सोमवार, 19 अप्रैल 2021

जन की बात

 

देवभूमि में लगातार हो रही मौत से सत्ता के प्रति गुस्सा स्वाभाविक है लेकिन उससे भी ज्यादा गुस्सा उन लोगों के प्रति है जो सबकुछ देखते-समझते मौन है। जनमानस को इतना कायर और निहिर हमने कभी नहीं देखा। लगातार अपने ही आसपास हो रही मौत, आपदा में अवसर की तलाश करते नेता व्यापारी फिर भी मौन?

ये सच है कि जब से मोदी सत्ता आई है, सरकार के खिलाफ कुछ भी बोलना देशद्रोह हो गया है, बहुत से लोग यह मानने लगे हैं या उनका अनुभव है कि इस सरकार से कोई अच्छी बात की जाये, या उनके गलत नीतियों के लिए कुछ बोला जाये तो वे तनिक भी लज्जित नहीं होते, उल्टा झगड़े पर उतारु हो जाते हैं। देशद्रोह कह देते हैं, पाकिस्तान चले जाने की बात करते हैं। सत्ता की ताकत और इस विषैले व्यवहार की वजह से कोई खुलकर विरोध नहीं करता। उनके अनुचित व्यवहार को देखते हुए सामान्यत: बहुत से लोग आंखे मूंद लेते हैं, मौन रहने में ही अपनी भलाई समझते हैं। विपक्ष भी ज्यादा कुछ नहीं कहता, उनके ही उघमहीनता की वजह से मोदी सत्ता का अहंकार सर चढ़कर बोल रहा है। वरना कोरोना के दूसरी लहर के बाद भी चुनावी रैली होती या कुंभ का आयोजन किया जाता।

जनता ही नहीं लगता है समूचा विपक्ष ही निरीह हो चला है वरना चुनाव आयोग की इतनी हिम्मत नहीं है कि इस भीषण महामारी में मरते हुए लोगों के बीच ऐसी चुनावी रैली की अनुमति दे जो सीधा सीधा जनसामान्य की हत्या करने जैसी हो। क्या इस देश का विपक्ष नैतिक-सामाजिक भावनाओं से शून्य, हतवीर्य तथा कायर और जड़ वस्तु नहीं बन गया है। पूरा देश कोरोना के कहर से लाशें गिन रहा है और अब तो कई अखाड़ों ने कुंभ के समाप्त करने की घोषणा कर दी है और बंगाल में ममता ने एक ही साथ बचे चुनाव को करा डालने का प्रस्ताव चुनाव आयोग को दे दिया है। 

तब बाकी विपक्ष क्यों यह प्रस्ताव नहीं देता। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से इस तरह के प्रस्ताव की उम्मीद ही बेमानी है क्योंकि वे तो अपनी पूरी शक्ति बंगाल को जीतने में लगाये हुए हैं। भाजपा जानती है कि बंगाल में उनका कैडर नहीं है इसलिए चुनाव आयोग ने भी भाजपा की स्थिति को देखते हुए आधा दर्जन से अधिक चरण में चुनाव कराने का निर्णय लिया है तब भला बगैर सत्ता से पूछे वह बाकी बचे चुनाव कैसे एक साथ कराने का निर्णय ले सकती है।

शायद सत्ता को अभी और लाशें गिननी है। तब सवाल यही है कि क्या जनता की मौतों से बड़ी सत्ता है, क्या लोकतंत्र में किसी को इतना अधिकार है कि वह अपनी मनमानी कर ले। इस विषम परिस्थिति में स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हजारों की रैली कर रहे हो तब आम जनमानस क्या सोचे? या उनकी सोच पर ही इस सत्ता ने पाबंदी लगा दी है।

शर्मनाक बात तो यह भी है कि समूचे विपक्ष में भी कोई ऐसा दमदार नेता नहीं है जो मौत की ओर ढकेलने के इस खेल का विरोध करे। हम किन परिस्थितियों में जी रहे हैं। क्या हमारी सत्ता सभ्यता संस्कृति से दूर हिंसक पशुओं से भी गये गुजरे नहीं हो गई है। यह ठीक है कि लोकतंत्र में सत्ता महत्वपूर्ण है लेकिन लाशों पर खड़ा होकर सत्ता पाने की आकांक्षा रावण और राक्षसी प्रवृत्ति है।

रावण भी शिवभक्त था, उससे बड़ा शिवभक्त कौन था लेकिन किसी की पूजा और भक्ति देख उसकी राक्षसी प्रवृत्ति को नजर अंदाज करना मूर्खता होगी।

ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण...

