इन दिनों पूरे देश में यह बहस चल रही है कि सांसदों के वेतन भत्ते बढऩा चाहिए या नहीं बढऩा चाहिए। हमने आम आदमियों के बीच यह सवाल उठाया तो अब तक हमें एक भी व्यक्ति नहीं मिला जिन्होंने सांसदों के वेतन भत्तों में बढ़ोत्तरी पर सहमत हो। आखिर सांसद और विधायकों को वेतन क्यों? क्या जनसेवा के बदले मेवा वे सरकारी खजानों से कब तक लेते रहेंगे। आश्चर्य का विषय तो यह है कि जिंदल से लेकर हेमामालिनी तक को वेतन भत्ते और पेंशन चाहिए?
सांसद-विधायक अब पूरी तरह से व्यवसायी हो चुके हैं। समाज सेवा के बदले उन्हें मोटी तनख्वाह चाहिए और पेंशन भी चाहिए? ऐसा तो यह देश कतई नहीं था। फिर आजादी के सिर्फ 63 साल में ऐसा क्या हो गया कि सांसद विधायक नौकरों की तरह वेतन के लिए इतने लालायित हैं? आम लोगों ने तो कभी नहीं चाहा कि उनके जनप्रतिनिधि वे व्यक्ति बने जिनके लिए वेतन सर्वोच्च प्राथमिकता है और जिन लोगों को अपनी सेवा करानी होती है वे अपने हैसियत के अनुसार नौकर रख लेते हैं। ऐसे में आम आदमी के गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा मिल बांटकर डकारने की इस कोशिश को क्या कहेंगे।
दुखद स्थिति तो यह है कि अपने को समाजसेवी कहने वाले सैकड़ों सांसदों और हजारों विधायकों में से एक भी ऐसा नहीं है जो वेतन भत्ते या पेंशन नहीं लेने की घोषणा कर दे। 'माल ए मुफ्त दिल ए बेरहम' की तर्ज पर हम दो चार साल में वेतन भत्तों में बढ़ोत्तरी के लिए जरूर ये लोग लामबंद हो जाते हैं तब न पार्टी प्रतिद्वंद्विता ही आड़े आती है और न ही सिद्धांत मायने रखते हैं। आज भी इस देश में ऐसी पीढ़ी मौजूद है जो बगैर वेतन के समाजसेवा में लगे हैं। राजनीतिक दल ऐसे लोगों को अपनी पार्टियों में शामिल ही नहीं करना चाहते? हमारे बहुत से मित्र सांसद-विधायक है? उनका कहना है कि ऐसी घोषणाएं करने पर पार्टी निकाल बाहर करेगी? क्योंकि अमूमन सभी पार्टियों में यह परिपाटी है कि सांसद-विधायक अपने वेतन का एक हिस्सा पार्टी फंड में दे। पार्टी फंड में पैसा जमा होते होते यह स्थिति है कि पार्टियों के पास इफरात धन संपत्ति जमा हो गई है और देश खोखला होता जा रहा है।
कांग्रेस हो या भाजपा, माकपा हो या लोकदल, जनता दल आप किसी भी पार्टी का नाम ले लिजिए। इनकी चली तो पार्टी कार्यालय के नाम पर सरकारी जमीनों का जमकर बंदरबाट हुआ। जिला या प्रदेश स्तर तो छोड़ दिजिए कस्बों तक में कौडिय़ों के मोल सरकारी जमीनें इन राजनैतिक दलों को दी गई। देश की इस विषम स्थिति में जब आम आदमी को दो वक्त का खाना ठीक से नसीब नहीं हो रहा है। पीने का पानी नहीं मिल रहा है और स्वास्थ्य सुविधा के अभाव में दुरस्थ अंचल के लोग बेमौत मारे जा रहे हैं तब भला हमारे सांसदों की वेतन में बढ़ोत्तरी के लिए तीन-पांच करना निकृष्ठता नहीं तो और क्या है?
