सोमवार, 12 अक्टूबर 2026

गरीबों का हक मारो और अपने करीबियों में रेवड़ियां बांटो!

गरीबों का हक मारो और अपने करीबियों में रेवड़ियां बांटो!


 सोचिए, अगर किसी गरीब के घर में कोई गंभीर बीमारी से जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहा हो... किसी बेबस मां के पास बच्चे के इलाज के लिए पैसे न हों... और वो सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर थक जाए... लेकिन उसे एक रुपया न मिले!

और दूसरी तरफ, उसी जनता के टैक्स के पैसों से बने 'स्वेच्छानुदान फंड' से विधायकों के सगे भाइयों, बहनों, भांजों, ड्राइवरों और करोड़पति भाजपाइयों के खातों में लाखों रुपये ट्रांसफर कर दिए जाएं?

जी हां! छत्तीसगढ़ में 'जीरो टॉलरेंस' का ढोल पीटने वाली सरकार के माननीय विधायकों ने गरीबों की मदद के लिए बने फंड को अपनी 'पारिवारिक प्रॉपर्टी' समझ लिया है! महासमुंद से लेकर साजा और सीधे प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल के घर तक... हर जगह एक ही खेल चल रहा है— 'गरीबों का हक मारो और अपने करीबियों में रेवड़ियां बांटो!'

आज के इस वीडियो में हम आपको सबूतों के साथ दिखाएंगे कि कैसे जनता के खून-पसीने की कमाई को अपनों की जेब में डाला गया। पूरी वीडियो अंत तक देखिएगा, क्योंकि आज हम किसी को बख्शने वाले नहीं हैं!"

 : "सबसे पहले बात करते हैं महासमुंद के बीजेपी विधायक योगेश्वर राजू सिन्हा की। हाल ही में खबर आई कि विधायक जी ने 'स्वेच्छानुदान निधि' से 30 लाख 30 हजार रुपये बांट दिए! अब आप सोचेंगे कि इसमें क्या गलत है? विधायक तो गरीबों को बांटने के लिए ही पैसे पाते हैं ना?

ठहरिए! जरा लिस्ट खोलकर देखिए कि ये पैसे गए किसकी जेब में:

  • विधायक जी की सगी बहनें— ललिता सिन्हा, रयवती सिन्हा और जितेश्वरी सिन्हा!
  • विधायक जी के ड्राइवर और उनके करीबी!
  • इतना ही नहीं, बीजेपी के रसूखदार नेता, पूर्व पार्षद और यहां तक कि उन नेताओं के परिवार, जिनके घर में पहले से सरकारी नौकरी है! (जैसे बीजेपी नेता संदीप दीवान, जिनकी पत्नी खुद सरकारी टीचर हैं!)

नियमानुसार यह पैसा कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे गरीबों, बेबस विधवाओं या अनाथ बच्चों की पढ़ाई के लिए होता है। लेकिन महासमुंद में पात्र गरीब भटकते रहे और विधायक जी अपने रिश्तेदारों का घर भरते रहे!

और जब मीडिया ने विधायक जी से पूछा कि 'मालिक, ये क्या कर दिया?' तो विधायक योगेश्वर राजू सिन्हा का घमंड देखिए! वो कहते हैं— 'आपको जो सही लगता है छापो, क्या ऐसी बातों का जवाब दूं!'

सुन लिया आपने? जनता के पैसों की लूट पर सवाल पूछो तो माननीय को जवाब देना भी फालतू लगता है!"

: "अब आप सोच रहे होंगे कि क्या यह सिर्फ महासमुंद तक सीमित है? जी नहीं!

ज़रा साजा विधानसभा चलिए। वहां से विधायक हैं ईश्वर साहू। ईश्वर साहू जी को जनता ने किस उम्मीद से चुना था, यह सब जानते हैं। लेकिन विधायक बनते ही उन्होंने स्वेच्छानुदान निधि में क्या किया?

