भी मिल जायेगी लेकिन देश की समझ कैसे होगी?

शुक्रवार, 28 मई 2021

देश को कहां ले जाओगे मोदी जी...


देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु की पुण्यतिथि पर कुंठित हिन्दुओं ने सोशल मीडिया में जिस तरह के शब्दों का प्रयोग किया, अश्लीलता फैलाई वह न तो हिन्दू धर्म के अनुरुप है और न ही मानवता के।

पिछले कुछ सालों में इस देश में कुंठित हिन्दुओं ने एक नई परम्परा शुरु की है कि गांधी, नेहरु या ऐसा कोई भी नेता जो संघ और भाजपा के विचारधारा को नहीं मानता, उनके जयंती या पुण्यतिथि पर अमर्यादित भाषा का प्रयोग किया जाता है। यह परम्परा अमानवीय ही नहीं उस कुंठा का प्रतीक भी है जो सत्ता के अहंकार में फलने फूलने लगा है। और यह सब खेल वही लोग कर रहे है जिनका कहीं न कहीं से संघ या भाजपा से संबंध है। ऐसे में हम समाज को कहां ले जा रहे हैं, मानवता की कौन सी परिभाषा गढ़ रहे है यह सवाल देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भई पूछना चाहिए क्योंकि बात-बात पर झूठ बोलना और अमर्यादित भाषा के इस्तमेाल भी वे ही करते हैं।

हालांकि यह पार्टी अपने को हिन्दुवादी या हिन्दुओं की रक्षक ही नहीं बताती बल्कि समय-समय पर धार्मिक का चोला भी ओढ़ती है तब यह बात जरूरी हो जाता है कि जिस हिन्दू धर्म ग्रंथ में झूठ, छल प्रपंच और अमर्यादित भाषा केवल असुरों की बताई जाती है उस धर्म ग्रंथ के कथित रक्षकों को यह बात समझ में क्यों नहीं आ रही है। इस देश ने हमेशा ही मानवता के उस परम्परा को जिया है जिसके तहत मृतात्माओं की बुराई करने से बचा जा सके लेकिन हाल के सालों में जिस तरह की परम्परा को बढ़ावा दिया जा रहा है उसके बाद किसी के सम्मान को बचाये रखना मुश्किल हो जायेगा।

भारतीय जनता पार्टी में यह परम्परा क्यों शुरु हो गई यह कहना कठिन है क्योंकि पार्टी इस तरह के आरोपों को सिरे से खारिज भी कर सकती है लेकिन देखने वाली बात तो यही है कि इस तरह की हरकत सिर्फ उसी समूह के लोग ही कर रहे हैं और बेशर्मी से कर रहे हैं। तब सवाल यही उठता है कि यह हरकत क्या नीच किस्म का नहीं है? आप मेरी बातों से सहमत या असहमत हो सकते हैं। लेकिन परिवारवाद के विरोध के नाम पर जिस तरह से मर्यादा लांघी जा रही है उस पर रोक नहीं लगाई गई तो इस देश को रसातल में जाने से कोई बचा भी ले तो लोगों का जीवन नारकीय होना तय है।

सत्ता तो आती जाती रहती है लेकिन देश तभी बचेगा जब उसकी संस्कृति और परम्परा बची रहेगी वर्ना भूगोल को देश कहकर खुश तो हुआ जा सकता है लेकिन नफरत के बीच लोगों में खुशहाली नहीं ला पायेगा। इसलिए इस तरह की हरकत न केवल निंदनीय है बल्कि असुरों जैसी है जो हिन्दू धर्म के विपरीत है।

गुरुवार, 27 मई 2021

मोदी के सात साल में सत्तर हाल...

 प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सात साल का सफर पूरा कर लिया है लेकिन यकीन मानिये इन सात सालों में देश का सत्तर हाल हो गया है। विफलताओं का सारा रिकार्ड इन सात सालों में बना है लेकिन हिन्दू-मुस्लिम और राष्ट्रवाद का खेल अब भी जारी है और यही हाल रहा तो देश में आम नागरिकों का जीवन न केवल किसी बर्बाद हो चुके देश की तरह होगा, नारकीय होगा?

ये दावा हम उन आकड़ों के बल पर कर रहे हैं जो मोदी सत्ता की विफलता की कहानी तो कह रही है बल्कि गरीबों की संख्या में हो रही लगातार बढ़ोत्तरी है। मोदी सरकार जब 2014 में सत्ता में पहली बार आई तब वह अच्छे दिन आयेंगे के जुमले को लेकर आई थी, लोगों को इस सत्ता से उम्मीद भी बहुत रही लेकिन इन सात सालों में देश ने क्या खोया और क्या पाया इसकी समीक्षा नहीं की गई तो यह पता ही नहीं चलेगा कि यह देश किस तरह दुनिया के कमजोर देशों से भी नीचे जा रहा है।

आप बैकों के 8 लाख करोड़ रुपए के राइट ऑफ में गिनते जाईये। हालांकि मोदी समर्थक इस राइट ऑफ यानी कर्ज माफी को कहते हैं कि यह कर्ज माफी उन लोगों का हुआ है जो हिन्दू है और मोदी के रहते हिन्दुओं का कर्ज माफ नहीं होगा तो किसका होगा। हालांकि उनके पास कर्ज में डूबे किसानों की मौत मायने नहीं रखते क्योंकि किसान चंदा नहीं देते।