 

कोविड-19 अब 21 साबित होने लगा है, हर तरफ हाहाकार है, छोटे शहरों की हालत ज्यादा खराब है, अस्पतालों में बेड की कमी, और लापरवाही ने कितने ही घरों की रोशनी छिन ली, और यह आगे कब तक चलेगा कहना मुश्किल है।

कई शहरों में ताला लगने लगा है जिसे लॉकडाउन कहा जा रहा है, शासन-प्रशासन की बेबसी साफ दिखाई देने लगा है, दो गज की दूरी, मास्क जरूरी ही इस संक्रमण से बचने का एक मात्र उपाय है। लेकिन नेताओं को राजनीति करने से फुर्सत नहीं है वे इस आपदा को भी अवसर में बदलकर अपनी राजनीति चमकाने में लगे हैं।

सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को गई की तर्ज पर सत्ता और विपक्ष अपने में मस्त हैं, हालांकि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बेबाकी से स्वीकार किया कि छत्तीसगढ़ में कोरोना बढऩे की कई वजहों में से एक वजह रोड सेफ्टी क्रिकेट टूर्नामेंट भी हो सकता है लेकिन असली वजह विदर्भ से होली त्यौहार के लिए आवाजाही है। आज के इस दौर में यह स्वीकारोक्ति भी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हाउडी ट्रम्प और मध्यप्रदेश में सत्ता बनाने की चाह में निर्णय की देरी की बात को आज तक केन्द्र की सत्ता मानने को तैयार नहीं है।

यह सभी जानते हैं कि राहुल गांधी सहित विपक्ष के कई नेता जनवरी-फरवरी से ही मोदी सत्ता को इसकी भयावकता पर चिंता जता रहे थे लेकिन निर्णय में देरी की वजह से न केवल कोरोना से मौतों के आकड़े बढ़े बल्कि 186 मौते गरीब मजदूरों की सड़कों पर हो गई। मध्यम वर्गों की हालत सबसे ज्यादा खराब हुई। बढ़ते संक्रमण ने देश की आर्थिक स्थिति को बदहाल कर दिया। ऐसे में याद कीजिए सत्ता ने अपनी गलती छुपाने किस तरह से नफरत फैलाकर अपने को पाक बताया था। तब्लिकी जमात और मौलाना साद तो कईयों को आज भी याद होगा लेकिन शायद वे नहीं जानते होंगे कि इस मामले में न्यायालय ने फैसले क्या दिये, सभी पर लगे आरोप निराधार पाये गए। विदेशी नागरिक अपने देश में लौट गए और मौलाना साद के रुप में जो नफरत फैलाई गई वह उन लोगों के दिलों में घर बना लिया जो अच्छे खासे पढ़े लिखे, डिग्रीधारी हैं।

ज्ञान पर नफरत का यह ध्वजारोहण नया नहीं है, हां तरीका नया है क्योंकि एक ही तरीका अपनाया गया तो लोग बेवकूफ नहीं बनेंगे। इसलिए हर बार पूरे सच में से आधे में अपना झूठ और नफरत की चाशनी लपेटी जाती है और इसे परोसा जाता है कि यही पूरी सच लगे।

ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण नया नहीं है, धर्म और राष्ट्रवाद के चश्में ने अच्छे-अच्छे पढ़े-लिखे नौजवानों को अपनी चपेट में लिया है। ताजा उदाहरण  बंगाल का है, जिसमें ममता बैनर्जी सिर्फ इसलिए बानों बना दी गई क्योंकि वे अल्पसंख्यकों की पीड़ा के साथ खड़ी नजर आती है। सच तो यह है कि उन्होंने जिस सादगी के साथ मुख्यमंत्री को जिया है वैसा देखने को ही नहीं मिलेगा। विधायक-सांसद से लेकर मुख्यमंत्री तक के सफर में वह आज भी अपनी लिखी किताब की रायल्टी और पेटिंग बेचकर ही पैसा रखती है। न विधायक-सांसद का पेंशन न वेतन।

