रविवार, 29 जून 2025

भारतीय मीडिया और जोहरान ममदानी…

भारतीय मीडिया और जोहरान ममदानी…


भारतीय मीडिया ख़ुद अपना तमाशा बना रही है चाहे ममदानी का मामला हो या शेफाली का… संवेदनहीनता की पराकाष्ठा और सत्ता की जी हुजूरी का ऐसा उदाहरण आपको पूरी दुनिया में नहीं मिलेगा…

भारतीय मीडिया का चेहरा आज अपनी विश्वसनीयता खो चुका है मीडिया का काम सूचना देना है, न कि सनसनी फैलाना। लेकिन टीआरपी की अंधी दौड़ में, चैनल और डिजिटल प्लेटफॉर्म तथ्यों को दरकिनार कर अफवाहों को हवा देते हैं। शेफाली जरीवाला, जो महज अपने एक नृत्य गीत  के लिए जानी जाती हैं, को इस बार उनकी कथित मृत्यु की खबरों ने सुर्खियों में ला दिया। बिना किसी आधिकारिक पुष्टि के, उनके निजी जीवन, करियर और यहां तक कि मृत्यु के काल्पनिक कारणों पर बहस छेड़ दी गई। क्या यह पत्रकारिता है या संवेदनहीनता की पराकाष्ठा?

यह प्रवृत्ति केवल शेफाली तक सीमित नहीं है। कोई भी सेलिब्रिटी, चाहे वह कितना ही सम्मानित क्यों न हो, इस मीडिया की भूख का शिकार बन सकता है। मृत्यु जैसे गंभीर विषय को भी मजाक बना देना, परिजनों के दुख को तमाशा बनाना, क्या यही है हमारी चौथी दीवार का कर्तव्य? कथावाचक बन चूका मीडिया सुधरने वाला नहीं है , अब यह तय हो गया है ! 

रील देखकर समय गुजारती पीढ़ी से भी संजीदगी की उम्मीद नहीं है। उनके भी सोंच और संवेदना में उथलापन पसर गया है।  फिर भी आग्रह है कि सनसनी के प्रसार का तमाशा बंद होना चहिये।


भारतीय (गुजराती) मूल के डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से न्यूयॉर्क के मेयर प्रत्याशी जोहरान ममदानी की भारत में मुख्यधारा की मीडिया द्वारा खूब आलोचना हो रही। 


हालांकि  ममदानी एक प्रगतिशील राजनेता हैं, जो मानवाधिकार और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर मुखर रहे हैं। उनके 2002 के गुजरात दंगों और भारत में मुस्लिम उत्पीड़न संबंधी बयान उनके वैश्विक स्तर पर अल्पसंख्यक अधिकारों के प्रति समर्थन को दर्शाते हैं, जो उनकी राजनीतिक विचारधारा का हिस्सा है। कंगना राणावत और अभिषेक मनु सिंघवी को मीडिया में बने रहने के लिए मुद्दा चाहिए जो वो बखूबी निभा रहे हैं। 


उनकी इजरायल-नेतन्याहू तुलना फिलिस्तीन समर्थन के संदर्भ में थी, जिसे उनके समर्थक उत्पीड़न के खिलाफ साहसी रुख मानते हैं। न्यूयॉर्क में 15 लाख से अधिक यहूदी हैं जिसमें आधे से अधिक ममदानी के समर्थन में हैं। ममदानी के बयान उनके न्यूयॉर्क के मतदाताओं के लिए हो सकते हैं, न कि भारत की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप। यह विवाद उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और भारत की संवेदनशीलता के बीच तनाव को उजागर करता है।

अब तक आपको पता चल ही गया होगा। प्रख्यात फ़िल्मकार मीरा नायर के पुत्र  33 वर्षीय इस अप्रवासी मुस्लिम अमेरिकन युवा  ने दुनिया भर के मीडिया को अपने बारे में बात करने के लिए काफी मसाला दे दिया है।  सब कुछ ठीक रहा तो यह शख्स नवंबर में  न्यूयॉर्क का मेयर बन जाएगा। महज पिछले दो दिनों में ममदानी भारतीय मीडिया में विलेन बनकर उभर रहे है , वजह बस इतनी सी है कि उन्होंने  गुजरात के 2002 के जख्मों के लिए  मोदी का नाम लिया है साथ ही  नेतन्याहू का नाम भी लेते हुए इन दोनों को ' युद्ध अपराधी ' करार दिया है।  

अब भारतीय पालतू मीडिया इस बात को कैसे बर्दाश्त कर सकता है! जो मोदी के खिलाफ बोलेगा उसे भारत के दुश्मन के रूप में प्रोजेक्ट करना उसका परम धर्म होगा ही। लिहाजा ममदानी इस समय भारत के ' एनीमी नंबर वन ' घोषित हो चुके है। 

न्यूयॉर्क का मेयर कोई भी बने , उससे हमारी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। लेकिन इनके वीडियो ढूढ़ कर देखने का प्रयास करे , अंग्रेजी के अलावा  आठ भारतीय भाषाओ को धारा प्रवाह बोलने वाला यह युवक आपको प्रभावित जरूर करेगा , इसकी गारंटी है।

शनिवार, 28 जून 2025

देश प्रेम के मायने…

 देश प्रेम के मायने…


आज जब देशप्रेम के मायने बदल गये है तब 1937 की घटना को याद करते हुए मन भर जाता है कि इस दौर में मोदी सत्ता ने क्या कर दिया है तब इसे एक बार ज़रूर पढ़े…

डेढ़ घंटा,,, आज चंचल दादा( Chanchal Bhu  )ने एक पोस्ट डाली है डेढ़ घंटे वाले पत्र की कांग्रेस पर,, इसी पर याद आया डेढ़ लाइन के एक पत्र का वह भी कांग्रेस से ही संबंधित है। 👉


यू पी मे एक जिला है गाजीपुर,,। जिसे शहीदों की धरती, वीरों का देश भी कहते हैं।यह जिला पहले से ही कांग्रेस का गढ़ रहा है। 


मंगल पांडे से लेकर अब्दुल हमीद तक के नाम को सभी जानते हैं। 


उसी जिले की एक तहसील है, सैदपुर। सन् रहा होगा 1937का। द्वितीय विश्व युद्ध शुरू ही हुआ था अभी। 


दो भाईयों के परिवार में पांच लड़के वयस्क हो रहे थे। बड़ा बेटा जिला कांग्रेस का महा मंत्री बन कर देश के लिए जेल में था। 


दूसरा घर की खेती देख रहा था, तीसरा हाई स्कूल पास कर निकला ही था। पिता से उपेच्छित था, किन्तु बड़े भाई का लाडला। 


नई नई भर्ती हो रही थी दरोगा की, चुन लिया गया। किन्तु बिना भाई के परमिशन के जाए तो जाए कैसे,,,जाए ! 


