बुधवार, 2 जनवरी 2013

परिवर्तन के स्वर को धरातल पर लाने का संकल्प---


अन्ना का आन्दोलन, रामदेव का तामझामए प्रमुख राजनैतिक दल कांगेे्रस-भाजपा की करतूतों, उद्योगों की चालबाजी और छत्तीसगढ़ की रमन सरकार के कालिख पूते चेहरे, रोगदा बांध का बिकना, और महिला अत्याचार की दर्दभरी दास्तान के साथ 2012 भी बीत गया।
बीती ताही बिसार दे आगे की सुध ले। आखिर कब तक हम सच से अपने को दूर रखे। सच तो यह है कि अतीत को भूल जाने की सलाह वही देते हैं जो अतीत के काले सच से सराबोर होते है। जबकि अतीत का काला सच ही भविष्य के प्रकाश का रास्ता होता है। हर साल नये वर्ष में अतीत के स्याह पक्ष को भूलने की सलाह ने ही वर्तमान में भी अंधेरा फैलाने का काम किया है। और राजनैतिक दलों में समाजसेवा की बजाय पैसे की भूख बढ़ी है। इसलिए अब हम इस स्याह पक्ष को भूल जाने की बजाय इसकी खिलाफत की बात कर रहे है।
 बहुत हो चुका, रक्षक के भेष में भक्षकों की ताज पोशी। इसलिए हमें अब नये साल में बदलते तारीख के साथ समाज के  दुश्मनों को पहचान कर उसके खिलाफ खड़े होने का संकल्प लेना है। और इसकी शुरूआत अपने आसपास से ही की जानी चाहिए।
छत्तीसगढ़ राÓय निर्माण के समय क्या नहीं सोचा गया था। टैम्स फ्री राÓय की बात तक की जाती रही। बिजली के मामले में खूब प्रसार हुआ। और रतनजोत से नई क्रांति की बात कही जाने लगी। क्या हुआ? इन बातों का? क्यों सरकार अपने वादे से मुकर गई।
नई राजधानी पर करोड़ों-अरबों फंूकने वाली सरकार के पास शिक्षा-स्वास्थ्य प्राथमिकता क्यों नहीं है। जनप्रतिनिधि चुने जाने के बाद औकात से बढ़कर रहन सहन कैसे हो गया। जब किसानों को 270 रूपये बोनस देना ही नहीं था तब वादे क्यों हुए। जब शिक्षा कर्मियों का संविलियन होना ही नहीं था तब संकल्प का नाम क्यों दिया गया और जब तिवारी कमेटी की अनुशंसा माननी ही नही थी तब कमेटी क्यों बनाई गई। आन्दोलन करने वाले अपनी मांग पूरी होने पर अपने साथ हुए अन्याय को शायद भूल भी जाये लेकिन क्या उन लोगों को यह सब भूलना चाहिए जो सरकार के रवैये की वजह से हुए आन्दोलन के कारण आते जाते बेवजह परेशान हुए।  क्या लोगों को कोयले की कालिख भूल जानी चाहिए या बांध बेचना भूलना चाहिए? उद्योगों के लिए जबरिया खेती की जमीनों की बरबादी को कैसे भूला जा सकता है या करीना को नचाने खड़ी फसल पर बुलडोजर चलाने की तुगलकी फरमान भूला जा सकता है।
बढ़ते अपराध, लुटती बेटियां को कैसे भूला जा सकता है।
बारह साल में छत्तीसगढ़ में शिक्षा को दूकान बनाने में सरकार जिस तरह से सरकारी स्कूल कालेजों को बरबाद किया है वह कैसे भूला जा सकता है और न ही चिकि त्सा के अभाव में मरते लोगों को भूलना मानवता के लिए कितना ठीक होगा।
सत्ता की ऊंची दौड़ ने गाँवों के विकास को अवरूद्ध कर दिया है। सत्ता मे बैठे लोगों के अपराधिक गठजोड़ ने इस शांत प्रदेश को अपराध के आंकड़े में सबसे उपर ला दिया है। हर विभाग भ्रष्टाचार में गले तक डुब गया है और कुर्सी में बैठने वालों ने सात पीढ़ी की व्यवस्था कर ली है या करने में लगे है।
यदि कांग्रेस के छत्तीसगढ़ में हार की वजह से भी भाजपा ने सबक नहीं लिया है तो इसके परिणाम की चिंता जनता को करनी पड़ेगी ।
अब पिछली बातों को भूलने की बजाय इससे सबक लेने का समय ही नहीं है बल्कि इस पर प्रहार करने की जरूरत आ पड़ी है। हर अपराध के खिलाफ  खुल कर खड़े होने का समय है। अपराधी चाहे अपना ही क्यों न हो।
आओं वर्ष 201& का स्वागत इसी संकल्प के साथ करें।

