रविवार, 18 अक्टूबर 2026

छत्तीसगढ़ की संपदा की खुली डकैती!

 छत्तीसगढ़ की संपदा की खुली डकैती! बालको, FSNL, सेक्टर 9 अस्पताल के बाद अब BSP की बारी?


आज बात किसी एक कंपनी की नहीं, बात छत्तीसगढ़ के अस्तित्व की है! बात उस मिट्टी की है, जिसकी छाती चीरकर पूरे देश को लोहा, कोयला और एल्यूमीनियम मिला, और आज उसी माटी के स्वाभिमान को दिल्ली के हुक्मरानों द्वारा अपने पसंदीदा कॉरपोरेट मित्रों की झोली में परोसा जा रहा है!

सोचिए... पहले बालको को बेचा गया, भिलाई की फेरो स्क्रैप निगम लिमिटेड (FSNL) को बेचने का सौदा हुआ, भिलाई के जीवनदाता सेक्टर 9 अस्पताल तक को निजी हाथों में सौंपने की साजिश रची गई, और अब सीधी नज़र टिका दी गई है छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े गौरव—भिलाई इस्पात संयंत्र (BSP) पर!

क्या छत्तीसगढ़ सिर्फ कॉरपोरेट्स का 'शॉपिंग मॉल' बनकर रह गया है, जहाँ आओ, बोली लगाओ और राज्य की बेशकीमती संपदा को कौड़ियों के दाम खरीदकर ले जाओ?"

बालको से लेकर FSNL और सेक्टर 9 अस्पताल तक—बेचने की क्रोनोलॉजी समझिए!

"निजीकरण का यह खेल आज का नहीं है, यह एक सोची-समझी क्रोनोलॉजी है!

  1. पहला वार—BALCO पर: छत्तीसगढ़ के एल्यूमीनियम के नवरत्न 'बालको' को औने-पौने दामों में निजी कंपनी के हवाले कर दिया गया। वादा था कि रोजगार बढ़ेगा, विकास होगा! लेकिन क्या हुआ? स्थानीय युवाओं के हक और अधिकारों पर ताला लग गया।
  2. दूसरा वार—FSNL और सेक्टर 9 अस्पताल पर हमला: भिलाई में स्थित FSNL (फेरो स्क्रैप निगम लिमिटेड), जो देश के बड़े-बड़े स्टील प्लांटों का स्क्रैप प्रोसेस करके मुनाफा कमाती थी, उसे बेचने का षड्यंत्र रचा गया। और तो और, भिलाई के लाखों मजदूरों और आम जनता की सेहत का ख्याल रखने वाले ऐतिहासिक सेक्टर 9 अस्पताल तक को पीपीपी (PPP) मोड या निजी हाथों में सौंपने की सुगबुगाहट शुरू कर दी गई! जिस अस्पताल ने पीढ़ियों का इलाज किया, उसे भी मुनाफे का सौदा बना दिया गया!
  3. और अब तीसरा वार—भिलाई स्टील प्लांट (BSP): जी हाँ! भिलाई स्टील प्लांट सिर्फ ईंट-पत्थर या लोहे का ढांचा नहीं है, यह छत्तीसगढ़ का दिल है, देश का स्टील मैन्युफैक्चरिंग हब है! लेकिन अब इसकी जमीनों और इसकी संपदा पर देश के सबसे बड़े कॉरपोरेट घराने की सीधी नज़र पड़ चुकी है!"

भूपेश बघेल का तीखा प्रहार—"बीएसपी छत्तीसगढ़ की आत्मा है!"



"इस मामले पर छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सीधे केंद्र सरकार और उद्योगपतियों के गठजोड़ की धज्जियां उड़ाते हुए ट्वीट किया है। उन्होंने साफ-साफ शब्दों में लिखा है:

