गुरुवार, 17 जुलाई 2025

संघ की लाचारी, मोदी सब पर भारी

 संघ की लाचारी, मोदी सब पर भारी 



देश में 2014 के बाद से जो मज़ाक़ बाज़ी का खेल शुरू हुआ है वह थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। दरअसल बचपने का वह दिन मुझे अब भी याद है जब स्कूल से लौटते समय मैं भी उस मजमा का हिस्सा बन गया था जिसमें एक व्यक्ति चीख चीख कर आकाश की ओर देखते हुए कह रहा था कि जिसके जेब में जो भी पैसा है वह उसके सामने बिछे चादर में डाल दे नहीं तो एक लोहे का गोला उस व्यक्ति के ऊपर गिरेगा जो जेब से पैसा नहीं निकलेगा, कुछ लोग डरकर पैसा डालने लगा तो कुछ खिसकने लगे। बस इसी तरह का तमाशा चल रहा है। नये तमाशे में संघ ने फुफकारा 75 साल… लेकिन यदि ज़हर नहीं होने की बात जो जानता है वह भला ऐसे फुफकार से क्यों डरने लगा…

75 की उम्र में संघ सेवा छोड़ना होता है,

पर सत्ता सेवा में कोई रिटायरमेंट नहीं!


अब क्या कोई शक बाकी है?

मोहन भागवत जी ने पहले 75 की उम्र के बाद पद छोड़ने की बात कही — और फिर पलट गए!

क्यों?

क्योंकि वो खुद संघ प्रमुख हैं, पर असली प्रमुख तो कोई और है!

"बिस्वगुरु" की छाया इतनी गहरी है कि संघ भी अब संघ नहीं रह गया,

वो भी आदेशपालक हो गया है — संघ से संघठन तक की यात्रा पूरी हो गई है!

जब भागवत जी जैसे लोग बोलने के बाद बोल पलटें,

तो समझ लीजिए —

"जुगल जोड़ी" ने किसी को नहीं छोड़ा दबाव में लाने से!


तथाकथित नीति, विचारधारा, सिद्धांत सब राजनीतिक जुमले बन चुके हैं —

जहाँ सत्ता के लिए उम्र भी लचीली हो जाती है और संगठन भी झुक जाता है!


अब मत पूछिए "संघ स्वतंत्र है या नहीं"

बस आईना देखिए — और चुपचाप समझ जाइए।

यूं तो आम जीवन में  पचहत्तर वां साल प्लेटिनम जयंती के रुप में जश्न के रूप में मनाया जाता है किंतु यह साल जीवन में सत्ता सुख से वंचित करने वाला सवाल बनके आएगा ऐसा  मोहन भागवत और मोदीजी ने कभी सोचा ना होगा।अपने आपको तुगलक समझने वाले ये लोग अपने बनाए नियमों में इस कदर फंस गए हैं कि कुछ सार्वजनिक तौर पर कहते नहीं बन रहा ।ये मुश्किल वक्त है जब दोनों सितमग़रों के  जन्मदिन सितम्बर की 11(मोहन भागवत) और 17तारीख़ को (नरेंद्र मोदी ) है। यानि मोदी को चादर उढ़ाने की बात प्रतीकत्मक रुप से कहने वाले मोहन भागवत पहले यानि 11सितंबर को 75 के हो जाएंगे। यदि वे चादर पहन बैठ जाते हैं तो 17 को मोदीजी भी शायद अनुसरण कर सकते हैं।पर जैसे कि संकेत मिल रहे हैं कि यह नियम संघ के लिए नहीं बना है यदि भागवत स्थापित रहते हैं तो मोदी को चादर चढ़ाना आसान नहीं होगा।वैसे उनका मूड बता रहा है कि वे पूरे पांच साल पद पर बने रहना चाहते हैं।संघ फुफकार सकता है लेकिन उन्हें काट नहीं सकता है।

तब सवाल यह है कि यह पूरा तमाशा क्या मोदी विरोधियों में संघ के प्रति  विश्वास कम नहीं करेगा। हालाँकि वे लोग यह बात अच्छे से जानते है कि  संघ का एक मतलब झूठ और अफ़वाह उड़ाने वाली संस्था से ज़्यादा कुछ नहीं है…



बुधवार, 16 जुलाई 2025

संसद का जवाब चुनाव आयोग का मज़ाक़ और कराहता तंत्र…

 संसद का जवाब चुनाव आयोग का मज़ाक़ और कराहता तंत्र…


चुनाव आयोग किसके इशारे पर झूठ बोल रहा, बर्मा, नेपाल और बांग्लादेशी वोटरों का सच तो संसद में दिये मोदी सत्ता के जवाब में निहित है फिर चुनाव आयोग यह नारैटिव क्यों बना रहा है, संसद में मोदी सत्ता का जवाब जान लीजिए..,

अपनी रणनीति सरेआम हो जाने और लगातार आलोचना का पात्र बने देश  का विश्वास खोते चुनाव आयोग का पत्रकार अजीत अंजुम के ख़िलाफ़ fir कराने का यह कदम इस बात को प्रमाणित करता है की सत्ता के साथ उसका गठबंधन चुनाव चोरी करने की कोशिश में लगातार लगा रहता है? 

