गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026

प्रो. डॉ. लवली शर्मा: खैरागढ़ से ग्वालियर तक विवादों और सवालों की पूरी इनसाइड स्टोरी!

 प्रो. डॉ. लवली शर्मा: खैरागढ़ से ग्वालियर तक विवादों और सवालों की पूरी इनसाइड स्टोरी! 



 जब देश के बड़े कला और संगीत विश्वविद्यालयों की बात आती है, तो उम्मीद की जाती है कि उनका नेतृत्व करने वाले कुलपति विवादों से दूर रहकर उच्च शैक्षणिक मानक स्थापित करेंगे। लेकिन क्या हो जब एक नाम जहाँ भी प्रशासनिक ज़िम्मेदारी संभाले, वहाँ विवादों, नियुक्तियों के बवंडर और वित्तीय सवालों का सिलसिला साथ-साथ चलने लगे?

आज हम बात कर रहे हैं प्रो. डॉ. लवली शर्मा की, जो वर्तमान में छत्तीसगढ़ के खैरागढ़ स्थित 'इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय' की कुलपति हैं। इससे पहले वे मध्य प्रदेश के ग्वालियर स्थित 'राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय' में कुलपति की कमान संभाल चुकी हैं। दयालबाग शैक्षणि संस्थान (आगरा) से लेकर ग्वालियर और अब खैरागढ़ तक—आखिर क्यों इनके कार्यकाल के दौरान प्रशासनिक कार्यशैली, नियुक्तियाँ और शोध से जुड़े मामले लगातार सवालों के घेरे में रहे हैं?

और सबसे बड़ा सवाल—जब खैरागढ़ में इनकी नियुक्ति का आदेश आया था, तब सत्तारूढ़ दल के अपने ही छात्र संगठन ABVP ने सड़कों पर उतरकर भारी विरोध प्रदर्शन और धरना क्यों दिया था? बाद में ऐसा क्या बदला कि विरोध की आवाज़ें शांत हो गईं? आज इस पूरी कहानी की एक-एक परत खोलेंगे।"

- खैरागढ़ विश्वविद्यालय: सोशल मीडिया का भूचाल और गंभीर आरोप

"शुरुआत करते हैं खैरागढ़ के इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय से, जहाँ का माहौल हाल के दिनों में फिर गरमा गया है।

हाल ही में सोशल मीडिया पर एक के बाद एक कई पोस्ट्स और शिकायतें वायरल हुईं। इन पोस्ट्स में कुलपति डॉ. लवली शर्मा के कार्यकाल पर सीधे तीखे प्रहार किए गए:

  1. नियुक्तियों में गड़बड़ी: दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों की भर्ती व्यवस्था और नियमों की अनदेखी पर सवाल।
  2. शोध पंजीयन और पीएचडी आवंटन: पीएचडी के पंजीयन, गाइड्स के चयन और चहेतों को लाभ पहुँचाने के आरोप।
  3. निरीक्षण दल और वित्तीय मामले: विश्वविद्यालय के निरीक्षण दलों (Inspection Teams) में बाहरी सदस्यों की नियुक्ति और रायगढ़ कार्यक्रमों व दीक्षांत समारोह के वित्तीय खर्चों को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए।

मामला इतना बढ़ गया कि विश्वविद्यालय प्रशासन को सामने आकर बयान जारी करना पड़ा। प्रशासन का कहना है कि ये सभी आरोप तथ्यहीन और भ्रामक हैं तथा सभी प्रक्रियाएं नियमानुसार हुई हैं। लेकिन सवाल वही है कि धुआं बार-बार क्यों उठता है?"

- ग्वालियर कार्यकाल: राजा मानसिंह तोमर यूनिवर्सिटी के विवाद

अब बात करते हैं ग्वालियर की। खैरागढ़ आने से पहले डॉ. लवली शर्मा मध्य प्रदेश के ग्वालियर स्थित 'राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय' की कुलपति थीं।

ग्वालियर में उनके कार्यकाल के दौरान भी प्रशासनिक कार्यशैली और नियुक्तियों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए थे:

