रविवार, 7 मार्च 2010

रमन की होशियारी, गडकरी की गणितबाजी





ऊपर से शांत दिख रही भाजपा में सब कुछ ठीक ठाक नहीं चल रहा है। पहले ही बगावत का झंडा उठा चुके आदिवासी नेता रामविचार नेताम ने आदिवासी एक्सप्रेस चलाना शुरु कर दिया है तो डॉ. रमन सिंह राष्ट्रीय कार्यकारिणी में अपने दुश्मनों को भेजने होशियारी दिखा रहे है। प्रदेश अध्यक्ष पद पर मुरारी सिंह का नाम आदिवासी एक्सप्रेस के तोड़ के रुप में देखा जा रहा है तो राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह पर दबाव बनाए रखने गणितबाजी में उलझे हुए हैं।
छत्तीसगढ़ के भाजपाई राजनीति में उथल-पुथल की सुगबगाहट शुरु हो गई और कहा जा रहा है कि आदिवासी सांसदों, आदिवासी मंत्रियों सहित दर्जनभर विधायक मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से बेहद खफा है और वे कभी भी डॉ. रमन सिंह के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोल सकते हैं। वैसे डॉ. रमन सिंह के खिलाफ असंतोष की खबरें नई नहीं है। राज्यसभा सदस्य नंदकुमार साय तो गाहे-बगाहे मौके की तलाश में रहते हैं जबकि रामविचार नेताम, ननकीराम कंवर और सोहन पोटाई का भी नाम सत्ता परिवर्तन में रुचि रखने वालों में शुमार है।
पिछले दिनों राजधानी में 32 प्रतिशत आरक्षण को लेकर हुई रैली में भाजपा के दिग्गज आदिवासी नेताओं की मौजूदगी में डॉ. रमन सिंह के खिलाफ हुई नारेबाजी को भी इसी रूप में देखा जा रहा है। इस रैली में रामविचार नेताम की सक्रियता को लेकर भी कई तरह के सवाल उठाये जा रहे हैं। दूसरी तरफ पिछड़े वर्ग में भी जबरदस्त आक्रोश है लेकिन रायपुर के सांसद रमेश बैस की चुप्पी की वजह से पिछड़ा वर्ग खामोश है और उन्हें नेतृत्व की तलाश है। हालांकि चन्द्रशेखर साहू की भूमिका को लेकर सवाल उठाये जा रहे हैं और सूत्रों का कहना है कि रायपुर में दशक पहले राज्य की मांग उठाकर अपना हाथ जला चुके चंपू साहू फिलहाल मौन है और दूध का जला... वाली कहावत पर चल रहे हैं।
इधर डा. रमन सिंह ने ब्राम्हण और बनिया से निपटने नई रणनीति बना ली है और कहा जा रहा है कि एक तीर से दो शिकार की तर्ज पर वे सरगुजा के आदिवासी सांसद मुरारी सिंह को प्रदेशाध्यक्ष बनवाकर जहां आदिवासी एक्सप्रेस की हवा निकालने में लगे हैं वहीं दूसरी तरफ राष्ट्रीय कार्यकारिणी में अपने दुश्मनों को भेजने की रणनीति पर चल रहे हैं। कहा जाता है कि लगातार विवादों में रहने वाले राजधानी के विधायक बृजमोहन अग्रवाल को वे एक बार फिर महत्व देने लगे हैं ताकि विरोधियों को ताकत न मिले।
बताया जाता है कि डॉ. रमन सिंह की असली चिंता आदिवासी नेताओं की एकजुटता है और वे इस एकजुटता को तोड़ने मंत्रियों को जिम्मेदारी दे रखे हैं। इसके तहत अलग-अलग मंत्री दो तीन आदिवासी विधायकों को संभालने का काम कर रहे हैं। बहरहाल भाजपा में चल रहे इस अंदरूनी उठापटक की दबी जुबान पर चर्चा होने लगी है और कहा जा रहा है कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी की घोषणा के बाद स्थिति साफ होगी।

