सीजी में स्कूलों की दुर्दशा, जानकर दंग रह जाओगे
छत्तीसगढ़ में अगर आज आप किसी पढ़े-लिखे युवा से मिलेंगे, तो उसकी आंखों में आपको कोई सपने नहीं, बल्कि एक खौफनाक गुस्सा तैरता हुआ दिखाई देगा! वो गुस्सा—जो सालों की मेहनत, डिग्रियों के बंडलों और बेरोजगारी की मार से पैदा हुआ है।
एक तरफ डी.एड, बी.एड और टीईटी पास किए लाखों युवा सड़कों पर जूते घिस रहे हैं, धरना स्थलों पर लाठियां खा रहे हैं, और दूसरी तरफ प्रदेश के सरकारी स्कूलों का ताला बंद होने की नौबत आ गई है!
सरकारें मंचों से दावे करती हैं, बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगाकर शिक्षा क्रांति का ढोल पीटती हैं। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि छत्तीसगढ़ की स्कूली शिक्षा व्यवस्था इस वक्त वेंटिलेटर पर है! कहीं स्कूल की छत गिर रही है, कहीं बच्चों को कीड़े वाला मध्याह्न भोजन परोसा जा रहा है, तो कहीं 5-5 कक्षाओं को संभालने के लिए सिर्फ एक अकेला मास्टर साहब तैनात हैं।
आज की यह रिपोर्ट छत्तीसगढ़ के हर उस युवा के नाम है जिसका हक मारा जा रहा है, और सरकार से हमारा सीधा सवाल है— "जबप्रदेश के स्कूलों को 80 हजार से ज्यादा शिक्षकों की जरूरत है, जब स्कूल जर्जर हैं, तो हमारे युवाओं का भविष्य और बच्चों का बचपनकिस भट्टी में झोंका जा रहा है?"
80 हजार शिक्षकों की दरकार और युवाओं का खौलता खून
आंकड़ों का खेल समझिए। सरकार कागजों पर दिखाती है कि लगभग 57,000 पद रिक्त हैं। लेकिन जब आप नियम और कानून की कसौटी पर कसेंगे, तो असली आंकड़ा सुनकर आपके होश उड़ जाएंगे!
राइट टू एजुकेशन (RTE) एक्ट और नई शिक्षा नीति (NEP) के मापदंडों को अगर छत्तीसगढ़ में ईमानदारी से लागू कर दिया जाए, तो आज इस राज्य को कम से कम 75,000 से 80,000 नए शिक्षकों की तत्काल जरूरत है!
हमारे पास लगभग 30,000 प्राथमिक स्कूल हैं। नियम कहता है कि हर स्कूल में कम से कम 3 से 4 शिक्षक होने चाहिए, लेकिन सैकड़ों स्कूल ऐसे हैं जो 'एकल शिक्षकीय' (Single Teacher) हैं या शून्य शिक्षक पर चल रहे हैं!
मिडल और हाई स्कूलों में गणित, विज्ञान, अंग्रेजी जैसे मुख्य विषयों के व्याख्याता ही नहीं हैं।
अब जरा उस युवा का दर्द सोचिए... जिसने अपने बाप की गाढ़ी कमाई लगाकर बी.एड किया, दिन-रात एक करके TET परीक्षा पास की। वो युवा रोज सुबह उठकर भर्ती का नोटिफिकेशन तलाशता है, लेकिन उसे क्या मिलता है? सिर्फ खोखले आश्वासन, तारीख पर तारीख और भर्ती प्रक्रियाओं में बैठाई गई जांच समितियां!
यह सिर्फ बेरोजगारी नहीं है, यह प्रदेश के लाखों युवाओं के सब्र का इम्तिहान लिया जा रहा है। युवा पूछ रहा है— "जब पद खाली हैं, जब स्कूलों में मास्टर नहीं हैं, तो भर्ती का विज्ञापन निकालने में सरकार के हाथ क्यों कांप रहे हैं?"
जर्जर भवन - 'स्कूल' या 'मौत का कुआं'?
