शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

पुलक से पल्लवित होगा मूणत का खेल



सीतापुर तबादले में जाने के चार माह में ही वापसी
 एक तरफ जब पुरी भाजपा केन्द्र की कांग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार पर हल्ला मचा रही है तो वहीं दूसरी तरफ प्रदेश की भाजपा सरकार के मंत्री भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहे हैं । वैसे तो मुख्यमंत्री सहित सारे मंत्रियों पर भ्रष्ट अफसरों को बचाने का आरोप है लेकिन प्रदेश सरकार के मंत्री राजेश मूणत ने जिस तरह से चार महिने में ही पुलक भट्टाचार्य को वापस अपने विभाग में बुला लिया उससे सरकार की किरकिरी ही हो रही है ।
बेलगाम अफसर या प्रशासनिक आतंक की कहानी थमने का नाम ही नहीं ले रहा हैं । यही वजह है कि मंत्रियों की करतूत से जहां आम आदमी का बुरा हाल है वही भ्रष्ट अफसरों के मजे हैं । खासकर राजधानी में जमीन से जुड़े मामलों में मंत्रियों की रूचि देखते ही बन रही है । चौतरफा अंधेरगर्दी का आलाम यह है कि चहेते अफसरों के लिए नियम कानून तक ताक पर रखे जा रहे हे । यही वजह है कि चार महिने पहले नगर निगम रायपुर से सीतापुर भेजे गए तहसीलदार पुलक भट्टाचार्य की न केवल वापसी कर ली गई बल्कि कमल विहार जेसे महत्वपूर्ण योजना में बिठा दिया गया । कहां जाता है कि यह सारा खेल प्रदेश सरकार के मंत्री राजेश मूणत का है और उन्ही की रूचि के चलते पुल्लक भट्टाचार्य जैसे अफसर की चार महिने में ही वापसी हो गई ।
सूत्रों का कहना है कि पुलक भट्टाचार्य की वापसी के पीछे सिर्फ कमल विहार प्रोजेक्ट ही नहीं है बल्कि जमीन के दूसरे मामले भी है । दरअसल पुलक भट्टाचार्य पर यह भी आरोप है कि उनके कार्यकाल के दौरान राजधानी व इसके आस पास की जमीनों का जबर दस्त खेल हुआ है । सरकारी जमीनों की बंदर बांट से लेकर कब्जे की कहानी में पुलक भट्टाचार्य का नाम है और पुलक की वापसी की वजह भी जमीन ही है । सूत्रों की माने तो पुलक के पास नामी-बेनामी जमीनों की भरपूर जानकारी है और मंत्रियों को खुश रखने में माहिर मूणत को चार माह पहले दबाव में जब सीतापुर तबादला किया गया था तभी से उनकी वापसी की चर्चा रही है । कहा जाता हे कि तबादले के बाद भी राजेश मूणत से उनकी नजदीकी की चर्चा होते रही है ।
बंगाली मूल के इस अफसर की करतूतों की वैसे तो कई तरह की चर्चा है और कहां जाता है कि मंत्रियों के शह पर उन पर बेहिसाब संपत्ति अर्जित करने का भी आरोप है । कहा जाता है कि पुलक भट्टाचार्य की करतूतों से पार्टी के कई कार्यकर्ता नाराज है और यही वजह है कि संगठन खेमें ने भी उनकी वापसी का विरोध किया था लेकिन राजेश मूणत के जिद के आगे किसी की नहीं चली । इधर पुलक भट्टाचार्य की वापसी को लेकर कई ऐसे बिल्डर भी खुश है जो अवैध कब्जे में माहिर है जबकि रायपुर विकास प्राधिकरण में इसका भारी विरोध है ।
बहरहाल पुलक की वापसी से राजेश मूणत का कितना भला होगा यह तो वही जाने लेकिन सरकार के इस रूख से भाजपा को जरूर नुकसान हो सकता है ।

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

सत्ता से समृद्धि...