कल सारे देश के मेन मीडिया ने और आज भी कई प्रादेशिक समाचार पत्रों में यह समाचार प्रमुखता से छपा है, चुनाव आयोग के सूत्रों की माने तो बड़ी मात्रा में बर्मी नेपाली और बांग्लादेशी नागरिक बिहार में पाए गए हैं! लेकिन हम तथ्यों का अनुसंधान करें और चुनाव आयोग के पिछली घोषणाओं का विश्लेषण करते हैं करें तो अपने आप हमें समझ में आ जाएगा किस तरह देश के संवेदनों के साथ झूठ बोला जा रहा है 

इसकी असली पोल खोली है इकोनामिक टाइम्स में अनुभूति बिश्नोई के इस खुलासे ने ,उन्होंने अपने खुलासे में बताया की जुलाई 2019 में संसद में एक सवाल पूछा गया था जिसमें भारत में रह रहे विदेशी मूल के लोगों की जिनकी नागरिकता पर संदेह है की, पिछले तीन वर्षों के साथ इस वर्ष की भी सूचना मांगी गई थी! संसद में ही


*उसके जवाब में 19 जुलाई 2019 को भारत के कानून मंत्रालय ने जो कहा वह आपको चौंका देगा*


*कानून मंत्रालय ने  अपने जवाब मेंकहा 2016 ,2017 और 2019 मैं किसी भी मतदाता का नाम नहीं है 2018 में जरूर तीन मतदाता ऐसे पाए गए हैं उसमें भी आश्चर्यजनक बात यह है एक गुजरात में एक तेलंगाना में और एक बंगाल में पाया गया है*!


2019 से 2025 तक बिहार में नीतीश और भारतीय जनता पार्टी का राज है केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है सीमाओं पर चौकसी की जवाबदारी देश के गृह मंत्रालय की है अगर बिहार में जैसी चुनाव आयोग बता रहा है की हजारों वोट विदेशी लोगों के हैं तो फिर इसका जिम्मेवार कौन है? 


इस पर भी विचार करना चाहिए!

*सीमांचल के जिन मुस्लिम बहुल जिलों को लेकर इस विवाद को प्रसारित किया जा रहा है*  उसी सीमांचल में अभी जनवरी 2025 में *चुनाव आयोग ने स्पेशल समरी रिवीजन किया था* और उसमें हजारों की संख्या में नाम काटे गए थे, और खुद चुनाव आयोग ने यह वक्तव्य दिया था जो नाम काटे गए हैं वह तीन आधार पर काटे गए हैं उन लोगों की मौत हो गई है या वह लोग शिफ्ट हो गए हैं या वह दो जगह दर्ज हैं! 


*अब फिर सवाल उठता है चुनाव आयोग स्पेशल समरी रिवीजन में सही था या इंटेंसिव समरी रिवीजन में उसकी बातों में यह दोहराव क्यों है


*बर्मी नागरिक यानी रोहिंग्या की स्थिति* इसकी सच्चाई जानकरभी आपके पैरों तले जमीन खिसक जाएगी!


रोहिंग्याओं को मुद्दा बनाकर सीमांत प्रदेशों में जो हिंदू मुस्लिम नॉरेटिव बनाया जाता है उसकी असलियत क्या है! 


रोहिंग्या वर्मा के रखाइन राज्य के  एक आदिवासी जाति के लोग हैं जो मुसलमान धर्म को मानते हैं और वर्मा में 1982 के नागरिकता कानून के अनुसार उनके नागरिकता रद्द कर दी गई थी इसलिए बड़ी मात्रा में उन्होंने पलायन किया था और सीमांत देश में मसलन बांग्लादेश भारत और पाकिस्तान में उन्होंने शरण ली थी! 


*भारत सरकार के अधिकृत आंकड़ों के अनुसार*कुल 40000 रोहिंग्या भारत में विद्यमान है*


जिसमें सबसे ज्यादा वह कश्मीर में फिर दिल्ली में फिर हरियाणा में उनकी संख्या है! 


संसद में जानकारी देते हुए भारत के कानून मंत्रालय ने बताया था पश्चिम बंगाल में 3724 त्रिपुरा में 1713 तमिलनाडु में 639 और महाराष्ट्र में 228 कुल रोहिंग्याकी संख्या है! बिहार का तो उसमें जिक्र तक नहीं है! ऐसे में चुनाव आयोग के दावे का रोहिंग्या के मामले में क्या अर्थ है? 

सरकार के आंकड़ों पर ही हम विश्वास करें 28356 विदेशी लोग हैं जो आवर स्टे कर कर भारत में रह रहे हैं! और जो रोहिंग्या है 40000 उनमें से भी 14000 रोहिगयाUNHCR के तहत भारत सरकार के यहां रजिस्टर्ड हैं! 


*नेपाल से लंबे समय तक भारत का रोटी बेटी का रिश्ता रहा है!*

 भारत की सेना में भी एक *बहादुर गोरखा ब्रिगेड* हुआ करती थी जिसमें नेपाली नागरिकों को सेना में भर्ती किया जाता था!