अब परमिशन भी कैसे ले,,? पूछने की भी हिम्मत नहीं। भाई के प्यार के साथ उनके गुस्से से वाक़िफ़। इरादा हुआ पत्र लिखकर पूछने का। 


अब पत्र में भी भला क्या लिखे,,? बहुत सोचने के बाद लिखा,,👉👇

 "भ्राता जी प्रणाम, 

दरोगा की नौकरी करने चंदोली जाए क्या? "


अब यह पत्र कैसे पहुँचे, खुद दे कर उत्तर प्राप्त करने का निर्णय लेकर पहुँच गए जिला जेल, गाजीपुर। 


उस समय भी नमक सत्याग्रह के कारण जेल में बन्द थे बड़े भाई, नर सिंह जी। पहुँचने के बाद गाँव घर का हाल - चाल हुआ। घर से लाये कुछ सामान के साथ पत्र दे दिया धीरे से। 


भाई ने सोचा कोई गुप्त खबर होगी,चुपके से पीछे जाकर पढ़ने लगे। 


सिर्फ एक मिनट भी नहीं बिता होगा,,, गुस्से से एकदम लाल, क्रोध में फुफकारते हुए चिल्लाये,,, 👉👇


" अरे,,कमीना तूने यह सोच कैसे ली, कुत्तों की नौकरी करने की,,!?, 


,,,मै कांग्रेस में रहु और मेरे घर का कोई इन कुत्तों का तलुवा चाटे,,, यह नहीं हो सकता। ,,,,, "


"तुझे नौकरी करनी है तो रुक तुझे मै अभी रानिवा आश्रम(फैजाबाद)  भेजवा दे रहा हूँ। जा तु वहाँ गाँधी आश्रम के काम को कर। तुझे वहाँ तनख्वाह भी मिलेंगी और तु देश की सेवा भी करेगा। "


तुरंत एक कागज पर किसी के नाम पत्र लिख कर दे दिये।अगले एक महीने के अंदर छोटा भाई रनिवा आश्रम में हथकरघा का काम सिख रहा था। 


दरसल उस समय कांग्रेस के नेताओं को तोड़ने के लिए अंग्रेज हर हथकंडे अपना रहे थे। जब जेल और मार के बाद भी नर सिंह नही टूटे और ना कांग्रेस छोड़ी तो जेलर ने छोटे भाई को मिलाने के लिए नई हो रही भर्ती में उनकी पोस्टिंग करवा दी। 


किन्तु वह बबर शेर ही क्या जो सवा शेर पर भारी ना पड़े,,नर सिंह,! 


डेढ़ लाइन के पत्र पर डेढ़ पन्ने का पत्र भारी पड़ गया।एक साल रनिवा आश्रम मे रह कर कपड़े की रंगाई , विनाई, धुलाई हुई। 


किन्तु दुर्भाग्य,,, जेल में पुलिस की पिटाई और कुपोषण के कारण जल्द ही टी वी से बड़े भाई जी की मृत्यु के बाद उन्हें घर आना पड़ा। 


फिर वापस नहीं जा पाए रनिवा,,,। बल्कि भाई के ना रहने पर फ़ौज मे चले गए। फिर वहाँ से नेताजी के साथ,,आजाद हिंद फ़ौज में।।🙏🏾

शुक्रवार, 27 जून 2025

जहाँचाह-वहाँ राह…

 जहां चाह-वहाँ राह,,,


ये कहानी फ़िल्मी नहीं है बल्कि असमान से उतरा वह सच है जो धरातल पर चीख चीख कर कहता है, हाँ मैं यह कर सकता हूँ, आत्मसम्मान से बढ़कर कुछ नहीं, और वो कहते है मन का हारे हार है और मन का जीते जीत… ऐसा ही एक सच जो आपको भाव विभोर कर देगा…

 लड़का अपने स्कूल की फुटबॉल टीम का कप्तान था. लड़की चीयरलीडर्स की मुखिया. दोनों में मोहब्बत होती है और वे कुछ ही समय बाद शादी कर लेते हैं. यह 1961 का साल था. डिक हॉइट और जूडी लेटन की इस दास्तान ने फकत एक मामूली प्रेमकथा बनकर रह जाना था अगर शादी के अगले बरस जन्मा उनका बेटा एक गंभीर बीमारी लेकर पैदा न हुआ होता.

डाक्टरों ने उन्हें राय दी कि वे अपने बेटे को भूल जाएं और उसे किसी मेडिकल रिसर्च संस्थान को दान कर दें क्योंकि बच्चा जीवन भर चल-फिर या बोल सकने वाला नहीं था. डिक और जूडी ने ऐसा नहीं किया. वे उसे घर लेकर आए और उसका नाम रिक रखा. उन्हें उम्मीद थी उनका बच्चा कभी न कभी उनसे किसी तरह का संवाद कर सकेगा.

जूडी ने कड़ी मशक्कत के बाद बच्चे को इस लायक बना दिया कि वह संख्याओं और अक्षरों को पहचान सके. रिक 11 बरस का हुआ तो माँ-बाप ने टफ्ट्स यूनिवर्सिटी के इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के वैज्ञानिकों से मदद माँगी. काफी मेहनत के बाद वैज्ञानिक रिक के शरीर को एक ऐसे कम्प्यूटर से जोड़ पाने में कामयाब हुए जिसके कर्सर को वह अपने सर से छूकर नियंत्रित कर सकता था. 

आखिरकार रिक संवाद स्थापित कर सकने में सफल हुआ. उसने स्कूल जाना भी शुरू कर दिया था. स्कूल में एक चैरिटी रेस होने वाली थी. रिक ने उसमें भाग लेने की इच्छा जाहिर की.