अब जरा उन स्कूलों की तस्वीर देखिए जहां हमारे बच्चे पढ़ने जाते हैं।
बारिश का मौसम आते ही छत्तीसगढ़ के कई जिलों से तस्वीरें सामने आती हैं—कहीं छत से प्लास्टर गिर रहा है, तो कहीं क्लासरूम में पानी भरा हुआ है। बच्चे डर-डरकर पढ़ाई कर रहे हैं कि कहीं ऊपर से ढलाई का टुकड़ा उनके सिर पर न गिर जाए!
कई जगहों पर स्थिति यह है कि बच्चे तिरपाल टांगकर या पेड़ के नीचे बैठने को मजबूर हैं। जिस उम्र में बच्चों के हाथों में कॉपी-किताब और डिजिटल स्लेट होनी चाहिए, उस उम्र में वे जर्जर दीवारों के साये में जान जोखिम में डालकर बैठ रहे हैं।
सरकार से पूछिए कि 'आत्मानंद स्कूलों' के चकाचौंध वाले विज्ञापनों के पीछे जो हजारों सामान्य सरकारी स्कूल सड़ रहे हैं, उनका जीर्णोद्धार कौन करेगा? क्या ग्रामीण और गरीब के बच्चों को सुरक्षित छत में बैठकर पढ़ने का हक नहीं है?
मध्याह्न भोजन घोटाला - बच्चों की थाली में डाका
शिक्षकों की कमी से पढ़ाई ठप है, इमारतों से जान का खतरा है, और जो थोड़ा-बहुत आकर्षण बच्चों को स्कूल खींचकर लाता था—यानी 'मध्याह्न भोजन' (Mid-Day Meal)—उसमें भी डकैती डाली जा रही है!
आए दिन खबरें आती हैं कि मिड-डे मील में पानी जैसी पतली दाल दी जा रही है, चावल में सूंडी और कीड़े निकल रहे हैं। जो बजट बच्चों के पोषण के लिए आता है, उसमें भ्रष्टाचार की दीमक लगी हुई है।
सोचिए, कितना शर्मनाक है यह! एक तरफ कुपोषण से लड़ने का ढोंग किया जाता है, और दूसरी तरफ मासूम बच्चों की थाली से पौष्टिक खाना छीनकर बिचौलियों और भ्रष्ट तंत्र की जेबें भरी जा रही हैं। जिस राज्य को धान का कटोरा कहा जाता है, वहां के सरकारी स्कूलों में बच्चों को भरपेट शुद्ध खाना नसीब नहीं हो रहा!
बदहाल सिस्टम का शिकार - 'एक शिक्षक' और 'पांच कक्षाएं'
जरा उस एक अकेले शिक्षक की हालत भी सोचिए, जिसे एक ही स्कूल में बैठा दिया गया है।
उसे पहली से पांचवीं तक के बच्चों को पढ़ाना भी है, मध्याह्न भोजन की एंट्री भी करनी है, डाक भी संभालना है, जनगणना और चुनाव ड्यूटी भी करनी है, और रोज पोर्टल पर जानकारी भी अपलोड करनी है!
आप खुद बताइए, क्या एक इंसान एक साथ पांच कक्षाओं के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दे सकता है?
नतीजा क्या हो रहा है? बच्चे अगली क्लास में प्रमोट तो हो जाते हैं, लेकिन 5वीं-8वीं के बच्चों को अपना नाम और हिंदी का एक सीधा वाक्य पढ़ना नहीं आता! यह बच्चों का भविष्य संवारा जा रहा है या उनका जीवन बर्बाद किया जा रहा है?
युवाओं का आक्रोश और सरकार को अल्टीमेटम
अब बात करते हैं उस सबसे बड़े ज्वालामुखी की जो छत्तीसगढ़ में फटने की कगार पर है— युवाओं का आक्रोश!