शनिवार, 6 मार्च 2010

चावल योजना से मध्यम वर्ग त्रस्त भाजपाई सत्ता सुख में मस्त

छत्तीसगढ़ में एक-दो रुपया किलो चावल योजना के चलते मध्यम वर्ग का बुरा हाल है। लेबर प्राब्लम के साथ-साथ चावल सहित अन्य समानों की कीमतों में दो गुणा वृद्धि हो गई है जबकि चावल वास्तविक लोगों को मिलने की बजाय कालाबाजारी में चला गया है।जगह-जगह मध्यम वर्ग की तरफ से यह सवाल उठाये जा रहे हैं कि आखिर एक रुपया किलो चावल बांटकर सरकार को वोट बैंक की राजनीति करने का अधिकार क्या है? इस एक रुपया किलो चावल योजना का दुष्परिणाम मध्यम वर्ग को सर्वाधिक भुगतना पड़ रहा है। ब्राम्हणपारा निवासी संजीव तिवारी ने कहा कि इस एक रुपया किलो चावल योजना की वजह से घरेलु काम के लिए नौकर-नौकरानी नहीं मिल रही है। पहले जो लोग मन लगाकर काम करते थे वे इस योजना के लागू होने के बाद छुट्टियां मारने लगे। सुंदर नगर निवासी प्रमिला पाण्डे ने कहा कि इस योजना के कारण महंगाई बढ़ गई है 16 रुपए किलो वाला एचएमटी चावल 40 रुपए किलो मिल रहा है। नौकरो का भाव अलग बढ़ गया है।
इसी तरह सदर बाजार निवासी नवरतन गोलछा का कहना था कि इस योजना ने प्रदेश की आर्थिक स्थिति को जर्जर कर दिया है। चावल योजना का लाभ वास्तविक लोगों को कम जमाखारों-कालाबाजारियों को अधिक मिल रहा है। जबकि प्रभाकर अग्रवाल का कहना था कि फर्जी राशन कार्ड बनाकर एक रुपया किलो वाले चावल दूसरे प्रांतों में बेचा जा रहा है।
बताया जाता है कि चावल योजना को लेकर सबसे यादा त्रस्त मध्यम वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग के लोग है क्योंकि इन वर्गों को न केवल महंगाई का सामना करना पड़ रहा है बल्कि घरेलू नौकरों के भाव बढ़ने से सर्वाधिक परेशानी इन्हीं वर्गों को उठाना पड़ रहा है। ऐसे में भले ही भारतीय जनता पार्टी नगरीय निकाय चुनाव में व्यक्तिगत ईमेज का अमलीजामा पहनाये मध्यम वर्ग भाजपा के खिलाफ बड़े पैमाने पर वोट डाला है।
राजधानी में भाजपा ने प्रभा दुबे को अपना प्रत्याशी बनाया प्रभा दुबे को इस चावल योजना के चलते भारी नुकसान उठाना पढ़ा है। राजधानी में रहने वाले यादातर ब्राम्हण वोटर मध्यम वर्ग के हैं और इस प्रतिनिधि को चर्चा के दौरान अधिकांश लोगों का कहना था कि वे चावल योजना से त्रस्त है इसलिए यदि ब्राम्हणपारा की बात हुई तो वे बसपा प्रत्याशी प्रणिता पाण्डे को वोट दे देंगे लेकिन भाजपा को वोट नहीं देंगे। आखिर ऐसे लोगों को कैसे चुना जा सकता है जिनकी सरकार के चलते मध्यम वर्ग त्रस्त है।
सूत्रों की माने तो चावल योजना भाजपा के लिए गले की हड्डी बनते जा रही है। रोज हजारों की संख्या में फर्जी राशन कार्ड पकड़ाये जा रहे है। यदि खबरों पर भरोसा करे तो मुख्यमंत्री के गृह जिले कवर्धा में एक गुप्ता परिवार ने चावल योजना के चावल को पटना भेजकर करोड़ों रुपया कमाया और सालभर के भीतर ही 7 ट्रक खरीद लिया।
राजधानी में भी बड़े पैमाने पर फर्जी राशन कार्ड पकड़ाये गए। यहां तक कि ये चावल किराना स्टोर्स में भी बिक रहे है। वास्तविक लोगों को इसका लाभ नहीं मिल रहा है और कालाबाजारी करने वाले मस्त है।
बहरहाल सरकार की चावल योजना को लेकर मध्यम वर्ग त्रस्त है