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

वांटेड मन्नू को पकडऩे में पुलिस के हाथ पांव फूल रहे!



रायपुर। करोड़ों के वायदा कारोबार में धमकी-चमकी और अपहरण के मामले पुलिस ने दर्ज तो कर लिये हैं लेकिन इस कांड के सरगना मन्नू उर्फ अभिनंदन नत्थानी को पुलिस अब तक गिरफ्तार नहीं कर पाई है जबकि वह लगातार नेताओं और अधिकारियों के संपर्क में है। करोड़ों के वायदा कारोबार को लेकर शहर के धनाड्य वर्गों में जबरदस्त रूचि है। चूंकि मामला लाखों-करोड़ों का है इसलिए इसकी वसूली भी इसी तरीके से की जाती है। चूंकि पूरा मामला नम्बर दो का है इसलिए वायदा कारोबारी पैसा वसूली में दो नंबरी लोगों का ही उपयोग करती है कही वजह है कि इस कारोबार में किसी गंभीर वारदात की आशंका है। चूंकि इस मामले में दोनों की पक्ष धनाड्य व अपने को ई"ातहार मानते हैं इसलिए भी मामला पुलिस तक पहुंचने के पहले ही जैसे-तैसे सुलझा लिया जाता है।
चूंकि एक मामला पुलिस तक पहुंच गया इसलिए इस धंधे के पीछे का सच लोग जान पाये। इधर अभय नाहर अपहरण कांत में पुलिस ने कुछ लोगों को पकड़ा जरूर है लेकिन वह मन्नू नत्थानी को गिरफ्तार नहीं कर पा रही है इससे पुलिस पर उसे बचाने का भी आरोप लगाया जा रहा है। हालांकि पुलिस ने उसे वांटेड घोषित जरूर कर दिया है लेकिन उसे अभी मन्नू तक पहुंचने में सफलता नहीं मिली है।
हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों का कहना है कि मन्नू नत्थानी लगातार शहर में मौजूद अपने शुभ चिंतकों के संपर्क में है और उसके पास पुलिस की गतिविधियों की भी सूचना पहुंच रही है। मन्नू इन दिनों मोबाईल नंबर बहल-बदल कर या लैंड लाईन से अपने शुभचिंतकों के संपर्क में है।
ज्ञात हो कि सोने चांदी की ऑनलाईन बुुकिंग के जरिये करोड़ों का खेल दो नंबर में बिना लिाख पढ़ी के हुआ है सूत्रों का कहना है। मन्नू उर्फ अभिनंदन नत्थानी, नीतिन चोपड़ा और सन्नी नायडू इस बाजार के बड़े खिलाड़ी के रूप में अपने को प्रचारित किया था। एजेटों के माध्यम से बेहिसाब कटिंग के चलते वसूली में दिक्कत हुई फिर वसूली के लिए भाई गिरी का रास्ता अख्तियार किया गया।
बताया जाता है कि शहर में अभी भी तीन दर्जन से अधिक एजेंट हैं जो बेहिसाब कटिंग कर रहे हैं जबकि इस खेल में किसी प---पृथ्वानी के दादागिरी करने की चर्चा भी दब  जोर पकडऩे लगी है। एकांश जैन सहित कोठारी बंधु भी अपने दो वायदा बाजार का बड़ा खिलाड़ी बताकर वसूली के लिए धमकी चमकी का रास्ता अख्तियार कर रहे हैं।
वायदा कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि कई लोग अपना सब कुछ दांव पर लगा चुके हैं और पैसा देने में आना-कानी कर रहे हैं चूंकि पूरा खेल दो नंबर में हुआ है इसलिए वसूली के लिए भाईगिरी वाला रास्ता ही अख्तियार किया जा रहा है।
इधर खबर है कि अनीस भंडारी, प्रवीण मालू, निलेश बेगानी विकास अग्रवाल जैसे वायदा कारोबारियों पर पुलिस की नजर लगी हुई है। चूंकि में लोग राजनैतिक पहुंच रखते हैं इसलिए पुलिस इन पर हाथ नहीं डाल पा रही है।
बहरहाल वाटेंड मन्नू को पुलिस द्वारा गिरफ्तार नहीं करने से आम लोगों में कई तरह की प्रतिक्रिया है जो ठीक नहीं कही जा सकती।