बकौल ज्योति बसु, 'ममता ही असली कामरेड है लेकिन गलत पार्टी में है। को नजरअंदाज कर भी दें तो जब आज अपने को सजने संवारने में गरीब से गरीब घर की लड़कियां भी हजारों रुपए खर्च करती है खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने को गरीब घर का बताते हुए लाखों रुपए चश्में, घड़ी व पहनावे फैशन पर करते हो तब ममता की सादगी से मुकाबला उसे बानों बनाकर ही किया जा सकता है। तब इस नफरती ध्वाजारोहण में शामिल कितने पढ़े लिखे हैं जो ममता को बानों कहने का विरोध करते हैं? क्या यह उन पढे-लिखे लोगों के क्षणिक स्वार्थ से यह ध्वजारोहण उचित है। मंडल कमीशन के बाद से जिस तरह से पढ़े-लिखे लोगों पर धर्म का कंबल डाला गया है, उसका दुष्परिणाम यह है कि अब मध्यम वर्ग बेबस है असहाय है और कुछ लोग शर्मसार तो हैं लेकिन खामोश कहना ठीक नहीं, भीतर ही भीतर घुन रहे हैं ।

ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण का इतिहास जानना जरूरी है कि इसका इतिहास क्या है और कब से शुरु हुआ। इससे पहले ये जान ले कि इसकी शुरुआत कैसे हुई?

ऐतिहासिक तथ्य इसे हिटलर से शुरुआत होना बताते हैं। क्या इससे पहले भी शुरु हुआ? इतिहासकारों का अपना दावा है लेकिन एक बात तो तय है कि इसकी शुरुआत सत्ता और श्रेष्ठता पर आधारित है। सत्तासीन होने और स्वयं को श्रेष्ठ समझने-समझाने के साथ ही ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण हुआ है। क्योंकि बगैर पढ़े-लिखों को तो आसानी से बेवकूफ बनाया जा सकता है लेकिन पढ़े-लिखों में नफरत का ध्वजारोहण आसान नहीं होता क्योंकि वे पंचतंत्र के शेर आया शेर आया वाला चरवाहे की कहानी भी पढ़े लिखे होते है तो आदमखोर शेर के दलदल में सोने का कंगन दिखाकर शिकार करने की कहानी भी जानते हैं तब सवाल था ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण कैसे किया जाए।

हमने पहले ही कहा है कि आदमी तोता नहीं है जो रटा रटाया वाक्य 'शिकारी आयेगा, जाल फैलायेगा, दाना डालेगा, दाना नहीं चुगना, जाल में फंस जाओगे को बोलकर जाल में फंस जायेगा! इसलिए दिल और दिमाग को अलग करना जरूरी था। और यह काम भारत में अंग्रेजों ने किया। अंग्रेजों ने भारतीय को टाई पहनाना शुरु किया। टाई दिल यानी हृदय और दिमाग यानी मस्तिष्क के बीच गले में पहना जाता है। यानी ज्ञान पर नफरत की ध्वजारोहण की शुरुआत भारत में अंग्रेजों ने शुरु की। वह आजादी की लड़ाई का दौर था, अंग्रेजों ने भले ही 1857 की क्रांति को विफल कर दिया था, लेकिन हिन्दू-मुस्लिम एकता को तोड़कर ही लंबे समय तक राज किया जा सकता था।

इतिहास चिख-चिख के कह रहा था कि शिवाजी से महाराणा प्रताप के लिए मुस्लिम और मुगलों की तरफ से हिन्दू युद्ध करते थे। कहीं धर्म को लेकर नफरत नहीं था। युद्ध केवल और केवल राजाओं की सत्ता प्राप्ति और सत्ता के विस्तार की वजह से होते थे। आम तौर पर हिन्दू-मुस्लिम सभी एक साथ रह रहे थे। जाति भेद तो था लेकिन वह जीवन जीने के तरीके को लेकर था। नफरत की दीवारें कैसे खड़ी की जाए ताकि जाति और धर्म की दीवार में जहर बोया जा सके यह काम अंग्रेजी सल्तनत का था। और इसी अंग्रेजी सल्तनत ने ही अपने स्वार्थ के लिए नफरत का जहर बोना शुरु किया। मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय सेवक संघ का उदय हुआ। और भी संगठन बनने लगे।