'पता चला है कि अडानी भिलाई इस्पात संयंत्र यानी हमारे बीएसपी को देखने आने वाले हैं। अडानी के बीएसपी आने का क्या मतलबहै समझ रहे हैं ना? इसका मतलब ये है कि देश बेचने का अभियान चला रहे नरेंद्र मोदी जी की नज़र अब हमारे बीएसपी पर है। औरउनके प्रिय खरीदार मुआयना करने आ रहे हैं। मोदी जी समझ लें कि बीएसपी छत्तीसगढ़ की आत्मा है। और हम छत्तीसगढ़वासी इसेकिसी सूरत में बिकने नहीं देंगे। किसी भी सूरत में नहीं। यह बात छत्तीसगढ़ भाजपा के नेता भी समझ लें कि बीएसपी बिकाऊ नहीं है।'

दोस्तों! भूपेश बघेल का यह हमला सिर्फ राजनीतिक बयान नहीं है। यह उस हर एक मजदूर, हर मरीज और हर छत्तीसगढ़िया का गुस्सा है, जिसकी कई पीढ़ियों ने भिलाई को खून-पसीने से सींचा है!"

छत्तीसगढ़ की खनिज संपदा की डकैती!


"अब सवाल उठता है कि ये उद्योगपति छत्तीसगढ़ पर ही आँखें क्यों गड़ाए बैठे हैं?

क्योंकि छत्तीसगढ़ की धरती के नीचे सोने का अंडा देने वाली मुर्गियां दबी हैं!

  • यहाँ का आयरन ओर (लोह अयस्क) दुनिया में सबसे बेहतरीन क्वालिटी का है।
  • यहाँ कोयला, लिथियम, बॉक्साइट, डोलोमाइट का अटूट खजाना है।
  • यहाँ की नदियां, जंगल और जमीन प्रकृति का अनमोल उपहार हैं।

जब आप बीएसपी, उसकी इकाइयों या उसके अस्पतालों को बेचते हैं, तो आप सिर्फ एक फैक्ट्री नहीं बेचते! आप उस फैक्ट्री के साथ मिलने वाली हजारों एकड़ की बेशकीमती जमीन, खानों के लीज और प्राकृतिक संसाधनों की चाबी भी उस कॉरपोरेट मालिक को सौंप देते हैं!"

आम जनता को क्या मिलेगा? सिर्फ बेरोजगारी और भुखमरी?

"केंद्र सरकार से हमारा सीधा सवाल है—

  • क्या गरीबों का इलाज करने वाले सेक्टर 9 जैसे अस्पतालों को भी उद्योगपतियों के हवाले करना ही आपका 'विकास' है?
  • जब सारी कंपनियां प्राइवेट हो जाएंगी, तो हमारे एससी, एसटी और ओबीसी भाइयों के आरक्षण का क्या होगा?
  • स्थानीय युवाओं को रोजगार की जगह क्या सिर्फ कॉरपोरेट का शोषण मिलेगा?

छत्तीसगढ़ की माटी से निकलने वाला लोहा पूरे देश का ढांचा खड़ा करता है, और उसी छत्तीसगढ़ के लोगों को अपने ही हक के लिए सड़कों पर उतरना पड़ रहा है!"

यह लड़ाई छत्तीसगढ़ के वजूद की है!

अब चुप रहने का समय नहीं बचा है! बालको बिका, FSNL की बोली लगी, सेक्टर 9 अस्पताल पर नजर पड़ी और अब अगर बीएसपी के अस्तित्व पर आंच आई, तो छत्तीसगढ़ की जनता खामोश नहीं बैठेगी!

भिलाई इस्पात संयंत्र और इसकी धरोहर छत्तीसगढ़ का स्वाभिमान है, और यह किसी कॉरपोरेट घराने की जागीर नहीं बन सकता!

न्याय मांगने गए बच्चों पर अधिकारी की धौंस!"

  "बिलासपुर कलेक्ट्रेट में असंवेदनशीलता: न्याय मांगने गए बच्चों पर अधिकारी की धौंस!"



"क्या इस देश में मासूम बच्चों का रोना, उनकी तकलीफें और उनका न्याय मांगना गुनाह हो गया है? क्या सरकारी कुर्सियों पर बैठे अधिकारी इतने अंधे और बहरे हो चुके हैं कि उन्हें स्कूली बच्चों का भविष्य नहीं, बल्कि सिर्फ अपना अहंकार दिखाई देता है?