बैंक कर्मियों की अवैध उगाही से लोग त्रस्त

यह तो सीधे-सीधे लोगों की जेब में डाका डालने वाली बात है और जब यह डाका बैंक ही डालने लगे तो आम आदमी किस पर भरोसा करे। अब तो बैंक कर्मी एनओसी देने सौ रुपए ले ही रहे हैं। नोटों का बंडल गिनने भी पैसे वसूल रहे हैं। प्रति बंडल 15 रुपए की रसीद नहीं चाहिए तो इसके आधे में भी बंडल गिने जाते हैं।
राजधानी में चल रहे निजी बैंकों के इस ड्रामेबाजी से आम आदमी ही नहीं व्यापारी भी त्रस्त है लेकिन वे इसका दबी जुबान से विरोध भी कर रहे हैं। लेकिन बैंकों की हठधर्मिता के कारण वे खुलकर नहीं बोल पा रहे हैं।
निजी बैंकों की इस दादागिरी के संबंध में एक व्यापारी विजय जैन ने बताया कि यह तो हद है। उन्होंने बताया कि पीएनबी में प्रति बंडल गिनने के 15 रुपए लिए जाते हैं और इसका बकायदा रसीद भी दिया जाता है लेकिन यदि आपको रसीद नहीं लेना है तो आधी राशि में आपके रुपयों का बंडल गिन लिया जाएगा और यह राशि सीधे-सीधे बैंक कर्मियों की जेब में जाता है। श्री जैन ने इसकी शिकायत छत्तीसगढ चेम्बर से भी की है लेकिन चेम्बर भी अभी तक इस मामले में खामोश है।
बताया जाता है कि इस तरह का खेल कई अन्य निजी बैंकों में चल रहा है जिससे आम लोग या व्यापारी त्रस्त है। व्यापारी नेता कन्हैया अग्रवाल ने इसे सीधे-सीधे लोगों की जेब में डाका डालने वाला बताते हुए कहा कि यह उचित नहीं है और यदि बैंकों ने अपना रवैया नहीं सुधारा तो इसका जोरदार विरोध किया जाएगा।
दूसरी तरफ ऋण लेने वालों को अन्य बैकों से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेना पड़ता है लेकिन बैंक कर्मी बगैर रिश्वत लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं देते। लाखेनगर निवासी घनश्याम सोनकर ने कहा कि जिस बैंक से कोई लेना देना नहीं है वहां सिर्फ एनओसी के नाम पर सौ दौ सौ रुपए की उगाही से लोग त्रस्त है। राजधानी जैसी जगहों पर जहां दर्जनों बैंकों से एनओसी लेना पड़ता है हजारों रुपए बैंक कर्मियों के अवैध उगाही में चला जाता है। एक तो ऋण लेने वाले बेरोजगार युवकों को बैंकों का चक्कर लगाना वैसे ही भारी पड़ता है उपर से रिश्वत देना पड़े तो क्या हाल होता होगा। अंदाजा लगाया जा सकता है।
बहरहाल बैंक कर्मियों की इस अवैध उगाही से लोग त्रस्त है खासकर व्यापारी वर्गों में भारी नाराजगी है। लेकिन व्यापारियों की संस्था चेम्बर ऑफ कामर्स की चुप्पी आश्चर्यजनक है और इसे लेकर कई तरह की चर्चा है।

शुक्रवार, 5 मार्च 2010

अंधा पीसे, कुत्ता खाय...