1857 की क्रांति से डरे अंग्रेजों ने हिन्दू और मुस्लिम एकता को कुठाराघात करने जहां बंग भंग जैसे कानून लाये तो दलितों को अलग करने पूना पेक्ट लाया गया। इस अंग्रेजी नीति में वे लोग फंसते चले गए, जिसमें स्वार्थ भरा था, या जिनमें संघर्ष का माद्दा नहीं था। उधर हिटलर की जर्मन नस्ल की श्रेष्ठता ने पूरी दुनिया को विश्व युद्ध में झोक दिया तो उसी तरह की श्रेष्ठता की लड़ाई यहां भी होने लगी। इतिहास कुरेदे गये जिनका वर्तमान से कोई संबंध नहीं रहा। राजाओं की लड़ाई में हिन्दू-मुस्लिम का मसाला लगाया गया जबकि वह केवल सत्ता की लड़ाई थी। राजाओं के फैसलों में हिन्दू मुस्लिम ढूंढा गया। यहां तक कि अफवाह, झूठ का सहारा लिया जाने लगा।  झूठ को अतिशयोक्ति तक ले जाकर नफरत के बीज बोए जाने लगे। 

लेकिन महात्मा गांधी दीवार बनकर खड़े हुए। नफरत के हर तीर पर ढाल बने रहे लेकिन अंग्रेजों की नीति को कामयाब होने से नहीं रोक पाये। देश का विभाजन नहीं रोक पाये। और विभाजन के बाद जब सत्ता नहीं मिली तो गांधी को ही मार डाला गया। 


रविवार, 18 अप्रैल 2021

जन की बात-२

 

न समय रुक रहा था, न करोनो का कहर ही रुक था। हां सत्ता का चरित्र पल-पल बदल रहा था । अपनी जिम्मेदारी और दायित्व से मुंह मोड़ते सत्ता की जब आलोचना बढऩे लगी तो वह तमाम विरोधी दलों से सुझाव का आबंडर करने लगी, दरबारी मीडिया को सरकार की प्रशंसा में लगा दिया और इस महामारी के बढ़ते प्रकोप के लिए जन मानस को ही जिम्मेदार ठहराया जाने लगा।

जबकि हकीकत यही है कि सत्ता ने इस महामारी के कम होते प्रभाव को लेकर घोर लापरवाही बरती। जिसकी वजह से जब कोरोना का दूसरा लहरा आया तो अस्पताल, दवाई, चिकित्सकों की अनदेखी का पोल खुल गया। विश्व के दूसरे संस्थानों से मिले 50 हजार करोड़ के अलावा पीएम केयर फंड के पैसों का समुचित उपयोग नहीं किया गया जिसकी वजह से चिकित्सा सुविधा बदहाल की बदहाल रही।

जिस तरह से निजी अस्पतालों ने अपदा को अवसर में तब्दिल किया उस पर भी सत्ता की अनदेखी रही। दवाई, आक्सीजन के बगैर दम तोड़ती जिन्दगी के बीच भी कुंभ के आयोजन की अनुमति और चुनौती रैलियों में हजारों की भीड़ जुटाई गई। मोदी सत्ता को सिर्फ और सिर्फ यश चाहिए। जनता की आंखों में, मन में सत्ता प्रमुख का चरित्र खंडित नहीं होना चाहिए। नफरत-झूठ-अफवाह के चलाये शब्द बाण को धर्म और राष्ट्रवाद की चाशनी में परोसने की जिम्मेदारी दरबारी मीडिया की थी। धर्म और राष्ट्रप्रेम का ऐसा आबंडर किसने देखा था। नफरत का वेग इस कदर हावी था कि प्रधानमंत्री जैसा शख्स हर गांव में कब्रिस्तान के मुकाबले श्मशान खड़ा करना चाहता था। (फतेहपुर की जनसभा)

शायद राजा की ईच्छा ईश्वर ने पूरी कर दी थी? हर जगह से जलती चिता के ताप लोग उद्देलित थे, दुखी थे, लेकिन अब भी दरबारी मीडिया सत्ता के महिमा मंडन में लगी थी। कल तक मरकज को कोरोना फैलाने की वजह बताने वाली मीडिया कुंभ और चुनावी रैली पर मौन साध रखा था। मीडिया ने मौन तो एनआरसी और किसान आंदोलन पर भी साध रखा था। लोकतंत्र में सत्ता और मीडिया का सुख किसी अभिशाप की तरह है, जो व्यक्ति को दूसरों की व्यथा की ओर से अंधा कर देता है। मीडिया और सत्ता जितने साधारण होगे लोगों की व्यथा उतनी ही स्पष्ट दिखाई देती है, लेकिन जब सत्ता अपनी रईसी बचाने में व्यस्त हो जाये और मीडिया को रुतबा और पैसों की भूख हो तो जनमानस यूं ही लाशों में तब्दिल होता रहेगा।