गोरखा ब्रिगेड में देश की सेवा करने वाले कई सैनिक नौकरी के बाद भारत में रहने लगे हैं और उत्तर प्रदेश और बिहार में ऐसा कोई भी गांव नहीं होगा जहां एक समय में गोरखा लोग चौकीदारी नहीं करते हो!


ऐसे में उनकी नागरिकता पर सवाल उठाना अपने आप में ही एक प्रश्न चिन्ह है? 

यह लोग अधिकांश 2003 के पहले ही भारत में बस चुके हैं इसलिए जब भी सघन जांच होगी नेपाली लोगों के मामले में चुनाव आयोग के दावों की पोल खुल जाएगी! 


यहां एक बात और है *भारत सरकार ने अभी कानून बनाया है कि हिंदू शरणार्थी को भारत के नागरिकता दे दी जाएगी क्योंकि नेपाली मूल के जो लोग भारत में बस भी रहे हैं तो वह दरअसल इस परिभाषा के तहत भारत के नागरिक माने जा सकते हैं* ऐसे में उन पर सवाल उठाना सरकार के बनाए गए कानून पर प्रश्न चिन्ह है?

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*बांग्लादेश की समस्या किसी से छुपी हुई नहीं है 1972 में जब बांग्लादेश को अलग कराया गया तब स्वयं इंदिरा गांधी जो देश के प्रधानमंत्री थी उन्होंने पूरे विश्व में कहा के बांग्लादेश में कई लोग देश छोड़ रहे हैं और क्योंकि भारत पर भी शरणार्थियों का दबाव आ रहा है ऐसे में बांग्लादेश को आजाद कराना भारत के लिए जरूरी है वरना भारत की अर्थव्यवस्था पर दुष्प्रभाव पड़ सकता है!* 


और उसके बाद बांग्लादेश अलग किया गया उसे दौर में बांग्लादेश के शरणार्थियों के लिए खुद सरकार ने कैंप लगाए और कई जगह उन्हें बसाने की व्यवस्था भी की गई!


*इसलिए यह माना जाना की वह शरणार्थियों की समस्या अब वोटर लिस्ट में परिलक्षित हो रही है चौंकाने वाली बात है!* 

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*अब सवाल उठता है फिर यह नॉरेटिव क्यों बनाई जा रहे हैं किस आधार पर चुनाव आयोग सूत्रों की खबर बात कर इस बात को जन सामान्य का विचार बनाना चाहता है*


सीधा सा सवाल है देश के उच्चतम न्यायालय को गुमराह करने के लिए और जो वोट काटे जाएंगे उनको परिभाषित करने के लिए यह सारा नॉरेटिव भरा जा रहा है ताकि बिहार में भी चुनाव चोरी किया जा सके! 


जैसा कि मैंने पूर्व के आकलन में भी लिखा है माइग्रेटेड पापुलेशन बिहार में बहुत बड़ी मात्रा में है और वह अधिकांश गरीब तबके की है, जिनके वोट काटे जाएंगे वह लोग रहते कहीं भी हो लेकिन अपना आधार और वोटिंग राइट बिहार में रखना पसंद करते हैं! 

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यह नॉरेटिव मुसलमान के नाम पर फैलाया जा रहा है लेकिन इसके शिकार बनेंगे गरीब दलित आदिवासी और महा पिछड़े हिंदू! 


पिछले चुनाव में सीटों में भले अंतर ज्यादा रहा हो महागठबंधन के और एनडीए के वोटो के बीच में बहुत महीन अंतर था उसी को आधार मानकर यह विश्लेषण किया जा रहा है यदि महागठबंधन के कुछ लाख वोट कम कर दिए जाएं तो बिहार दोहराना आसान हो जाएगा! 


यह नॉरेटिव बनाकर जो गरीबों दलितों के अल्पसंख्यकों को वोट काटे जाएंगे, वह इसी सोच का परिणाम होगा! (साभार)

मंगलवार, 15 जुलाई 2025

स्त्रियों पर रूह कंपा देने वाली कविता

 स्त्रियों पर रूह कंपा देने वाली कविता  


एक बेहद  शर्मनाक सच...

ईरान की मशहूर शायरा शाहरूख हैदर की कविता ने स्त्रियों का वह सच सामने लाया जो शर्मनाक है।


मैं एक शादीशुदा औरत हूँ!

मैं एक औरत हूँ ईरानी औरत

रात के आठ बजे हैं

यहां ख़्याबान सहरूरदी शिमाली पर

बाहर जा रही हूँ रोटियां खरीदने को

न मैं सजी धजी हूँ न मेरे कपड़े खूबसूरत हैं

मगर यहां सरेआम

ये सातवीं गाड़ी है...

मेरे पीछे पड़ी है

कहते हैं शौहर है या नहीं

मेरे साथ घूमने चलो

जो भी चाहोगी तुझे ले दूँगा।


यहाँ तंदूरची है...

वक़्त साढ़े आठ हुआ है

आटा गूँथ रहा है मगर पता नहीं क्यों

मुझे देखकर आँखे मार रहा है

नान देते हुए अपना हाथ मेरे हाथ से मिस कर रहा है!!


ये तेहरान है...

सड़क पार की तो गाड़ी सवार मेरी तरफ आया

गाड़ी सवार कीमत पूछ रहा है, रात के कितने?