हमारा यह महाअभियान ऐसे ही अंधेरगर्दी के खिलाफ है। हम चाहते हैं सांसदों-विधायकों के वेतन-पेंशन बंद हो और जिन्हें डाक्टरों ने समाजसेवा करने कहा है वे बगैर वेतन का समाजसेवा करे। हम आम लोगों में यही जागरूकता पैदा कर रहे हैं कि वे अब ऐसे लोगों को ही अपना प्रतिनिधि चुने जो वेतन पेंशन नहीं लेने की घोषणा करें।
http://midiaparmidiaa.blogspot.in/
बुधवार, 25 अगस्त 2010
मंगलवार, 24 अगस्त 2010
कांग्रेस-भाजपा में सांठ-गांठ
परमाणु दायित्व विधेयक को लेकर कांग्रेस-भाजपा में सांठगांठ को लेकर लालू-मुलायम और वाम दलों ने खूब हंगामा किया। इस सांठ-गांठ के चलते गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को बचाने का भी आरोप है? क्या सचमुच कांग्रेस और भाजपा में इस तरह की सांठ-गांठ हो रही है। हालांकि यह सत्य है कि राजनीति में न तो स्थाई दोस्त होते हैं और न ही दुश्मन। खासकर अपने हितों के लिए सांसद और विधायक कितने नीचे गिर सकते हैं यह इस देश के आम लोगों ने बहुत नजदीक से देखा है।
छत्तीसगढ़ में भाजपा और कांग्रेस किस स्तर तक सांठगांठ कर रहे हैं यह किसी से छिपा नहीं है। ये वही रमन सिंह है जिन्होंने मुख्यमंत्री बनने से पहले जोगी सरकार के घोटाले की जुलूस निकाला था। तब रमन सिंह प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष थे और कांग्रेस के अन्याय के खिलाफ संकल्प पत्र जारी किया था। अजीत जोगी को खलनायक बताने वाले संकल्प पत्र की कितनी बातें पूरी की गई? यह सवाल अब भी लोगों की जुबान पर है। आज रमन सरकार को 6 साल से उपर हो गए है और उसने अभी तक जोगी सरकार के किसी भी घोटाले पर कार्रवाई नहीं की। क्या यह सांठ-गांठ नहीं है। सांठ-गांठ का आलम यह है कि अपनी तनख्वाह बढ़ाने यही लालू-मुलायम या वामदल एक हो जाते हैं। छत्तीसगढ़ में भी यही स्थिति है। प्रदेश सरकार का ऐसा कोई विभाग नहीं है जहां घोटाले, अनियमितता की खबरें नहीं आ रही है। लेकिन क्या कभी किसी कांग्रेसी ने कार्रवाई होते तक आंदोलन किया। हालत तो इतनी खराब है कि बृजमोहन अग्रवाल जैसे नेताओं के खिलाफ बोलने में कांग्रेसियों के पसीने छूट जाते हैं? क्या पीडब्ल्यूडी की करतूत किसी कांग्रेसी से छिपी है। कमीशन 15 से बढक़र 20 हो गया। तबादला उद्योग चलाया गया। पर्यटन में एमजी श्रीवास्तव हो या अजय श्रीवास्तव की दादागिरी पर कोई कुछ नहीं बोल रहा है। उल्टे नियम विरुद्ध यहां नियमितिकरण किया जा रहा है। संविलियन किया जा रहा है। नाते-रिश्तेदारों को नौकरी दी जा रही है। लेकिन कोई कुछ नहीं कह रहा है। शिक्षा विभाग में तो फर्नीचर घोटाला हो या विज्ञान उपकरणों की खरीदी कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं है। विवादास्पद तवारिस, बाम्बरा जैसे लोगों के मजे है और कांग्रेसी अपने मुंह पर ताला जड़े हुए हैं।
ऐसा नहीं कि सांठ-गांठ सिर्फ बृजमोहन अग्रवाल के मामले में है। चंद्रशेखर साहू हो या राजेश मूणत। खुद मुख्यमंत्री रमन सिंह के विभाग में घोटाले की फेहरिश्त है लेकिन कोई कुछ नहीं कहता। मुख्यमंत्री धर्म का अपमान करते हैं और कांग्रेसी यह कहकर खामोशी ओढ़ लेते हैं कि यह व्यक्तिगत है। भाजपा का कमल दीप में महंगाई डायन पर भी कांग्रेसी दो-चार घंटे चिल्लाकर चुप हो जाते हैं। सांठ-गांठ इतनी की कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों के आम कार्यकर्ता हैरान है और आम लोगों का पैसा बेदर्दी से लूटा जा रहा है। छत्तीसगढ़ में राजस्व की कमी नहीं है लेकिन उस स्तर पर विकास कार्य नहीं हो रहे हैं जब एक ही सडक़ साल में दो-चार बार बनानी हो तो विकास के दूसरे कार्य कैसे होंगे। लालू-मुलायम या वामदलों को कांग्रेस-भाजपा में सांठगांठ अब दिखाई दे रहा है। वेतन भत्तों में बढ़ोत्तरी में यह सांठगांठ नहीं दिखता। भ्रष्टाचारियों को बचाने में सांठगांठ नहीं दिखता और न ही अपराधियों को संरक्षण में ही सांठगांठ दिखता है।