यह राज्य युवाओं का है। इस राज्य का युवा अब बेवकूफ बनने को तैयार नहीं है।
जब चुनाव आते हैं, तो हर राजनीतिक दल बड़े-बड़े वादे करता है— "हम इतने लाख रोजगार देंगे", "हम शिक्षा व्यवस्था बदल देंगे"। लेकिन चुनाव खत्म होते ही युवाओं को भूल दिया जाता है।
आज छत्तीसगढ़ का युवा सड़कों पर उतर रहा है, क्योंकि:
1. उसने मेहनत की है, उसके पास योग्यता है।
2. वो देखता है कि स्कूलों में सीटें खाली पड़ी हैं, बच्चे बिना मास्टर के बैठे हैं, लेकिन सरकार भर्ती निकालने में आनाकानी कर रही है।
3. युवाओं को समझ आ गया है कि यह सिर्फ उनकी नौकरी की लड़ाई नहीं है, बल्कि छत्तीसगढ़ की आने वाली पीढ़ी की शिक्षा को बचाने की लड़ाई है!
सत्ता में बैठे हुक्मरानों को कान खोलकर सुन लेना चाहिए— युवाओं के इस गुस्से को हल्का मत समझिए। जब पढ़ा-लिखा युवा हताश होकर सड़क पर उतरता है, तो वो बड़े-बड़े राजनीतिक तख्तों को हिलाकर रख देता है।
अगर 80,000 नए शिक्षकों की जरूरत है, तो प्रक्रिया को अटकाने और लटकाने का खेल बंद होना चाहिए। संविदा और अस्थायी व्यवस्था के नाम पर युवाओं का शोषण बंद होना चाहिए और तत्काल पारदर्शी नियमित भर्तियों का विज्ञापन जारी होना चाहिए!
यह सिर्फ एक घटना नहीं है, यह छत्तीसगढ़ के बदहाल स्कूलों और दर-दर भटकते हमारे युवा भाइयों-बहनों की चीख है।
अगर आपको भी लगता है कि राज्य की शिक्षा व्यवस्था में सुधार होना चाहिए, जर्जर भवनों की मरम्मत होनी चाहिए, बच्चों को शुद्ध खाना मिलना चाहिए और 80,000 रिक्त पदों पर हमारे युवाओं को नौकरी मिलनी चाहिए—तो इसे इतना शेयर कीजिए कि यह शासन के गलियारों तक गूंजे!
अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखिए। क्या आपके इलाके के स्कूल में शिक्षक हैं? क्या वहां का स्कूल सुरक्षित है? लिखकर बताइए ताकि सच्चाई सबके सामने आए।
छत्तीसगढ़ में अगर आज आप किसी पढ़े-लिखे युवा से मिलेंगे, तो उसकी आंखों में आपको कोई सपने नहीं, बल्कि एक खौफनाक गुस्सा तैरता हुआ दिखाई देगा! वो गुस्सा—जो सालों की मेहनत, डिग्रियों के बंडलों और बेरोजगारी की मार से पैदा हुआ है।
एक तरफ डी.एड, बी.एड और टीईटी पास किए लाखों युवा सड़कों पर जूते घिस रहे हैं, धरना स्थलों पर लाठियां खा रहे हैं, और दूसरी तरफ प्रदेश के सरकारी स्कूलों का ताला बंद होने की नौबत आ गई है!
सरकारें मंचों से दावे करती हैं, बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगाकर शिक्षा क्रांति का ढोल पीटती हैं। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि छत्तीसगढ़ की स्कूली शिक्षा व्यवस्था इस वक्त वेंटिलेटर पर है! कहीं स्कूल की छत गिर रही है, कहीं बच्चों को कीड़े वाला मध्याह्न भोजन परोसा जा रहा है, तो कहीं 5-5 कक्षाओं को संभालने के लिए सिर्फ एक अकेला मास्टर साहब तैनात हैं।
आज की यह रिपोर्ट छत्तीसगढ़ के हर उस युवा के नाम है जिसका हक मारा जा रहा है, और सरकार से हमारा सीधा सवाल है— "जबप्रदेश के स्कूलों को 80 हजार से ज्यादा शिक्षकों की जरूरत है, जब स्कूल जर्जर हैं, तो हमारे युवाओं का भविष्य और बच्चों का बचपनकिस भट्टी में झोंका जा रहा है?"
80 हजार शिक्षकों की दरकार और युवाओं का खौलता खून
आंकड़ों का खेल समझिए। सरकार कागजों पर दिखाती है कि लगभग 57,000 पद रिक्त हैं। लेकिन जब आप नियम और कानून की कसौटी पर कसेंगे, तो असली आंकड़ा सुनकर आपके होश उड़ जाएंगे!