हैरानी तो तब होती है जब कोई कहता है मैंने गरीबी देखी है, अभाव में जिया है और सत्ता आते ही सबसे पहले अपने सुख सुविधा के इंतजाम में उन वर्गों की अनदेखी करता है जो उपेक्षित हैं या जिन्हें सरकार के संरक्षण की ज्यादा जरूरत है। हैरानी तब और अधिक होती है जब  वह पूंजीपतियों की गोद में बैठकर, पूंजीपतियों के अनुरुप कानून बनाता है। कितने उदाहरण है जो सत्ता के प्रति घृणा उत्पन्न करती है, नोटबंदी की लाईन में मरते लोग, जीएसटी की चक्रव्यूह में आत्महत्या करते व्यापारी, मॉब लिचिंग और बलात्कार के आरोपियों की जयकारा और दूसरी पार्टियों के भ्रष्टाचारियों को संरक्षण, किसान आंदोलन से मरते किसान के बाद भी किसी सत्ता में करुणा न जगे तो इसका क्या मतलब है। अनेक अवसर में सत्ता ने अपनी मनमानी और प्रभाव का इस्तेमाल कर अपने अहंकार को बढ़ाया है। राफेल का मामला हो या तरुण गोगाई सहित कई नियुक्तियां? लेकिन सत्ता ने धर्म और राष्ट्रवाद का जो भ्रम फैलाया है, उससे जनमानस भ्रमित है और अपना हित नहीं देख पा रही है। (जारी...)

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2021

संवेदना, दायित्व, अधिकार...

 

इस देश ने कई बवंडर देखें है, यह कोरोना का बवंडर भी थम जायेगा? लेकिन सत्ता की जनमानस के प्रति उपेक्षा याद रहेगी! याद तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ताली-थाली, दीप प्रज्जवलन और टीका उत्सव भी याद रहेगा। आपदा को अवसर में बदलने की सीख तो कई व्यापारी अभी से ही याद कर रहे हैं। ऐसे समय में संवेदना शून्य सरकार और उसके दायित्व को लेकर सवाल खड़ा करना कितना उचित है?

हैरानी तो इस बा की है कि जो लोग कल तक सत्ता की रईसी के लिए लगातार बेचे जा रहे सार्वजनिक उपक्रम और सरकारी संस्थानों के निजीकरण को लेकर सत्ता के साथ खड़े थे वे भी निजी अस्पतालों की कमाई को लूट रहे हैं। हालांकि यह मौका निजीकरण के विरोध का नहीं है लेकिन जो लोग निजीकरण के समर्थक हैं उनके लिए निजी अस्पताल और निजी स्कूल की इस दौर में भी कमाई चेतावनी है।

दरअसल आज भी लोगों को अपने अधिकार का पता ही नहीं है, लोकतंत्र में सरकारें क्यों बनाई जाती है यह वे जानते ही नहीं है, क्योंकि पिछले कई दशकों से उनके दिमाग में यही भरा गया कि सरकार मंदिर नहीं बनवा रही है, अल्पसंख्यकों को ज्यादा तवज्जों दे रही है, आरक्षण के नाम पर सवर्ण समाज का हक और प्रतिभा का गला घोंटा जा रहा है।

जबकि लोकतंत्र में सरकार इसलिए बनाई जाती है ताकि वह आम लोगों के मूलभूत सुविधाओं का ध्यान रखें, स्वास्थ्य, शिक्षा की सुविधा अधिकाधिक लोगों को मिले। आपदा के समय किसी को कोई तकलीफ न हो, चोरी, लूट और अन्य अपराध से लोग सुरक्षित जीवन जी सके। टैक्स का बोझ न हो अऔर हर आदमी सुख पूर्वक जीवन जीये, सबको काम मिले।

लेकिन ऐसा क्यों नहीं हुआ? क्योंकि न सरकारों ने जनता को उनका अधिकार समझाया और न ही सत्ता ने अपने दायित्व को ही पूरा किया। जो समझदार थे, नामी-गिरामी थे, पैसे वाले थे उनके गले में पट्टा डाल दिया गया ताकि वे किसी एक दल के होकर रह जाए और अपने दल की राक्षसी प्रवृत्ति पर भी खामोश रहे। लोकतंत्र में सत्ता महत्वपूर्ण नहीं होता और न ही धर्म जाति महत्वपूर्ण होता है लेकिन सत्ता में बैठने का  लोभ ने इसे हवा दी। और इस हवा के साथ लोग बहते चले गए? उन्हें लगा कि उनका दायित्व सिर्फ अपनी धर्म और जाति की श्रेष्ठता ही है।

ही वजह है कि गांधी और अम्बेडकर की तारीफ करने पर कुछ लोगों के पेट में दर्द होने लगा? उन्हें बताया गया कि हमारा ध्वज का रंग कुछ और है, संविधान गलत है। धर्म नहीं रहेगा तो देश का क्या मतलब!