शारीरिक रूप से बेहद मिसफिट हो चुके बाप की सांस एक किलोमीटर दौड़ने में फूल जाती थी. पांच किलोमीटर कैसे भाग सकेगा? वह भी अपने बेटे को उसकी व्हीलचेयर में बिठाकर धकेलते हुए.

डिक हॉइट को उसके अंतर्मन ने लताड़ा, “विकलांग तुम्हारा बेटा है या खुद तुम?”

कोशिश करने में क्या हर्ज़ है - उसने अपने आप से कहा और रेस में हिस्सा लिया. दो सप्ताह तक डिक की मांसपेशियां दर्द करती रहीं लेकिन उस दिन रेस ख़त्म होने के बाद बेटे रिक ने जो बात कही थी उसने दोनों का जीवन बदल दिया. रिक ने पिता से कहा – 

“जब आप और मैं दौड़ रहे थे, मुझे महसूस हुआ जैसे मैं विकलांग हूँ ही नहीं.”

डिक हॉइट ने अपने बेटे को वह अहसास बार-बार दिलाने का फैसला किया और अपनी देह पर इस कदर मेहनत की कि बाप-बेटे 1979 में दुनिया की सबसे मशहूर मैराथन यानी बोस्टन मैराथन के लिए तैयार थे.

लेकिन बोस्टन मैराथन के आयोजकों ने साफ़ मना कर दिया. वे बाप-बेटे की जोड़ी को एक धावक नहीं मान सकते थे. 

डिक ने हार नहीं मानी और अगले चार साल तक खूब मेहनत की. 1983 में वे एक मैराथन इतनी तेज़ भागे कि उन्होंने अगले बरस की बोस्टन रेस के लिए क्वालीफाई कर लिया. 

उसके बाद से हर साल की बोस्टन मैराथन में उन्हें टीम हॉइट के नाम से प्रवेश मिला और उन्होंने अगले बत्तीस साल तक उसमें हिस्सा लिया. 1992 की मैराथन में उनका समय वर्ल्ड रेकॉर्ड से कुल 35 मिनट कम रहा. 2007 वाली मैराथन के समय पिता-पुत्र की आयु क्रमशः 65 और 43 थी. कुल 20 हज़ार धावकों ने हिस्सा लिया और टीम हॉइट का नंबर रहा - 5,083 जो करीब 15 हज़ार स्वस्थ स्त्री-पुरुषों से बेहतर था. 

2014 में उन्होंने अपनी आख़िरी बोस्टन मैराथन दौड़ने की घोषणा की क्योंकि डिक 74 साल के हो चुके थे और उनका शरीर कमज़ोर पड़ रहा था. 2015 से लेकर 2019 तक मैसाचुसेट्स के एक डेंटिस्ट ब्रायन लियोन्स ने डिक की जगह ली और रिक की व्हीलचेयर को धकेलने का जिम्मा उठाया. बदकिस्मती से जून 2020 में मात्र 50 की आयु में लियोन्स की मौत हो गई.

उधर रिक ने 1993 में बोस्टन यूनीवर्सिटी से स्पेशल एजूकेशन में डिग्री हासिल की और बोस्टन कॉलेज की एक कम्प्यूटर लैब में नौकरी करना शुरू किया जो विकलांगों के लिए विशिष्ट संचार तकनीकों पर कम कर रही थी. 

पहली बोस्टन मैराथन के कुछ समय बाद किसी ने डिक को ट्रायथलन में हिस्सा लेने का विचार दिया. डिक को तैरना नहीं आता था और साइकिल उसने छः साल की उम्र के बाद से नहीं चलाई थी.  

कोशिश करने में क्या हर्ज़ है - उसने अपने आप से फिर से कहा और एक ट्रायथलन में हिस्सा लिया. 2005 तक वे 212 ट्रायथलन दौड़ चुके थे.

2003 में डिक हॉइट को दिल का दौरा पड़ा. डाक्टरों ने पाया उसके दिल की एक धमनी 95% ब्लॉक्ड थी. “अगर तुम दौड़ न रहे होते तो शायद 15 बरस पहले मर गए होते” – डाक्टरों ने उसे बताया.

विकलांग रिक ने इस तरह अपने पिता को नया जीवन भी दिया. एक इंटरव्यू में अपने पिता को ‘फादर ऑफ़ द सेन्चुरी’ बताने वाले रिक ने कहा था, “मेरे दिल में एक ही ख्वाहिश है कि पापा कुर्सी पर बैठे हों और उन्हें धकेलता हुआ मैं दौड़ रहा हूँ.”

टीम हॉइट ने ग्यारह सौ से ज़्यादा दौड़ों में हिस्सा लिया. 17 मार्च 2021 को अस्सी साल की आयु में डिक हॉइट की मृत्यु हो गई.

2013 में बोस्टन मैराथन के आयोजकों ने पिता-पुत्र के अविश्वसनीय और अदम्य हौसले के सम्मान में उनकी एक प्रतिमा ठीक उस जगह स्थापित की जहाँ से यह प्रतिष्ठित रेस शुरू होती है.(साभार)


मूर्ति के नीचे लिखा हुआ है – “यस यू कैन!”


Ashok Pande

गुरुवार, 26 जून 2025

आपात काल का एक और सच…

 आधी रोटी खाएँगे , इंदिरा वापस लायेंगे…

और इस नारे ने इंदिरा को वापस सत्ता में ले आये..


लेकिन संसद की देहरी से देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आपातकाल की याद दिलाते समय यह बात भूल गये, भूले तो वे विनोबा जी द्वारा इस आपात काल को अनुशासन पर्व कहा था,, हम आपात काल की वकालत नहीं बल्कि एक और सच्चाई आपको दिखा रहे है…

दरअसल आरएसएस और बीजेपी के पास गाड़े मुर्दे उखाड़ने के अलावा कुछ बचा भी नहीं है तब सीतामढ़ी के राजकुमार गुप्ता ने जो लिखा वह भी लोगों को जानना चाहिए…  

इंदिरा गांधी ने संविधान के दायरे में रहते हुए अराजकता, देशविरोध और विदेशी एजेंटों से  देश को बचाया. अगर वह निर्णय नहीं लिया गया होता, तो भारत का राजनीतिक और सामाजिक ढांचा नष्ट हो जाता.