मैं नहीं जानती थी रातों की कीमत क्या है!!


ये ईरान है...

मेरी हथेलियाँ नम हैं

लगता है बोल नहीं पाऊँगी

अभी मेरी शर्मिंदगी और रंज का पसीना

खुश्क नहीं हुआ था कि घर पहुँच गई।

इंजीनियर को देखा...

एक शरीफ मर्द जो दूसरी मंजिल पर 

बीवी और बेटी के साथ रहता है

सलाम...

बेग़म ठीक हैं आप ?

आपकी प्यारी बेटी ठीक है ?

वस्सलाम...

तुम ठीक हो? खुश हो?

नजर नहीं आती हो?

सच तो ये है आज रात मेरे घर कोई नहीं

अगर मुमकिन है तो आ जाओ

नीलोफर का कम्प्यूटर ठीक कर दो

बहुत गड़बड़ करता है

ये मेरा मोबाइल है

आराम से चाहे जितनी बात करना

मैं दिल मसोसते हुए कहती हूँ

बहुत अच्छा अगर वक़्त मिला तो जरूर!!


ये सर ज़मीने इस्लाम है

ये औलिया और सूफियों की सरजमीन है

यहां इस्लामी कानून राएज हैं

मगर यहां जिन्सी मरीज़ों ने

मादा ए मन्विया (वीर्य) बिखेर रखा है।

न दीन न मज़हब न क़ानून

और न तुम्हारा नाम हिफाज़त कर सकता है।


ये है इस्लामी लोकतंत्र...

और मैं एक औरत हूँ

मेरा शौहर चाहे तो चार शादी करे

और चालीस औरतों से मुताअ

मेरे बाल मुझे जहन्नुम में ले जाएंगे

और मर्दों के बदन का इत्र

उन्हें जन्नत में ले जाएगा

मुझे कोई अदालत मयस्सर नहीं

अगर मेरा मर्द तलाक़ दे तो इज्ज़तदार कहलाए

अगर मैं तलाक़ माँगू तो कहें

हद से गुजर गई शर्म खो बैठी

मेरी बेटी को शादी के लिए

मेरी इजाज़त दरकार नहीं

मगर बाप की इजाज़त लाज़िमी है।


मैं दो काम करती हूँ

वह काम से आता है आराम करता है

मैं काम से आकर फिर काम करती हूँ

और उसे सुकून फराहम करना मेरा ही काम है।


मैं एक औरत हूँ...

मर्द को हक़ है कि मुझे देखें

मगर गलती से अगर मर्द पर मेरी निगाह पड़ जाए

तो मैं आवारा और बदचलन कहलाऊँ।


मैं एक औरत हूँ...

अपने तमाम पाबंदी के बाद भी औरत हूँ

क्या मेरी पैदाइश में कोई गलती थी ?

या वह जगह गलत था जहाँ मैं बड़ी हुई?

मेरा जिस्म मेरा वजूद

एक आला लिबास वाले मर्द की सोच

और अरबी ज़बान के चंद झांसे के नाम बिका हुआ है।


अपनी किताब बदल डालूँ या

यहां के मर्दों की सोच

या कमरे के कोने में क़ैद रहूँ?

मैं नहीं जानती...

मैं नहीं जानती कि क्या मैं दुनिया में

बुरे  मुकाम पर पैदा हुई हूँ?

या बुरे मौके पर पैदा हुई हूँ?

....Cpd

सोमवार, 14 जुलाई 2025

भारत रत्न के कामराज

भारत रत्न के कामराज  



कामराज का जन्म 15 जुलाई 1903 को तमिलनाडु के विरूधुनगरमें हुआ था। उनका मूल नाम कामाक्षी कुमारस्वामी नादेर था लेकिन बाद में वह के कामराज के नाम से ही जाने गये। स्वतंत्रता के बाद कामराज 1952 के संसदीय चुनावों में श्रीविल्लीपुतुर संसदीय सीट से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में लोकसभा के सदस्य चुने गए।

12 अप्रैल 1954 को चक्रवर्ती राजगोपालाचारी जी के मद्रास राज्य के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद कामराज ने मुख्यमंत्री पद की कमान संभाली। (13 अप्रैल 1954 से 2 अक्टूबर 1963 तक) उन्होंने मद्रास राज्य के मुख्यमंत्री के रूप कार्य किया। सीएम बनने के बाद उन्हें संसद की सदस्यता से इस्तीफा देने पड़ा।

1964 में नेहरू की मृत्यु के समय, कामराज भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष थे। नेहरू की मृत्यु के बाद अशांत समय में पार्टी को सफलतापूर्वक संचालित किया।  कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में, उन्होंने खुद अगला प्रधान मंत्री बनने से इनकार कर दिया और दो प्रधानमंत्रियों, 1964 में लाल बहादुर शास्त्री और 1966 में नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी को सत्ता में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस भूमिका के लिए, उन्हें 1960 के दशक के दौरान "किंगमेकर" के रूप में व्यापक रूप से सराहा गया। 

(1964 से 67) तक उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में नेतृत्व किया। 1969 में उन्होंने नागरकोइल संसदीय सीट से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में उपचुनाव लड़ा, और संसद पहुंचने में कामयाब रहे।