छत्तीसगढ़ में भाजपा और कांग्रेस किस स्तर तक सांठगांठ कर रहे हैं यह किसी से छिपा नहीं है। ये वही रमन सिंह है जिन्होंने मुख्यमंत्री बनने से पहले जोगी सरकार के घोटाले की जुलूस निकाला था। तब रमन सिंह प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष थे और कांग्रेस के अन्याय के खिलाफ संकल्प पत्र जारी किया था। अजीत जोगी को खलनायक बताने वाले संकल्प पत्र की कितनी बातें पूरी की गई? यह सवाल अब भी लोगों की जुबान पर है। आज रमन सरकार को 6 साल से उपर हो गए है और उसने अभी तक जोगी सरकार के किसी भी घोटाले पर कार्रवाई नहीं की। क्या यह सांठ-गांठ नहीं है। सांठ-गांठ का आलम यह है कि अपनी तनख्वाह बढ़ाने यही लालू-मुलायम या वामदल एक हो जाते हैं। छत्तीसगढ़ में भी यही स्थिति है। प्रदेश सरकार का ऐसा कोई विभाग नहीं है जहां घोटाले, अनियमितता की खबरें नहीं आ रही है। लेकिन क्या कभी किसी कांग्रेसी ने कार्रवाई होते तक आंदोलन किया। हालत तो इतनी खराब है कि बृजमोहन अग्रवाल जैसे नेताओं के खिलाफ बोलने में कांग्रेसियों के पसीने छूट जाते हैं? क्या पीडब्ल्यूडी की करतूत किसी कांग्रेसी से छिपी है। कमीशन 15 से बढक़र 20 हो गया। तबादला उद्योग चलाया गया। पर्यटन में एमजी श्रीवास्तव हो या अजय श्रीवास्तव की दादागिरी पर कोई कुछ नहीं बोल रहा है। उल्टे नियम विरुद्ध यहां नियमितिकरण किया जा रहा है। संविलियन किया जा रहा है। नाते-रिश्तेदारों को नौकरी दी जा रही है। लेकिन कोई कुछ नहीं कह रहा है। शिक्षा विभाग में तो फर्नीचर घोटाला हो या विज्ञान उपकरणों की खरीदी कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं है। विवादास्पद तवारिस, बाम्बरा जैसे लोगों के मजे है और कांग्रेसी अपने मुंह पर ताला जड़े हुए हैं।
ऐसा नहीं कि सांठ-गांठ सिर्फ बृजमोहन अग्रवाल के मामले में है। चंद्रशेखर साहू हो या राजेश मूणत। खुद मुख्यमंत्री रमन सिंह के विभाग में घोटाले की फेहरिश्त है लेकिन कोई कुछ नहीं कहता। मुख्यमंत्री धर्म का अपमान करते हैं और कांग्रेसी यह कहकर खामोशी ओढ़ लेते हैं कि यह व्यक्तिगत है। भाजपा का कमल दीप में महंगाई डायन पर भी कांग्रेसी दो-चार घंटे चिल्लाकर चुप हो जाते हैं। सांठ-गांठ इतनी की कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों के आम कार्यकर्ता हैरान है और आम लोगों का पैसा बेदर्दी से लूटा जा रहा है। छत्तीसगढ़ में राजस्व की कमी नहीं है लेकिन उस स्तर पर विकास कार्य नहीं हो रहे हैं जब एक ही सडक़ साल में दो-चार बार बनानी हो तो विकास के दूसरे कार्य कैसे होंगे। लालू-मुलायम या वामदलों को कांग्रेस-भाजपा में सांठगांठ अब दिखाई दे रहा है। वेतन भत्तों में बढ़ोत्तरी में यह सांठगांठ नहीं दिखता। भ्रष्टाचारियों को बचाने में सांठगांठ नहीं दिखता और न ही अपराधियों को संरक्षण में ही सांठगांठ दिखता है।
लोग मरते हैं तो मर जाएं सांसद-विधायकों को पैसा चाहिए
आजादी के 63 साल बाद भी आम आदमी को पीने का पानी तक नहीं मिल रहा है, शिक्षा और चिकित्सा सुविधा का भगवान ही मालिक है। लोग दो जून की रोटी के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं और इस देश के सांसदों और विधायकों को 16 हजार रुपए महिना भी कम पड़ रहा है। इस शर्मनाक स्थिति को रोका नहीं गया तो न नेताओं को कोई पिटने से बचा पाएगा और न ही लोगों को सडक़ों पर उतरने से कोई सरकार रोक पाएगी।
जनप्रतिनिधि कहलाने वाले इस देश के सांसदों व विधायकों ने अपनी सुविधा बढ़ाने आम लोगों का जीवन दांव पर लगा दिया है। रोजमर्रा की चीजे सिर्फ महंगी इसलिए हुई है क्योंकि इस पर भारी भरकम टैक्स लागू है और इस टैक्स में से बड़ी राशि सांसदों-विधायकों के वेतन भत्ते और पेंशन में चले जाते हैं। जिस देश के आम आदमी को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं है उस देश के सांसद और विधायक अपनी सुविधाओं में कटौती कराने की बजाए सुविधाएं बढ़ाने लड़ रहे हो इससे शर्मनाक स्थिति और क्या होगी?
