गुरुवार, 25 मार्च 2010

एक ल मां एक ल मौसी

तभे राज ठाकरे के जमन होथे...
अइसने फैसला ल तो कहिथे एक ला मां अऊ एक ल मौसी। तभे सरकार का एक कोती किसान मन के जमीन ल कौड़ी के मोल खरीदे बर अपन डंडा चलावत हे त दूसर डहार कमल विहार योजना के जमीन मालिक ल अरबपति बनावत हे। सरकार के अइसने फैसला के कारण राज ठाकरे पैदा होथे नहीं त उड़ीसा असन भगाव अभियाव चलथे।
छत्तीसगढ़ सरकार हा अधिकारी कर्मचारी अऊ अपन सुविधा बर राजधानी के बनावत हे। राजधानी बनाय बर छत्तीसगढ़ के किसान मन के जमीन ल कौड़ी मोल खरीदत हे। जेन किसान नई बेचन कहात हे तेन मन ल डंडा के बल म जमीन छोड़े बर मजबूर करत हे। जब उहां के जमीन के कीमत 25-30 लाख रुपया एकड़ हे तब भला किसान मन ह 7-9 लाख रुपया एकड़ म बेचे बर कइसे तैयार होही। लेकिन सरकार ह अपन दमनकारी नीति ले किसान मन जमीन बेचे बर मजबूर करत हे।
दूसर कोती सरकार ह कमल विहार योजना लाए हे ये योजना म जउन मन के जमीन ह आही ओखर विकास करके 16 आना में 6 आना जमीन वापस दे दिये जाही। यानी भर्रा जमीन ल लेके बाहरा बना के दीही केहे जाय त गलत नई होवय।
आखिर सरकार के योजना ह अइसे कइसे बनथे के किसान मन के जमीन के कौड़ी दाम अऊ सेठ मन के जमीन के करोड़ो दाम। हमर खबरची के अनुसार सरकार ह जेन ढंग ले किसान मन उपर अत्याचार करत हे ये हा सिर्फ उदाहरण भर हे के कइसे सरकार एक ला मां एक ला मौसी करत हे जबकि सरकार के नजर हर आदमी बर सामान होना चाही।
हमर सूत्र के अनुसार त कमल विहार योजना ह भाजपाई भू-माफिया मन के हित ल देख के बनाय गेहे। यदि 6 आना जमीन विकास करके वापिस करही त कमल विहार ह खाली दू आना जगह म बनही अऊ बाकी जमीन ह त नाली-सड़क गार्डन, मंदिर अऊ गरीब मन के मकान म निकल जाही। यानी दू आना जमीन म कमल विहार बनाय बर सेठ मन के 6 आना जमीन के विकास करे जात हे।
सवाल ये नोहय के सेठ मन के जमीन ला सरकार ह विकास करके देवत हे सवाल ये हे के भू-माफिया मन के जमीन ल सरकार ह काबर विकास करत हे। सवाल यहू हे के आखिर राजधानी के किसान मन ह का पाप करे हे के उंखर जमीन कौड़ी के मोल अऊ सेठ मन के जमीन अरबों मं।
आखिर सरकार ह ये दू योजना म भेदभाव काबर करत हे। सबले पहीली तो हमर खबरची के अनुसार जेन जगह में कमल विहार योजना लाय जात हे उहां राजधानी के एक मंत्री के रिश्तेदार अऊ समर्थक मन के जमीन हे अऊ उही मन ल सरकार के माध्यम से मदद करत हे। यहू नहीं कई झन भाजपा नेता मन के इहां भारी जमीन हे अऊ कमल विहार योजना ह आम आदमी बर के बजाय अइसने मंत्री समर्थक मन बर लाय जात हे।
ये मामला ल लेके किसान मन भारी गुस्सा हे अऊ कमल विहार योजना के खिलाफ आंदोलन करे के धमकी घलो देवत हे।