रविवार, 30 दिसंबर 2012

अवैध निर्माण बना कमाई का जरिया ...


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर को सुंदर बनाने की जिम्मेदारी जिन पर है वे ही निगम को चूना लगाने आमदा है । बजबजाती नालियां, भयंकर धूल और खौफनाक म'छर राजधानी की पहचान बन चुका है । कभी धूल मुक्त शहर का दावा करने वालों को जनता ने धूल चटा ही । इसके बाद भी हालात कुछ नहीं बदला है ।
बेतरतीब निर्माण ने तो शहर को बेढंगा कर ही दिया है इसकी वजह से यातायात की समस्या भी शहर वालों को झेलना पड़ रहा हैं । निगम के अधिकारियों से तो इन अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई की उम्मीद ही बेमानी है और जिन पाषदों पर उम्मीद की जा रही है वे भी ऐसे अवैध निर्माण को कमाई का जरिया बना चुके है ।
यहां तक कि इन अवैध निर्माण करने वालों से मंत्रियों तक पैसा पहुंचाने की चर्चा गरम है ।
शहर के ह्दय स्थल माने जाने वाले जयस्तम्भ चौक में स्थित किरण बिल्डिंग को लेकर क्या कुछ नहीं हुआ । नक्शे के विपरित निर्माण से लेकर नियम-कानून की ध"िायां उड़ाते यह अब भी वैसा ही खड़ा है । पहले तो जांच रिपोर्ट आने के बाद कार्रवाई करने का बहाना बनाया गया और जब जांच रिपोर्ट आ गई तब भी कुछ नहीं हो रहा है । कमिश्रर से लेकर महापौर सहित तमाम जिम्मेदार लोगों पर पैसों को लेकर उंगलिया उठ रही है । हल्ला मचाने वाले भाजपाई भी खामोश है और वार्ड पार्षद को तो मानों इससे कोई मतलब ही नहीं है ।
जब शहर के जयस्तम्भ जैसी जगह का यह हाल है तो आसानी से समझा जा सकता हे कि दूसरे काम्प्लेक्सों का क्या हाल होगा । कार्रवाई नहीं करने का मतलब  साफ है कि तिजोरियां भरी जा रही है । Óयादा दिन नहीं हुए है शंकर नगर में राजकुमार चोपड़ा के काम्प्लेक्स की दूकानों पर सील लगाई गई थी । मंत्री राजेश मूणत तक नाराज थे । क्रिस्टल टावर का भी यही हाल था । सील लगाई गई । फिर खोल दी गई । सील खोलने के एवज में क्या सौदा हुआ । कोई नहीं जानता । पार्किंग की समस्या यथावत है काम्प्लेक्स नियम कानून को चिढ़ाते खड़े है । पार्षद बनते ही जिन्दगी बदलने लगी । गाडिय़ां खरीदी जा रही है । क्या-कांग्रेस और क्या भाजपा, निर्दलीय तो पहले ही सौदेबाजी कर मजे में है ।
शहर का बुरा हाल हे । निगम राजनीति का अड्डा बनते जा रहा है । विकास में बाधा के लिए एक दूसरे के सिर ठिकरा फोड़ा जा रहा है लेकिन धूल और म'छर से परेशान जनता की पीड़ा कोई नहीं देख रहा है । नगर निगम पहले दिन घोषणा करता है कि सड़कें नहीं खोदने दी जायेगी दूसरे दिन पुलिस वाले मोतीबाग के पास धड़ा-धड़ सड़क खोदते है । कुछ नहीं होता है।
धर्मार्थ के नाम पर बिल्डिंग बन गई है लेकिन यहां खुले आम दूकानदारी चल रही है लेकिन निगम को यह सब देखने की फुरसत  ही नहीं है । सच तो यह है कि टैक्स बचाने के एवज में भी पैसे वसूले जा रहे है ं ।
राÓय बनने के बाद से निगम की राजनीति में जबरदस्त गिरावट आई है । लाखों रूपए चुनाव में खर्च किये जा रहे हैं । लोग हैरान है कि पार्षद जैसे पद के लिए लाखों खर्च करके चुनाव जीतने की कोशिश क्यों हो रही है ।
बैजनाथ पारा के उपचुनाव में तो एक मंत्री द्वारा 60-70 लाख रूपये खर्च करने की चर्चा है । खर्च तो कांग्रेसीयों ने भी कम नहीं किया है । इतने खर्च के बाद क्या जन सेवा होगी । आसानी से समझा जा सकता है ।
मूंदी आंख से ..
बैजनाथ पारा में पार्षद उपचुनाव में भले ही मुकाबला भाजपा-कांग्रेस के बीच कही जा रही हो लेकिन वास्तव में कांग्रेस यहां अपने ही लोगों से मुकाबले पर नजर आ रही थी । ढेबर गुटको पटकनी देने कौन सा गुट सक्रिय था और वह कितना कारगर होगा यह तो वक्त की बात है लेकिन भाजपाई भी अपने मंत्री की रूचि से हैरान थे ।

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

अवैध कालोनी की सूची बने साल बीत गये पर कार्रवाई नहीं...



