मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026

महिला एवं बाल विकास विभाग में महा-घोटाला? | कागजों में गोद भराई, पोषण किट गायब और भ्रष्टाचार का सच!

 महिला एवं बाल विकास विभाग में महा-घोटाला? | कागजों में गोद भराई, पोषण किट गायब और भ्रष्टाचार का सच!



क्या आपने कभी सोचा है कि जिस देश में महिलाओं और छोटे मासूम बच्चों की देखभाल के लिए एक पूरा विभाग बनाया गया हो, जहाँ गर्भवती माताओं और कुपोषित बच्चों के लिए करोड़ों रुपये का बजट आता हो... अगर वही बजट कागजों में सिमटकर रह जाए, तो क्या होगा?

आज हम बात कर रहे हैं महिला एवं बाल विकास विभाग की। एक ऐसा विभाग, जिसका काम है देश की नींव—यानी हमारी माताओं और बच्चों—को मजबूत बनाना। लेकिन लगातार सामने आती मीडिया रिपोर्ट्स और घोटालों की परतें देखें, तो लगता है कि यहाँ योजनाओं के नाम पर सिर्फ ‘खानापूर्ति’ और ‘बड़ा खेल’ चल रहा है!"


पोषण किट और गोद भराई का कड़वा सच

हाल ही में सामने आई रिपोर्ट को देखिए। सरकार की तरफ से बड़े-बड़े दावे किए गए थे कि 'मुख्यमंत्री सुपोषण न्यूट्री किट योजना' के तहत गर्भवती महिलाओं को पोषण किट दिए जाएंगे। योजना यह थी कि गर्भावस्था के आखिरी 5 महीनों में महिलाओं को देशी घी, खजूर, मखाने, भुने चने और ड्राई फ्रूट्स जैसे माइक्रोन्यूट्रीएंट्स से भरे किट मिलेंगे।

लेकिन हकीकत क्या निकली? कागजों पर 'गोद भराई' की रस्में मना लीगईं, बड़ी-बड़ी तस्वीरें खिंचवा ली गईं। लेकिन जब किट बांटने की बारी आई, तो 2,200 महिलाओं की मांग के मुकाबले सिर्फ 844 किट ही भेजी गईं! नौ महीने से ज्यादा का वक्त बीत गया, लेकिन 1,400 से ज्यादा पंजीकृत गर्भवती महिलाएं आज भी पोषण किट के इंतजार में हैं।"

इसका नतीजा क्या हुआ पता है? दर्ज की गई महिलाओं में से करीब 70 फीसदी महिलाएं एनीमिया (खून की कमी) से पीड़ित हैं! लगभग 10 प्रतिशत महिलाओं में हीमोग्लोबिन का स्तर 7 से भी नीचे है। नौबत यह आ गई है कि हर तीसरे प्रसव (Delivery) के वक्त महिलाओं को खून चढ़ाने की जरूरत पड़ रही है। सवाल यह है कि जब बजट जारी होता है, योजनाएं बनती हैं, तो फिर यह न्यूट्री-किट महिलाओं तक क्यों नहीं पहुँचती? यह सामान बीच में कहाँ गायब हो जाता है?"

"लेकिन बात सिर्फ इस एक योजना या पोषण किट की नहीं है। अगर आप इस विभाग के पिछले कुछ सालों के मामलों को खंगालेंगे, तो आपको एक के बाद एक कई पैटर्न नजर आएंगे।

पहला है — सप्लाई और राशन घोटाला।

आंगनवाड़ी केंद्रों के जरिए बच्चों और गर्भवती महिलाओं को जो 'टेक-होम राशन' (Sattu, दलिया, पंजीरी) भेजा जाता है, उसमें अक्सर यह देखा गया है कि सामान की क्वालिटी बेहद खराब होती है या फिर सप्लाई सिर्फ कागजों पर ही दर्ज कर दी जाती है।

यह आरोप सामने आते हैं कि जिन गाड़ियों से राशन ढोने का दावा किया जाता है, उनके नंबर चेक करने पर वे दोपहिया वाहन या ऑटो रिक्शा निकलते हैं! करोड़ों रुपये का बजट कागजों पर पास हो जाता है, सप्लायर और अधिकारियों की जेबें भर जाती हैं, लेकिन आंगनवाड़ी तक पहुँचती है तो सिर्फ घटिया सामग्री या खाली हाथ!"

साड़ी और वर्दी घोटाला

"और सिर्फ खाने-पीने के सामान में ही नहीं, दोस्तों... यहाँ तक कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को दी जाने वाली साड़ियों और यूनिफॉर्म में भी खेल हो जाता है!

विभाग की तरफ से हर साल आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को पहचान के रूप में साड़ियां देने का नियम है। इसके लिए करोड़ों का टेंडर निकाला जाता है। लेकिन असलियत में क्या होता है? कम लागत की, बेहद घटिया क्वालिटी की साड़ियां खरीदकर भारी-भरकम दामों में बिल बना दिए जाते हैं। कई जगहों पर तो कार्यकर्ताओं की शिकायत होती है कि सालों-साल तक उन्हें साड़ियां मिलती ही नहीं, जबकि फाइलों में सब 'ओके' (Distributed) दर्ज हो चुका होता है। सोचिए, जो विभाग महिलाओं के सम्मान और पहचान के लिए साड़ी खरीद रहा है, उसमें भी कमिशनखोरी का जाल फैला हुआ है!"

फर्जी नियुक्ति और मानदेय का खेल


 "अब आते हैं तीसरे सबसे बड़े मुद्दे पर — भ्रष्टाचार और फर्जी नियुक्तियों का खेल।

आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, सहायिका और सुपरवाइजर पदों की भर्ती प्रक्रिया में बार-बार गड़बड़ियों के आरोप लगते रहे हैं।

  • कहीं फर्जी प्रमाण पत्रों और फर्जी निवास प्रमाणपत्रों के आधार पर चहेतों को नौकरी दे दी जाती है।
  • तो कहीं बिना किसी पारदर्शिता के मेरिट लिस्ट को रातों-रात बदल दिया जाता है।
  • इतना ही नहीं, कागजों में 'भूतिया' (Ghost) कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के नाम दर्ज करके हर महीने उनके नाम का मानदेय (Salary) निकाला जाता है और यह पैसा सीधे बिचौलियों की जेब में जाता है!"

जब हम किसी विभाग में घोटाला सुनते हैं, तो हमें लगता है कि यह सिर्फ पैसों का नुकसान है। लेकिन महिला एवं बाल विकास विभाग में होने वाला भ्रष्टाचार सीधे तौर पर आने वाली पीढ़ी के स्वास्थ्य और माताओं की जिंदगी के साथ खिलवाड़ है।

जब 70% गर्भवती महिलाएं एनीमिया से जूझ रही हों, जब हर तीसरी महिला को बच्चे को जन्म देते समय खून की जरूरत पड़ रही हो... तो कागजों में चलाई जा रही 'गोद भराई' और 'पोषण योजनाएं' सिर्फ एक कड़वा मजाक बनकर रह जाती हैं।

अगर इस विभाग की हर योजना—चाहे वो सप्लाई हो, साड़ी वितरण हो, न्यूट्री-किट हो या नियुक्तियां हों—की निष्पक्ष जाँच की जाए और दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो, तभी असल मायनों में महिलाओं और बच्चों का विकास संभव है।

आप इस पूरे मुद्दे पर क्या सोचते हैं? क्या आपके इलाके में आंगनवाड़ी केंद्रों की स्थिति ठीक है? नीचे कमेंट करके जरूर बताइए।