यह तो अंधा पीसे कुत्ता खाय की कहावत को ही चरितार्थ करता है वरना स्वयं को स्थापित और बड़ा अखबार बनने की जिद में पत्रकारिता की दिनों-दिन यह दुर्गति नहीं होती। पिछले कुछ सालों से राजधानी के पत्रकारों में ही नहीं पत्रकारिता में भी बदलाव की बयार चली है। खबरों को तोड़ मरोड़ कर सनसनी फैलाने की नई परम्परा के साथ-साथ संबंधों को ज्यादा अहमियत दी गई। अखबारों से पाठकों के साथ संबंधो को अहमियत दी जाती है तो सवाल कभी नहीं उठते लेकिन अहमियत दी गई अफसरों और नेताओं से संबंध स्थापित करने की। इसके चलते पत्रकारों की सोच में तो बदलाव आया ही पत्रकारिता की दुर्गति भी हुई। खासकर एम्सवन्लूजिव्ह और खोजी पत्रकारिता को तो बड़ा झटका लगा है। खबरों की तह तक जाने की परम्परा का भी अनादर हुआ। इससे अखबार मालिक और पत्रकार दोनों खुश है लेकिन पाठकों का एक वर्ग जो व्यवस्था की चोंट से पीड़ित है उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ा है। अब तो अखबारों में सामाजिक और सरकारी खबरें ही ज्यादा दिखाई देती है। अपराधिक खबरों में भी वही खबर छपती है जो पुलिस बता देती है। मेरा दावा है कि राजधानी के अखबारों में काम करने वाले क्राईम रिपोर्टरों में आधे रिपोर्टर ऐसे होंगे जो राजधानी के 23 थानों और चौकियों को महिनों से नहीं देखे होंगे। ऐसे में उन थानों या चौकियों में हो रही अच्छी या बुरी कार्रवाई की खबरें कैसे छपती होगी अंदाज लगाया जा सकता है। संपादकों का क्या? अब तो रोज संपादकीय लिखना भी जरूरी नहीं है। ग्रुप के अखबारों में काम करने वाले संपादकों को कलम चलाने की बंदिशे भी कम नहीं होती। उनकों जवाबदारी तो प्रतिध्दंदी अखबारों से तुलना करने और छुटी खबरों के बारें में पूछताछ में ही गुजर जाती है। इस सबके बाद यदि समय बचा तो अधिकारियों और नेताओं से अखबार हित में संबंध बनाने में चला जाता है। पत्रकारिता के इस स्तर तक पहुंचने में अखबार मालिकों का रवैया तो जिम्मेदार रहा ही है। स्वयं पत्रकारों का रवैया भी कम जिम्मेदार नहीं है। कुछ साल पहले की बात है शहर के एक नामी गिरामी अखबार के एक रिपोर्टर ने जब आलीशान बंगला तैयार किया तो अन्य रिपोर्टर उन्हें खुब गाली देते थे लेकिन अब न तो पत्रकारिता की ऊचाई की बात होती है और न ही किसी का बंगले पर ही चर्चा होती है। जब तनख्वाह कम थी तब पत्रकारों में दुनिया बदलने का हौसला होता था लेकिन अब जब सुविधाएं बड़ गई है तो सुविधाएं बढ़ाने की जिद भी बढ़ी है। सुविधाएं छिन जाने का डर उन्हें बेहतर पत्रकारिता या खबरों से दूर रखता है। वे सोचते हैं खबरें छपने पर क्या होगा। अल्टा वे दुश्मन बन जायेंगे और इससे मिलने वाली सुविधाएं से वंचित होंगे। और फिर इस खबर के नहीं छपने से क्या होगा? बस इसी सोच के चलते ही हौज में दूध नहीं भर पाया था सभी शिष्यों ने अंधेरे का फायदा उठाकर गुरू के निर्देश की अवहेलना कर हौज को दूध की जगह पानी से भर दिया था। पत्रकारिता में भी सुविधाएं छिनने का डर कलम पर जंजीरे कसने लगी है।
और अंत में
अवैध प्लाटिंग की लगातार छप रही खबरों से दुखी एक बिल्डर ने सरकार के इस रवैया का जब विरोध किया तो एक अखबार सारा संसार के रिपोर्टर ने उसे सलाह दी इस विरोध का कोई मतलब नहीं है विरोध करना है तो अखबारों के और मंत्री को दमदारी दिखाने ज्ञापन सौंपो तो कुछ हल निकल आयेगा।