साजा में स्वेच्छानुदान निधि की जो लिस्ट सामने आई, उसमें विधायक ईश्वर साहू के बेटे, उनके सगे भाइयों और करीबी रिश्तेदारों के नाम दर्ज थे! जिस फंड पर किसी गरीब किसान, मजदूर या बीमार व्यक्ति का हक होना चाहिए था, उस फंड से विधायक जी ने अपने ही परिवार की 'आर्थिक सहायता' कर दी!

जब साजा की जनता और विपक्ष ने इस पर सवाल उठाए, तो लीपापोती करने की कोशिशें शुरू हो गईं। क्या साजा की गरीब जनता इसलिए वोट देती है कि विधायक बनते ही सबसे पहले अपने ही बेटे-बेटियों का बैंक बैलेंस मजबूत किया जाए? क्या यह जनता के भरोसे का कत्ल नहीं है?"

: "और अब आते हैं सबसे बड़े मामले पर... बात सिर्फ विधायकों तक खत्म नहीं होती, बात पहुंचती है सीधे प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल तक!

जी हां, वही मंत्री जिनके कंधे पर पूरे प्रदेश के गरीबों को इलाज मुहैया कराने की जिम्मेदारी है!

श्याम बिहारी जायसवाल के मनेन्द्रगढ़/बैकुंठपुर क्षेत्र से जब स्वेच्छानुदान की सूची बाहर आई, तो लोग दंग रह गए। स्वास्थ्य मंत्री जी ने अपने रिश्तेदारों, अपने जिला पंचायत/जनपद के करीबी नेताओं, कार्यकर्ताओं और संपन्न लोगों को स्वेच्छानुदान के चेक बांट दिए!

सोचिए! जो व्यक्ति प्रदेश का स्वास्थ्य मंत्री है, जिसके पास गरीबों को 'आयुष्मान योजना' या 'संजीवनी कोष' से करोड़ों का इलाज दिलवाने का अधिकार है... वो अपने विधायक स्वेच्छानुदान फंड से भी अपनों को ही रेवड़ियां बांट रहा है!

एक तरफ राज्य के सरकारी अस्पतालों में दवाइयां नहीं हैं, गरीब वेंटिलेटर और स्ट्रेचर के लिए तरस रहे हैं, और दूसरी तरफ स्वास्थ्य मंत्री जी के अपने लोग सरकारी खजाने से मजे मार रहे हैं! क्या इसे भ्रष्टाचार नहीं कहेंगे? क्या यह सत्ता का सीधा दुरुपयोग नहीं है?"


महासमुंद के योगेश्वर राजू सिन्हा, साजा के ईश्वर साहू, और स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल... ये तीनों मामले कोई इत्तेफाक नहीं हैं! यह एक सोची-समझी कार्यप्रणाली बन चुकी है।

हर साल हर विधायक को जनता की मदद के लिए लाखों-करोड़ों रुपये का स्वेच्छानुदान फंड मिलता है। अगर हर विधायक अपने रिश्तेदारों और कार्यकर्ताओं में ही 30-40 लाख रुपये बांट देगा, तो इस प्रदेश का गरीब कहां जाएगा? वो गरीब जो एक-एक हजार रुपये की दवा के लिए अपने बर्तन और जेवर बेचने पर मजबूर होता है!

सरकारें बदलती हैं, चेहरे बदलते हैं, लेकिन क्या गरीबों की किस्मत कभी बदलेगी? भाजपा सरकार 'जीरो टॉलरेंस' की बात करती है। मुख्यमंत्री जी से हमारा सीधा सवाल है—

  • क्या अपने इन विधायकों और मंत्रियों पर कोई जांच बैठाई जाएगी?
  • क्या गरीबों के हक का पैसा छीनकर अपने रिश्तेदारों को देने वालों पर कार्रवाई होगी?
  • या फिर यह मान लिया जाए कि 'स्वेच्छानुदान' का मतलब है— 'अपनी स्वेच्छा से अपनों को लूटने की छूट'?