"बिलासपुर कलेक्ट्रेट में असंवेदनशीलता: न्याय मांगने गए बच्चों पर अधिकारी की धौंस!"
"क्या इस देश में मासूम बच्चों का रोना, उनकी तकलीफें और उनका न्याय मांगना गुनाह हो गया है? क्या सरकारी कुर्सियों पर बैठे अधिकारी इतने अंधे और बहरे हो चुके हैं कि उन्हें स्कूली बच्चों का भविष्य नहीं, बल्कि सिर्फ अपना अहंकार दिखाई देता है?
तस्वीरें देखिए आपकी स्क्रीन पर! बिलासपुर कलेक्ट्रेट का वह शर्मनाक नजारा, जहां सरकारी स्कूलों के बे-हाल बच्चे, अपनी बदकिस्मती का रोना रोने और न्याय की गुहार लगाने पहुंचे थे... लेकिन बदले में क्या मिला? मिला अधिकारियों का रौब, धमकी और उनका घमंड!
आज इस वीडियो में हम पर्दाफाश करेंगे उस सिस्टम का जो बच्चों का भविष्य खा रहा है, और उन अधिकारियों का जो अन्नदाता या जनसेवक होने का ढोंग तो करते हैं, लेकिन मासूम बच्चों को डराने से भी बाज नहीं आते!"
बैकग्राउंड और ग्राउंड रियलिटी: क्या है स्कूलों का हाल?]
"जरा सोचिए, जिन बच्चों के हाथों में किताबें होनी चाहिए, जो देश का भविष्य हैं, वो आज कलेक्ट्रेट की दहलीज पर क्यों भटक रहे हैं? वजह दिल दहला देने वाली है:
- शिक्षकों की भारी कमी: स्कूलों में पढ़ाने के लिए टीचर तक नहीं हैं, आखिर बच्चे पढ़ाई करें तो कैसे?
- ज़हरीला और कीड़ेयुक्त मिड-डे मील: बच्चों को जो मध्याह्न भोजन (मिड-डे मील) मिल रहा है, वो पोषण देने के बजाय उनकी जान ले रहा है - खाने में कीड़े निकल रहे हैं!
- बदहाल बुनियादी ढांचा: स्कूल के भवन जर्जर हो चुके हैं, सिर पर छत गिरने का खतरा मंडरा रहा है। स्कूलों में शौचालय तक नहीं हैं और बाउंड्री वॉल न होने के कारण सुरक्षा का भारी संकट है।"
प्रशासनिक संवेदनहीनता: जब बच्चे पहुंचे शिकायत लेकर
"जब सिस्टम के इन नाकारा तरीकों से तंग आकर ये मासूम बच्चे अपनी शिकायत लेकर बिलासपुर कलेक्ट्रेट पहुंचे, तो इनकी सुनने के बजाय नए अधिकारियों ने इन्हें डराना-धमकाना शुरू कर दिया।
अरे शर्म आनी चाहिए ऐसे प्रशासनिक अमले को! जो बच्चे अपनी किताबों की जगह कलेक्ट्रेट के फर्श पर न्याय मांगने आएं, उन्हें न्याय देने के बजाय आप उन्हें अपनी धौंस दिखा रहे हैं? क्या इसलिए बैठाया गया है आपको उस कुर्सी पर?"
पुराना इतिहास और सिस्टम का दोहरा रवैया
"और ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है, दोस्तों! ये कोई छिटपुट घटना नहीं है, बल्कि इस बीमार व्यवस्था का एक पुराना और दर्दनाक इतिहास रहा है। याद कीजिए, थोड़े दिन पहले भी ऐसा ही एक वाकया हुआ था, जब एक रोती हुई बच्ची कलेक्ट्रेट से बाहर निकली थी — उस प्रशासनिक अधिकारी की संवेदनहीनता इतनी बढ़ गई थी कि बाद में उसे निलंबित करना पड़ा था। इतना ही नहीं, जब वही बच्चियां अपनी मांगों को लेकर धरने पर बैठी थीं, तब भी एसडीएम मैडम ने उन्हें कैसे 'चमकाया' था, कैसे डराया था, ये किसी से छिपा नहीं है!
मतलब साफ है—साहेब लोग अपनी गलतियां सुधारने के बजाय, बच्चों की आवाज को कुचलना चाहते हैं।"
"आज सवाल सिर्फ बिलासपुर का नहीं है, सवाल पूरे छत्तीसगढ़ और देश की शिक्षा व्यवस्था का है। क्या हमारे बच्चे अब इतने लाचार हो गए हैं कि वे अपना हक मांगेंगे तो उन्हें अधिकारियों की डांट और धौंस सुननी पड़ेगी?
मैं आपसे पूछता हूँ—क्या इन अधिकारियों पर सख्त से सख्त कार्रवाई नहीं होनी चाहिए? क्या इन बच्चों को उनका हक नहीं मिलना चाहिए?

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