क्या किसी सरकार ने कभी सोचा है कि उसके राज में हर व्यक्ति को शिक्षा, चिकित्सा और पानी की सुविधाएं उपलब्ध है। भोजन तो दूर की बात है। इस देश का ऐसा कोई हिस्सा नहीं होगा जहां ये तीन मूलभूत सुविधाएं आम लोगों को पूरी तरह मिल रही हो। जब आजादी के 63 साल बाद भी ये तीन चीजें आम लोगों तक नहीं पहुंचाई जा सकी है तो फिर इन्हें वेतन किस बात का? सिर्फ एय्याशी या लोकतंत्र के मंदिर में हंगामा करने का?
सवाल यह नहीं है कि सांसदों-विधायकों का वेतन क्यों नहीं बढ़े? बल्कि अब आम आदमी यह सवाल करने लगा है कि इन्हें आखिर वेतन ही क्यों दिया जाए? जब सवाल करने पैसे ये लेते हैं? सवाल नहीं करने के पैसे ये लेते हैंं? उद्योगों के हित में नीति बनाते समय पैसे ये खाते है? कब किसका टैक्स बढ़ाना है घटाना है के एवज में पैसे का लेनदेन होता है और संसद या विधानसभा की कार्रवाई के दौरान इन्हें जब भत्ते दिए जाते है तब वेतन क्यों।
क्या आम आदमी इस बात से अनभिज्ञ है कि पांच सौ पैतालीस सांसदों में से तीन सौ से ज्यादा सांसद करोड़पति है? इन्हें वेतन की जरूरत क्यों और किसलिए दी जानी चाहिए? आम लोगों के खून पसीने की कमाई पर अपना हित साधने की कोशिश अब बंद करनी ही होगी वरना इसका दुखद परिणाम भुगतने के लिए देश को तैयार होना होगा। इस देश का प्रति व्यक्ति की आय कितना है और नेताओं को कितना वेतन भत्ता सुविधा दिया जा रहा है? सकारी आंकड़े सच्चाई से कोसो दूर होता है और औसत के फेर में गरीब कैसे मरता है इसका उदाहरण है भारत का प्रति व्यक्ति आय। सरकारी आकड़े के मुताबिक भारत के प्रति व्यक्ति की आय लगभग 40 हजार रुपए वार्षिक है यानी महिने में तीन साढ़े तीन हजार रुपए। ऐसे में सांसदों-विधायकों को इससे ज्यादा वेतन की बात ही बेमानी है।
अब तो लोग आक्रोशित है और आने वाले दिनों में राजनैतिक दलों को इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ेगा। यदि बगैर वेतन के काम करने वाले लोग चुनाव लड़ेंगे तो उन्हें ही जनता अपना वोट देगी और यह स्थिति बनने भी लगी है।
00मालामाल सांसद
0 पांच सौ पैतालीस सांसदों में तीन सौ से ज्यादा करोड़पति है।
0 देश के प्रधानमंत्री भी विश्व बैंक में पूर्व नौकरीशुदा।
0 तीसरे मोर्चे की कमान संभालने वाले यादव बंधु दोनों अआय से अधिक संपत्ति के मामलों में कोर्ट के चक्कर काट रहे हैं।
0 गरीब और दलित लोगों के मसीहा पासवान हो या मायावती लोगों के पास कितना पैसा यह किसी से छुपा नहीं।
00 मंत्री बनने के बाद यह मिलता है सांसदों को
0 टाइप 8 बंगला, राज्यमंत्रियों को टाइप 7 बंगला।
0 कोई किराया नहीं, बिजली के बिल पर कोई लगाम नहीं।
0 मूल वेतन 16 हजार रुपए, भत्ता 1 हजार रुपए
0 संसदीय क्षेत्र भत्ता 20 हजार रुपए।
0 टेलीफोन : दो फोन और एक लाख 75 हजार फ्री कॉल।
0 हर साल ढाई हजार रुपए मोबाइल भत्ता।
0 मोबाइल हैंडसेट फ्री।
0 नि:शुल्क एयर टिकट।
0 परिवार के लिए साल में 48 यात्राएं।
0 जितना चाहें उतनी एसी कोच में यात्रा परिवार के साथ
स्टाफ : पर्सनल स्टाफ में इन लोगों की नियुक्ति किया जा सकता है।
एक प्राइवेट सेक्रेटरी, एक एडिशनल पर्सनल सेक्रेटरी, दो पर्सनल असिस्टेंट, एक हिन्दी स्टेनो, एक ड्राइवर, एक क्लर्क एक जमादार या चपरासी।
( यह केवल मंत्री का स्टाफ है मंत्रालय से अलग से स्टाफ मिलता है।)
जनप्रतिनिधि कहलाने वाले इस देश के सांसदों व विधायकों ने अपनी सुविधा बढ़ाने आम लोगों का जीवन दांव पर लगा दिया है। रोजमर्रा की चीजे सिर्फ महंगी इसलिए हुई है क्योंकि इस पर भारी भरकम टैक्स लागू है और इस टैक्स में से बड़ी राशि सांसदों-विधायकों के वेतन भत्ते और पेंशन में चले जाते हैं। जिस देश के आम आदमी को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं है उस देश के सांसद और विधायक अपनी सुविधाओं में कटौती कराने की बजाए सुविधाएं बढ़ाने लड़ रहे हो इससे शर्मनाक स्थिति और क्या होगी?