कभी राजनीति समाज सेवा का सबसे सशक्त माध्यम हुआ करता था । सादा जीवन उच्च विचार के मूलमंत्र से अभिभूत राजनीति में आने वाले की सेवा भाव देखते ही बनती थी । कांग्रेस हो या भाजपा, समाजवादी हो या कम्यूनिष्ट सबके लिए समाज सेवा प्रथम लक्ष्य रहा । ऐसे कितने ही उदाहरण रहे जब इस देश में नेताओं ने राजनैतिक सुचिता के लिए सत्ता की कुरसी को लात मारने से भी परहेज नहीं किया । खुद छत्तीसगढ़ में बैठी रमन सरकार की पार्टी में ही अटल-आडवानी से लेकर कई नाम लोगों को जुबानी याद हैं जिन्होंने राजनैतिक सुचिता के लिए अपना सब कुछ होम कर दिया । लेकिन क्या अब इसी पार्टी में ऐसा हो रहा है । भाजपा ही क्यों किसी भी पार्टी में ऐसा नहीं हो रहा है । अपराधियों को संरक्षण से लेकर खुद भ्रष्टाचार में डुबे लोग सत्ता का केन्द्र बने हुए है और ऐसे लोग बड़ी बेशर्मी से राजनैतिक सुचिता, ईमानदारी की बात करते नहीं थकते । http://naiaaaadee.blogspot.in/

शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013

हैट्रिक में जुटी रमन सरकार की बढ़ी मुश्किल


पिछली बार 18 कटी थी, इस बार 36 के हालात
सत्ता की हैट्रिक बनाने में जुटी रमन सरकर के सामने सबसे बड़ी दिक्कत उनके अपने विधायक ही बन रहे है॥ कहा जा रहा है कि रमन सरकार के अधिकांश मंत्रियों और विधायकों के प्रति लोगों में बेहद गुस्सा है। पिछले चुनाव में ऐसे ही हालात के चलते 18 विधायकों की टिकिट काटनी पड़ी थी जबकि इस बार कोयले की कालिख ने हालात और खराब कर दिए है और करीब 36 ऐसे विधायकों की सूची तैयार हो चुकी है जिनके टिकिट काटे जा सकते हैं।
इस साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर सरकार ने जोर शोर से तैयारी शुरु कर दी है और विपक्षी कांग्रेस का माकूल जवाब देने साम दाम दंड भेद की नीति अपनाई जा रही है। मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह इस बार विपक्ष के सीधे निशाने पर हैं तो इसकी वजह कोयले की कालिख के अलावा रोगदा बांध के3 अलावा शिक्षा कर्मियों , किसान और बेरोजगारी भत्ता को लेकर किया गया वादा खिलाफ़ी है।
हांलाकि डॉ रमन सिंअह ने विपक्षी हमले का जवाब ब्रह्मास्त्र से देने की बात कही है और यह ब्रह्मास्त्र क्या होगा इसका खुलासा नहीं हुआ है। डॉ रमन सिंह के इस हैट्रिक अभियान को चाक चौबंद करने भाजपा संगठन के अलावा आर एस एस और उसके अनुसागिंक संगठनों ने भी तैयारी शुरु कर दी है जबकि मुख्यमंत्री के खास अधिकारी भी इस अभियान में शामिल होने लगे हैं।