रायपुर। यह तो राम नाम की लूट है लूट सको तो लूट की कहावत को ही चरितार्थ करता है वरना नगर एवं ग्राम निवेश द्वारा अवैध कालोनियों की सूची बगैर कार्रवाई के सवा साल तक यू ही पड़ी नहीं होती। कहा जाता है कि राजनैतिक पहुंच से लेकर पैसे वालों की इस जमात ने अधिकारियों से लेकर मंत्रियों तक के मुंह में नोट भर दिये हैं। इसलिए कार्रवाई होने की बात तो दूर इन्हें नोटिस तक नहीं दिया गया और गुपचुप ढंग से पैसा खाकर इन्हें बचाया जा रहा है।
राजधानी में पदस्थ अधिकारियों की खाओं पियों नीति के चलते भू-माफियाओं ने जबरदस्त ठंग से अवैध कालोनी बना रखा है और वे शासन प्रशासन को अपनी जेबों में रखने का दावा करते हुए आम लोगों को मनमाने कीमत पर जमीन व मकान बेच रहे हैं।
इस संबंध में आरटीओ कार्यकर्ता इंदरजीत छाबड़ा, राकेश चौबे से बात की गई तो उन्होंने बताया कि सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी के बाद सरकार में बैठे मंत्री और अधिकारियों की नीति के चलते ही आम आदमी ठग जा रहा है। सूचना के अधिकार के तहत मिली जानकारी में संयुक्त संचालक नगर तथा ग्राम निवेश ने ऐसे 204 लोगों की सूची बनाई है जिन लोगों के द्वारा ग्राम बोरियाखुर्द, डोमा, माना, डूण्डा, कांदुल, धरमपुर, बनरसी टेमरी, दतरेंगा, भठगांव, संकरी, पिद्दा जोरा मडिया देवपुुरी, काठाडीह, कचना, धनेली, छपोरा व सेजबहार में अवैध रूप से प्लाटिंग, अवैध व्यपर्तन व अवैध कालोनी का निर्माण कर रहे हैं।
यह सूची 10-08-2010 को बन गई है लेकिन इनके खिलाफ कार्रवाई नहीं हो रही है। आखिर सरकार क्या यह चाहती है कि इनके झांसे में आकर लोग अपने घर का सपना परा करे फिर सरकार इसे तोड़ दे? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब सरकार को देना चाहिए? सरकार की इस नीति के चलते आम आदमी ठगा जा रहा है। ग्राम व नगर निवेश द्वारा तैयार सूची के अनुसार माना में दलजीत सिंह पिता कुलदीप सिंह चावला, जनक बाई पिता मनराखन, मनोज पिता नंदकुमार सिंहा, ग्राम बोरियाखुद में श्रीमती मथुरा बाई पिता प्रेमलाल, सुरेश सिंह पिता चंद्रपाल सिंह, ग्राम डूण्डा में मो. मोहसिन पिता अब्दुल जलील, विनोद अंदानी पिता स्व. नरसिंह दासअंदानी, कमलजीत कौर पिता हरजीत सिंग छाबड़ा, ग्राम सेरीखेड़ी में अनिल कुमार थौरानी पिता मंशाराम थौरानी, ग्राम धरमपुरा में मनोहरलाल पिता आसन दास, घनाराम पिता बिसाहू, कार्तिक पिता बिसाहू, अमरू पिता कार्तिक, सरजू पिता भोकलू, ग्राम टेमरी में विजय कुमार पिता शुभकरण, ग्राम बनरसी में तापस चन्द्र दास और ग्राम काठाडीह में विमल कुमार पिता मोतीलाल जैन शामिल है।
सूत्रों के मुताबिक इस 17 लागों की सूची में शामिल लोगों ने नियम कानून को ताक पर रखकर काम किया है और इन्हें बचाने में मंत्री स्तर के लोग भी लगे हुए हैं। बताया जाता है कि सरकार का काम ऐसे लोगों पर कार्रवाई कर आम लोगों को ठगी से बचाना है लेकिन कार्रवाई की बजाय इनसे पैसा लेकर मामले को रफा-दफा किया जा रहा है।
ऐसा नहीं है कि इस मामले में भाजपाईयों को ही बचाया जा रहा है बल्कि कांग्रेस के लोग भी शामिल है जिसके चलते यह कहावत को भी बल मिला है कि लूट की राजनीति में दोनों ही दल माहिर है।
आश्चर्य का विषय तो यह है कि इस मामले में अधिकारियों की जेबें Óयादा गरम हुई है और मंत्रियों या नेताओं को सिर्फ रोटी डाला गया है तब भी कार्रवाई नहीं की गई।

गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

क्या करोगे नहीं लिखेंगे रिपोर्ट...