क्या किसी सरकार ने कभी सोचा है कि उसके राज में हर व्यक्ति को शिक्षा, चिकित्सा और पानी की सुविधाएं उपलब्ध है। भोजन तो दूर की बात है। इस देश का ऐसा कोई हिस्सा नहीं होगा जहां ये तीन मूलभूत सुविधाएं आम लोगों को पूरी तरह मिल रही हो। जब आजादी के 63 साल बाद भी ये तीन चीजें आम लोगों तक नहीं पहुंचाई जा सकी है तो फिर इन्हें वेतन किस बात का? सिर्फ एय्याशी या लोकतंत्र के मंदिर में हंगामा करने का?
सवाल यह नहीं है कि सांसदों-विधायकों का वेतन क्यों नहीं बढ़े? बल्कि अब आम आदमी यह सवाल करने लगा है कि इन्हें आखिर वेतन ही क्यों दिया जाए? जब सवाल करने पैसे ये लेते हैं? सवाल नहीं करने के पैसे ये लेते हैंं? उद्योगों के हित में नीति बनाते समय पैसे ये खाते है? कब किसका टैक्स बढ़ाना है घटाना है के एवज में पैसे का लेनदेन होता है और संसद या विधानसभा की कार्रवाई के दौरान इन्हें जब भत्ते दिए जाते है तब वेतन क्यों।
क्या आम आदमी इस बात से अनभिज्ञ है कि पांच सौ पैतालीस सांसदों में से तीन सौ से ज्यादा सांसद करोड़पति है? इन्हें वेतन की जरूरत क्यों और किसलिए दी जानी चाहिए? आम लोगों के खून पसीने की कमाई पर अपना हित साधने की कोशिश अब बंद करनी ही होगी वरना इसका दुखद परिणाम भुगतने के लिए देश को तैयार होना होगा। इस देश का प्रति व्यक्ति की आय कितना है और नेताओं को कितना वेतन भत्ता सुविधा दिया जा रहा है? सकारी आंकड़े सच्चाई से कोसो दूर होता है और औसत के फेर में गरीब कैसे मरता है इसका उदाहरण है भारत का प्रति व्यक्ति आय। सरकारी आकड़े के मुताबिक भारत के प्रति व्यक्ति की आय लगभग 40 हजार रुपए वार्षिक है यानी महिने में तीन साढ़े तीन हजार रुपए। ऐसे में सांसदों-विधायकों को इससे ज्यादा वेतन की बात ही बेमानी है।
अब तो लोग आक्रोशित है और आने वाले दिनों में राजनैतिक दलों को इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ेगा। यदि बगैर वेतन के काम करने वाले लोग चुनाव लड़ेंगे तो उन्हें ही जनता अपना वोट देगी और यह स्थिति बनने भी लगी है।
00मालामाल सांसद
0 पांच सौ पैतालीस सांसदों में तीन सौ से ज्यादा करोड़पति है।
0 देश के प्रधानमंत्री भी विश्व बैंक में पूर्व नौकरीशुदा।
0 तीसरे मोर्चे की कमान संभालने वाले यादव बंधु दोनों अआय से अधिक संपत्ति के मामलों में कोर्ट के चक्कर काट रहे हैं।
0 गरीब और दलित लोगों के मसीहा पासवान हो या मायावती लोगों के पास कितना पैसा यह किसी से छुपा नहीं।
00 मंत्री बनने के बाद यह मिलता है सांसदों को
0 टाइप 8 बंगला, राज्यमंत्रियों को टाइप 7 बंगला।
0 कोई किराया नहीं, बिजली के बिल पर कोई लगाम नहीं।
0 मूल वेतन 16 हजार रुपए, भत्ता 1 हजार रुपए
0 संसदीय क्षेत्र भत्ता 20 हजार रुपए।
0 टेलीफोन : दो फोन और एक लाख 75 हजार फ्री कॉल।
0 हर साल ढाई हजार रुपए मोबाइल भत्ता।
0 मोबाइल हैंडसेट फ्री।
0 नि:शुल्क एयर टिकट।
0 परिवार के लिए साल में 48 यात्राएं।
0 जितना चाहें उतनी एसी कोच में यात्रा परिवार के साथ
स्टाफ : पर्सनल स्टाफ में इन लोगों की नियुक्ति किया जा सकता है।
एक प्राइवेट सेक्रेटरी, एक एडिशनल पर्सनल सेक्रेटरी, दो पर्सनल असिस्टेंट, एक हिन्दी स्टेनो, एक ड्राइवर, एक क्लर्क एक जमादार या चपरासी।
( यह केवल मंत्री का स्टाफ है मंत्रालय से अलग से स्टाफ मिलता है।)
रविवार, 22 अगस्त 2010
क्या सांसदों -विधायकों को वेतन लेना चाहिए?