  • योग्यता और अनुभव पर सवाल: उनकी नियुक्ति के समय ही यह आरोप लगा था कि पद के लिए आवश्यक 10 वर्षों के प्रोफेसर स्तर के शैक्षणिक व प्रशासनिक अनुभव के मापदंडों पर सवाल उठाए गए थे।
  • अंदरूनी खींचतान और मनमानी: ग्वालियर में प्राध्यापकों, स्टाफ और विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच लगातार खींचतान की खबरें आती रहीं। आरोप थे कि प्रशासनिक निर्णयों और वित्तीय मामलों में पारदर्शिता की कमी रही।

यानी ग्वालियर से लेकर खैरागढ़ तक, पेटर्न एक जैसा ही नज़र आता है—जहाँ भी वे प्रशासनिक शीर्ष पर रहीं, वहाँ नियमों की व्याख्या और नियुक्तियों के तरीक़ों पर सवाल उठे।"

नियुक्ति के समय का वो ड्रामा: ABVP का विरोध प्रदर्शन

"अब आते हैं इस पूरी कहानी के सबसे चौंकाने वाले मोड़ पर। जब खैरागढ़ में इनकी नियुक्ति की प्रक्रिया चल रही थी, तब विरोध विपक्षी दलों ने नहीं, बल्कि भाजपा के अपने ही छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने किया था!

ABVP के कार्यकर्ताओं ने कुलपति की नियुक्ति का जमकर विरोध किया। विश्वविद्यालय परिसर और प्रशासनिक भवनों के सामने ज़ोरदार प्रदर्शन और धरने दिए गए। ABVP का स्पष्ट आरोप था कि अतीत में विवादित कार्यकाल और कार्यशैली को देखते हुए ऐसे व्यक्ति को इतने प्रतिष्ठित कला-संगीत विश्वविद्यालय की ज़िम्मेदारी नहीं दी जानी चाहिए।

लेकिन फिर क्या हुआ? जैसे-जैसे समय बीता, विरोध की धार धीमी होती गई और अंततः मामला शांत हो गया। अंदरखाने चर्चाएँ शुरू हुईं कि क्या राजनीतिक तालमेल बिठा लिया गया या प्रशासनिक दबाव में विरोध को दबा दिया गया? जो संगठन शुरुआत में नियुक्ति रद्द करने की माँग पर अड़ा था, उसने बाद में चुप्पी क्यों साध ली? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब आज भी छात्र खोज रहे हैं।"

- प्रशासनिक सफाई और वर्तमान तस्वीर

"दूसरी तरफ, अगर कुलपति और विश्वविद्यालय परिवार के पक्ष को देखें, तो उनका कहना है कि डॉ. लवली शर्मा एक प्रतिष्ठित सितार वादक और देश की पहली महिला D.Litt. धारक हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन का तर्क है कि समय पर परीक्षा परिणाम घोषित करना, शैक्षणिक अनुशासन बनाना और दीक्षांत समारोह में कम खर्च करना उनकी उपलब्धियाँ हैं। सोशल मीडिया पर उठने वाले आरोपों को वे विश्वविद्यालय की छवि धूमिल करने की साज़िश बताते हैं।

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि एक तरफ प्रतिष्ठित उपलब्धियाँ और दूसरी तरफ लगातार पीछा करते विवाद—इन दोनों के बीच सच कहाँ छुपा है?"

विश्वविद्यालय सिर्फ़ ईंट-पत्थर की इमारतें नहीं होते, वे युवाओं के भविष्य और देश की संस्कृति के केंद्र होते हैं। चाहे ग्वालियर हो या खैरागढ़, अगर बार-बार नियुक्तियों, शोध और पैसों के लेन-देन पर सवाल उठ रहे हैं, तो इसकी निष्पक्ष जाँच होना बेहद ज़रूरी है ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।

आप इस पूरे मामले पर क्या राय रखते हैं? क्या छात्र संगठनों का विरोध सही था या यह सब सिर्फ़ अंदरूनी गुटबाज़ी का नतीजा है? कमेंट बॉक्स में अपनी राय ज़रूर शेयर करें।

अदानी पॉवर में घोर लापरवाही, दो गुटों में भिड़ंत

 अदानी पॉवर में घोर लापरवाही, दो गुटों में भिड़ंत 


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से सटे धरसींवा-खरोरा इलाके के रायखेड़ा में स्थित अडानी पावर प्लांट में आखिर ऐसा क्या हुआ कि देखते ही देखते पूरा परिसर जंग का मैदान बन गया? पत्थर चले, गाड़ियां फोड़ी गईं, सरपंच की गाड़ी के कांच टूटे और बीच-बचाव करने पहुंची पुलिस टीम पर भी पथराव हुआ—जिसमें खरोरा थाना प्रभारी (TI) समेत कई पुलिसकर्मी घायल हो गए।

लेकिन सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि उस दिन क्या हुआ। असली सवाल यह है कि इस विवाद की जड़ में क्या है? क्या यह सिर्फ दो गुटों का आपसी झगड़ा था, या इसके पीछे लंबे समय से सुलग रही ‘स्थानीय बनाम बाहरी’ (Local vs Outsider) की वह आग है, जो छत्तीसगढ़ के औद्योगिक इलाकों में लगातार सुलग रही है?