लेकिन इतिहास गवाह है जिस देश ने भी धर्म अधिक महत्व दिया वह देश न तो ठीक से तरक्की कर पाया और न ही वहां लोकतंत्र ही बच सका। बात कोरोना के बवंडर से शुरु हुई थी इसलिए इस पर ही बात होनी चाहिए। लेकिन इस देवभूमि में जिस तरह लाशें गिर रही है उसे लेकर अब गुस्सा ही है, लगता है सरकार अब भी अपनी जिम्मेदारी से भाग रही है। वह अब भी आपदा में अवसर तलाश रही है क्योंकि चुनाव में हजारों की भीड़ और कुंभ में लाखों की भीड़ में वह अपना निजी फायदा देख रही है। तब सवाल यही है कि कौन अपने अधिकार बोध को जागृत करे। और संवेदना शून्य सरकार पर प्रहार करे।

गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

कोरोना की दूसरी लहर और मोदी सत्ता...

 

कोरोना की दूसरी लहर इतनी भयावह होगी, यह किसने सोचा था? क्या पहली लहर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए चेतावनी थी कि वह पूरा ध्यान स्वास्थ्य सुविधा पर दे? सवाल कई है क्योंकि अस्पताल और दवाई से जूझ रहे लोगों को यह जानना चाहिए कि पिछले साल कोरोना की पहली लहर से निबटने डब्ल्यू.एस.ओ, आईएमएफ और एशियन डेवलपमेंट बैंक ने भारत को करीब 53 हजार 620 करोड़ रुपए दिये थे ताकि मोदी सत्ता स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करे। इसके अलावा पीएम केयर फंड में भी करोड़ों अरबों रुपए जमा हुए थे! लेकिन मोदी सत्ता ने क्या किया?

सवाल बहुत से है लेकिन सारे सवाल का हिन्दू-मुस्लिम ही जवाब हो तो फिर गुस्सा और करुणा में लाशें गिनने के अलावा जनता कर भी क्या सकती है। देश का कोई राज्य नहीं है जहां स्वास्थ्य सुविधा मजबूत हो, हर जगह सरकारी लापरवाही साफ दिख रहा है, उपर से कुंभ और चुनाव ने मोदी सत्ता की लापरवाही के सारे रिकार्ड तोड़ दिये हैं?

कोरोना को लेकर जब पिछले साल सारी दुनिया उपाय ढूंढ रही थी तब हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नमस्ते ट्रम्प के चक्कर में थे लेकिन इसका दुष्परिणाम क्या हुआ। न यार मिला न बिसार सनम के तर्ज पर कोरोना तो बढ़ा ही अमेरिका से दुश्मनी अलग मोल ले ली। लापरवाही यही नहीं रुकी जब तक मध्यप्रदेश में सत्ता नहीं बन गई तब तक हाथ बांधे इंतजार किया गया। राहुल गांधी ने जब कोरोना को सुनामी और अर्थव्यवस्था को लेकर चेतावनी दी तो मोदी सत्ता सहित पूरी भाजपा मजाक बनाने लगे। यानी जिस सत्ता को विपक्ष का अच्छा सुझाव भी गंवारा नहीं उस सत्ता के अहंकार का असर जनता ही भुगतेगी। लेकिन सत्ता इन सब बातों से इसलिए बेपवाह है क्योंकि उनके पास लोगों का दिल जीतने धर्म और राष्ट्रवाद का ब्रम्हा है।