आपातकाल को केवल एकतरफा आलोचना से नहीं, बल्कि उस समय की ऐतिहासिक परिस्थितियों, सामाजिक विघटन और विद्रोह के प्रयासों की पृष्ठभूमि में देखना होगा।


जब देश अराजकता के कगार पर था, तब एक स्त्री ने " आयरन लेडी " ने सही निर्णय लेकर भारत को बचाया.... 

                        


नए संसद सत्र प्रारंभ के ठीक पूर्व संसद की देहरी से आपातकाल की याद दिलाते नरेंद्र मोदी शायद यह भूल रहे हैं कि इन्हीं के पितृ संगठन आरएसएस की बढ़ती अनुशासनहीनता के कारण ही आपातकाल लगाया गया था जिसे विनोबा जी ने अनुशासन पर्व की संज्ञा दी थी. 


इस दौर में हर जगह संघ के संधियों की साहूकारी चल रही थी. मुनाफाखोरी और गोदामों में अनाज भरकर कालाबाजारी की जा रही थी. जबकि किसान और आम आदमी कर्ज़ के तले दबा जा रहा था. लोगों की निजी संपत्ति और ज़मीन जायदाद इन लोगों के अधीन गिरवी होते जा रहे थे. मजदूर बंधुआ मजदूरी करने विवश किए जा रहे थे.


कालेज, यूनिवर्सिटीज बंद से हो गए थे और पाठ्यक्रम तीन साल पीछे चल रहा था. हर जगह अव्यवस्था का आलम सम्पूर्ण क्रांति के नाम पर चल रहा था. 


ट्रेन घंटों पीछे चला करती थी और इनके साथी जार्ज फर्नांडिस डायनामाइट लगा कर बड़ौदा में ट्रेन उड़ाने का षड्यंत्र रच रहे थे. 

जेपी ने पुलिस और सेना से सरकार का आदेश न मानने का आह्वाहन कर डाला. यह सब भारत जैसे लोकतंत्र में सीधे विद्रोह की चेष्टा थी. अगर यह सब चलता रहता, तो भारत एक अराजक, विखंडित और गृहयुद्ध की ओर बढ़ता देश बन जाता.


इंदिरा जी ने आपातकाल लगा कर देश को विखंडन और विदेशी षड्यंत्रों से बचाने का एक रणनीतिक कदम उठाया, सब चीजों को व्यवस्थित किया. बीस सूत्री कार्यक्रम लागू किया जिससे हर वंचित को लाभ पहुंचाने के वास्तविक प्रयत्न किए गए. बैंक फाइनेंस की झड़ी लगा दी गई ताकि हर व्यक्ति अपनी योग्यता के अनुसार व्यवसाय और जीवनयापन कर सके. 


ट्रेन इतने समय पर चलने लगी थीं कि उनके आगमन से लोग अपनी घड़ी मिलाने लगे थे. हर किस्म की हड़तालें बंद हो गई थी और कल कारखाने पूर्ववत चालू हो गए थे.  जनता एक तरह से खुश हो रही थी. यह कदम भारत को अराजकता, सामाजिक विघटन, और विदेशी प्रायोजित "टुकड़े-टुकड़े गैंग" के हाथों में गिरवी रखने से बचाने का था।


सबसे ज्यादा  संघ परिवार के लोग ही जेल भेजे गए थे. यही वे संघी थे जो जेल से अपने माफीनामे सरकार को भेजा करते थे और उनका विधिवत प्रकाशन समाचार पत्रों में सशुल्क छपवाते थे, और तब पैरोल पर जेल से छूटते थे. एक प्रकार से तब वे अपने आप में सावरकर को दोहरा रहे थे. देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त होने की यह कोई बड़ी सजा नहीं.

सेना के साथ मिलकर कुछ लोग सत्ता हथियाना चाहते थे. वो इलाहाबाद का जज भी जे पी का रिश्तेदार था. कमाल तो देखो, इनके समुदाय ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपने को sc ( हरिजन ) घोषित करने का मुकदमा कर रखा है जो आज भी लंबित है. बुरा दौर था. मैं उसका समर्थन नहीं करता. लेकिन आज का दौर उससे भी बुरा है.

यह जानना दिलचस्प हो सकता है कि इंदिरा गांधी जब इमरजेंसी हटाने पर विचार कर रही थीं तो कौन लोग इमरजेंसी के पक्ष में बयान दे रहे थे? अगर विकीपीडिया पर भरोसा करें तो इमरजेंसी हटाए जाने की घोषणा के महज चार महीने पहले- यानी नवंबर 1976 में माधवराव मुले, दत्तोपंत ठेंगड़ी और मोरोपंत पिंगले के नेतृत्व में 30 से ज़्यादा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने इंदिरा गांधी को चिट्ठी लिखकर कहा था कि अगर आरएसएस कार्यकर्ताओं को रिहा कर दिया जाए तो वे लोग इमरजेंसी का समर्थन करेंगे. वाजपेयी भी इसके पक्ष में थे.

संजय गांधी की नसबंदी की जबराना हरकतों की वजह से इंदिरा गांधी चुनाव हारी और बाद में जो संघनीत सरकार बनी, उसने सबसे पहले ऐसे तमाम जेल यात्रियों के लिए स्वतंत्रता सेनानियों की तरह पेंशन शुरू की गई जिसका लाभ उन्हें अब तक मिल रहा है जो अभी शायद 25000 प्रतिमाह है. आंदोलनजीवी को अशांति फैलाने का यह पुरस्कार कितना वाजिब है यह देश तय करेगा.