तस्वीरें देखिए आपकी स्क्रीन पर! बिलासपुर कलेक्ट्रेट का वह शर्मनाक नजारा, जहां सरकारी स्कूलों के बे-हाल बच्चे, अपनी बदकिस्मती का रोना रोने और न्याय की गुहार लगाने पहुंचे थे... लेकिन बदले में क्या मिला? मिला अधिकारियों का रौब, धमकी और उनका घमंड!

आज इस वीडियो में हम पर्दाफाश करेंगे उस सिस्टम का जो बच्चों का भविष्य खा रहा है, और उन अधिकारियों का जो अन्नदाता या जनसेवक होने का ढोंग तो करते हैं, लेकिन मासूम बच्चों को डराने से भी बाज नहीं आते!"

बैकग्राउंड और ग्राउंड रियलिटी: क्या है स्कूलों का हाल?]


"जरा सोचिए, जिन बच्चों के हाथों में किताबें होनी चाहिए, जो देश का भविष्य हैं, वो आज कलेक्ट्रेट की दहलीज पर क्यों भटक रहे हैं? वजह दिल दहला देने वाली है:

  • शिक्षकों की भारी कमी: स्कूलों में पढ़ाने के लिए टीचर तक नहीं हैं, आखिर बच्चे पढ़ाई करें तो कैसे?
  • ज़हरीला और कीड़ेयुक्त मिड-डे मील: बच्चों को जो मध्याह्न भोजन (मिड-डे मील) मिल रहा है, वो पोषण देने के बजाय उनकी जान ले रहा है - खाने में कीड़े निकल रहे हैं!
  • बदहाल बुनियादी ढांचा: स्कूल के भवन जर्जर हो चुके हैं, सिर पर छत गिरने का खतरा मंडरा रहा है। स्कूलों में शौचालय तक नहीं हैं और बाउंड्री वॉल न होने के कारण सुरक्षा का भारी संकट है।"

प्रशासनिक संवेदनहीनता: जब बच्चे पहुंचे शिकायत लेकर

"जब सिस्टम के इन नाकारा तरीकों से तंग आकर ये मासूम बच्चे अपनी शिकायत लेकर बिलासपुर कलेक्ट्रेट पहुंचे, तो इनकी सुनने के बजाय नए अधिकारियों ने इन्हें डराना-धमकाना शुरू कर दिया।

अरे शर्म आनी चाहिए ऐसे प्रशासनिक अमले को! जो बच्चे अपनी किताबों की जगह कलेक्ट्रेट के फर्श पर न्याय मांगने आएं, उन्हें न्याय देने के बजाय आप उन्हें अपनी धौंस दिखा रहे हैं? क्या इसलिए बैठाया गया है आपको उस कुर्सी पर?"

पुराना इतिहास और सिस्टम का दोहरा रवैया


"और ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है, दोस्तों! ये कोई छिटपुट घटना नहीं है, बल्कि इस बीमार व्यवस्था का एक पुराना और दर्दनाक इतिहास रहा है। याद कीजिए, थोड़े दिन पहले भी ऐसा ही एक वाकया हुआ था, जब एक रोती हुई बच्ची कलेक्ट्रेट से बाहर निकली थी — उस प्रशासनिक अधिकारी की संवेदनहीनता इतनी बढ़ गई थी कि बाद में उसे निलंबित करना पड़ा था। इतना ही नहीं, जब वही बच्चियां अपनी मांगों को लेकर धरने पर बैठी थीं, तब भी एसडीएम मैडम ने उन्हें कैसे 'चमकाया' था, कैसे डराया था, ये किसी से छिपा नहीं है!

मतलब साफ है—साहेब लोग अपनी गलतियां सुधारने के बजाय, बच्चों की आवाज को कुचलना चाहते हैं।"


"आज सवाल सिर्फ बिलासपुर का नहीं है, सवाल पूरे छत्तीसगढ़ और देश की शिक्षा व्यवस्था का है। क्या हमारे बच्चे अब इतने लाचार हो गए हैं कि वे अपना हक मांगेंगे तो उन्हें अधिकारियों की डांट और धौंस सुननी पड़ेगी?

मैं आपसे पूछता हूँ—क्या इन अधिकारियों पर सख्त से सख्त कार्रवाई नहीं होनी चाहिए? क्या इन बच्चों को उनका हक नहीं मिलना चाहिए?