खैर सवाल तो यही है कि सालभर के समय मिलने के बाद भी मोदी सत्ता ने अस्पताल दवाई और डॉक्टर के बारे में क्या किया। कुछ नहीं किया और हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा कहा जाए तो गलत नहीं है। दुनिया की शायद यह पहली सत्ता है जिसका विरोध करना देशद्रोह है, पैसों का हिसाब मांगना देशद्रोही और हिन्दू विरोधी है। कब्रिस्तान की तरह श्मशान में बढ़ोत्तरी की मंशा सबके सामने है। उपर से सत्ता का जिम्मेदारी से भागना तो बेशर्मी की हद पार करना है। हर बात पर हिन्दू-मुस्लिम और राष्ट्रवाद के ढोंग ने देश के सामने भयावह संकट खड़ा कर दिया है। चिकित्सा सुविधा को मजाक बना देने और निजी अस्पतालों को प्रश्रय देने का नतीजा सबके सामने है। तब सवाल है आम आदमी क्या करे, एक तरफ सरकारी अस्पतालों में सुविधा का अभाव और दूसरी तरफ निजी अस्पतालों की महंगी होती चिकित्सा सुविधा में आम जन मरे नहीं तो क्या होगा। हम निजी अस्पताल की चिकित्सा व्यवस्था को लूट इसलिए नहीं कहेंगे क्योंकि ये सिस्टम क अंग है। जब सरकार ही सुविधा देने के नाम पर कमीशनखोरी और लूट मचा रखी है तब किसी एक संस्थान पर लूट का आरोप बेमानी है।

जब सत्ता ही आपदा को अवसर में बदलने का राग अलाप रहा हो तो कालाबाजारी कैसे गलत हो सकता है आखिर वे गलत क्या कर रहे है। जैसी राजा वैसी प्रजा तो 2014 के बाद से चल रही है।

बुधवार, 14 अप्रैल 2021

ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण-2

 

ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण का इतिहास बहुत पुराना नहीं है, लेकिन यह जानना जरूरी है कि इसका इतिहास क्या है और कब से शुरु हुआ। इससे पहले ये जान ले कि इसकी शुरुआत कैसे हुई?

ऐतिहासिक तथ्य इसे हिटलर से शुरुआत होना बताते हैं। क्या इससे पहले भी शुरु हुआ? इतिहासकारों का अपना दावा है लेकिन एक बात तो तय है कि इसकी शुरुआत सत्ता और श्रेष्ठता पर आधारित है। सत्तासीन होने और स्वयं को श्रेष्ठ समझने-समझाने के साथ ही ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण हुआ है। क्योंकि बगैर पढ़े-लिखों को तो आसानी से बेवकूफ बनाया जा सकता है लेकिन पढ़े-लिखाों में नफरत का ध्वजारोहण आसान नहीं होता क्योंकि वे पंचतंत्र के शेर आया शेर आया वाला चरवाहे की कहानी भी पढ़े लिखे होते है तो आदमखोर शेर के दलदल में सोने का कंगन दिखाकर शिकार करने की कहानी भी जानते हैं तब सवाल था ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण कैसे किया जाए।

हमने पहले ही कहा है कि आदमी तोता नहीं है जो रटा रटाया वाक्य 'शिकारी आयेगा, जाल फैलायेगा, दाना डालेगा, दाना नहीं चुगना, जाल में फंस जाओगÓे को बोलकर जाल में फंस जायेगा! इसलिए दिल और दिमाग को अलग करना जरूरी था। और यह काम भारत में अंग्रेजों ने किया। अंग्रेजों ने भारतीय को टाई पहनाना शुरु किया। टाई दिल यानी हृदय और दिमाग यानी मस्तिष्क के बीच गले में पहना जाता है। यानी ज्ञान पर नफरत की ध्वजारोहण की शुरुआत भारत में अंग्रेजों ने शुरु की। वह आजादी की लड़ाई का दौर था, अंग्रेजों ने भले ही 1857 की क्रांति को विफल कर दिया था, लेकिन हिन्दू-मुस्लिम एकता को तोड़कर ही लंबे समय तक राज किया जा सकता था।

इतिहास चिख-चिख के कह रहा था कि शिवाजी से महाराणा प्रताप के लिए मुस्लिम और मुगलों की तरफ से हिन्दू युद्ध करते थे। कहीं धर्म को लेकर नफरत नहीं था। युद्ध केवल और केवल राजाओं की सत्ता प्राप्ति और सत्ता के विस्तार की वजह से होते थे। आम तौर पर हिन्दू-मुस्लिम सभी एक साथ रह रहे थे। जाति भेद तो था लेकिन वह जीवन जीने के तरीके को लेकर था। नफरत की दीवारें कैसे खड़ी की जाए ताकि जाति और धर्म की दीवार में जहर बोया जा सके यह काम अंग्रेजी सल्तनत का था। और इसी अंग्रेजी सल्तनत ने ही अपने स्वार्थ के लिए नफरत का जहर बोना शुरु किया। मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय सेवक संघ का उदय हुआ। और भी संगठन बनने लगे।