वर्दी वाला गुण्डा, पुलिस को कोई यूं ही नहीं कहता ! छत्तीसगढ़ में तो कम से कम हर वर्दी वाला अपनी मर्जी का मालिक है । उसे लगेगा कि रिपोर्ट लिखी जाय तो लिखा जायेगा नहीं तो नहीं । कोई क्या कर लेगा । मुंह में तो मानों गाली की घुट्टी पिलाई गई हो । वे यह भी नहीं देखते कि आजू-बाजू से महिलाएं गुजर रही है । और वर्दी का रौब तो सिर्फ शरीफों के लिए है वरना ऐसा कौन सा थाना नहीं है जहां अपराधियों की घुसपैठ न हो ।
अब पंकज अग्रवाल का मामला ही देख लें । उसके आफिस में उसे धमकाया जाता है । वह जब इसकी शिकायत लेकर थाना पहुंचता है तो उसे थाने से चलता कर दिया जाता है । पंकज पैसे वाला है इसलिए वह शहर के मंत्री बृजमोहन अग्रवाल और मुख्यमंत्री रमन सिंह तक पहुंच जाता है । तब कहीं जाकर पुलिस रिपोर्ट भी लिखती है और आरोपियों को पकड़ भी लेती है । छत्तीसगढ़ में  यह सिर्फ अपवाद नहीं है । रोज ऐसे कितने लोग है जिन्हें थाने से लौटा दिया जाता है अब सबके पास न तो राजनैतिक पहुंच है न पैसा ऐसे में उनकी कौन सुनेगा । लोग गुस्से में है लेकिन वे कर भी क्या सकते हैं । पुलिस भी जानती है कि उसके मुंह के आगे सब बेबस है इसलिए वह खुले आम मन मर्जी चला रही है ।
एक तरफ मंत्री से लेकर वरिष्ठ अधिकारी अपनी बातों में नागरिकों के सम्मान, पुलिस-नागरिक संबंध सुधारने और अपराधियों में भय की दुहाई देते रहते हैं लेकिन थानों में इसका उलट होता है । थानों में उलट इसलिए होता है क्योंकि थाने वाले जानते हैं कि उनका काम भाषण देना भर है । उनके खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं है तभी तो पंकज की रिपोर्ट नहीं लिखने वाले अब भी थाने में बैठे हैं उनका कभी नहीं बिगड़ेगा । आखिर सब पंकज जैसे तो है नहीं जिनके लिए मंत्री फोन कर दे और कार्रवाई हो जाए ।
अब पंडरी मोवा में ही संध्या द्विवेदी वाले थाने की करतूत क्या कम है । थाने की शिकायतों का अंबार है । लेकिन न तो पुलिस वालों की हिम्मत है और न ही मंत्री ही उन्हें हटा पा रहे हैं ।
ऐसे में जनता का गुस्सा कभी न कभी-फुट पड़ेगा तब क्या होगा ! इसकी भी परवाह पुलिस वालों को नहीं है उन्हें मालूम है कि उनकी लाठी के आगे किसी की नहीं चलती । तभी तो दिल्ली में हुए बलात्कार को लेकर रायपुर में सड़क पर निकलने वाले युवाओं व महिलाओं को खुले आम धमकाया गया यह सच है कि लॉ एंड आर्डर बनाये रखने की जिम्मेदारी पुलिस पर है लेकिन गाली-गलौच देने की जिम्मेदारी भी क्या पुलिस की है ।
छत्तीसगढ़ में सम्रांट लोगों या पीढि़तों से थाने में दुव्र्यवहार के मामले लगातार बढ़ रहे है । यह सरकार के लिए भी चिंता की बात होनी चाहिए क्योंकि पुलिस का गुस्सा कहीं न कहीं उतरेगा और यह गुस्सा सरकार के खिलाफ भी निकल सकता है ।
चलते-चलते

उरला थाने की कमाई का सबसे बड़ा जरिया कबाड़ के नाम पर बिकने वाले चोरी के लोहे के अलावा अवैध शराब के अड्डे हैं । सर्वे के अनुसार इस थाना क्षेत्र में आधादर्जन सट्टा अड्डा हे तो एक दर्जन से उपर अवैध शराब कोचिये हैं । कार्रवाई नहीं होती तो वजह वरिष्ठ अधिकारी स्वयं समझे तो अ'छा है ।

