सरकारी निर्माण या भ्रष्टाचार का खेल? विधानसभा से लेकर संसद तक हाल बेहाल!
आज बात करेंगे एक ऐसे गंभीर मुद्दे पर, जो सीधे तौर पर जनता के खून-पसीने की कमाई की बर्बादी से जुड़ा है। क्या हमारे देश में अब बड़े-बड़े सरकारी भवन और सड़कें सिर्फ कागजों पर मजबूत और असलियत में भ्रष्टाचार के नमूने बनकर रह गए हैं?
अभी हाल ही में रायपुर के नवा रायपुर स्थित हमारे नए छत्तीसगढ़ विधानसभा भवन से जो तस्वीरें सामने आई हैं, उसने हर किसी को चौंका दिया है। भई, ज़रा सोचिए—जिस विधानसभा भवन को बनाने में करीब 324 करोड़ रुपये खर्च किए गए हों, वहां कुछ ही महीनों के भीतर फॉल्स सीलिंग गिर जाए, कभी स्टील के पाइप नीचे आ जाएं और अब दीवार की 10 फीट लंबी टाइल्स भरभराकर नीचे गिर जाएं—इसे आप क्या कहेंगे? गनीमत ये रही कि उस वक्त वहां कोई मौजूद नहीं था, वरना कोई बड़ा हादसा भी हो सकता था। लेकिन सवाल ये है कि क्या सरकार किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रही है?
लेकिन कहानी सिर्फ रायपुर या छत्तीसगढ़ की नहीं है। बीमारी राष्ट्रीय स्तर पर फैल चुकी है! आइए राजधानी दिल्ली चलते हैं... वही दिल्ली, जहां देश का नया संसद भवन बना है। दुनिया भर में डंका पीटा गया कि आधुनिक सुविधाओं से लैस नया संसद भवन तैयार हुआ है। लेकिन जरा बरसात के मौसम की वो तस्वीरें याद कीजिए, जब संसद भवन के अंदर से पानी टपकने लगा था और छत टपकने की वजह से अंदर बाल्टी लगानी पड़ गई थी! भई वाह! देश के सर्वोच्च लोकतंत्र के मंदिर में अगर बारिश का पानी टपकेगा, तो आम जनता की बस्तियों और सरकारी दफ्तरों का क्या हाल होगा, इसका अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं।
और जरा इन सरकारी बाबूओं और ठेकेदारों के कारनामों का दायरा देखिए। बात सिर्फ इमारतों तक सीमित नहीं है, सड़कों का खेल तो इससे भी निराला है! चुनाव के वक्त या किसी बड़े नेता के दौरे से पहले रातों-रात सड़कें ऐसे बनाई जाती हैं, जैसे मानों कोई सोने की पट्टी बिछाई जा रही हो। लेकिन जनाब, पहली ही बारिश या थोड़ा सा ट्रैफिक क्या झेला, वो सड़कें ऐसे उखड़ने लगती हैं जैसे मक्खन पर से चादर हट रही हो! पैचवर्क के नाम पर जनता के करोड़ों रुपये हर साल पानी की तरह बहा दिए जाते हैं, और कुछ ही हफ्तों में सड़क पर बड़े-बड़े गड्ढे और धूल के गुबार उड़ने लगते हैं।
सवाल यह है कि आखिर इन प्रोजेक्ट्स की क्वालिटी चेक करने वाले इंजीनियर, अधिकारी और मंत्री कहां सोते रहते हैं? क्या 324 करोड़ या हजारों करोड़ के बजट में वाटर-प्रूफिंग, मजबूत दीवारों और टिकाऊ सड़कों का प्रावधान नहीं होता? या फिर बजट का बड़ा हिस्सा कमीशन और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है?
आज जरूरत सिर्फ इस बात की नहीं है कि गिरी हुई टाइल्स को दोबारा चिपका दिया जाए या टपकती छत पर पन्नी डाल दी जाए। जरूरत इस बात की है कि पूरे सिस्टम की, इन तमाम सरकारी भवनों की और निर्माण गुणवत्ता की एक उच्चस्तरीय स्वतंत्र जांच हो। ठेकेदारों और मिलीभगत करने वाले अधिकारियों पर सख्त से सख्त कार्रवाई हो, ताकि जनता के टैक्स के एक-एक पाई का सही इस्तेमाल हो सके।