हालांकि कोयले की कालिख के अलावा भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर हमले कर रही कांग्रेसी नीति का क्या असर होगा यह तो बाद में ही पता चलेगा। लेकिन कांग्रेस की आक्रामक शैली से रमन सरकार के माथे पर बल पडऩे लगा है।
कांग्रेसियों द्वारा उठाए जा रहे मुद्दे से रमन सरकार कटघरे में नजर आ रही है और यही वजह है कि मुख्यमत्री डॉ रमन सिंह न केवल संघ के लोगों से लगातार बैठकें कर रहे हैं बल्कि ब्रह्मास्त्र होने की बात कर रहे हैं।
हालांकि विपक्षी कांग्रेस रमन सिंह के ब्रह्मास्त्र की बात को नजर अंदाज करने की कोशिश में है। लेकिन कांग्रेस यह जानती है कि सत्ता का ब्रह्मास्त्र क्या हो सकता है। भले ही वह मुख्यमंत्री रमन सिंह के ब्रह्मास्त्र को भगवान लक्ष्मण द्वारा छोड़े गए मेघनाथ के ब्रह्मास्त्र से तुलना कर रहे हैं लेकिन गुटबाजी में बटी कांग्रेस के पास लक्ष्मण के लिए संजीवनी लाने वाले हनुमान कौन होगें। इसका जवाब किसी के पास नहीं है। इसकी तरफ़ मुख्यमंत्री के ब्रह्मास्त्र बादक़ भी भाजपा की चिंता अपने ही विधायकों के प्रति जनता में उत्पन्न आक्रोश को लेकर भी है। कहा जाता है कि सरकार के कामकाज को लेकर करीब आधा दर्जन सर्वेक्षण हुए हैं और सभी सर्वेक्षणों में मंत्रियों व विधायकों के प्रति आक्रोश की बात अधिक है। इस सर्वे में टिकिट काटे जाने वाले विधायकों की संख्या अलग-अलग है लेकिन सूत्रों क अभी दावा है कि किसी भी सर्वे रिपोर्ट में यह संख्या दो दर्जन से कम नहीं है। बताया जाता है कि 50 विधायकों वाली सरकार में यदि दो-तीन दर्जन विधायकों की टिकिट काटने की नौबत आई तो बगावत से इंकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में भाजपा के लिए यह मुश्किल भरा काम हो सकता है। हालांकि संगठन सूत्रों का कहना है कि पिछली बार भी 18 विधायकों टिकिटें काटी गई थी तब कुछ नहीं हुआ था लेकिन इस बार मुख्यमंत्री की पहले जैसे छवि पर भी संगठन खेमा खामोश है। बहरहाल भाजपा की हैट्रिक में सबसे बड़े रोड़ा बन रहे उनके अपने विधायकों पर ब्रह्मास्त्र का क्या असर होगा यह चर्चा में है।