1969 के अंत में कुछ कांग्रेसी नेताओं की इंदिरा गांधी से मतभेद हो गए। मोरारजी देसाई, कुमारस्वामी कामराज, एस निजलिगंप्पातथा अन्य नेताओं ने कांग्रेस को अलविदा कह दिया। असंतुष्ट धड़े ने कामराज के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (संगठन) के नाम से राजनीतिक दल का गठन किया।

1971 के संसदीय चुनावों में उन्होंने नागरकोइल संसदीय सीट से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (संगठन) के उम्मीदवार के रूप में लोकसभा पहुंचे।

1971 के चुनावों में विपक्षी दलों द्वारा धोखाधड़ी के आरोपों के बीच पार्टी का प्रदर्शन खराब रहा। वह 2 अक्टूबर 1975 में अपनी मृत्यु तक कांग्रेस (ओ) के नेता बने रहे।

उन्हे वर्ष 1976 में भारत रत्न से सम्मनित किया गया, तथा उनकी स्मृति में भारत सरकार द्वारा डाक टिकट जारी किया गया।

महत्वपूर्ण योगदान

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कामराज ने साठ के दशक की शुरुआत में महसूस किया कि कांग्रेस की पकड़ कमजोर होती जा रही है। उन्होंने सुझाया कि पार्टी के बड़े नेता सरकार में अपने पदों से इस्तीफा दे दें और अपनी ऊर्जा कांग्रेस में नई जान फूंकने के लिए लगाएं। उनकी इस योजना के तहत उन्होंने खुद भी इस्तीफा दिया और लाल बहादुर शास्त्री, जगजीवन राम, मोरारजी देसाई तथा एस. के. पाटिल जैसे नेताओं ने भी सरकारी पद त्याग दिए। यही योजना कामराज प्लान के नाम से विख्यात हुई। कहा जाता है कि कामराज प्लान की बदौलत वह केंद्र की राजनीति में इतने मजबूत हो गए कि नेहरू के निधन के बाद लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्रीबनवाने में उनकी भूमिका किंगमेकर की रही। 

उस योजना के अंतर्गत करीब आधे दर्जन केंद्रीय मंत्री और करीब इतने ही मुख्यमंत्रियों ने इस्तीफा दिया था। उस योजना का उद्देश्य था, बतौर पार्टी कांग्रेस को मजबूत करना। पर वास्तव में उसने नेहरू को अपनी नई टीम बनाने के लिए स्वतंत्र कर दिया था, जिसकी छवि 1962 के चीनी युद्ध के कारण धूमिल हुई थी।

दक्षिण भारत की राजनीति में कामराज एक ऐसे नेता भी रहे जिन्हें शिक्षा जैसे क्षेत्र में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए जाना जाता है। आजादी मिलने के बाद 13 अप्रैल 1954 को कामराज ने अनिच्छा में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद स्वीकार किया लेकिन प्रदेश को एक ऐसा नेता मिल गया जो उनके लिए कई क्रांतिकारी कदम उठाने वाला था। उन्होंने प्रदेश की साक्षरता दर, जो कभी सात फीसद हुआ करती थी, को बढ़ाकर 37 फीसद तक पहुंचा दिया।

कामराज ने आजादी के बाद तमिलनाडु में जन्मी पीढ़ी के लिए बुनियादी संरचना पुख्ता की थी। कामराज ने शिक्षा क्षेत्र के लिए कई अहम फैसले किए। मसलन उन्होंने यह व्यवस्था की कि कोई भी गांव बिना प्राथमिक स्कूल के न रहे। उन्होंने निरक्षरता हटाने का प्रण किया और कक्षा 11वीं तक निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा लागू कर दी। वह स्कूलों में गरीब बच्चों को मध्याह्न भोजन देने की योजना लेकर आए। उन्हीं के कार्यकाल के बाद से तमिलनाडु में बच्चे तमिल में शिक्षा हासिल कर सके। 

रविवार, 13 जुलाई 2025

इसलिए मिला उज्जवल निगम को राज्यसभा का ईनाम…

 इसलिए मिला उज्जवल निगम को राज्यसभा का ईनाम…

वह झूठ जिसने निगम को हीरो बना दिया, अंधभक्ति की दास्तान 


सार्वजनिक रूप से झूठ बोलना आसान काम नहीं है इसके लिए बेशर्मी चाहिए या संघ का संस्कार। राष्ट्रपति ने जिन चार लोगो को राज्यसभा के लिये मनोनीत किया है उनमे से एक नाम उज्जवल निगम भी है, आज हम बतायेंगे उज्जवल निगम कौन है और उन्होंने राज्यसभा तक सफ़र कैसे किया…

