मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026

झीरम घाटी कांड: दया की भीख, राजनीति और वो 'गोपनीय' खत जिसने सबको हिला दिया!

 झीरम घाटी कांड: दया की भीख, राजनीति और वो 'गोपनीय' खत जिसने सबको हिला दिया!



छत्तीसगढ़ के इतिहास का वो सबसे भयावह, सबसे काला पन्ना— झीरम घाटी कांड! वो खूनी खेल जिसमें कांग्रेस की पूरी की पूरी शीर्ष नेतृत्व वाली पंक्ति को गोलियों से भून दिया गया था। 25 मई 2013 की उस खूनी दोपहर को बीते कई साल हो चुके हैं, लेकिन आज भी इसके जख्म हरे हैं... और क्यों न हों? क्योंकि न्याय आज भी अधूरा है!

लेकिन आज झीरम कांड को लेकर चार अलग-अलग दिशाओं में ऐसी आग भड़की है जिसने पूरे प्रदेश के सियासी और प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है!

  • पहला रुख: सजायाफ्ता नक्सली महिला प्रमिला, जो जेल की सलाखों के पीछे से महामहिम राष्ट्रपति से अपनी दया की भीख मांग रही है।
  • दूसरा रुख: सर्व आदिवासी समाज, जो अदालत और सरकार के फैसलों से बुरी तरह नाराज और आंदोलित है।
  • तीसरा रुख: वो पीड़ित परिवार, जो आज भी अपनों को खोने का दर्द सीने में दबाए दिल्ली पहुंचे और राहुल गांधी से गुहार लगाई, जिसके बाद राहुल गांधी ने मामले के सारे गोपनीय रिकॉर्ड्स तलब कर लिए हैं।
  • और चौथा सबसे बड़ा खुलासा: तत्कालीन इंटेलिजेंस आईपीएस अफसर दीपांशु काबरा की वो 'अत्यंत गोपनीय' रिपोर्ट, जो झीरम हमले से ठीक एक महीने पहले भेजी गई थी और जिसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया!"
  • सजायाफ्ता प्रमिला की 'दया की भीख' 

"आइए सबसे पहले बात करते हैं उस प्रमिला की।

झीरम घाटी के सबसे क्रूर और जघन्य हत्याकांड में शामिल सजायाफ्ता नक्सली महिला प्रमिला ने अब राष्ट्रपति के सामने दया याचिका दायर की है। वो अपनी सजा कम कराने या माफी की भीख मांग रही है।

लेकिन सवाल यह उठता है कि जिस समय झीरम की वादियों में गोलियां गूंज रही थीं, जब बस्तर टाइगर महेंद्र कर्मा, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, विद्याचरण शुक्ल जैसे दिग्गजों को बर्बरता से मौत के घाट उतारा जा रहा था, तब दया कहाँ थी? जिन निर्दोष सुरक्षाकर्मियों और चालकों की जानें गईं, उनके परिवारों की दया याचिका कहाँ गई थी?

कानूनी प्रक्रिया के तहत याचिका दाखिल करना अधिकार हो सकता है, लेकिन जनता के मन में यह सवाल कौंध रहा है— क्या इतने बड़े जनसंहार के दोषियों को दया की गुंजाइश मिलनी चाहिए?"

सर्व आदिवासी समाज का आक्रोश 

"अब सिक्के का दूसरा पहलू देखिए— सर्व आदिवासी समाज!

एक तरफ प्रमिला की दया याचिका है, तो दूसरी तरफ सर्व आदिवासी समाज इस पूरे घटनाक्रम और कानूनी फैसलों से बेहद आक्रोशित है। समाज का सीधा आरोप है कि इस पूरे कांड में निर्दोष आदिवासियों को मोहरा बनाया गया या फिर बस्तर के असली गुनाहगारों को बचाने के लिए पूरी पटकथा को अलग मोड़ दिया गया।

आदिवासी समाज का कहना है कि जब तक इस बड़े राजनीतिक षड्यंत्र का पर्दाफाश नहीं होता, जब तक पर्दे के पीछे छिपे असली 'मास्टरमाइंड' बेनकाब नहीं होते, तब तक न्याय अधूरा है। आदिवासी समाज का यह गुस्सा बता रहा है कि बस्तर की आबोहवा में न्याय की आस अब भी सुलग रही है।"

- पीड़ित परिवार और राहुल गांधी की एंट्री

"तीसरा और सबसे दर्दनाक पहलू— वो पीड़ित परिवार जिन्होंने इस खूनी मंजर में अपनों को खोया।

सालों से दर-दर भटक रहे पीड़ित परिवार हाल ही में दिल्ली में कांग्रेस नेता राहुल गांधी से मिलने पहुंचे। सालों से न्याय की आस लगाए इन परिवारों ने राहुल गांधी के सामने अपना दर्द बयां किया। उन्होंने साफ़ कहा कि 'हमें न्याय नहीं मिला, जांच आयोग बनते रहे, राजनीति होती रही, लेकिन असली गुनाहगार आज भी आज़ाद घूम रहे हैं!'