बुधवार, 26 दिसंबर 2012

गुस्से की वजह

गुस्से की वजह
दिल्ली में हुए बलात्कार के बाद दिल्लीवासियों का गुस्सा जिस तरह से फट पड़ा । वह हैरान कर देने वाला रहा । इतना गुस्सा ।
इसके उलट राजधानी में हफ्ते भर में बलात्कार की तीन घटनाएं हुई । चार साल के मासूम तक को नहीं छोड़ा । तब भी लोग सड़क पर नहीं आये और सड़क पर आये तो दिल्ली के लिए । छत्तीसगढ़ में शिक्षा  कर्मियों का आन्दोलन भी उतना उग्र नहीं हुआ । भाजपा ने एक नहीं दो बार अपने घोषणा पत्र बनाम संकल्प पत्र में शिक्षा कर्मियों के संविलियन की बात कहीं है लेकिन अपने संकल्प को वह सत्ता में आते ही भूल गई । पहले संकल्प के दौरान तो मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह स्वयं प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष थे ।
संकल्प तो किसानों को 270 रूपये बोनस देने का भी था लेकिन उसे भी भूल गई । किसानों ने भी आन्दोलन किया लेकिन न सरकार झूकी और न ही किसानों को इतना गुस्सा आया । गुस्सा तो तब भी नहीं दिखा जब नई राजधानी से लेकर उद्योगों के लिए खेती की जमीन कौडिय़ों के मोल किसानों से ले ली गई और न ही गुस्सा तब भी आ रहा है जब भ्रष्टाचार के किस्से गली चौराहे पर हो रही है ।
कृषि उपज मंडी की जमीन डाक्टरों को कौडिय़ों के मोल दे दी गई । तब भी गुस्सा नहीं आया ।
छत्तीसगढ़ राÓय आन्दोलन के दौरान भी कभी आन्दोलन में हिंसा ने अपना स्थान नहीं लिया और अब भी किसी भी आन्दोलन में हिंसा का कोई स्थान नहीं है । और न ही हम किसी भी आन्दोलन के हिंसा का समर्थन ही करते हैं । लेकिन हम सरकार से एक बात जरूर कहते हैं कि वह छत्तीसगढ़ की स्थिति को ऐसा न होने दे ।
सत्ता के लिए राजनीति जरूर करें लेकिन ऐसे वादे न करे जिसे पूरा करने में दिक्कत हो । कांग्रेस सरकार के लाठी चार्च से नाराज शिक्षा कर्मियों के वोट के लिए संविलियन का संकल्प जब पूरा नहीं करना था तब ऐसा संकल्प लिया ही क्यों गया ? ऐसे में आज जब शिक्षा कर्मी इसी संकल्प को पूरा करने सड़क पर उतर आये हैं तो गलती किसकी है । उनके सड़क पर उतरने से नौनिहालों की पढ़ाई का क्या होगा । इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा ।
उपर से आन्दोलन को कुचलने का सरकारी प्रयास क्या गुस्से को भड़काने वाला नहीं है । क्या भाजपा को इस झूठे वादे के लिए माफी मांगकर शिक्षाकर्मियों को समझाना नहीं चाहिए । हमारी तो सभी राजनैतिक दलों से गुजारिश है कि सिर्फ सत्ता के लिए ऐसा आश्वासन या वादे न करे जिसे पूरा नहीं किया जा सकता । क्योंकि ऐसे वादों से ही आन्दोलन में हिंसा को बल मिलता है और जिसकी सजा ईमानदार या आम लोगों को भुगतना पड़ता है । अब लोगों को सिर्फ झूठे वादों से Óयादा दिन नहीं बहलाया जा सकता । लोगों में जागरूकता आई है और वे अपना अधिकार भी समझने लगे हैं । अब पहले सा जमाना नहीं रहा कि लोग वादे भूल जाते थे या अपने जनप्रतिनिधियों के भ्रष्टाचार को नजर अंदाज कर देते थे ।
अब लोग अपने हक के लिए सड़कों तक आने लगे है और उन्हें समय रहते नहीं समझाया गया तो सरकार के लिए दिक्कत हो सकती है ।

सोमवार, 24 दिसंबर 2012

दबाव पर भारी पड़ते प्रतिस्पर्धा...