मंगलवार, 23 मार्च 2010

घोटालेबाजों का जमाना,महाधिवक्ता है सुराना

आरएसएस का संस्कार या सुराना का प्रभाव...
यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का संस्कार है या भारतीय जनता पार्टी का कारनामा है यह तो आम जनता तय करेगी लेकिन प्रदेश के महाधिवक्ता के पद पर जिस देवराज सुराना को बिठाया गया है उनके ही नहीं उनके परिवार जनों के खिलाफ लगभग दर्जनभर से अधिक मामले हैं। मंदिर की जमीन से लेकर आदिवासियों की जमीन हथियाने के अलावा अपने जनसंघी प्रभाव का उपयोग कर काम करवाने वाले व्यक्ति को सरकार कैसे महाधिवक्ता बना दी यह तो वही जाने लेकिन ऐसे व्यक्ति के महाधिवक्ता बनने से क्या कुछ हो रहा होगा सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
वैसे तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छाया में रहे देवराज सुराना राजधानीवासियों के लिए अपरिचित नाम नहीं है। राजधानी वासियों के बीच उनकी पहचान जनसंघी के अलावा एक वकील की भी है लेकिन अब हम अपने पाठकों को बताना चाहते हैं कि जनसंघ के सेवाभाव के पीछे देवराज सुराना और उनके परिजनों का कारनामा कितना भयावह है कि ऐसे व्यक्ति को महाधिवक्ता जैसे जिम्मेदार पद पर बिठाना कितना घातक हो सकता है। देवराज सुराना और उनके पुत्रद्वय आनंद सुराना, सुरेन्द्र सुराना, पुत्रवधु श्रीमती चेतना सुराना, दामाद विजयचंद सुराना यानी परिवार के अमूमन सभी लोगों पर मंदिर की जमीन, आदिवासियों की जमीन सहित अन्य आपराधिक प्रकरण दर्ज हैं।
आश्चर्य का विषय तो यह है कि देवराज सुराना को महाधिवक्ता बनाने सरकार ने इस घपलेबाजी को नजरअंदाज तो किया ही है संवैधानिक नियमों की भी अनदेखी की गई है। संविधान के अनुच्छेद 165(1) के अनुसार प्रत्येक राय का रायपाल उसी व्यक्ति को महाधिवक्ता बनाता है जो उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए अर्हित होता है। ऐसे में 82 साल के व्यक्ति को महाधिवक्ता बनाना स्पष्ट करता है कि किस तरह से आरएसएस या भाजपा के प्रभाव में देवराज सुराना को महाधिवक्ता बनाया गया है। जबकि नियमानुसार 62 साल से अधिक उम्र का व्यक्ति उच्च न्यायालय का न्यायाधीश होने का पात्र नहीं है।
देवराज सुराना को महाधिवक्ता बनाने में आरएसएस या भाजपा की भूमिका की चर्चा बाद में की जाएगी। यहां हम उनके व उनके परिजनों के कृत्यों पर प्रकाश डालेंगे तथा हम अपने पाठकों को यह भी बताएंगे कि किस तरह से देवराज सुराना के परिवार की नानेश बिल्डर्स से अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया और कैसे कलेक्टर से लेकर प्रशासनिक अधिकारियों ने उनके प्रभाव में अनैतिक कार्य किया। दरअसल देवराज सुराना और उनके परिवार तब विवाद में आए जब इनकी कंपनी नानेश बिल्डर्स से प्राईवेट लिमिटेड ने गोपियापारा स्थित श्री हनुमान मंदिर की भाठागांव स्थित बेशकिमती जमीन को खरीदा। कहा जाता है कि इस जमीन की फर्जी तरीके से दो रजिस्ट्री कराई गई। इसमें भारतभूषण नामक फर्जी सर्वराकार से दस्तखत कराए गए। इस फर्जी रजिस्ट्री की जानकारी होने पर जब हिन्दू महासभा ने आपत्ति की तो जोगी शासन काल में सन् 2001 में इस पर रोक लगा दी गई। इसके बाद जैसे ही भाजपा की सरकार सत्ता में आई देवराज सुराना पर अपने प्रभाव में इस विक्रय पत्रों को 17-3-04 को पंजीयन करा लिया। इस भूमि को क्रय करने के लिए देवराज सुराना के खाते से दो लाख देवराज सिंह सुराना एचयूएफ के खाते से दो लाख 51 हजार से निकालकर 8 मार्च 2001 को नानेश बिल्डर्स के खाते में जमा किए गए।
आश्चर्य का विषय तो यह है कि 2001 में तत्कालीन कलेक्टर ने हिन्दू महासभा की शिकायत पर की गई जांच रपट में यह लिखा है कि यह भूमि श्री हनुमान मंदिर प्रबंधक कलेक्टर रायपुर के नाम दर्ज होने के कारण विक्रय योग्य नहीं है। जांच प्रतिवेदन में मुख्यालय उपपंजीयक एवं तत्कालीन तहसीलदार रायपुर के विरुध्द कार्यवाही किया जाना बताया गया है एवं जिला पंजीयक रायपुर को लिखा है कि भविष्य में अग्रिम आदेश तक कोई रजिस्ट्री ना किया जाए।
बताया जाता है कि 2004 में अपने प्रभाव पर इस जमीन की रजिस्ट्री कराने के बाद जब विवाद बढ़ता दिखा तो नानेश बिल्डर्स ने यह जमीन रवि वासवानी और सुशील अग्रवाल रामसागरपारा को बेच दी। इस पर जब हिन्दू महासभा ने पुन: आपत्ति की तो तहसीलदार ने नामांतरण रोक दिया है और जब मामला उलझता दिखा तो विक्रय की गई जमीन का नानेश बिल्डर्स ने आश्चर्यजनक रुप से अपने नाम पर डायवर्सन करा लिया। यानी जमीन बेचने के बाद किस तरह से डायवर्सन की कार्रवाई की गई होगी समझा जा सकता है। जबकि अब भी भू-अभिलेखों में सुशील अग्रवाल एवं रवि वासवानी वगैरह का नाम भूमि स्वामी के रुप में दर्ज है। इतना सब कुछ होने के बाद भी इन्हें महाधिवक्ता कैसे बनाया गया यह समझा जा सकता है।