गुरुवार, 4 मार्च 2010

मंत्री के दबाव में तवारिस हुई बहाल, पार्टी में बवाल



फर्जी प्रमाण पत्र सहित आर्थिक अनियमितता व कई अन्य मामलों में निलंबित गारमेंट स्कूल की पूर्व प्राचार्या श्रीमती जया तवारिस को शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के दबाव में बहाल करने का सनसनीखेज मामला इन दिनों चर्चा में है। जबकि उनके खिलाफ न्यायालय में भी मामला चलने की खबर है। इधर इस मामले को लेकर पार्टी में भी बवाल मचने की चर्चा है।
हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार शिक्षा विभाग में इन दिनों पदोन्नति से लेकर अन्य नियमों की जमकर धज्जिया उड़ाई जा रही है। कहा जाता है कि निलंबित लोगों को बहाल करने का खेल चल रहा है और उच्च स्तरीय लेन-देन की खबरों के बीच यह भी चर्चा है कि श्रीमती बाम्बरा व श्री चन्द्राकर के खिलाफ आए मामले को दबाया जा रहा है।
इधर अपने कार्यकाल के दौरान विवादों में रही श्रीमती जया तवारिस को बहाल करने के मामले में शिक्षा विभाग में भूचाल आ गया है और इस वजह से कई लोग बेहद नाराज है। दरअसल श्रीमती जया तवारिस पर अपने प्रमाणपत्रों में की गई कूटरचना से लेकर कई तरह के आरोपों के चलते उन्हें निलंबित किया गया था।
सूत्रों का कहना है कि निलंबन को रद्द कराने कांग्रेस के नेता भी लगे हुए थे और जब मामला शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के पास आया तो पहले तो उन्होंने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया था लेकिन अचानक सप्ताहभर पहले उनका बहाली आदेश निकाल दिया गया। चर्चा है कि उनके बहाली आदेश के पीछे मंत्री का हाथ है।
इधर भाजपा सूत्रों ने भी श्रीमती जया तवारिस को बहाल करने को लेकर पार्टी के कई नेताओं में नाराजगी की बात कही है और इसकी शिकायत मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह से भी किए जाने की चर्चा है। एक भाजपा नेता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि ऐसे ही कारणों से भाजपा की बदनामी हो रही है और इसका नुकसान भी पार्टी को उठाना पड़ रहा है।
बहरहाल श्रीमती जया तवारिस की बहाली के मामले को लेकर भाजपा में जबरदस्त हलचल है और इसकी शिकायत मुख्यमंत्री से हुई तो इसका परिणाम क्या होगा इसे लेकर भी भारी उत्सुकता है।

अधिकारियों के इशारे पर होते हैं अवैध उत्खनन,मंत्री के नाम पर कमीशन

यह तो जब सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का की कहावत को ही चरितार्थ करता है वरना छत्तीसगढ़ में बड़े पैमाने पर खनिजों का अवैध उत्खनन नहीं होता। कभी कार्रवाई हुई तो खानापूर्ति के लिए की जाती है और अवैध उत्खनन करने वालों से विभागीय मंत्री तक के नाम पर कमीशन लेने की परंपरा है जबकि इन दिनों खनिज विभाग मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के पास है।
छत्तीसगढ़ में खनिजों का अकूत भंडार है और लीज पर खदानें दी जाती है। सभी खदानों का निर्धारित रकबा है लेकिन निर्धारित रकबों के अलावा भी उत्खनन का कार्य बड़े पैमाने पर चल रहा है। बताया जाता है कि अवैध उत्खनन तो सीधे अधिकारियों की जानकारी में होने लगा है। मंजीत सिंह ने बताया कि बगैर अधिकारियों की जानकारी के अवैध उत्खनन का काम हो ही नहीं सकता और इसके एवज में लाखों रुपया दिया जाता है।
एक अन्य लीज धारक ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि अवैध उत्खनन के खिलाफ जो भी कार्रवाई होती है वह सब पूर्व निर्धारित और खानापूर्ति के लिए की जाती है। एक अन्य ठेकेदार ने बताया कि अकेले रायपुर जिले में हर साल दर्जनों मामले पकड़े जाते हैं और उन पर जुर्माना भी लगाया जाता है। नियमानुसार बार-बार पकड़ाये जाने वाले लीज धारकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का प्रावधान है लेकिन कड़ी कार्रवाई तो दूर जुर्माना तक ठीक से नहीं वसूला जाता।
बताया जाता है कि अकेले रायपुर शहर में आधा दर्जन लोग हैं जो बार-बार अवैध उत्खनन करते पकड़ा चुके हैं। इनमें से कई तो प्रभावशाली है और खनिज अधिकारी तक इनसे बात करने से घबराते है ऐसे लोगों की लीज रद्द की जा सकती है लेकिन अधिकारियों को गले तक पैसा खाने की आदत की वजह से सरकार को हर साल लाखों रुपये के राजस्व का नुकसान केवल रायपुर जिले में हो रहा है।
बहरहाल जब रक्षक ही भक्षक बन जाए और विभागीय मंत्री अपने में मस्त हो तो प्रदेश की दुर्दशा स्वाभाविक है खनिज विभाग में इन दिनों यही सब हो रहा है अपने सीधे व सरल छवि के चक्कर में मुख्यमंत्री को फुरसत ही नहीं है कि वे अपने ही खनिज विभाग के अधिकारियों के कारनामों पर कार्रवाई करें। ऐसे में सरल और सीधे बने रहने के औचित्य पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।