राइट टू एजुकेशन (RTE) एक्ट और नई शिक्षा नीति (NEP) के मापदंडों को अगर छत्तीसगढ़ में ईमानदारी से लागू कर दिया जाए, तो आज इस राज्य को कम से कम 75,000 से 80,000 नए शिक्षकों की तत्काल जरूरत है!
हमारे पास लगभग 30,000 प्राथमिक स्कूल हैं। नियम कहता है कि हर स्कूल में कम से कम 3 से 4 शिक्षक होने चाहिए, लेकिन सैकड़ों स्कूल ऐसे हैं जो 'एकल शिक्षकीय' (Single Teacher) हैं या शून्य शिक्षक पर चल रहे हैं!
मिडल और हाई स्कूलों में गणित, विज्ञान, अंग्रेजी जैसे मुख्य विषयों के व्याख्याता ही नहीं हैं।
अब जरा उस युवा का दर्द सोचिए... जिसने अपने बाप की गाढ़ी कमाई लगाकर बी.एड किया, दिन-रात एक करके TET परीक्षा पास की। वो युवा रोज सुबह उठकर भर्ती का नोटिफिकेशन तलाशता है, लेकिन उसे क्या मिलता है? सिर्फ खोखले आश्वासन, तारीख पर तारीख और भर्ती प्रक्रियाओं में बैठाई गई जांच समितियां!
यह सिर्फ बेरोजगारी नहीं है, यह प्रदेश के लाखों युवाओं के सब्र का इम्तिहान लिया जा रहा है। युवा पूछ रहा है— "जब पद खाली हैं, जब स्कूलों में मास्टर नहीं हैं, तो भर्ती का विज्ञापन निकालने में सरकार के हाथ क्यों कांप रहे हैं?"
जर्जर भवन - 'स्कूल' या 'मौत का कुआं'?
अब जरा उन स्कूलों की तस्वीर देखिए जहां हमारे बच्चे पढ़ने जाते हैं।
बारिश का मौसम आते ही छत्तीसगढ़ के कई जिलों से तस्वीरें सामने आती हैं—कहीं छत से प्लास्टर गिर रहा है, तो कहीं क्लासरूम में पानी भरा हुआ है। बच्चे डर-डरकर पढ़ाई कर रहे हैं कि कहीं ऊपर से ढलाई का टुकड़ा उनके सिर पर न गिर जाए!
कई जगहों पर स्थिति यह है कि बच्चे तिरपाल टांगकर या पेड़ के नीचे बैठने को मजबूर हैं। जिस उम्र में बच्चों के हाथों में कॉपी-किताब और डिजिटल स्लेट होनी चाहिए, उस उम्र में वे जर्जर दीवारों के साये में जान जोखिम में डालकर बैठ रहे हैं।
सरकार से पूछिए कि 'आत्मानंद स्कूलों' के चकाचौंध वाले विज्ञापनों के पीछे जो हजारों सामान्य सरकारी स्कूल सड़ रहे हैं, उनका जीर्णोद्धार कौन करेगा? क्या ग्रामीण और गरीब के बच्चों को सुरक्षित छत में बैठकर पढ़ने का हक नहीं है?
मध्याह्न भोजन घोटाला - बच्चों की थाली में डाका
शिक्षकों की कमी से पढ़ाई ठप है, इमारतों से जान का खतरा है, और जो थोड़ा-बहुत आकर्षण बच्चों को स्कूल खींचकर लाता था—यानी 'मध्याह्न भोजन' (Mid-Day Meal)—उसमें भी डकैती डाली जा रही है!
आए दिन खबरें आती हैं कि मिड-डे मील में पानी जैसी पतली दाल दी जा रही है, चावल में सूंडी और कीड़े निकल रहे हैं। जो बजट बच्चों के पोषण के लिए आता है, उसमें भ्रष्टाचार की दीमक लगी हुई है।
सोचिए, कितना शर्मनाक है यह! एक तरफ कुपोषण से लड़ने का ढोंग किया जाता है, और दूसरी तरफ मासूम बच्चों की थाली से पौष्टिक खाना छीनकर बिचौलियों और भ्रष्ट तंत्र की जेबें भरी जा रही हैं। जिस राज्य को धान का कटोरा कहा जाता है, वहां के सरकारी स्कूलों में बच्चों को भरपेट शुद्ध खाना नसीब नहीं हो रहा!