दो दिन से मै सो नहीं सका , लोग क्यों नहीं निकल रहें है विरोध करने ,क्या राजनीती सिर्फ पैसे कमाने का जरिया बन गया है, गाँधी के इस देश में ये क्या हो रहा है,कंहा है समाज सेवी लोग , मै ठेका ले रहा हूँ , जब तक इन लोगो का वेतन बंद नहीं होगा या जब तक ऐसे लोगो को जो वेतन न ले संसद में नहीं पहुचेंगे चैन से नहीं बैठूँगा ,
आइये मेरा साथ दीजिये ,मैंने राष्टपति को भी पत्र लिखा है ,
आइये मेरा साथ दीजिये ,मैंने राष्टपति को भी पत्र लिखा है ,
शनिवार, 21 अगस्त 2010
पता नहीं बेटा...
पता नहीं बेटा...
बेटा- संगठन चुनाव में मोती लाल वोरा ने बाकी कांग्रेसियों को चारोखाने चित कर दिया।
पिताजी- हां बेटा। वोरा जी के सामने बाकी कोई लगते कहां है। सालों से उन्हीं का कब्जा है
बेटा- तो क्या छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की दुर्दशा के लिए वोरा जी ही जिम्मेदार हैं।
पिताजी- पता नहीं बेटा।
--------0-------
बेटा-भाजपा के प्रदेश प्रभारी नड्डा ने असंतुष्टों की खूब खबर ली। भ्रष्टाचारियों को लताड़ा।
पिताजी- हां बेटा। रमेश बैस पर उनका सीधा निशाना था।
बेटा- लोग कहते हैं नया मुल्ला यादा प्याज खाता है।
पिताजी- पता नहीं बेटा।
बेटा- संगठन चुनाव में मोती लाल वोरा ने बाकी कांग्रेसियों को चारोखाने चित कर दिया।
पिताजी- हां बेटा। वोरा जी के सामने बाकी कोई लगते कहां है। सालों से उन्हीं का कब्जा है
बेटा- तो क्या छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की दुर्दशा के लिए वोरा जी ही जिम्मेदार हैं।
पिताजी- पता नहीं बेटा।
--------0-------
बेटा-भाजपा के प्रदेश प्रभारी नड्डा ने असंतुष्टों की खूब खबर ली। भ्रष्टाचारियों को लताड़ा।
पिताजी- हां बेटा। रमेश बैस पर उनका सीधा निशाना था।
बेटा- लोग कहते हैं नया मुल्ला यादा प्याज खाता है।
पिताजी- पता नहीं बेटा।
शुक्रवार, 20 अगस्त 2010
मौते हुई तो सरकार की झूठ पकड़ी गई ...
वाह भाई! सरकार हो तो ऐसी हो! छत्तीसगढ़ की सरकार ने विधानसभा तक में कह दिया कि छत्तीसगढ़ से कोई पलायन नहीं होता। सरकार के इस दावे के पीछे तर्क था कि वह यहां के लोगों को न केवल दो रूपये किलो चावल दे रही है बल्कि रोजगार के पूरे साधन उपलब्ध करा रही है। सरकार के इस दावे पर स्वयं शासकीय अधिकारी भी गुण गान करते नहीं थकते थे। यहां तक कि रमन राज पर प्रशंसा के कसीदे पढ़ने वालों की भी कमी नहीं है जबकि आखबार सरकार की विफलता के उसके करतूतों के इतने खबरें छाप रहे हैं कि हर दिन एक ... सौ पृष्ठों की किताबें लिखी जा सकती है। वैसे इस सरकार के लोगों के पास अपनी बातें कहने या अफवाह फैलाने का अदम्य साहस है और झूठ को सच कहने के इस साहस का मैं शुरू से प्रशंसक रहा हूं।
गणेश भगवान को दूध पिलाने की बात हो या अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की बात हो। भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े होने का दावा हो या अल्पसंख्यक के दुश्मन के रूप में प्रस्तुति की बात हो 50 साल बनाम 5 साल के इनके नारो से आम लोगों को अपनी ओर खीचने की ताकत शायद इसी पार्टी में है। तभी तो लोग चिल्लाते रहे कि दो रूपया किलों चावल .... लोगों में बंट रहा है। गरीबी के सरकारी आंकड़े झूठे हैं लेकिन सरकार अपनी बातों पर तब तक अडिग रही जब तक फर्जी राशन कार्ड के मामले पकड़े नहीं गये अब जब कालाबाजारियों ने करोड़ों कमा लिये तब सरकार जाग रही है।