उल्टा चोर कोतवाल को डांटे...,किसान पर राजनीति गर्म

यह तो उल्टा चोर कोतवाल को डांटे की कहावत को ही चरितार्थ करता है वरना छत्तीसगढ़ की रमन सरकार किसानों को लेकर चुनावी घोषणा पत्र में किए वादों को पूरा करने की बजाए केन्द्र में जाकर राजनीति नहीं करती। कांग्रेस और भाजपा के इस मिलीजुली कुश्ती से छत्तीसगढ़ के किसान हैरान है और वे भाजपा से वादा निभाने की मांग को लेकर बड़ा आंदोलन की तैयारी में लग गए हैं।
विधानसभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने अपने घोषणा पत्र जिसे वह संकल्प पत्र भी कहता है में किसानों को 270 रुपए प्रति क्विंटल बोनस और मुफ्त में बिजली देने की बात कही थी लेकिन चुनाव जीतकर सत्ता में आते ही भाजपा अपने इस संकल्प को टालने लगी तब छत्तीसगढ़ के किसानों ने आंदोलन का रास्ता अख्तियार किया।
संयुक्त मोर्चा बनाकर आंदोलनरत किसानों को रोकने सरकार ने बहुत कोशिश की और जब पूरे प्रदेश में धरना और चक्काजाम कर रहे किसानों ने उग्र तेवर दिखाये तो सरकार ने 50 रुपए बोनस बढ़ा दी। इससे भी किसान जब नहीं माने और महाबंद का ऐलान किया तो इस महाबंद को असफल करने सरकार के नुमाईदों ने बेशर्मी पूर्वक आंदोलनकारियों को तोड़ने व व्यापारी जमात पर आंदोलन का विरोध करने दबाव बनाया।
सूत्रों की बात पर भरोसा करें तो सरकार ने आंदोलन को कमजोर करने भाजपा के लोगों का सहारा लिया और भाजपा किसान मोर्चा किसानों का साथ देने की बजाए अपने को आंदोलन से न केवल अलग कर लिया बल्कि यह कहने से भी गुरेज नहीं किया कि बंद की अपील वापस ली जा रही है ताकि भ्रम की स्थिति बन जाए।
वर्तमान राजनीति में सुचिता की दुहाई देने वाली भाजपा सरकार का किसानों के प्रति यह रवैया आश्चर्यजनक है। जबकि किसान भाजपा को उसके वादों के अनुरूप कार्य करने की सिफारिश ही कर रहे हैं।
इधर किसान मोर्चा के नेता वीरेन्द्र पाण्डे, द्वारिका साहू, जागेश्वर प्रसाद, दिनदयाल वर्मा ने कहा कि किसान अब चुप बैठने वाला नहीं है। विधानसभा सत्र के दौरान सरकार को घेरने राजधानी में 5 लाख किसान आ सकते है।
दूसरी तरफ इस मामले में कांग्रेस की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाये जा रहे हैं। बंद का समर्थन देने वाले कांग्रेसी बंद के दौरान कहीं नहीं दिखे। इसे लेकर भी कई तरह की चर्चा है। चर्चा तो रमन सिंह के केन्द्र में राजनीति करने को लेकर भी है और आम किसानों का कहना है कि पहले रमन सिंह अपने वादे निभाये फिर छत्तीसगढ़ के किसान दिल्ली जाने तैयार है।
बहरहाल किसान आक्रोशित है और सरकार ने उनकी मांगों पर कार्रवाई नहीं की तो इसका गंभीर परिणाम पड़ेगा ही विधानसभा सत्र भी सरकार को भारी पड़ सकता है।