वहीं उज्ज्वल निकम जिसे बीजेपी ने  2024 के लोकसभा चुनाव मे मुंबई नाॅर्थ सेंट्रल से उम्मीदवार बनाया था, जिसमें वे कांग्रेस की वर्षा गायकवाड़ से हार गए थे। तब श्री निकम संसद नहीं पहुंच पाए तो अब भाजपा ने उन्हें दूसरा रास्ता बना लिया। इसका फ़ायदा भाजपा को महाराष्ट्र और ख़ासतौर पर मुंबई में अपनी पकड़ और मजबूत बनाने में मिलेगा। उज्ज्वल निकम ने इस मनोनयन के बाद बताया कि आधिकारिक सूचना आने से एक दिन पहले ही नरेन्द्र मोदी ने उन्हें फोन कर इसकी जानकारी दी थी और इस बातचीत में मराठी में ही पूछा था कि हिन्दी में बात करूं या मराठी में। यह कोई सामान्य सवाल नहीं है, बल्कि इसके गहरे अर्थ भाषा विवाद में देखे जा सकते हैं। प्राथमिक शिक्षा में हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में अनिवार्य करने का फ़ैसला फड़नवीस सरकार ने लिया था, लेकिन उद्धव ठाकरे की शिवसेना और राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने इस फैसले का भारी विरोध किया। नतीजा यह हुआ कि फड़नवीस सरकार को फ़ैसला वापस लेना पड़ा। इसे भाजपा की एक बड़ी हार के तौर पर देखा जा रहा है अब शायद नरेन्द्र मोदी हिंदी बोलूं या मराठी, यह सवाल खड़ा करके इस हार की खीझ मिटा रहे हैं।

मोदी के इस तंज भरे सवाल का सीधा जवाब यह है कि ठाकरे  गुट की शिवसेना के आगे भाजपा की घबराहट बरकरार है।

उज्ज्वल निकम का मनोनयन ऐसा ही एक उपाय दिख रहा है। श्री निकम 1991 का कल्याण बम धमाका, 1993 का मुंबई सीरियल ब्लास्ट, 2003 का गेटवे ऑफ इंडिया बम धमाका, 26/11 मुंबई आतंकी हमला, प्रिया दत्त अपहरण कांड और नरेंद्र दाभोलकर हत्याकांड जैसे कई हाई-प्रोफाइल मामलों में अभियोजन का नेतृत्व कर चुके हैं। लेकिन वे सबसे ज्यादा चर्चा में तब आये, जब उन्होंने कहा था कि मुंबई हमलों के दोषी अजमल कसाब को जेल में बिरयानी खिलाई जा रही है। गौरतलब है कि इस हमले में शामिल सारे आतंकवादी मारे गए थे, लेकिन अजमल कसाब को मुंबई पुलिस में बतौर सहायक इंस्पेक्टर तैनात रहे तुकाराम ओंबले ने जिंदा पकड़ा, हालांकि इसमें खुद उनकी जान चली गई, क्योंकि कसाब अपनी एके 47 से अंधाधुंध गोलियां बरसा रहा था, जबकि श्री ओंबले के पास केवल एक लाठी थी, जिससे उन्होंने कसाब को रोके रखा, खुद गोलियां खाईं, लेकिन उसे पकड़ लिया। शहीद तुकाराम ओंबले को मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया है। उनकी बहादुरी और सर्वोच्च त्याग से भारत पर हुए बड़े आतंकी हमले के दोषी को पकड़ा जा सका, जिससे इस हमले के कई भेद सामने आये।

कसाब को पूरी न्यायिक प्रक्रिया के बाद 21 नवंबर 2012 को फांसी दे दी गई। लेकिन इन चार सालों में जब तक कसाब जेल में रहा, यूपीए सरकार के ख़िलाफ़ इस बात को लेकर नाराज़गी बनी कि उसने एक आतंकी को जेल में बिरयानी खिलाई है। जबकि इस झूठ के बारे में 2015 में खुद उज्ज्वल निकम ने खुलासा किया है। जयपुर में आतंकवाद विरोधी अंतररराष्ट्रीय सम्मेलन में हिस्सा लेने आये श्री निकम ने कहा था कि , ‘कसाब ने कभी भी बिरयानी की मांग नहीं की थी और न ही सरकार ने उसे बिरयानी परोसी थी। मुकदमे के दौरान कसाब के पक्ष में बन रहे भावनात्मक माहौल को रोकने के लिए मैंने इसे गढ़ा था।’ श्री निकम के मुताबिक कसाब को आतंकवादी मानने पर कुछ लोग सवाल उठा रहे थे, उसके लिए मीडिया में सहानुभूति बन रही थी। श्री निकम ने कहा कि जब उन्होंने मीडिया से यह सब कहा तो एक बार वहां फिर पैनल चर्चाएं शुरू हो गईं और मीडिया दिखाने लगा कि एक खूंखार आतंकवादी जेल में मटन बिरयानी की मांग कर रहा है, जबकि न उसने बिरयानी मांगी, न सरकार ने उसे बिरयानी खिलाई थी।

उज्ज्वल निकम ने तो बड़ी आसानी से झूठ बोलकर उसका खुलासा भी कर दिया, लेकिन इसके कारण कांग्रेस सरकार और खासकर सोनिया गांधी पर कीचड़ उछालने का मौका भाजपा को मिला और यूपीए सरकार को सत्ता से हटाने में मदद मिली। सियासी स्तर पर तो यह घिनौना खेल भाजपा ने खेला ही, खुद उज्ज्वल निकम ने एक खूंखार आतंकी के लिए ऐसा झूठ बोलकर देश की आतंकविरोधी नीति के साथ खिलवाड़ किया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को दागदार किया। भाजपा 2014 में सत्ता में आई और 2016 में ही उज्जवल निकम को पद्मश्री से सम्मानित किया गया था, फिर 2024 में चुनाव का टिकट मिला और अब सीधे राज्यसभा का मनोनयन। भाजपा में झूठ बोलने वालों को सम्मानित किया जाता है, यह बात खुद नरेन्द्र मोदी ने इस बार साबित की है।(साभार)