 इमरजेंसी उपरांत इंदिरा जी चुनाव हार गयीं और इंदिरा जी के विरूद्ध भ्रष्टाचार और तमाम फालतू के आरोप लगाकर जांच करने के लिए गुजरात के एक जज छोटा भाई शाह के नेतृत्व में शाह कमीशन बनाया गया ।

वरिष्ठ पत्रकार खुशवंत सिंह ने कहा था कि शाह कमीशन में कार्यवाही नहीं खिलवाड़ हो रहा था।

उस कमीशन के सामने कांग्रेस सांसद शशि भूषण बाजपेई ने ३५० पन्नों की साक्ष्य प्रस्तुत की जिसमें जनसंघ के एकाउंट नंबर और उनमें आने वाले पैसे का जिक्र किया गया और शाह कमीशन की रिपोर्ट बिल्कुल पढ़ी नहीं गयी।

जनता पार्टी की सरकार मोरारजी देसाई के नेतृत्व में बनी और वो बेटे को दलाली करवाने लगे और ये पहले लिख चुका हूं और जयप्रकाश नारायण दिल्ली आये और दलाली देखी तो उनको दिल्ली के मौर्या शेरेटन होटल में पूरे सम्मान के साथ नजरबंद कर दिया गया और कुछ दिन बाद जेपी किडनी पकड़कर बिहार वापस चले गये।

 कुछ ही दिनों बाद सारा झूठ का महल भरभरा कर गिर गया और लोग चीखने लगे " आधी रोटी खाएंगे इंदिरा वापस लायेंगे" 

कुदरत ने आगे और खेल दिखाया आगे चलकर। 

देश के साथ गद्दारी करने वाले निक्सन के दलाल जेपी कैसे निपटे? अटल बिहारी वाजपेई और जार्ज फर्नांडिस दस दस साल देश के साथ गद्दारी करने की सजा पाकर मरे और उनका बास रिचर्ड निक्सन अमरीका में जलील करके वाटरगेट कांड में महाभियोग के जरिए हटाया गया और आज कैनेडी, आइजनहावर या ओबामा की तरह उसे कोई याद करने वाला नहीं है और शेरनी की तरह मुस्कुराते हुए शहीद हुयीं इंदिरा जी को कोई भूलने वाला नहीं है। 

तुम मर जाओ जेपी ... 

क्या आप जानते है कि जेपी के कंधों पर सवार होकर आने वाली जनता सरकार, जेपी की मौत के लिए कितनी उत्साह से भरी हुई थी। जेपी, जो आंदोलन के नेता थे, जनता सरकार की सत्ता में दलाली देखकर टूट गए। मौर्या शेरेटन होटल में नजरबंद किए गए और बीमार होकर लौटे।

हांजी, बीमार जेपी के मरने के पहले ही उन्हें संसद में हड़बड़ तड़बड़ श्रद्धाजंलि भी दे दी थी। फिर पता चला, अभी साहब जिंदा है, तो भरी संसद से माफी मांगी गयी। 

गूगल कीजिए, मिल जाएगा। 

इंदिरा की "तानाशाही" के खिलाफ...? 

जेपी आंदोलन आखिर था क्यों? ऐसा कौन सा भ्रष्टाचार हो गया? जब नियमित चुनाव हो ही रहे थे, तो तानाशाही कैसे आ गयी? और जब माँग बिहार विधानसभा बरखास्त करने की थी, तो यह इंदिरा गांधी की सत्ता उखाड़ने की ओर क्यों बढ़ गयी?

◆◆◆◆

वे तानाशाहीपूर्ण निर्णय क्या थे?


प्रिवीपर्स खत्म करना?? बैंक नेशनलाइजेशन?? हरित क्रांति?? पाकिस्तान को दो टुकड़े करना??? या कांग्रेस के मोरारजी सहित कांग्रेस के सिंडिकेट को बेरोजगार कर देना?? 

आह, क्या मेस के खाने की फीस बढ़ जाना, गेहूं की कीमत बढ़ जाना, बेरोजगारी बढ़ जाना, रेलवे के वेतम भत्ते न बढ़ाना?? ये इतना बड़ा संकट था, कि देश की सेना और पुलिस से विद्रोह का आव्हान किया जाए। 

अगर हां, तो क्या आप आज के विपक्ष को, इन्हीं कृत्यों के लिए आप समर्थन देंगे?? 

●●

दरअसल 1975 की इमरजेंसी के बाद तो आप नसबन्दी, संजय गांधी, तुर्कमान गेट, मीसाबन्दी और किशोर कुमार के गाने न बजाने को तानाशाही गिना सकते हैं। 

लेकिन 1975 के इसके पहले कौन से निर्णय थे, जिसके खिलाफ जेपी आकर खड़े हो गए। 

कोई बताये...

मुस्लिम लीग जिन्ना के साथ सरकार बनाने वाले, अंग्रेजों के मुखबिर, गांधी के हत्यारे, सुभाष चंद्र बोस और भगत सिंह के विरोधी, संविधान और तिरंगा को जलाने वाले किस मुंह से संविधान रक्षा की बात करते हैं? 

जनता ने जल्द ही देखा कि संघ-जनसंघ-जनता पार्टी की सरकार न तो अनुशासन ला सकी, न विकास दे सकी। जल्द ही पूरे देश में नारा गूंजा —

"आधी रोटी खाएंगे, इंदिरा को लाएंगे!"

जनता का मन पलटा और 1980 में इंदिरा गांधी फिर सत्ता में लौटीं।

बा'द में जेपी ने इंदिराजी से माफ़ी मांगी थी- जेपी ने क़ुबूल किया था कि इंदिराजी के ख़िलाफ़ आंदोलन ग़लत था.(साभार)

बुधवार, 25 जून 2025

सीज़फ़ायर-युद्ध और ट्रंप…

 सीज़फ़ायर-युद्ध और ट्रंप…


यह दुनिया के लिए राहत की खबर है कि इज़राइल ईरान या भारत पाकिस्तान के बीज सीज़फ़ायर हो गया लेकिन युद्ध और सीज़फ़ायर के बीच जो कुछ हुआ वह क्या सब पूर्व में लिखी स्क्रिप्ट है ताकि कोई खेल खेला जा सके… राष्ट्रवाद के जुनून में जनता को धकेला जा सके…


जैसे भारत-पाकिस्तान में आभासी युद्ध करवाया गया था ड्रोन ड्रोन मिसाइल मिसाइलों का खेल किया गया था कुछ उसी तरह से यह स्क्रिप्ट भी लिख दी गई!


भारत-पाक युद्ध में भी क्या हुआ था सरकार ने स्वयं अपनी पीठ ठोकी थी पाकिस्तान को सूचना देकर आतंकवादी ठिकानों पर हमले किए थे जहां से पहले ही आतंकवादी हटा लिए गए थे और अब तो यह भी साबित हो गया है की पहलगाम आतंकवादियों के लिए जिन आतंकवादियों को नामांकित किया गया था उसमें भी भारत सरकार चूक कर गई थी और वह आतंकवादी वह नहीं थे जिन्होंने हमला किया!