उद्योगपतियों की सरकार

छत्तीसगढ सरकार क्या आम लोगों की सरकार है? यह सवाल इसलिए उठाये जा रहे हैं क्योंकि छत्तीसगढ में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है। सब तरफ राम नाम की लूट मची है। सरकार में बैठे मंत्री से लेकर अधिकारी मनमानी पर उतारू है यहां तक कि विधानसभा में भी प्रश्नों के जवाब ठीक से नहीं दिए जा रहे हैं और सारा खेल एक सोची समझी रणनीति के तहत चल रहा है ताकि उद्योगपतियों को अधिकधिक लाभ मिले।
सरकार की स्थिति तो गृहमंत्री ननकीराम कंवर के अलग-अलग समय पर दिए दो बयानों से लगाया जा सकता है पहला बयान गृहमंत्री ने मुख्यमंत्री के गृह जिले में जाकर पुलिस कप्तान को निकम्मा और कलेक्टर को दलाल कहा। यह किस परिप्रेक्ष्य में कहा गया यह बताने की जरूरत नहीं है लेकिन विधानसभा में उनका यह कहना कि पुलिस वाले दस हजार रुपया महिना लेकर शराब वालों के लिए काम करते हैं यह सरकार के लिए डूब मरने वाली बात है। इतना ही नहीं है पूरा मामला। दरअसल राज्य बनने के बाद यहां की प्रचुर धन संपदा को लुटने में सरकार ने जिस तरह से उद्योगपतियों को सहयोग किया है वैसा आजादी के बाद किसी भी प्रदेश में नहीं हुआ होगा। जिंदल से लेकर बालको और अल्ट्राटेक से लेकर दूसरे उद्योगपतियों की मनमानी से आए दिन अखबार रंगे पड़े हैं। यहां तक कि बालको में हुई चिमनी कांड भी ऐसी जमीन पर हुई जो बालको ने कब्जा कर रखी है। शायद यहीं वजह है कि अजीत प्रमोद कुमार जोगी यह सवाल उठाते रहे हैं कि आखिर सरकार अनिल अग्रवाल से डरती क्यों हैं।
दो चार सौ फुट जमीन पर कब्जा कर अपना आशियाना बनाने वालो पर बुलडोजर चलाने वाली सरकार उद्योगों द्वारा अवैध कब्जे की गई हजारों एकड़ जमीन को लेकर क्यों खामोश है। क्या इसके एवज में मुख्यमंत्री से लेकर अन्य मंत्री व सरकारी अधिकारी को लाखों रुपए दिए गए हैं। यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब सरकार को देना ही होगा कि वह उद्योगपतियों की मनमानी पर क्या इसलिए चुप है क्योंकि वहां से उन्हें पैसे मिल रहे हैं? आम लोगों के हितों की रक्षा के लिए बैठी सरकार को क्या यह नहीं पता है कि उद्योगपतियों की मनमानी से आम आदमी प्रदूषण की वजह से बीमार हो रहा है और उनके गुण्डे आम लोगों को पीट रहे हैं।
क्या सरकार को खबर है कि उसके दर्जनभर से अधिक आईएएस अधिकारियों ने मौली श्री विहार में अपने बंगलों को इन्हीं उद्योगपतियों को लाखों रुपए किराए पर दे रखा है। एक साधारण आदमी भी समझ सकता है कि कोई किसी के 15-20 हजार किराये वाली जगह को एक लाख रुपए किराये में क्यों ले रहा है फिर यह बात सरकार के समझ में क्यों नहीं आ रहा है। क्या ऐसा नहीं है कि इन उद्योगपतियों ने प्रदेश के इन आईएएस अधिकारियों को ओब्लाईज् कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। उद्योगों को जिस पैमाने पर जमीन दी जा रही है और उन्हें जमीन कब्जा करने की छूट दी जा रही है क्या यह किसी अंधेरगर्दी से कम है। गरीबों के नाम पर दिए जाने वाले चावल क्या राईस मिलरों व धन्ना सेठों के गोदाम में नहीं जा रहा है। चौतरफा भ्रष्टाचार ने छत्तीसगढ क़ी वित्तीय स्थिति को डगमगा दिया है और सरकार ने इस पर अंकुश नहीं लगाया तो इसके दुखद परिणाम आना तय है।