इन दिनों राजधानी के बड़े मीडिया समूह में प्रसार संख्या बढ़ाने की होड़ मची हुई है कोई प्रदेश में स्वयं को नम्बर वन बताने लगा है तो कोई राजधानी में अपने को नंबर वन बता रहा है । नबंर वन बनने की इस प्रतिस्पर्धा में उपहार तो बांटे ही जा रहे हैं विज्ञापन दरों पर भी समझौते हो रहे हैं । ऐसे कार्यक्रमों में मीडिया पार्टनर बने जा रहे हैं जिनके आयोजकों पर उंगली उठ रही है ।
यह प्रतिस्पर्धा खबरों पर भी दिखने लगी है । लेकिन कुछ खबरों पर विज्ञापन की मजबूरी भी झलकने लगी है । खबरों से संस्थान के नाम गायब हो जाते है या फिर खबरें छायावाद पर बन जाती है  ।
इस सार्धा से पत्रकार बिरादरी खुश है कम से कम उन्हें रूटीन की खबर पर दबाव नहीं फेलना पड़ रहा है । यह अलग बात है कि राज बनने के बाद ग्रामीण रिर्पोटिंग व खोजी पत्रकारिता को सर्वाधिक नुकसान पहुंचा है ।
कभी- सर्वाधिक ग्रामीण रिपोटिंग प्रकाशित करने वाला देशबंधु प्रसार में पीछे छूट गया है तो इसकी वजह कहीं न कहीं विज्ञापनदाताओं का दबाव ही है ।
सरकार केविज्ञापन का दबाव तो अब भी कम नहीं हुआ है अब तो पत्रकार बिरादरी भी सरकार के कई किस्से सुनाते नहीं थकते । पत्रिका को पास जारी नहीं करना भी सरकारी दबाव का एक हिस्सा है । वैसे भी कौडिय़ों के मोल सरकारी जमीन लेकर कार्मशियल उपयोग की गलती हो तो दबाव तो झेलने ही पड़ेंगे । लेकिन कई अखबार वाले तो केवल सरकारी विज्ञापन के लालच में ही दबाव झेल रहे है ।
मजे में ब्यूरों
छत्तीगढ़ से निकलने वाले पत्र पत्रिकाओं से Óयादा मजे में दूसरे प्रदेश से निकलने वाले पत्र-पत्रिकाओं के पत्रकारों के मजे है । विज्ञापन भी इन्हें खूब मिल रहा है और घूमने-फिरने के लिए जनसंपर्क से वाहन भी उपलब्ध हो जाते हैं ।
अब यह अलग बात है कि पत्रकारों के सत्कार में जितने पैसे खर्च नहीं होते उससे अधिक का बिल बन जाता है ।
रिश्तेदारी पर प्रहार...
भले ही इसे प्रतिस्पर्धा का नाम दिया जाये पर सच तो यह है कि अपने को मालिक का रिश्तेदार बताकर धौंस जमाना एक पुलिस अधिकारी को भारी पडऩे लगा हैं अब इसी अखबार के रिपोर्टर नाराज हैं और ढूंढ-ढूंढ कर खबरें बनाई जा रही है । आखिर थाने में रोज की करतूत कम नहीं है । यानी रिपोर्टर की जय हो ।
और अंत में ...
छत्तीसगढ़ में स्थापित होने छल-प्रपंच करने वाले एक अखबार को अब विज्ञापन वाला अखबार कहा जाने लगा है । आखिर इतना बड़ा काम्प्लेक्स कोई यूं ही खड़ा नहीं करता ।