यही हाल पलायन के मुद्दे पर है। सरकार का दावा है कि वह गांव गांव में काम दे रही है पलायन का सवाल ही नहीं है। लेकिन यह सत्य पता नहीं सरकार को कैसे नहीं मालूम है कि पंचायत सचिव और संबंधित विभाग किस तरह से मजदूरों के नाम पर पैसा हड़प रहे हैं। कागजों में बनते सड़क और सरकारी भवनों की तरफ से इसलिए आंखे मूंदली जाती है कि ठेका लेने वाले उनके लोग सरपंच सचिव उनकी पार्टी के प्रतिनिष्ठा रखते हैं।
लेकिन कहा जाता है कि झूठ और अफवाह यादा दिन नहीं टिकते और अब राममंदिर के प्रति कथित निष्ठा की तरह सब कुछ सामने है। लेह में आई तबाही ने छत्तीसगढ़ सरकार के पलायन को लेकर किये गए दावे की सच्चाई सबके सामने खोलकर रख दी है।
अब भी समय है सरकार अखबारों की खबरों को संज्ञान में लेकर कार्रवाई करना शुरू कर दे तो आम जनता का राज आ जायेगा। सरकार को इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि उसके किस मंत्री की क्या रूचि है। देखते ही देखते 2-5 हजार करोड क़ा ... बनने वालों को सरकार छोड़ सकती है और कहने को वह बचा भी सकती है लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि उपर वाले से कोई नहीं बच सका है और बद्दूआंए काम करती ही है।
गणेश भगवान को दूध पिलाने की बात हो या अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की बात हो। भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े होने का दावा हो या अल्पसंख्यक के दुश्मन के रूप में प्रस्तुति की बात हो 50 साल बनाम 5 साल के इनके नारो से आम लोगों को अपनी ओर खीचने की ताकत शायद इसी पार्टी में है। तभी तो लोग चिल्लाते रहे कि दो रूपया किलों चावल .... लोगों में बंट रहा है। गरीबी के सरकारी आंकड़े झूठे हैं लेकिन सरकार अपनी बातों पर तब तक अडिग रही जब तक फर्जी राशन कार्ड के मामले पकड़े नहीं गये अब जब कालाबाजारियों ने करोड़ों कमा लिये तब सरकार जाग रही है।
यही हाल पलायन के मुद्दे पर है। सरकार का दावा है कि वह गांव गांव में काम दे रही है पलायन का सवाल ही नहीं है। लेकिन यह सत्य पता नहीं सरकार को कैसे नहीं मालूम है कि पंचायत सचिव और संबंधित विभाग किस तरह से मजदूरों के नाम पर पैसा हड़प रहे हैं। कागजों में बनते सड़क और सरकारी भवनों की तरफ से इसलिए आंखे मूंदली जाती है कि ठेका लेने वाले उनके लोग सरपंच सचिव उनकी पार्टी के प्रतिनिष्ठा रखते हैं।
लेकिन कहा जाता है कि झूठ और अफवाह यादा दिन नहीं टिकते और अब राममंदिर के प्रति कथित निष्ठा की तरह सब कुछ सामने है। लेह में आई तबाही ने छत्तीसगढ़ सरकार के पलायन को लेकर किये गए दावे की सच्चाई सबके सामने खोलकर रख दी है।
अब भी समय है सरकार अखबारों की खबरों को संज्ञान में लेकर कार्रवाई करना शुरू कर दे तो आम जनता का राज आ जायेगा। सरकार को इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि उसके किस मंत्री की क्या रूचि है। देखते ही देखते 2-5 हजार करोड क़ा ... बनने वालों को सरकार छोड़ सकती है और कहने को वह बचा भी सकती है लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि उपर वाले से कोई नहीं बच सका है और बद्दूआंए काम करती ही है।
छत्तीसगढ़ में कौन सी भाजपा का शासन है...