भारत में यह परसेप्शन बनाया गया कि हमने चुन चुन कर टारगेट हिट किया और पाकिस्तान ने इस बात के लिए जश्न बनाया की पहली बार पाकिस्तान की वायु सेना ने भारत के बड़े-बड़े विमान को मार गिराया!


 दोनों तरफ से विन विन सिचुएशन का परसेप्शन मीडिया बनाता रहा और दोनों देश की जनता तमाशा देखते रही और दोनों देश के शासक सत्ता के पुनरप्राप्ति के प्रयासों पर अपने कदम बढ़ाते रहे और अमेरिका का राष्ट्रपति अपने व्यापारिक फायदा और अंतर्राष्ट्रीय सरपंची के लिए अपनी स्थिति मजबूत करता रहा!

पूरे देश में सेना की वर्दी पहनकर घूमने वाले तथाकथित 56 इंच कमांडर की जबान पर अभी तक पहलगाम के आतंकवादियों का सवाल वह कौन थे कब गिरफ्तार होंगे नहीं आ पाया है! 

समय की बिसात पर राजनीति के पासे  जब कूटनीति के सांचो में ढलते हैं, तो यह समझना मुश्किल हो जाता है क्या सच है क्या झूठ? 

बाहर से दिखने वाली परिस्थितियों अंदर से कितनी शालीनता से एक दूसरे का सहयोगी बन जाती है हम अपेक्षित ही नहीं कर पाते!  और शायद इसी का नाम अंतरराष्ट्रीय राजनीति है !

फोर्दो पर हमले के बाद ईरान के चट्टानी संकल्प की परीक्षा लेते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने जो कुछ कहा ,किया वह चौंकाने वाला था! 

आज ईरान ने भी कतर स्थित अमेरिकन बेस पर हमला किया लेकिन उसके पहले उसने कतर को आगाह किया इसलिए एयर बेस पर ईरानी मिसाइल तो विस्फोट करती नजर आई, लेकिन जनधन की हानि बहुत न्यूनतम थी हमले के वेग के अनुपात में 

और इस एक घटना से विमर्श उपजने लगा क्या कहीं सब कुछ स्क्रिपटेड तो नहीं चल रहा!

ईरान की पहाड़ियों में दफन सुरक्षित किला फॉरदो पर अमेरिका की बंकर रोधी मिसाइल ने हमले किए और सुरक्षित अमेरिका का विमान इसराइल लौट गए! 

एक बारगी लगा नोबेल पीस प्राइज की दौड़ में शामिल ट्रंप ऐसी गलती कैसे कर सकते हैं? 

जो संयुक्त राष्ट्र संघ के नियमों का उल्लंघन ही नहीं बल्कि अमेरिकन नागरिकों की मानसिकता को भी हिट करता था!

लेकिन जैसा भारत-पाक युद्ध में हुआ ठीक वही परसेप्शन वहां क्रिएट किया गया!

 अमेरिका ने ईरान को पूर्व सूचना दी थी कि हमें इजरायल की संतुष्टि और अमेरिका की जो सीनेट की यहूदी लाबी है , उसकी मानसिकता को तुष्ट करने के लिए ऐसा प्रदर्शित करना पड़ेगा !

आप वहां से अपने आवश्यक और जो आपको हानि पहुंचा सकते हैं ऐसी सामग्रियों को हटा ले जो 15 दिन का समय दिया गया था ट्रंप के द्वारा शायद उसकी प्रति ध्वनि भी अब समझी जा सकती है! चट्टान का वह किला अमेरिका की बंकर रोधी मिसाइलों ने हिलाया, एक सीमा तक नष्ट भी किया लेकिन फिर भी कोई रेडियोएक्टिव प्रभाव ईरान पर दुनिया ने नहीं देखा मतलब साफ था वहां से यूरेनियम हटा लिया गया था! 

यह सब इतना आसान भी नहीं रहा होगा क्योंकि

 ईरान को इस बात के लिए राजी करने के लिए शायद यह भी कहा होगा कि हम इसराइल के माध्यम से सीज फायर का निवेदन आप तक पहुंचाएंगे और वह उस ईरान की मानसिकता को संतुष्ट करेगा जिसका परसेप्शन आपने बनाया है! 

नेतन्याहू भी इजरायल के लगातार होते नुकसान से परेशान थे एक के बाद एक मुस्लिम देशों पर हमले के बाद इजरायल की आर्थिक स्थिति भी कमजोर हुई थी और युद्ध सामग्री का भंडार भी! 

कहीं की भी जनता युद्ध नहीं चाहती इजरायल की भी नहीं! नेतन्याहू परेशान थे, विद्रोह के स्वर इजराइल में भी उठने लगे थे!

अमेरिका ने समझाया इजराइल का प्राथमिक उद्देश्य युद्ध को लेकर यह था कि ईरान परमाणु संवर्धन नहीं कर पाए परमाणु बम नहीं बना पाए बंकर रोधी आक्रमण के बाद ईरान लगभग 10 साल पीछे चला गया है और यह इजरायल के लिए विन विन सिचुएशन है 

मिडिल ईस्ट में इजरायल के साथ सीधे युद्ध में शिरकत कर कर अमेरिका ने इजरायल की स्थिति को मजबूत किया है और इन्हीं सब तथ्यों की रोशनी में उन्होंने इसराइल पर दबाव डाला की  वह ईरान से  सीज फायर की रिक्वेस्ट करें!

एक चालाकीअमेरिका नेऔर की उन्होंने ईरान से अपनी एयरबेस जो कतर में थी उस पर भी हमला करवाया ताकि ईरानी मानसिकता और अमेरिका विरोधी मानसिकता इस बात से संतुष्ट हो सके कि ईरान ने सरेंडर नहीं किया नरेंद्र की तरह बल्कि अमेरिका के आक्रमण पर भी प्रत्यक्रमण कर जवाब दिया!

 ठीक इसी तरह जिस तरह इजराइल को समझाया गया कि चीन उत्तर कोरिया और सोवियत रूस ईरान को परमाण्विक हथियार दे सकते हैं इसलिए इस विषय को आगे बढ़ना तर्कसंगत नहीं!

