शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

क्यों फेल होने लगा बीजेपी आईटी सेल

 क्यों फेल होने लगा बीजेपी आईटी सेल 


आज हम बात करेंगे उस सिस्टम की, जिसे कभी देश का सबसे बड़ा 'ओपिनियन मेकर' कहा जाता था—बीजेपी का आईटी सेल और तथाकथित वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी।

सालों तक एक ही नैरेटिव को बार-बार दोहराकर जनता की सोच बदलने का दावा करने वाला यह तंत्र... आखिर आज ज़मीन पर क्यों धड़ाम हो गया? क्यों फेक न्यूज़, ट्रोलिंग और मैन्युफैक्चर्ड ट्रेंड्स की धार अब कुंद पड़ चुकी है?

आज जब 'जैन जी' (Gen Z)—यानी हमारी युवा पीढ़ी—डिजिटल दुनिया के केंद्र में आई है, तो इस आईटी सेल के सारे पुराने पैंतरे पस्त क्यों हो गए? आइए, इसे 5 बड़े कारणों से समझते हैं।"


पुराने दौर में वॉट्सऐप ग्रुप पर आए किसी भी मैसेज को लोग सच मानकर फॉरवर्ड कर दिया करते थे। लेकिन 'जैन जी' इंटरनेट पर पली-बढ़ी पीढ़ी है।

  • वे किसी फॉरवर्ड किए गए मैसेज पर आंख बंद करके भरोसा नहीं करते।
  • वे तुरंत गूगल (Google), ऑल्ट न्यूज़, या इंडिपेंडेंट डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर जाकर फैक्ट-चेक (Fact-Check) करते हैं।
  • अगर आईटी सेल कोई फ़ेक वीडियो या अधूरा बयान चलाता है, तो यह युवा पीढ़ी 5 मिनट के भीतर उसका 'ओरिजिनल अनकट वीडियो' निकालकर कमेंट सेक्शन में पोस्ट कर देती है। यानी झूठ की उम्र अब सिर्फ कुछ मिनटों की रह गई है।"

"दूसरा कारण—नैरेटिव की थकान!

आईटी सेल की सबसे बड़ी ताकत थी उनका 'कॉपी-पेस्ट मॉडल'। 10,000 हैंडल्स से एक ही लाइन ट्वीट करवाना। शुरुआत में तो यह प्रभावशाली लगा, लेकिन अब जनता इसका पैटर्न समझ चुकी है। जब भी कोई बड़ा मुद्दा आता है—चाहे वो बेरोजगारी हो, महंगाई हो या परीक्षा लीक का मामला—आईटी सेल का जवाब वही पुराना और घिसा-पिटा होता है। जनता अब समझ गई है कि यह स्वतःस्फूर्त जनआक्रोश नहीं, बल्कि स्पॉन्सर टूल (Paid Strategy) है।"

"तीसरा कारण—ज़मीनी सच्चाई और डिजिटल नैरेटिव का फासला।

आईटी सेल चाहे कितना भी ट्रेंड चला ले कि 'सब ठीक है', लेकिन जब युवा पेपर लीक की वजह से सड़कों पर आता है, जब डिग्री हाथ में होने के बावजूद नौकरी नहीं मिलती, तो वॉट्सऐप का कोई मैसेज उसकी जेब का खालीपन नहीं भर सकता। 'परसेप्शन मैनेजमेंट' तब तक काम करता है जब तक पेट भरा हो, जब मुद्दे रोज़गार और अस्तित्व के हों, तो आईटी सेल के मीम्स (Memes) फेल हो जाते हैं।"

"चौथा कारण—अल्टरनेटिव मीडिया का उभार।

पहले मुख्यधारा (Mainstream) मीडिया में जो दिखाया जाता था, वही सच मान लिया जाता था। लेकिन आज यूट्यूब, इंस्टाग्राम और डिजिटल पोर्टल्स पर स्वतंत्र पत्रकारों और क्रिएटर्स का एक बड़ा वर्ग खड़ा हो चुका है। आईटी सेल के ट्रोल्स किसी एक एंकर को डरा सकते हैं, लेकिन इंटरनेट पर मौजूद लाखों जागरूक क्रिएटर्स को एक साथ चुप नहीं करा सकते। अब हर दूसरे दिन कोई न कोई यूट्यूबर इनके फर्जी दावों की पोल खोल देता है।"

प्रचार (Propaganda) की एक सीमा होती है, लेकिन सत्य की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती।

आईटी सेल और वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी का मॉडल इसलिए फेल हो रहा है क्योंकि उन्होंने जनता की समझदारी को बहुत कम आंका। 'जैन जी' और आज का जागरूक नागरिक अब प्रोपेगैंडा और ग्राउंड रियलिटी का फर्क अच्छी तरह समझता है।