और इस मुलाकात के बाद बड़ा मोड़ आया! राहुल गांधी ने इस पूरे झीरम कांड से जुड़े तमाम दस्तावेज, जांच रिपोर्ट और रिकॉर्ड्स मांग लिए हैं। अब सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी के इस कदम से झीरम की फाइलों में बंद वो सच बाहर आ पाएगा, जिसे सालों से दबाने की कोशिश की जा रही है?"

महा-खुलासा! आईपीएस दीपांशु काबरा का वो गोपनीय पत्र 

"और अब आते हैं आज के सबसे बड़े और सनसनीखेज खुलासे पर!

मेरे हाथ में जो पत्र है, उसे ध्यान से देखिए। यह पत्र इंटेलिजेंस की जिम्मेदारी संभाल रहे तत्कालीन आईपीएस अधिकारी दीपांशु काबरा द्वारा 17 अप्रैल 2013 को यानी झीरम हमले से ठीक 38 दिन पहले पुलिस मुख्यालय (PHQ) को भेजा गया था!

इस पत्र पर ऊपर साफ अक्षरों में लिखा था— 'सर्वथा गोपनीय'।

इस इंटेलिजेंस रिपोर्ट में क्या लिखा था? ज़रा ध्यान से सुनिए! रिपोर्ट में लिखा गया था कि इंटेलिजेंस सूत्रों से पक्की सूचना मिली है कि माओवादियों द्वारा कांग्रेस के पूर्व विधायक और पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा (दंतेवाड़ा) और कांग्रेस नेता राजकुमार नामदेव (दंतेवाड़ा) को मारने के लिए एक 'एक्शन टीम' गठित की गई है!

इतना ही नहीं, इस पत्र में हमलावरों की पूरी कुंडली थी!

  • इसमें लिखा था कि माओवादी मिलिशिया कम्पनी नंबर 02 का प्लाटून कमेटी सदस्य राकेश इसका प्रभारी है।
  • भैरमगढ़ प्लाटून, गंगालूर प्लाटून और मंगाली LOS से सदस्यों को इसमें शामिल किया गया है।
  • एक्शन टीम प्रभारी को 9 mm पिस्तौल और सदस्यों को रिवॉल्वर उपलब्ध कराई गई है।

पत्र के अंत में आईपीएस दीपांशु काबरा ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि 'उनकी सुरक्षा में तैनात कर्मचारियों को विशेष सतर्कता बरतनेहेतु निर्देशित किया जाए और सुरक्षा मापदंड के अनुरूप आवश्यक सुरक्षा अमला बनाए रखना सुनिश्चित करें'। यह कॉपी एडीजी इंटेलिजेंस, एडीजी नक्सल अभियान, आईजी बस्तर और एसपी दंतेवाड़ा को भी भेजी गई थी!

अब मेरा सीधा सवाल: जब 17 अप्रैल 2013 को ही खुफिया विभाग के पास इतनी सटीक जानकारी थी कि महेंद्र कर्मा की हत्या के लिए 9mm पिस्तौल और रिवॉल्वर से लैस विशेष टीम बन चुकी है... तो 25 मई 2013 को झीरम घाटी में परिवर्तन यात्रा के दौरान सुरक्षा में इतनी भारी चूक कैसे हुई?

किसने इस इंटेलिजेंस रिपोर्ट को दरकिनार किया? किसने वीवीआईपी सुरक्षा के मानकों की अनदेखी की? क्या यह सिर्फ एक लापरवाही थी, या फिर किसी गहरी साजिश का हिस्सा?"

झीरम घाटी कांड सिर्फ एक नक्सली हमला नहीं था, यह लोकतंत्र पर एक गहरा आघात था।

आज एक तरफ नक्सली प्रमिला दया मांग रही है, सर्व आदिवासी समाज आक्रोश में है, पीड़ित परिवार राहुल गांधी के दरवाजे पर न्याय मांग रहे हैं, और दूसरी तरफ दीपांशु काबरा का यह 17 अप्रैल 2013 का खत चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है कि 'खतरा मालूमथा, फिर भी कदम नहीं उठाए गए!'

आखिर इस महा-लापरवाही या महा-षड्यंत्र का जिम्मेदार कौन है? क्या कभी झीरम का पूरा सच जनता के सामने आ पाएगा?

आप इस पूरे मामले पर क्या सोचते हैं? क्या दीपांशु काबरा की इस खुफिया रिपोर्ट के बाद नए सिरे से जांच होनी चाहिए? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।

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