शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026

दोनों डिप्टी सीएम की खीचतान में योजना बर्बाद

दोनों डिप्टी सीएम की खीचतान में योजना बर्बाद 


 छत्तीसगढ़ में जल जीवन मिशन का हाल और अटकी नीति

"हर घर जल... शुद्ध जल! मोदी सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना का मकसद देश के हर ग्रामीण घर तक नल से जल पहुंचाना था। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त क्या है? क्या वाकई लोगों को पानी मिल रहा है? आज हम बात करने वाले हैं छत्तीसगढ़ की, जहाँ जल जीवन मिशन का बुरा हाल है। ठेकेदार परेशान हैं, पानी घर-घर पहुँच नहीं रहा है, और सबसे बड़ा झटका यह है कि इस पूरी योजना की 'नीति' ही पिछले एक साल से सरकारी फाइलों में अटकी हुई है! तो चलिए, आज इस वीडियो में गहराई से समझते हैं कि आखिर कहाँ फंसा है पूरा मामला।"

एक साल से सरकारी फाइल में अटकी नीति 

 इस पूरे मामले के केंद्र में जो सबसे बड़ी वजह बनकर सामने आई है, वह है संचालन और रखरखाव की नीति। इसे 'ओएंडएम' यानी ऑपरेशन एंड मेंटेनेंस नीति कहा जाता है। यह नीति तय करती है कि योजना बनने के बाद उसका संचालन कैसे होगा, और पानी की सप्लाई व रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी होगी। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि छत्तीसगढ़ में इस नीति का प्रस्ताव करीब एक साल से लंबित बताया जा रहा है। इसका प्रारूप तैयार हो चुका है, लेकिन इसे अब तक अंतिम मंजूरी नहीं मिल सकी है। ठेकेदार संगठन के मुताबिक, पंचायत विभाग और लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) के बीच तालमेल की कमी है, और इसी आपसी खींचतान के कारण नीति को लागू करने में देरी हो रही है। और तो और, इस देरी का सीधा असर केंद्र से मिलने वाली राशि पर भी पड़ रहा है।"

केंद्र से पैसा मिलने में कहां फंसा 

अब सवाल ये उठता है कि क्या पैसों की भी कोई किल्लत है? जी हाँ! वित्त वर्ष 2025-26 में केंद्रीय हिस्से की राशि नहीं मिलने का मामला सामने आया था। इसके बाद राज्य सरकार ने अपने संसाधनों से निर्माण एजेंसियों को भुगतान किया। लेकिन अब वित्त वर्ष 2026-27 में आगे के भुगतान को लेकर गंभीर परेशानी बताई जा रही है। ठेकेदार संगठन का साफ कहना है कि राज्य सरकार पहले केंद्रीय प्रतिपूर्ति मिलने की बात कह रही है, जिसके चलते भुगतान का चक्रव्यूह उलझता जा रहा है। जब नीति ही नहीं होगी और फंड्स समय पर नहीं मिलेंगे, तो ठेकेदार काम कैसे करेंगे और जनता को पानी कैसे मिलेगा?"

ठेकेदारों का संकट और ज़मीनी हक़ीक़त 


  • इस पूरी व्यवस्था की पिसने वाली कड़ी हैं—आम जनता और ठेकेदार। एक तरफ ठेकेदार संगठन वित्तीय संकट और विभागों के बीच आपसी समन्वय की कमी से जूझ रहे हैं, तो दूसरी तरफ ग्रामीण इलाकों में लोग आज भी बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं। योजना कागजों पर तो बड़ी भव्य दिखती है, लेकिन जब बात ज़मीन पर उतरने की आती है, तो समन्वय की कमी और प्रशासनिक सुस्ती के कारण सब कुछ ठप पड़ जाता है। जिन गाँवों में नल तो लग गए, लेकिन पानी नहीं आया, वहाँ के लोग आज भी सरकार की तरफ उम्मीद भरी नज़रों से देख रहे हैं।"
  • "तो निष्कर्ष यह निकलता है कि छत्तीसगढ़ में जल जीवन मिशन की गाड़ी केवल इसलिए रुकी हुई है क्योंकि विभाग आपस में तालमेल नहीं बिठा पा रहे हैं और 'ओएंडएम' नीति एक साल से धूल फांक रही है। अगर सरकार और प्रशासन वाकई इस योजना को सफल बनाना चाहते हैं, तो सबसे पहले नीति को तुरंत मंजूरी देनी होगी और वित्तीय लेन-देन के मामलों को सुलझाना होगा ताकि ठेकेदार बिना किसी रुकावट के काम पूरा कर सकें और जनता का गला तर हो सके। दोस्तों, आपकी इस पर क्या राय है? क्या आपके इलाके में भी जल जीवन मिशन का यही हाल है? हमें नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।