क्वीन बेटन को लेकर पूरे छत्तीसगढ़ में जो उत्साह का वातावरण बना वह यहां के लोगों के खेल भावना का घोतक है लेकिन पूरे देश में क्वीन बेटन का विरोध करने वाली भाजपा का छत्तीसगढ़ में बढ़चकर हिस्सा लेने से यह सवाल उठने लगा है कि क्या भाजपा में हाईकमान और पार्टी निर्देश छत्तीसगढ़ में बेमानी है या फिर यहां किसी और भाजपा का शासन है।
क्वीन बेटन दरअसल राष्ट्रमंडल खेल का वह मशाल है जो हर आयोजन के पहले राष्ट्रमंडलीय देशों में भ्रमण करता है। दिल्ली में इस बार इसका आयोजन है और क्वीन बेटन के उद्देश्य के प्रचार प्रसार के लिए इसे पूरे देश में घुमाया जा रहा है।
देश का प्रमुख राजनैतिक दल भारतीय जनता पार्टी इस मशाल को गुलामी का प्रतीक बताते हुए इसके भ्रमण की तीखी आलोचना की है। दिल्ली से लेकर झारखंड हो या बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश हर जगह भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता इसके विरोध में खड़े हो गए है और अपना आक्रोश प्रकट भी कर रहे है।
छत्तीसगढ़ में इसके आगमन की बात हुई तो लगा कि यहां भी भाजपा इसका विरोध करेगी और सरकार होने की वजह से क्वीन बेटन के रास्ते या तो बदल दिये जायेंगे या फिर छत्तीसगढ से ये चुपचाप गुजर जायेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। क्वीन बेटन पर न केवल भाजपाई बल्कि डॉ. रमन सिंह सरकार ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया।
भाजपा की इस दोगली नीति को लेकर भाजपा के ही कई कार्यकर्ता नाराज है। भाजपा के एक नेता ने तो नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि मंदिर मुद्दे की दोगलाई ने हमें केन्द्र से ढकेल दिया इसके बाद भी हम नहीं सुधर पाये हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि हाईकमान के विरोध के बावजूद जिस तरह से पूरी सरकार यहां क्वीन बेटन के स्वागत में पलक ....बिछाई रही वह आश्चर्य जनक है।
इसी तरह आर एस एस से जुड़े एक नेता ने कहा कि यह विडंम्बना है कि किसी मुद्दे पर हम एक नहीं हो पा रहे हैं जिसकी वजह से भाजपा की छिछालेदर हो रही है। अब तो यह सवाल उठने लगा है कि जहां-जहां भाजपा की सत्ता है क्या वहां वहां भाजपा के नेता अपने हिसाब से काम करेंगे।
बहरहाल इस मामले को लेकर आम लोगों में भी भाजपा की इस राजनीति की काफी तीखी प्रतिक्रिया है कुछ तो हाईकमान तक से सरकार की शिकायत करने का मन बना चुके है और गडकरी के सामने भी बात लाई जेयेगी।
क्वीन बेटन दरअसल राष्ट्रमंडल खेल का वह मशाल है जो हर आयोजन के पहले राष्ट्रमंडलीय देशों में भ्रमण करता है। दिल्ली में इस बार इसका आयोजन है और क्वीन बेटन के उद्देश्य के प्रचार प्रसार के लिए इसे पूरे देश में घुमाया जा रहा है।
देश का प्रमुख राजनैतिक दल भारतीय जनता पार्टी इस मशाल को गुलामी का प्रतीक बताते हुए इसके भ्रमण की तीखी आलोचना की है। दिल्ली से लेकर झारखंड हो या बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश हर जगह भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता इसके विरोध में खड़े हो गए है और अपना आक्रोश प्रकट भी कर रहे है।
छत्तीसगढ़ में इसके आगमन की बात हुई तो लगा कि यहां भी भाजपा इसका विरोध करेगी और सरकार होने की वजह से क्वीन बेटन के रास्ते या तो बदल दिये जायेंगे या फिर छत्तीसगढ से ये चुपचाप गुजर जायेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। क्वीन बेटन पर न केवल भाजपाई बल्कि डॉ. रमन सिंह सरकार ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया।
भाजपा की इस दोगली नीति को लेकर भाजपा के ही कई कार्यकर्ता नाराज है। भाजपा के एक नेता ने तो नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि मंदिर मुद्दे की दोगलाई ने हमें केन्द्र से ढकेल दिया इसके बाद भी हम नहीं सुधर पाये हैं। उन्होंने यहां तक कहा कि हाईकमान के विरोध के बावजूद जिस तरह से पूरी सरकार यहां क्वीन बेटन के स्वागत में पलक ....बिछाई रही वह आश्चर्य जनक है।
इसी तरह आर एस एस से जुड़े एक नेता ने कहा कि यह विडंम्बना है कि किसी मुद्दे पर हम एक नहीं हो पा रहे हैं जिसकी वजह से भाजपा की छिछालेदर हो रही है। अब तो यह सवाल उठने लगा है कि जहां-जहां भाजपा की सत्ता है क्या वहां वहां भाजपा के नेता अपने हिसाब से काम करेंगे।
बहरहाल इस मामले को लेकर आम लोगों में भी भाजपा की इस राजनीति की काफी तीखी प्रतिक्रिया है कुछ तो हाईकमान तक से सरकार की शिकायत करने का मन बना चुके है और गडकरी के सामने भी बात लाई जेयेगी।
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