शनिवार, 12 जुलाई 2025

क्या ट्रंप के इशारे पर आया विमान हादसे की यह रिपोर्ट…

 क्या ट्रंप के इशारे पर आया

विमान हादसे की यह रिपोर्ट…


अहमदाबाद में जिस बोईंग ने चार सौ से अधिक लोगों की जान ले ली, उसकी प्रारंभिक रिपोर्ट में बोईंग कंपनी को बचाने का पूरा इंतज़ाम कर लिया गया है, रिपोर्ट में पायलट की भूमिका को लेकर कही गई बात  भारतीयों को बेवक़ूफ़ समझने की कोशिश है, और यह बात तो अंधभक्त भी नहीं पचा सकते कि इतने अनुभवी पायलट फ़्यूल स्विच बंद रखे या बंद कर दें तो क्या यह रिपोर्ट संकेत नहीं दे रहा कि ट्रंप के आगे सत्ता किस कदर नतमस्तक है…

मुझे नहीं मालुम आप लोग इस बात पर क्या प्रतिक्रिया देंगे लेकिन यह सिद्ध हो गया है कि हमारा नेतृत्व एक भीगी बिल्ली कर रही है और ट्रंप हमारे पालन हार बन चुके है।  अहमदाबाद में हुए एयर इंडिया ड्रीमलाइनर के हादसे की एक रिपोर्ट आज लीक हुई है। वैश्विक मीडिया के समझदार एक्सपर्ट बता रहे है कि किसी नतीजे पर पहुँचने में एक साल का समय लगेगा लेकिन भारत ने जो पंद्रह पेज की रिपोर्ट बनाई है उसे वाल स्ट्रीट जर्नल ने लीक कर दिया। 

 रिपोर्ट ने इनडायरेक्ट इशारा किया है कि फ्यूल स्विच पायलट ने ऑफ किया था जिसकी वजह से इंजन को ईंधन नहीं मिला और ड्रीमलाइनर ऊपर नहीं उठ पाया। इस बात  को मोदी के अंधभक्त भी गले नहीं उतारेंगे कि दोनों पायलट इस उड़ान से पहले नौ हजार घंटों की उड़ान का अनुभव रखते हुए काम कर रहे थे। इतने अनुभवी पायलट भला इस तरह की बेवकूफी कैसे कर सकते है ? 

अब आइये इस लेख की शुरूआती लाइन पर।  ड्रीमलाइनर बोईंग का प्रोडक्ट है।  बोईंग आज दस लाख करोड़ की कंपनी है।  जब आप यह पढ़ रहे है तब बोईंग के कम से कम तीन हजार प्लेन कही से उड़ान भर रहे हैं , कहीं उतर रहे है , कहीं हवा में होंगे।  अगर इस रिपोर्ट में एक लाइन भी बोईंग के खिलाफ होती तो बोईंग का स्टॉक मार्किट ओपन होते ही दस परसेंट का गोता लगाता नजर आता। 


सनद रहे। अमेरिका इस समय एक सनकी के हाथ में है , और यह सनकी अपने देश को लेकर अपने वाले से ज्यादा पसेसिव है। उसके देश की किसी कंपनी की गुडविल खराब हो वह बर्दाश्त नहीं करेगा ! बस अपनी भीगी बिल्ली ने उस लकड़बग्घे को खुश करने के लिए सारा दोष अपने निर्दोष पायलटों पर डाल  दिया। शहीद अपनी सफाई देने नहीं आने वाले। पन्दरह दिन बाद किसी को याद भी नहीं रहेगा कि अहमदाबाद ने ऐतिहासिक विध्वंस देखा है।(साभार)

शुक्रवार, 11 जुलाई 2025

थरूर का आपात काल पर लेख और सच्चाई

 थरूर का आपात काल पर लेख और सच्चाई…


कांग्रेस नेता शशि थरूर ने आपात काल पर लेख लिखकर जो तमाशा खड़ा किया है उसकी सच्चाई क्या है। वे कांग्रेस से ख़फ़ा है या बीजेपी से कुछ मिल पाने की उम्मीद कर रहे हैं ये तो वही बता पायेंगे लेकिन आपात काल के जिस दौर का उन्होंने ज़िक्र किया उसकी हक़ीक़त…

आज जनसंख्या दिवस पर जानिये The chief glamour girl of the  Emergency रुखसाना सुल्तान को....