क्या पैसा खिलाकर जाति प्रमाण पत्र बनाया गया है...



छत्तीसगढ में सत्ता के बल पर अधिकारियों से अनैतिक कार्य कराया जा रहा है। वामन राव लाखे वार्ड के पार्षद विजेता मन्नु यादव को पिछड़ी जाति का प्रमाण पत्र दिलाने में तो ऐसी ही भूमिका नजर आ रही है और ऐसा नहीं है तो अधिकारी पैसा खाकर किसी को भी जाति प्रमाण पत्र दे रहे हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार भारतीय दूरसंचार विभाग में सामान्य वर्ग से टेलीफोन मैकेनीक के पद पर कार्य कर रहे दयालदास मोहरे की पुत्री विजेता यादव को पार्षद चुनाव लड़ने तीन दिन में पिछड़ी जाति का प्रमाण पत्र जारी कर दिया गया। चूंकि विजेता ने प्रेम विवाह मन्नु यादव से किया है और उसे भाजपा ने टिकिट दी थी। इसलिए सारा खेल आनन-फानन में हुआ।
इस मामले का सबसे रोचक पहलू तो यह है कि विजेता के भाई सुनील को जाति प्रमाण पत्र के लिए दिया आवेदन यह कहकर खारिज किया गया कि मोहारे जाति को छत्तीसगढ़ में पिछड़ी जाति का कोई अधिकार नहीं दिया गया है। यह बात सुप्रीमकोर्ट ने भी तय कर दिया है कि प्रेम विवाह के बाद भी युवती की जाति नहीं बदलेगी। इस नियम के बाद भी यहां विजेता यादव को किस बिना पर पिछड़े वर्ग का जाति प्रमाण पत्र जारी किया गया यह आसानी से समझा जा सकता है। बहरहाल इस मामले में कांग्रेस के पराजित प्रत्याशी ने याचिका दायर भी कर दी है और देखना है कि सत्ता के गलियारे में इसकी क्या प्रतिक्रिया होती है।

रविवार, 21 मार्च 2010

बेचने तो निकले हो खरीदेगा कौन?


छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता इन दिनों विषम स्थिति में है। सरकारी विज्ञापनों के लालच में खबरों से समझौता या सेल्फ सेंशरशीप चल रहा है। बड़े अखबार न तो खोजी पत्रकारिता को लगभग तिलांजलि ही दे दी है और खबरों पर मालिक से लेकर संपादक की निगाहें तेज हो गई है।
ऐसे में वे पत्रकार जो इस पेशे को मिशन के रुप में लेते हैं उनके लिए खबरें बनाना मुश्किल हो गया है इसलिए कुछ पत्रकारों को लगा कि हम सब मिलकर खबरें बेचने का काम करते हैं। इसी कड़ी में मीडिया-हाऊस बनाया गया है। शहर के प्रतिष्ठित अखबारों में काम कर चुके अहफाज रशीद, नवीन शर्मा और मधुसूदन सुनीता गुप्ता सहित कुछ और लोगों ने मीडिया हाउस बना लिया है। इकना कहना है कि वे पत्रकारिता को नया आयाम देंगे और प्रिंट व इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिए खबरें बनाएंगे। इन्होंने नवरात्रि के प्रथम दिवस पर इसे लांच भी कर दिया लेकिन इस सवाल का जवाब शायद इनके पास भी नहीं है कि खबरें यदि बनाई गई तो इसे खरीदेगा कौन?
दरअसल यह सवाल इसलिए उठाये जा रहे हैं कि इन दिनों खबरों से यादा मार्केटिंग और विज्ञापन को महत्व दिया जा रहा है। अखबार ऐसी खबरों से अटा पड़ा रहता है जो या तो सूचनात्मक हो या फिर जिसके माध्यम से विज्ञापन बटोरे जा सकते हैं। ऐसे में मीडिया हाउस को लेकर सवाल उठाना स्वाभाविक है। अखबार हो या प्रिंट मीडिया उन्हें अपने मतलब की खबरें चाहिए और मीडिया हाउस सिर्फ उनकी मतलब पर काम करेगा तो पत्रकारिता को नया आयाम देने के सपने का क्या होगा तब भला नौकरी क्या बुरी होगी।
और अंत में....
मीडिया हाउस को जिस ताम-झाम के साथ लांच किया गया उसे लेकर लोग यह कहने लगे हैं कि पत्रकारिता के चंडाल चौकड़ी में चंडाल का नाम बताया जाए और वह टिक गया तो हाउस बन जाएगा।

घोटाले में नाम कमाओं,बजट में हिस्सा बढ़ाओं


यह चतुर नौकरशाही है या फिर मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का विरोधियों को चुप करने की रणनीति। लेकिन प्रदेश के जिस दमदार मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के विभागों में करोड़ों-अरबों रुपए के घोटाले की कहानी सामने आ रही है उसी बृजमोहन अग्रवाल के विभागों को प्रदेश के कुल बजट का 20 फीसदी हिस्सा दिए जाने को लेकर जनसामान्य में कई तरह की चर्चा है।
वैसे तो राय बनने के बाद से ही पीडब्ल्यूडी, खनिज, पंचायत, उर्जा, स्वास्थ्य, सिंचाई विभाग को काफी महत्वपूर्ण माना जाता रहा है और भाजपा शासनकाल में तो यहां हुए घपलों को लेकर खूब हल्ला मचा। बताया जाता है कि पर्यटन और संस्कृति विभाग में हुए काले कारनामें ने इस विभाग को भी चर्चा में ला दिया। इकलौता यही विभाग है जहां प्रचार प्रसार के नाम पर जमकर बंदरबांट हुए और यहां बैठे अफसरों ने करोड़ो कमाए। राय का ताजा बजट करीबन साढ़े तेईस हजार करोड़ है और इनमें से एक बडा हिस्सा पीडब्ल्यूडी, शिक्षा, पर्यटन और संस्कृति के लिए जारी किया गया है। यानी जिन विभागों को बृजमोहन अग्रवाल संभाल रहे हैं उन्हें साढ़े पांच हजार करोड़ आबंटित किया गया है।
भाजपा सूत्रों के मुताबिक यह उन नौकरशाहों की करतूत है जो अपनी जेबें गरम करना चाहते हैं इसलिए ऐसे विभागों में यादा बजट दिया गया जहां खाने की छूट मिल सके। जबकि एक अन्य सूत्रों का कहना है कि यह डॉ. रमन सिंह की रणनीति का हिस्सा है ताकि बृजमोहन अग्रवाल नाराज न हो और उसकी तरफ नजर न उठाये। मामला जो भी हो लेकिन आम लोगों में यह प्रतिक्रिया खुले आम सुनाई पड़ रही है कि जो सबसे यादा भ्रष्टाचार करेगा उसे ही बजट में सर्वाधिक आबंटन दिया जाएगा। छत्तीसगढ में जिस पैमाने पर पीडब्ल्यूडी में भ्रष्टाचार चल रहा है वह आश्चर्यजनक है सड़कों का हाल तो बदतर है ही भवनों के निर्माण में भी जमकर धांधली की जा रही है। जबकि पर्यटन में मोटल निर्माण में बाउंड्री निर्माण और घास लगाने के नाम पर जबरदस्त घोटाले हुए हैं। संस्कृति विभाग ने तो स्थानीय कलाकारों की उपेक्षा कर बाहर के कलाकारों को बुलाने में जमकर दलाली की है।
बहरहाल बजट में एक ही मंत्री को 20 फीसदी आबंटन को लेकर कई तरह की चर्चा है ऐसे में आम लोगों में डॉ. रमन सिंह की छवि को लेकर चर्चा स्वाभाविक है।