दूसरा सवाल सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को बेचने का है। सत्तर साल में किसी प्रधानमंत्री ने 19 कंपनियों को नहीं बेचा। इसी तरह 70 साल में कोई भी प्रधानमंत्री ने रिजर्व बैंक के रिजर्व फंड का उपयोग-दुरुपयोग इस स्तर पर कभी नहीं किया। सत्ता में आते ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि वे काले धन को विदेशों से लाने प्रतिबद्ध हैं और इसके लिए जरूरी कानून भी बनाना पड़ा तो वह भी बनायेंगे लेकिन इस बारे में सवाल पूछना ही मना है।

देश में हर साल दो करोड़ लोगों को रोजगार देने के वादे का सच यह है कि केन्द्र सरकार ने सात साल में केवल 9 लाख लोगों को नौकरी दी और यदि राज्यों को भी जोड़ दें तो इन सात सालों में केवल 48 लाख लोगों को ही नौकरी मिल पाई है। जबकि नौकरी से हाथ धोने वालों की संख्या दो करोड़ से अधिक बताई जा रही है। महंगाई किसी से छिपी नहीं है। पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस के अलावा रोजमर्रा के खानपान में भी दस फीसदी से अधिक महंगाई बढ़ी है।

नोटबंदी का सच तो पूरी दुनिया को मालूम है कि किस तरह से डेढ़ सौ लोग सड़कों में लाईन लगाकर मर गए। जबकि जीएसटी की विसंगति ने छोटे व्यापारियों को आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया। आगे विफलता गिनाने से पहले जिसे वे सरकार की सफलता मानते है उस धारा 370 को हटाने का कोई फायदा आम लोगों को या देश को हुआ हो यह कहना मुश्किल है।

तब मध्यप्रदेश की सत्ता की चाह और नमस्ते ट्रम्प की लापरवाही से देश में कोरोना से त्राहिमाम् भी कोई कैसे छुपा सकता है। नासमझी में किये गये लॉकडाउन के चलते मजदूरों की सड़क में मरने की मजबूरी भी कोई कैसे भूल सकता है। सच तो यह है कि हम गरीबी भूखमरी तक में पाक और कल के बंग्लादेश से पीछे है। तब सत्ता की कौन सी उपलब्धि को सच माना जाए।

बुधवार, 26 मई 2021

लड़ाई धंधे की...

 

एलोपैथी और आयुर्वेद को लेकर जिस तरह से लड़ाई छिड़ी है उससे हैरान होने की जरूरत नहीं है, असल में यह लड़ाई धंधे में वर्चस्व की लड़ाई है और कोरोना काल में बाबा रामदेव की कंपनी को हुए घाटे ने इस लड़ाई को तेज कर दिया है।

यह लड़ाई झूठ-नफरत, अफवाह और कुंठित राष्ट्रवाद की लड़ाई भी कही जा सकती है। क्योंकि जब आप किसी एक से बेहद नफरत करते रहते हैं और लगातार नफरत करते रहते हैं तो यह आपकी आदतों में शुमार हो जाता है फिर यदि आप नफरत के लिए नये नये लक्ष्य ढूंढते हैं। बाबा रामदेव ने एलोपैथी चिकित्सा पद्धति को जिस तरह से कोसा है, वह हैरान कर देने वाला है, और यह हैरानी तब और बढ़ जाती है जब वे अपनी बीमारी का ईलाज एलोपैथी से करवाते है।

इसका मतलब क्या है? इस लड़ाई की प्रमुख रुप से दो ही वजह है पहली वजह अपना बिजनेस चमकाना है तो दूसरी वजह नफरत फैलाना है। दोनों ही कारण बेहद स्पष्ट है और यह सब सरकार के संरक्षण में हो रहा है कहा जाय तो गलत नहीं है। एक तरफ जब पूरी दुनिया लाईलाज कोरोना महामारी से जूझ रही हो लाशें लगातार गिर रही हो तब चिकित्सा पद्धति को लेकर विवाद क्या लोगों का ध्यान भटकाने के लिए किया जा रहा है या अपनी नफरत की रोटी को सेंकने का उपक्रम मात्र है।

कहना कठिन है, यह सच है कि आयुर्वेद पद्धति विशुद्ध रुप से भारतीय चिकित्सा पद्धति है और अनेक मौकों पर यह कारगर भी रही है, और यह भी सच है कि एलोपैथी ने जमकर लूट मचाई है और यह एक ढंग से पैसों वालों के लिए है। लेकिन तमाम दोष के बाद भी एलोपैथी को सिरे से नकारने का मतलब क्या है। हालांकि यह खेल मोदी सत्ता के आने के बाद ही ज्यादा खेला गया क्योंकि यह धर्म की राजनीति करने वालों के लिए सुविधा देता है। इसलिए कोरोना की लड़ाई में भाजपा खेमे से जुड़े लोगों के गोबर गौमूत्र से लेकर हवन, भाभी जी पापड़, कोरोनिल की आवाजें आती रही है।

ऐसे में बाबा रामदेव का इस लड़ाई में कूदने का मतलब जो हनीं समझ रहे हैं वह भी एक तरह की रणनीति है। कोरोना के मामले ही नहीं दूसरे सभी मामलों में बुरी तरह असफल हो चुकी मोदी सत्ता में असल मुद्दों से ध्यान भटकाने का खेल नया नहीं है। तबलीकी जमात से लेकर फर्जी टूलकिट के ऐसे कई मामले है जो मोदी सत्ता की मंशा को एक्सपोज किया है। अब देखना है कि बाबा रामदेव के बिगड़े बोल का क्या असर होता है।