अब व्यापार की बात होगी, शेयर मार्केट में तेजी होगी सोने के भाव गिरेंगे और पेट्रोल की आपूर्ति निरंतर रहेगी लेकिन सवाल सबसे बड़ा है क्या ईरान इजरायल युद्ध में भारत की विदेश नीति और कूटनीति एक बार फिर से आहत नहीं हुई है? 

अपने अपने तर्कों से आपके जवाब प्रतीक्षित रहेंगे पर फिलहाल ऐसा लगता है तीसरे विश्व युद्ध का खतरा कुछ दिनों के लिए तो आगे खिसक गया है!(साभार)

मंगलवार, 24 जून 2025

चुनाव आयोग क्यों डर रहा…

चुनाव आयोग क्यों डर रहा…



जब से राहुल गांधी की लिखी चिट्ठी ने चुनावी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाया है तब से चुनाव आयोग ही नहीं पूरा सिस्टम एक तनाव में नजर आ रहा है! 

आज चुनाव आयोग ने यह घोषणा की वीडियोग्राफी फोटोग्राफी और इलेक्ट्रॉनिक डॉक्यूमेंट के सारे डेटा सिर्फ 45 दिन तक सुरक्षित रखें जायेंगे!

उल्लेखनीय है कि पहले मतदान की प्रक्रिया जिसमे वोटर वोट डालता था 6 महीने से 1 साल तक सुरक्षित रखी जाती थी, इलेक्ट्रानिक मशीनों में 6 महीने से 1 साल तक डाटा सुरक्षित रखने की बात पहले चुनाव आयोग कहता था! 

चुनाव आयोग का तर्क है मतदाता की निजता और सोशल मीडिया के माध्यम से जो गलत खबरें चुनाव आयोग को लेकर फैलाई जाती है उसको रोकने के लिए ये कदम उठाए गए हैं! 

अगर 45 दिन तक सबूत के साथ चुनाव पर कोई याचिका दायर नहीं हुई तो यह डाटा डिलीट कर दिए जाएंगे! 

वीडियो फुटेज जो ऑन डिमांड दिए जाते थे वह भी ऑन जुडिशरी आर्डर दिए जाएंगे अगर 45 दिन में यह सब कुछ नहीं हुआ तो डाटा डिलीट कर दिया जाएगा! 

जिस देश मेंअदालत की इतनी पेंडेंसी हो और सामान्य न्याय के लिए भी वर्षों लग जाते हैं कैसे संभव होगा की 45 दिन में संबंधित न्यायालय शिकायतों पर विचार कर पाएगा! सूचना  के अधिकार के तहत मांगी गई सूचनाए साल साल भर तक सुनी नहीं जाती वहां पर 45 दिन का यह प्रावधान क्या पार दर्शित का गला घोंटने की कोशिश नहीं?

चुनाव आयोग के इन बदलावों पर सारे राजनीतिक दल हमलावर है और इसे पारदर्शिता के प्रति कुठाराघात मान रहे हैं!

जिस लोकतंत्र के लिए चुनाव हो रहे हैं उस लोकतंत्र में आपको सवाल पूछने की आजादी तो है पर जवाब दिया जाए जरूरी नहीं है !


दरअसल चुनाव भी अब तकनीक का खेल हो गया है और इसलिए प्रक्रिया सिस्टम कैसे हैक किया जाए उसे लेकर रोज नई-नई योजनाएं बनाई जाती है !


राहुल गांधी के आरोपो के बाद जो पुराना सिस्टम हैक करने का तरीका था उसकी परत खुल जाने की वजह से अब सत्ता को और सत्ता के गुलाम चुनाव आयोग को नई तकनीक का उपयोग करने पर मजबूर होना पड़ा है! 


यह विमर्श तो आम है की चुनाव आयोग पर भरोसा खत्म हो गया है और आज इस बात को फिर से बल मिला है! 

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लेकिन चुनाव आयोग ने बिहार चुनाव के पहले भी 10 महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं! 


1_ ई वोटिंग की शुरुआत बिहार चुनाव में अब आप E वोटिंग कर सकते हैं घर बैठे लेकिन सवाल यह है कि जो लोग शहरों में रहते हैं जिनके पास स्मार्टफोन है वहीं इसका लाभ उठा पाएंगे ग्रामीण क्षेत्रों में यह कितना उपयोगी होगा यह विश्लेषण का विषय होगा! और ई वोटिंग में मतदाता को डराने धमकाने या मजबूर करने और उसकी निजता के उल्लंघन की पूरी पूरी संभावना रहेगी!


2_ बायोमेट्रिक सिस्टम से मतदाता पहचान जाएगा मतलब जब मतदाता मतदान करने  जाएगा तो आधार कार्ड पर जो उसका अंगूठा है वही अंगूठे का निशान बायोमेट्रिक सिस्टम से मैच किया जाएगा पर सवाल यह है कि जब एक ही अंगूठे वाले बहुत सारे जगह पर मतदाता का नाम होगा तो उसे बायोमेट्रिक सिस्टम से चुनाव आयोग कैसे पहचानेगा कि यह डुप्लीकेट वोटिंग हो रही है! 


 3_  बदलाव जो चुनाव आयोग ने किया है वह यह है किai आधारित चैट बॉक्स पर मतदान की सूचनाओं दी जाएगी यहां पर भी एक सवाल हैai जेनरेटेड चैट box क्या सिर्फ मतदान की जानकारी देगा या मतदाताओं को भ्रमित करने के लिए या प्रचारित करने के   के लिए किसी सत्ता का सहयोग करेंगे!


4_ E पास इशू किए जाएंगे, वृद्ध दिव्यांग या बीमार लोगों के लिए यह सुविधा दी जाएगी! इस सुविधा के लिए ऑनलाइन आवेदन करना पड़ेगा सवाल यह है जो लोग ऑनलाइन आवेदन नहीं कर पाएंगे क्या वह सुविधा के अधिकारी नहीं होंगे! 


5_मतदान केंद्र की देखरेख के लिए ड्रोन सर्विलांस का उपयोग किया जाएगा मतलब आप आसमान से मतदान केदो पर नजर रखी जाएगी पर यदि कोई जमीन पर गड़बड़ हो रही है कमरे के अंदर तो बेचारा ड्रोन सर्विलांस क्या करेगा! 