आज की इस विस्तृत रिपोर्ट में हम इस पूरी घटना की एक-एक परत खोलेंगे। जानेंगे कि विवाद कैसे शुरू हुआ, अवैध शराब का इसमें क्या एंगल है, और क्यों उद्योगों में स्थानीय युवाओं का गुस्सा अब धीरे-धीरे सड़कों पर आने लगा है। घटनाक्रम: उस दिन आखिर हुआ क्या?

सबसे पहले समझते हैं कि उस दिन रायखेड़ा स्थित अडानी पावर प्लांट (रायपुर एनेरजेन लिमिटेड) के भीतर और बाहर क्या-क्या घटा।

खबरों और स्थानीय सूत्रों के अनुसार, घटना की शुरुआत प्लांट परिसर और आसपास के इलाके में अवैध रूप से बेची जा रही शराब के विरोध को लेकर हुई। बताया जा रहा है कि प्लांट के भीतर काम करने वाले मजदूरों के दो गुटों के बीच पहले कहासुनी हुई। देखते ही देखते बात इतनी बढ़ी कि दोनों पक्ष आमने-सामने आ गए।

एक तरफ स्थानीय मजदूर थे और दूसरी तरफ बाहर से (विशेषकर बिहार और अन्य राज्यों से) आए मजदूर। विवाद इतना गहराया कि लाठी-डंडे और पत्थर चलने लगे। भगदड़ मच गई और जो भी बीच में आया, उसे निशाना बनाया गया।

घटना की खबर मिलते ही रायखेड़ा के स्थानीय सरपंच दिनेश वर्मा मौके पर पहुंचे ताकि स्थिति को शांत कराया जा सके, लेकिन उग्र भीड़ ने उनकी गाड़ी पर भी हमला कर दिया और वाहन के कांच फोड़ दिए।

जब स्थिति बेकाबू होने लगी, तो खरोरा थाने की पुलिस टीम मौके पर पहुंची। पुलिस ने जैसे ही दोनों गुटों को तितर-बितर करने और स्थिति पर काबू पाने की कोशिश की, उपद्रवियों ने पुलिस पर ही पथराव शुरू कर दिया। इस हमले में खरोरा टीआई सहित कई पुलिस जवान चोटिल हुए। इसके बाद अतिरिक्त पुलिस बल बुलाया गया, तब जाकर स्थिति को नियंत्रण में लिया जा सका।

स्थानीय बनाम बाहरी: विवाद का असली केंद्र

ऊपरी तौर पर देखने पर यह मामला सिर्फ शराब की बिक्री या दो मजदूरों के झगड़े का लग सकता है, लेकिन अगर आप छत्तीसगढ़ के औद्योगिक क्षेत्रों की जमीनी हकीकत को समझते हैं, तो आपको इसके पीछे की गहरी वजह साफ नजर आएगी।

और वह वजह है—‘स्थानीय बनाम बाहरी’ का तनाव।

छत्तीसगढ़ में जब भी कोई बड़ा उद्योग या पावर प्लांट लगता है, तो स्थानीय ग्रामीणों और युवाओं से कई बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं:

  1. जमीन देने वाले परिवारों को स्थायी रोजगार मिलेगा।
  2. स्थानीय युवाओं को योग्यता के अनुसार प्राथमिकता दी जाएगी।
  3. क्षेत्र का विकास होगा।

लेकिन रायखेड़ा और आसपास के इलाकों के ग्रामीणों की शिकायत सालों से रही है कि हकीकत इसके बिल्कुल उलट है।

