मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

जीवनदायिनी नदियों का घोंटा जा रहा गला: 30 हजार मामले दर्ज, फिर भी जिम्मेदार मौन!

 जीवनदायिनी नदियों का घोंटा जा रहा गला: 30 हजार मामले दर्ज, फिर भी जिम्मेदार मौन!



जिस पानी को हम आचमन करते हैं, जिस नदी को हम माँ का दर्जा देते हैं, आज वही नदियां अपना अस्तित्व बचाने के लिए सिसक रही हैं। छत्तीसगढ़—जिसे नदियों और प्राकृतिक संसाधनों का प्रदेश कहा जाता है, वहां की नदियां आज नालों में तब्दील हो चुकी हैं।

जलशक्ति मंत्रालय को भेजी गई जुलाई 2026 की रिपोर्ट ने जो आंकड़े पेश किए हैं, वे सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि प्रशासन और सरकार की नाकामी का वह काला चिट्ठा हैं जिसे देखकर किसी का भी कलेजा कांप जाए।

प्रदेश की नदियों को प्रदूषित करने के 30,000 से अधिक प्रकरण दर्ज हो चुके हैं! जी हां, 30 हजार! लेकिन सवाल यह है कि इतने मामले दर्ज होने के बाद भी क्या एक भी नदी का पानी साफ हुआ? क्या एक भी लापरवाह अफसर पर गाज गिरी? या फिर 'प्रस्ताव तैयार हो रहा है' के ढोंग तले पूरी व्यवस्था सो रही है?

आंकड़ों की जुबानी समझिए कि हमारी जीवनदायिनी नदियों के साथ कितना बड़ा खिलवाड़ हो रहा है। जलशक्ति मंत्रालय को भेजी गई रिपोर्ट के मुताबिक:

  • कुल दर्ज प्रकरण: पूरे छत्तीसगढ़ में 30 हजार से ज्यादा नदियों के प्रदूषण के मामले दर्ज हैं।
  • रायपुर (राजधानी की पोल): अकेले राजधानी रायपुर में 17,371 प्रकरण दर्ज किए गए हैं, जो पूरे प्रदेश में सबसे दर्ज हैं।
  • बिलासपुर: न्यायधानी बिलासपुर में 3,729 प्रकरण दर्ज हुए हैं।
  • कोरबा: ऊर्जाधानी कोरबा में 1,204 प्रकरण दर्ज किए गए हैं।

सोचिए, जहां सरकार बैठती है, जहां मुख्यमंत्री और तमाम मंत्री बैठते हैं, जहां पर्यावरण संरक्षण मंडल का मुख्यालय है, उसी रायपुर में 17 हजार से अधिक बार नदियों के सीने पर प्रदूषण का प्रहार हुआ। शहरों के अनचारित (untreated) सीवरेज, नालियों का गंदा पानी और औद्योगिक कचरा सीधे नदियों में उड़ेला जा रहा है।

सवाल यह उठता है कि क्या सरकार सिर्फ आंकड़े गिनने के लिए बैठी है? 30 हजार से ज्यादा मामले दर्ज होना इस बात का सबूत है कि अपराध लगातार जारी है। जब हर दिन गंदा पानी नदियों में मिल रहा है, तो पर्यावरण मंडल और जिम्मेदार विभाग क्या कर रहे हैं?

रिपोर्ट में लिखा गया है— "प्रदूषण फैलाने वालों पर कड़ी कार्रवाई का प्रस्ताव तैयार हो रहा है।" वाह! क्या शानदार व्यवस्था है! नदियां मर रही हैं, लोग विषैला पानी पीने को मजबूर हैं, और सरकार 'प्रस्ताव' तैयार कर रही है! यह प्रस्ताव कब लागू होगा? जब नदियां पूरी तरह सूखकर गंदे नाले का रूप ले लेंगी?

क्या उद्योगों की चिमनियों और जहरीले नालों के आगे शासन-प्रशासन ने घुटने टेक दिए हैं? भारी-भरकम बजट और 'नदी बचाओ' के बड़े-बड़े विज्ञापनों का पैसा आखिर कहां जा रहा है?

नदियों का यह प्रदूषण केवल पानी की खराबी नहीं है, यह सीधे तौर पर लाखों लोगों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ है। जब सीवरेज और कारखानों का जहरीला केमिकल पानी में घुलता है, तो वही पानी पाइपलाइनों के जरिए हमारे और आपके घरों तक पहुंचता है।

कैंसर, त्वचा रोग, पेट की गंभीर बीमारियों और जलजनित बीमारियों का ग्राफ प्रदेश में लगातार बढ़ रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां लोग सीधे नदी के पानी पर निर्भर हैं, वहां स्थिति और भी भयावह है। इसके बावजूद, ठोस सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) बनाने या उन्हें सुचारू रूप से चलाने में सरकार की कोई दिलचस्पी नजर नहीं आती।

छत्तीसगढ़ की जनता आज सरकार से सीधी जवाबदेही मांग रही है:

  1. 30 हजार प्रकरण दर्ज होने के बाद कितने दोषियों पर आपराधिक कार्रवाई हुई और कितनों को जेल भेजा गया?
  2. राजधानी रायपुर में दर्ज 17,371 मामलों के लिए कौन से अधिकारी जिम्मेदार हैं?
  3. कार्रवाई के नाम पर सिर्फ 'प्रस्ताव' बनाने का छलावा कब तक चलेगा?

अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। नदियां सिर्फ पानी का स्रोत नहीं, हमारी संस्कृति और जीवन का आधार हैं। इन्हें बचाना होगा, कागजों पर नहीं, धरातल पर!

 "एनजीटी (NGT): क्या भूमिका सिर्फ 'नोटिस' देने तक सीमित रह गई है?"

कागजी चेतावनी और बेअसर नोटिस: क्या दांतहीन संस्था बन चुका है एनजीटी?

पर्यावरण की रक्षा और नदियों को प्रदूषण मुक्त कराने के लिए देश में 'नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल' यानी NGT का गठन इस उम्मीद के साथ किया गया था कि यह संस्था पर्यावरण के दुश्मनों पर नकेल कसेगी। लेकिन आज स्थिति क्या है?

छत्तीसगढ़ में नदियों के प्रदूषण के 30 हजार से ज्यादा मामले दर्ज हो चुके हैं। जलशक्ति मंत्रालय तक रिपोर्टें भेजी जा रही हैं। लेकिन क्या NGT की धमक धरातल पर दिख रही है? या फिर एनजीटी की भूमिका अब महज 'नोटिस जारी करने' और 'जवाब मांगने' तक सिमट कर रह गई है?

नदियों में गिरता औद्योगिक कचरा, शहरों का बिना ट्रीट किया गया सीवरेज और लगातार बिगड़ती जल गुणवत्ता। यह तस्वीर किसी एक जिले की नहीं, बल्कि रायपुर (17,371 मामले), रायगढ़ (6,520 मामले), बिलासपुर (3,729 मामले) और कोरबा (1,204 मामले) की है।

जब भी कोई बड़ा प्रदूषण का मामला सामने आता है, एनजीटी संज्ञान लेता है, रिपोर्ट मांगता है और राज्य सरकार या संबंधित निकायों को नोटिस थमा देता है। लेकिन उस नोटिस का असर क्या होता है?

  • नोटिस नंबर 1: रिपोर्ट पेश करो।
  • नोटिस नंबर 2: जवाब संतोषजनक नहीं है, दोबारा एफिडेविट दो।
  • नोटिस नंबर 3: जुर्माना लगाया जाएगा।

और इसके बाद मामला फाइलों में दफन हो जाता है!

सवाल बहुत सीधा और कड़वा है— क्या एनजीटी सिर्फ एक नोटिस जारी करने वाली एजेंसी बनकर रह गया है?

  1. कार्यान्वयन (Execution) का अभाव: एनजीटी बड़े-बड़े जुर्माने तो लगा देता है, लेकिन क्या वह जुर्माना कभी वसूला जाता है? या फिर सरकारी महकमे कोर्ट और ट्रिब्यूनल के चक्कर काटकर समय बिता देते हैं?
  2. धरातल पर शून्य असर: रायपुर में 17 हजार से अधिक प्रकरण दर्ज होना यह बताता है कि प्रदूषण फैलाने वालों में न तो पर्यावरण विभाग का खौफ है और ना ही एनजीटी के निर्देशों का।
  3. 'प्रस्ताव' की आड़ में खेल: जलशक्ति मंत्रालय को भेजी गई जुलाई 2026 की रिपोर्ट में कहा गया है कि "कड़ी कार्रवाई का प्रस्ताव तैयार हो रहा है।" एनजीटी के सख्त निर्देशों के बावजूद अगर सालों-साल सिर्फ 'प्रस्ताव' ही बनते रहेंगे, तो फिर ऐसे ट्रिब्यूनल का औचित्य ही क्या रह जाता है?

 अगर पर्यावरण अदालतें सिर्फ कागजी आदेश जारी करती रहेंगी और जमीनी स्तर पर नदियां नाले में बदलती रहेंगी, तो जनता का इस व्यवस्था से विश्वास उठ जाएगा।

एनजीटी को अब सिर्फ 'नोटिस जारी करने वाली संस्था' से आगे बढ़कर कड़े फैसले लेने होंगे—दोषी अधिकारियों पर सीधी एफआईआर (FIR), प्रदूषण फैलाने वाली फैक्ट्रियों पर स्थाई ताला और सीवरेज बहाने वाले निकायों के प्रमुखों पर सीधी जवाबदेही तय करनी होगी। वरना 'नदी बचाओ' के सारे दावे सिर्फ कागजी आंकड़ों में ही बह जाएंगे।