6_ मतदान केदो में वृद्धि की जाएगी यह स्वागत योग्य बात है ताकि मतदान केंद्र पर किसी तरह की भीड़ नहीं हो लेकिन क्या यह भी तय किया जाएगा के मतदान केंद्र आसान पहुंच में हो सुलभ हो और बस्ती के पास हो!


7_मोबाइल ऐप से मतदान केदो की जानकारी दी जाएगी ताकि आप यह जान सके कि मतदान केंद्र पर कितनी भीड़ है और क्या आप समय पर वोट दे पाएंगे!


8_शिकायत निवारण में तेजी की जाएगी लेकिन चुनाव आयोग का जो वर्तमान का स्वरूप है उसमें बरसों बरस शिकायतें नहीं सुनी जाती क्या यह बदलाव सिर्फ कागजी रहेगा या व्यवहारिक रूप से परिवर्तित किया जाएगा? 


9_वृद्ध दिव्यांग या विशेष वर्गों के लिए रैंप बनाई जाएगी ताकि किसी तरह के असुविधा न हो यह स्वागत योग्य बात है! 


10_और अंतिम बदलाव यह है की सोशल मीडिया पर अंकुश लगाया जाएगा और सोशल मीडिया की मॉनिटरिंग होगी सवाल यह है की सोशल मीडिया को आप प्रतिबंधित करना चाहते हो पर टीवी मीडिया और प्रिंट मीडिया का लेकर कोई गार्ड लाइन नहीं है! (साभार)

सोमवार, 23 जून 2025

उपचुनाव-चार राज्य, आठ परिणाम…

 उपचुनाव- चार राज्य,आठ परिणाम…


चार राज्यों में हुए उपचुनाव के आज परिणाम जारी हुए, केरल, बंगाल, पंजाब और गुजरात के चुनाव परिणाम ने एक बार फिर बीजेपी की चूलें हिला दी.. तो दिल्ली हार चुकी आप पार्टी के लिए यह परिणाम ने उम्मीद की नई किरण को जन्म दिया है ऐसे में कांग्रेस के लिए यह परिणाम आत्म चिंतन का विषय भी है…

वैसे तो उपचुनाव के परिणाम का कोई ख़ास असर नहीं होता लेकिन एक संकेत तो उभरते ही है. । क्या है वह संकेत…

बंगाल में तृणमूल कांग्रेस भारतीय जनता पार्टी के तमाम प्रयासों के बावजूद मजबूती के साथ खड़ी है और भारतीय जनता पार्टी कोई विकल्प प्रस्तुत नहीं कर पाई है , सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की तमाम कोशिशें के बावजूद तृणमूल कांग्रेस मजबूत है, और ममता बनर्जी की स्थिति आज के परिणाम को देखते हुए आने वाले विधानसभा के आम चुनाव में बहुत मजबूत नजर आती है!

ठीक इसी तरह कांग्रेस के तमाम दावों के बावजूद पंजाब  में  आप ने लुधियाना पश्चिम सीट जीतकर अपनी स्थिति को मजबूत किया है और कांग्रेस को आत्म चिंतन पर मजबूर यह सही है कांग्रेस का उम्मीदवार अच्छा चुनाव लड़ा लेकिन कांग्रेस का जो जातिगत आधार रहता था उसे भाजपा के उम्मीदवार ने पूरी तरह डेंट किया है और ऐसे में कांग्रेस को वहां नए सिरे से अपने जातिगत समीकरण उलट पलट करने पड़ेंगे!

 दरअसल पंजाब में कांग्रेस के नेतृत्व को जनता  ने  विकल्प के तौर पर स्वीकार नहीं किया है !

इसलिए सत्ता विरोधी माहौल होने के बावजूद भी आप परिणाम देने में सक्षम रही है! 

केरल ऐसा उदाहरण है जहां कांग्रेस ने एलडीएफ की सत्ता के बावजूद अपना उम्मीदवार को जीता लाने में कामयाबी हासिल की है!

 लेकिन चुकि ये विधानसभा प्रियंका गांधी की लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा थी इसलिए यह कांग्रेस के लिए ज्यादा बड़ी चुनौती थी ! लेकिन फिर भी केरल के विधानसभा चुनाव भी आने वाले हैं और कांग्रेस इस एक राज्य में और उम्मीद कर सकती है!

भाजपा यहां अपनी उपस्थिति भी दर्ज नहीं कर पाई है और यह उसके लिए शुभ संकेत नहीं है क्योंकि दक्षिण में अभी भी उसकी स्वीकार्यता नजर नहीं आ रही है!

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण राज्य गुजरात था जहां राहुल गांधी ने काफी परिश्रम किया था और उम्मीद थी कांग्रेस कुछ बेहतर करेगी लेकिन राहुल गांधी का जो कार्यक्रम था या कोशिश थी वह जनता के बीच नहीं पहुंच पाई है, और सत्ता विरोधी माहौल होने के बावजूद कांग्रेस  अपनी उपस्थिति भी दर्ज नहीं कर पाई,

गुजरात को लेकर कांग्रेस को आत्म चिंतन करना पड़ेगा!

लेकिन इसके विपरीत गुजरात की विसवादर सीट पर आप पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और उपचुनाव के उम्मीदवार गोपाल इटालिया ने शानदार जीत दर्ज कर भारतीय जनता पार्टी को मोचक्का कर दिया है! 

सत्ता विरोधी माहौल जो कांग्रेस ने तैयार किया था इसका लाभ गोपाल इटालिया को मिला है लेकिन कांग्रेस जमीन पर उस माहौल का लाभ नहीं ले पाई यह कांग्रेस के लिए आत्म चिंतन का विषय है!

कड़ी में भारतीय जनता पार्टी ने कंफर्टेबल जीत हासिल की लेकिन जिस तरह गुजरात के परिणाम आए हैं भाजपा के लिए चिंता का विषय है क्योंकि कहीं ना कहीं परिणाम सत्ता विरोधी माहौल को इंगित कर रहा है! 

आप के लिए दिल्ली के बाद उपचुनाव के परिणाम उत्साह बढ़ाने वाले हैं और राष्ट्रीय राजनीति में एक बार फिर से केजरीवाल भी मुख्य भूमिका में अपने शिरकत निभाते नजर आ सकते हैं!