   मेरा मानना है कि जनसंख्या नियंत्रण को इतनी गम्भीरता से किसी और ने नही लिया होगा  देश में ......😊


  संजय गांधी से इनकी मुलाकात इनकी ज्वेलरी शॉप पर हुई थी , कुछ देर की बातचीत के बाद ही संजय इनसे बहुत प्रभावित हुए थे।ये मशहूर लेखक खुशवंत सिंह के भतीजे शिविंदर सिंह की तलाकशुदा पत्नी थीं, जो आर्मी ऑफिसर थे।

   रुखसाना सुल्तान की मौसी बेगम पारा बॉलीवुड की मशहूर अभिनेत्री थीं और उनकी शादी दिलीप कुमार के भाई नासिर खान से हुई थी। इस तरह दिलीप कुमार भी रूखसाना के मौसा थे।

  रुखसाना की बेटी मशहूर अभिनेत्री अमृता सिंह हैं जो सारा अली खान की मां भी हैं।

  निकाह फिल्म के लिए बी आर चोपड़ा कोई नया चेहरा लेना चाह रहे थे तब उनकी मुलाकात रुखसाना से हुई और उन्होंने अमृता सिंह को देखा , पर निकाह के लिये सलमा आगा को लिया गया , जो रुखसाना को बहुत खराब लगा  उन्हें पता लगा कि  बेताब के लिए धर्मेंद्र भी सन्नी के लिए कोई नई फीमेल एक्ट्रैस तलाश रहे थे , वे धर्मेंद्र से मिलीं और अमृता सिंह को इस फिल्म से लांच किया गया।


  शायद ये आपातकाल के दिनों की ही बात है जबकि संजय गांधी ,परिवार नियोजन ,अतिक्रमण जैसे कार्यक्रमों को हर हाल में पूरा कर लेना चाहते थे। रुखसाना काफी तेजतर्रार महिला थीं इसलिए संजय को जम गईं कि वो बहुत कुछ कर सकतीं हैं।

  संजय ने उन्हें नसबंदी के लिए लोगों को बिशेषकर मुस्लिमों को राजी करने का काम सौंप दिया।

  संजय गांधी जानते थे कि देश की सबसे बड़ी समस्या आबादी है और अगर इमरजेंसी के दौरान थोड़ा प्रभाव दिखाकर लोगों को नसबंदी के लिये समझा दिया गया तो देश की आबादी कंट्रोल हो सकती है ,इसकी शुरुआत वो दिल्ली से कराना चाहते थे । उन्ही दिनों रुखसाना से मुलाकात होने पर जब रुखसाना ने उनसे कहा कि मैं पार्टी के लिए क्या कर सकती हूं ? तो संजय ने अपनी दुविधा उनसे शेयर कर दी।


  कहा जाता है उन्होंने टारगेट इतना सीरियसली लिया कि लोगों में उनका खौफ फैल गया।

 उस समय संजय की मित्र मंडली में जगदीश टाइटलर ,सज्जन कुमार ,कमलनाथ और रुखसाना थे।

  वे शिफॉन की साड़ी और बड़ा सा goggles अक्सर पहनती थीं लोग उन्हें खूब पहचानने लगे थे। वे जिस इलाके में जातीं वहां हड़कंप मच जाता था। कहा जाता है कि एक बार पत्रकार तवलीन सिंह उनके लुक में पुरानी दिल्ली के किसी एरिया में किसी स्टोरी को कवर करने गईं तो लोगों ने उन्हें रुखसाना समझ कर दौड़ा लिया था।

  फिलहाल रुखसाना ने अपने काम को येन केन प्रकारेण पूरा किया । सरकारी कर्मचारियों को यहां तक कहा गया कि उन्होंने अगर नसबंदी न कराई तो उनका वेतन रोक दिया जायेगा ।

   अंततः एक साल में 8000  के टारगेट को उन्होंने 13000 के लगभग लोगों की नसबंदी कराकर पूरा किया।

  उसके बाद अतिक्रमण हटाओ अभियान के तहत संजय गांधी ने उन्हें तुर्कमान गेट की झुग्गी बस्तियों को हटाने का काम सौंप दिया और वो बुलडोजर लेकर वहां पहुंच गईं । वहां उस समय मारकाट शुरू हो गई लगभग 6 लोग मारे गये। पुरानी दिल्ली इलाके में रुखसाना सुल्तान के नाम का खौफ छा गया था।

 इन सब घटनाओं से संजय गांधी और इंदिरा जी की इमेज खराब हो गई ,और 1977 का चुनाव कांग्रेस हार गई।

  उन दिनों यूथ कांग्रेस की अध्यक्ष अंबिका सोनी थीं और वो रुखसाना के छा जाने से बहुत परेशान थीं ,इंदिरा जी तक हर बात पंहुचती थी इंदिरा जी और मेनका भी उन्हे नापसंद करती थीं। पर संजय के आगे कोई कुछ नही बोलता था। संजय गांधी का काम कराने का तरीका थोड़ा सख्त था या वे अनुभवी नही थे । जोश में काम करते थे और ऐसे ही लोगों को अपने आसपास रखते थे।

  उन दिनों रुखसाना की लाइफ स्टाइल भी बेहद चर्चित रहती थी। 

  वे "कैमे "  का साबुन  इस्तेमाल करतीं थी जो विदेशों से आता था ,भारत में स्मगलिंग के जरिये ही आता था। एक बार हाजी मस्तान उनसे मिलने गये तो उनकी गाड़ी की पिछली सीट पर बस वही साबुन भरा हुआ था (साभार)