1857 की क्रांति से डरे अंग्रेजों ने हिन्दू और मुस्लिम एकता को कुठाराघात करने जहां बंग भंग जैसे कानून लाये तो दलितों को अलग करने पूना पेक्ट लाया गया। इस अंग्रेजी नीति में वे लोग फंसते चले गए, जिसमें स्वार्थ भरा था, या जिनमें संघर्ष का माद्दा नहीं था। उधर हिटलर की जर्मन नस्ल की श्रेष्ठता ने पूरी दुनिया को विश्व युद्ध में झोक दिया तो उसी तरह की श्रेष्ठता की लड़ाई यहां भी होने लगी। इतिहास कुरेदे गये जिनका वर्तमान से कोई संबंध नहीं रहा। राजाओं की लड़ाई में हिन्दू-मुस्लिम का मसाला लगाया गया जबकि वह केवल सत्ता की लड़ाई थी। राजाओं के फैसलों में हिन्दू मुस्लिम ढूंढा गया। यहां तक कि अफवाह, झूठ का सहारा लिया जाने लगा।  झूठ को अतिशयोक्ति तक ले जाकर नफरत के बीज बोए जाने लगे। 

लेकिन महात्मा गांधी दीवार बनकर खड़े हुए। नफरत के हर तीर पर ढाल बने रहे लेकिन अंग्रेजों की नीति को कामयाब होने से नहीं रोक पाये। देश का विभाजन नहीं रोक पाये। और विभाजन के बाद जब सत्ता नहीं मिली तो गांधी को ही मार डाला गया। (जारी...)

मंगलवार, 13 अप्रैल 2021

आपदा में अवसर...

 

जब देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आपदा में अवसर की बात कही थी तब भी वे लोग ताली बजा रहे थे, जो हिन्दू कुंठा से ग्रस्त थे, उन्हें तो मोदी की हर बात अच्गछी लगती है चाहे वह कितना भी अधार्मिक हो या अनैतिक हो। ये वे लोग है जो ईवीएम के विरोध को भाजपा का विरोध मानते हैं और भाजपा के विरोध को देश का।

खैर बात यहां महामारी में आपदा में अवसर की बात पर ही चर्चा होनी चाहिए क्योंकि ये बात प्रधानमंत्री ने कहा थी और उसका परिणाम कालाबाजारी से लेकर निजी अस्पतालो में दिखाई देने लगा है। बहुत पहले शायद स्कूल के दिनों में कहीं सुना था कि आपदा में अवसर नहीं सेवा ही धर्म होना चाहिए और कोई भी लोकतांत्रिक और सेवाभावी जनसेवक महामारी में आपदा में अवसर की बात नहीं कर सकता लेकिन तब मेरे इस बात को लेकर भक्तों ने मुझसे लड़ाई भी कर ली थी और कुछ तो आज भी बात नहीं करते।

तब यह भी कहा गया कि महामारी जैसे आपदा में अवसर की प्रतिज्ञा गिद्ध, सियार और लकड़बग्घे करते हैं, उनके लिए महामारी से प्रभावित लाशें शानदार दावतें होती है और ये उनके लिए किसी उत्सव से कम नहीं होता। जिस देश में एक व्यक्ति के सुख और दुख में पूरा गांव का गांव, या मोहल्ला का मोहल्ला शामिल होता है वहां महामारी के आपदा में उत्सव की बात कोई सोच भी कैसे सकता है लेकिन अंधेर नगरी, अंधेर राजा की कहानी भी याद न हो तो फिर पढऩे-लिखने का मतलब ही क्या है?

आपदा में अवसर की तलाश ज्यादातर वे लोग करते हैं जिनके खून में व्यापार है। और यह बात जब कोई स्वयं स्वीकार कर ले तो याद कीजिए 1965 और 1971 का वह युद्ध जब कुछ व्यापारी कालाबाजारी कर आपदा में अवसर का लाभ ले रहे थे। लेकिन तब सत्ता ने सेवा को धर्म बताकर कितने ही व्यापारियों के हृदय परिवर्तन किये थे लेकिन जब देश का प्रधानमंत्री ही आपदा में अवसर जैसे शब्दों का प्रयोग करेगा तो उसका परिणाम क्या होगा?

लॉकडाउन की घोषणा के साथ ही कालाबाजारी और अब निजी अस्पतालों की लूट से आम जनमानस में भय व्याप्त है। भयमुक्त शासन का कहीं पता नहीं है। लेकिन हमारा आज भी मानना है कि आपदा में अवसर की तलाश करने की बजाय आपदा में सेवा धर्म किया जाए!