रमन बने असरदार,क्योंकि वे हैं लाचार|जोगी की दमदारी पर इंडिया टुडे कायल





यह तो देश की राजनैतिक परिस्थितियां ही है कि यहां फूलनदेवी जैसी डकैत सांसद के दरवाजे पर पहुंच जाती है और अंधेरगर्दी मचाने वाले देश के सबसे बड़े राय के मुख्यमंत्री बन जाते है। छत्तीसगढ क़े मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह भी तमाम घपलों-घोटालों के बाद भी छत्तीसगढ में सबसे असरदार माने जाते हैं तो इसकी वजह कांग्रेस में बिखराव के अलावा पैसों की भूख है जिसके आगे तमाम राजनेता नतमस्तक है।
इंडिया टुडे के ताजा सर्वे रिपोर्ट के आधार पर रमन सिंह इसलिए छत्तीसगढ क़े सबसे असरदार व्यक्ति है क्योंकि उन्होंने विरोधियों की हवा निकाल दी और अजीत जोगी को छोड़ अन्य कांग्रेसियों में चुनौती देने का साहस नहीं है। ऐसे में अजीत जोगी की दमदारी को इंडिया टुडे ने भी माना है भले ही कांग्रेसी न माने। सर्वे रिपोर्ट को लेकर डॉ. रमन सिंह के असरदार के पक्ष में जो बाते कही गई है उसमें दो रुपया किलो चावल का भी जिक्र है जो डॉक्टर रमन सिंह की लोकप्रियता का संवाहक बताया गया है।
हम यहां सर्वे के आधार को चुनौती नहीं दे रहे हैं बल्कि असरदार की परिभाषा को लेकर सवाल उठा रहे हैं। राष्ट्रीय परिपेक्ष्य में डॉ. रमन सिंह असरदार इसलिए भी हैं क्योंकि वे प्रदेश के मुख्यमंत्री है। दरअसल असरदार की परिभाषाएं अब बदल गई है। नरेन्द्र मोदी क्यों असरदार है और फूलनदेवी क्या बगैर असरदार के चुनाव जीत सकती है। यूपी-बिहार में तो अपराधियों की जीत ही उनके असरदार होने का ईशारा करती है।
छत्तीसगढ में राजनैतिक परिस्थिति भले ही भाजपा के अनुकूल न हो लेकिन कांग्रेस के बिखराव ने उन्हें कुर्सी पर तो बिठा ही दिया है। रोज नए-नए घोटाले की कहानी बाहर आ रही है और मंत्रियों पर खुलेआम कमीशन लेने के आरोप लग रहे हैं। आरोप तो यहां तक है कि मुख्यमंत्री का न प्रशासन पर पकड़ है न शासन पर पकड़ है। मंत्री से लेकर अधिकारी अपनी मनमानी कर रहे हैं और विधानसभा तक को झूठी जानकारी दी जाती है। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि छत्तीसगढ में शासन-प्रशासन का क्या हाल है रही बात डॉ. रमन सिंह को चुनौती का तो वह तो कहीं नहीं दिखलाई पड़ता। इसकी वजह उनकी प्रशासनिक छवि है जो अधिकारियों और मंत्रियों को मनमानी करने की छूट देता है।
यह सर्वमान्य सिध्दांत है कि आप जब किसी के गलत कार्यों का विरोध नहीं करेंगे तो आपका कोई विरोध क्यों करेगा हालांकि राजनीति में महत्वाकांक्षा भी मायने रखता है तो बृजमोहन अग्रवाल को छोड़ रमन सिंह के लिए कहीं कोई दिक्कत नहीं है और डॉ. रमन सिंह ये बात जानते हैं इसलिए उन्होंने प्रदेश के कुल बजट का 20 फीसदी हिस्सा बृजमोहन अग्रवाल के पाले में कर दिया है ताकि उनका ध्यान कुर्सी की बजाय पैसे पर लगा रहे। बहरहाल सर्वे रिपोर्ट ने कांग्रेसियों के कान खड़े कर दिए है और देखना है कि इंडिया टुडे के इस सर्वे रिपोर्ट का कांग्रेस के अंदरूनी राजनीति में क्या असर डालता है।