पहला मुद्दा—रोजगार और ठेकेदारी: संयंत्रों में अधिकतर बड़े ठेके बाहरी ठेकेदारों को दे दिए जाते हैं। ये ठेकेदार लागत कम करने और अपनी जान-पहचान के आधार पर बिहार, झारखंड या उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से सस्ते दामों पर मजदूरों को लेकर आते हैं। परिणाम स्वरूप, स्थानीय युवाओं को या तो काम नहीं मिलता, या उन्हें सबसे निचले स्तर के और कम मजदूरी वाले कामों में धकेल दिया जाता है।

दूसरा मुद्दा—असंतोष और सांस्कृतिक टकराव: जब किसी एक ही परिसर में स्थानीय और बाहर से आए सैकड़ों-हजारों मजदूर एक साथ काम करते हैं, और उनके बीच सुविधाओं व मजदूरी को लेकर विषमता (disparity) होती है, तो छोटी-सी बात भी बड़े विवाद का रूप ले लेती है। रायखेड़ा की घटना में भी यही देखने को मिला। अवैध शराब का मुद्दा सिर्फ एक चिनगारी था, लेकिन बारूद पहले से ही जमा था।

सुरक्षा, अवैध कारोबार और प्रशासन की भूमिका

अब सवाल यह भी उठता है कि इतने बड़े पावर प्लांट परिसर के भीतर या उसके ठीक आसपास अवैध शराब का कारोबार फल-फूल कैसे रहा था?

  • संयंत्र प्रबंधन की सुरक्षा पर सवाल: इतने बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठान में सुरक्षा गार्ड्स और सीसीटीवी कैमरे होने के बावजूद परिसर के आसपास ऐसा माहौल कैसे बना? क्या प्रबंधन ने समय रहते अंदर पनप रहे असंतोष और अवैध गतिविधियों पर ध्यान नहीं दिया?
  • स्थानीय पुलिस और आबकारी विभाग: क्या स्थानीय पुलिस और आबकारी विभाग को इस बात की भनक नहीं थी कि औद्योगिक क्षेत्र में मजदूरों के बीच अवैध शराब खपाई जा रही है? अगर समय रहते इन अवैध गतिविधियों पर नकेल कसी जाती, तो शायद बात इतनी नहीं बिगड़ती।
  • कानून व्यवस्था का सवाल: पुलिस पर पथराव होना और थाना प्रभारी का घायल होना यह दर्शाता है कि उपद्रवियों के भीतर कानून का खौफ खत्म हो चुका था।

पुलिस ने अब इस मामले में बलवा, तोड़फोड़ और सरकारी काम में बाधा डालने की धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया है और वीडियो फुटेज के आधार पर उपद्रवियों की पहचान की जा रही है। कई लोगों को हिरासत में भी लिया गया है।

रायखेड़ा की घटना एक चेतावनी है। अगर इसे सिर्फ एक 'क्राइम न्यूज़' मानकर फाइल बंद कर दी गई, तो ऐसी घटनाएं बार-बार दोहराई जाएंगी। जरूरत इस बात की है कि इसके मूल कारणों पर ध्यान दिया जाए।

1. स्थानीय युवाओं को रोजगार नीति का पारदर्शी पालन: राज्य सरकार और औद्योगिक घरानों को यह सुनिश्चित करना होगा कि छत्तीसगढ़ नीति के तहत जो 80-90% स्थानीय रोजगार का नियम है, उसका पालन कागजों पर नहीं बल्कि जमीन पर हो।

2. बाहरी मजदूरों का वेरिफिकेशन: प्लांट्स में काम करने वाले सभी बाहरी मजदूरों और ठेकेदारों का पुलिस वेरिफिकेशन अनिवार्य होना चाहिए, ताकि आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों पर रोक लग सके।

3. अवैध कारोबार पर नकेल: औद्योगिक बस्तियों के आसपास अवैध शराब, गांजा और जुए जैसे अड्डों को तुरंत बंद कराया जाना चाहिए, जो अक्सर ऐसे बड़े विवादों की वजह बनते हैं।

रायखेड़ा स्थित अडानी प्लांट की यह घटना सिर्फ दो गुटों की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह उस असंतोष का नतीजा है जो स्थानीय अधिकारों की अनदेखी और प्रशासनिक लापरवाही से पैदा होता है।

इस पूरे मामले पर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि उद्योगों में स्थानीय युवाओं को उनका हक न मिलना ही ऐसे विवादों की मुख्य वजह है? अपनी राय नीचे कमेंट सेक्शन में जरूर लिखें।