बदहाल सिस्टम का शिकार - 'एक शिक्षक' और 'पांच कक्षाएं'
जरा उस एक अकेले शिक्षक की हालत भी सोचिए, जिसे एक ही स्कूल में बैठा दिया गया है।
उसे पहली से पांचवीं तक के बच्चों को पढ़ाना भी है, मध्याह्न भोजन की एंट्री भी करनी है, डाक भी संभालना है, जनगणना और चुनाव ड्यूटी भी करनी है, और रोज पोर्टल पर जानकारी भी अपलोड करनी है!
आप खुद बताइए, क्या एक इंसान एक साथ पांच कक्षाओं के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दे सकता है?
नतीजा क्या हो रहा है? बच्चे अगली क्लास में प्रमोट तो हो जाते हैं, लेकिन 5वीं-8वीं के बच्चों को अपना नाम और हिंदी का एक सीधा वाक्य पढ़ना नहीं आता! यह बच्चों का भविष्य संवारा जा रहा है या उनका जीवन बर्बाद किया जा रहा है?
युवाओं का आक्रोश और सरकार को अल्टीमेटम
अब बात करते हैं उस सबसे बड़े ज्वालामुखी की जो छत्तीसगढ़ में फटने की कगार पर है— युवाओं का आक्रोश!
यह राज्य युवाओं का है। इस राज्य का युवा अब बेवकूफ बनने को तैयार नहीं है।
जब चुनाव आते हैं, तो हर राजनीतिक दल बड़े-बड़े वादे करता है— "हम इतने लाख रोजगार देंगे", "हम शिक्षा व्यवस्था बदल देंगे"। लेकिन चुनाव खत्म होते ही युवाओं को भूल दिया जाता है।
आज छत्तीसगढ़ का युवा सड़कों पर उतर रहा है, क्योंकि:
1. उसने मेहनत की है, उसके पास योग्यता है।
2. वो देखता है कि स्कूलों में सीटें खाली पड़ी हैं, बच्चे बिना मास्टर के बैठे हैं, लेकिन सरकार भर्ती निकालने में आनाकानी कर रही है।
3. युवाओं को समझ आ गया है कि यह सिर्फ उनकी नौकरी की लड़ाई नहीं है, बल्कि छत्तीसगढ़ की आने वाली पीढ़ी की शिक्षा को बचाने की लड़ाई है!
सत्ता में बैठे हुक्मरानों को कान खोलकर सुन लेना चाहिए— युवाओं के इस गुस्से को हल्का मत समझिए। जब पढ़ा-लिखा युवा हताश होकर सड़क पर उतरता है, तो वो बड़े-बड़े राजनीतिक तख्तों को हिलाकर रख देता है।
अगर 80,000 नए शिक्षकों की जरूरत है, तो प्रक्रिया को अटकाने और लटकाने का खेल बंद होना चाहिए। संविदा और अस्थायी व्यवस्था के नाम पर युवाओं का शोषण बंद होना चाहिए और तत्काल पारदर्शी नियमित भर्तियों का विज्ञापन जारी होना चाहिए!
यह सिर्फ एक घटना नहीं है, यह छत्तीसगढ़ के बदहाल स्कूलों और दर-दर भटकते हमारे युवा भाइयों-बहनों की चीख है।
अगर आपको भी लगता है कि राज्य की शिक्षा व्यवस्था में सुधार होना चाहिए, जर्जर भवनों की मरम्मत होनी चाहिए, बच्चों को शुद्ध खाना मिलना चाहिए और 80,000 रिक्त पदों पर हमारे युवाओं को नौकरी मिलनी चाहिए—तो इसे इतना शेयर कीजिए कि यह शासन के गलियारों तक गूंजे!
अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखिए। क्या आपके इलाके के स्कूल में शिक्षक हैं? क्या वहां का स्कूल सुरक्षित है? लिखकर बताइए ताकि सच्चाई सबके सामने आए।