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

छत्तीसगढ़ के डेढ़ दर्जन आईएएस निकम्में व भ्रष्ट...


छत्तीसगढ़ के डेढ़ दर्जन आईएएस अफ़सर या तो निकम्मे हैं या भ्रष्ट हैं और इन्हें रमन सरकार ने केवल संरक्षण दे रखा है बल्कि महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी दे रखी है। कहा जाता है कि इन भ्रष्ट व निकम्मे अफ़सरों के खिलाफ़ कार्यवाई की बजाए रमन सरकार पूरी भाजपा का ही भ_ा बिठाने में लगी है। इन अफ़सरों की करतूत से न केवल छत्तीसगढ़ के विकास पर असर पड़ा है। बल्कि सरकारी खजाने का एक बड़ा हिस्सा भी इनकी जेब में चला गया है। यही नहीं अफ़सरों की करतूत की वजह से सरकार की साख पर भी धब्बा लग रहा है।
छत्तीसगढ़ की रमन सरकार के संरक्षण में निकम्मे एवं भ्रष्ट अफ़सरों के फ़लने फ़ूलने का सच किसी और ने नहीं वरन मुख्य सचिव सुनील कुमार की अध्यक्षता में गठित रिव्यू कमेटी ने उजागर किया है।
रिव्यू कमेटी ने 31 जनवरी को अपनी बैठक के बाद 25 साल की सेवा कर चुके आईएएस अफ़सरों के कार्यों की जांच कर रिपोर्ट तैयार की है। हालांकि केन्द्रीय कार्मिक विभाग के अफ़सरों के नहीं आने की वजह से सूची पर मुहर नहीं लग पाई। लेकिन सूत्रों का कहना है कि सुनील कुमार की अध्यक्षता वाली कमेटी ने 19 नाम तय किए हैं जो नौकरी में रखने लायक नहीं है।
सूत्रों का कहना है कि रिव्यू कमेंटी की रिपोर्ट के बाद न केवल आइएएस अफ़सरों बल्कि सरकार में भी हड़कम्प मचा हुआ है। एक तरफ़ सरकार के कई मंत्री ऐसे अफ़सरों को हटाकर सरकार की छवि सुधारने की बातें कर रहे हैं तो वहीं यह भी कहा जा रहा है कि सीएम इन्हे हटा कर कोई बखेड़ा खड़ा करना नहीं चाहते। हालांकि चर्चा इस बात की भी है कि भ्रष्ट अफ़सरों ने मुख्यमंत्री पर कार्यवाई नहीं करने का दबाव बना दिया है। ऐसे में रिव्यू कमेटी की रिपोर्ट को रद्दी की टोकरी में डाला जा सकता है।
हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों ने बताया है कि आइएएस अफ़सरों की कमी झेल रही सरकार के सामने सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि कई अफ़सरों का सीधे सरकार में बैठे लोगों से संबंध है और ऐसे में कार्यवाई के खिलाफ़ अफ़सरों ने मुंह खोल दिया तो सरकार को इस चुनावी साल में लेने के देने पड़ सकते हैं।
बहरहाल निकम्मे एवं भ्रष्ट अफ़सरों के खिलाफ़ कार्यवाई कर चुनावी साल में छवि सुधारने की कवायद में लगी रमन सरकार का रुख क्या होगा यह बाद में पता चलेगा।
19 अफ़सरों की सूची तैयार
हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों ने राज्य के भ्रष्ट व निकम्मे 19 आईएएस अफ़सरों के नाम बताते हुए कहा कि सूची को लेकर विवाद इसलिए भी है क्योंकि सुनील कुमार की अध्यक्षता वाली इस टीम में मालिक मकबूजा कांड के आरोपी नारायण सिंह की सवालों के घेरे में है। जबकि सूची में दो सीनियर अफ़सरों के अलावा, प्रिंसिपल सेक्रेटरी के नाम भी शामिल है। इनमें से एक के खिलाफ़ डीई तक चल रही है। जबकि मालिक मकबूजा से लेकर बारदाना और चिकित्सा उपरकरण की खरीदी के अलावा कई घोटालेबाज चर्चित अफ़सरों के नाम सूची में शामिल हैं। रिव्यू कमेटी के सदस्य के मुताबिक इन अफ़सरों की करतूतों की वजह से बाकी अफ़सर बदनामी झेल रहे हैं। इसलिए कार्यवाई जल्द होनी चाहिए।

बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

सरकार का सच ! सुराज का झूठ...


गाँव से लेकर शहर तक सुराज और विकास का ढिंढोरा पिटने में लगी रमन सरकार भले ही सत्ता की चकाचौंध में आम आदमी की पीड़ा नहीं देख पा रही हो, अपनी चमचमाती गाडिय़ों के फर्ऱाटे से उड़ रही धूल की दिक्कतों से वे अनजान हों या लालबत्ती की धौंस से यातायात में फ़ंसने वाली भीड़ की परेशानी गाडिय़ों के काले शीशे से वे पार न देख रहे हों पर हकीकत में सिफऱ् दो रुपए किलो चावल दे देने से जीवन नहीं चलता।
जीवन चलता है रोटी कपड़ा मकान के अलावा बेहतर शिक्षा, बेहतर चिकित्सा सुविधा और भयमुक्त वातावरण से। लेकिन 9 साल में रमन सरकार ने विकास की जो लकीर खींचने की कोशिश की है। उसका आम आदमी की तकलीफ़ों से कोई लेना-देना नहीं है। बल्कि खेती की बरबादी और नदियों के पानी को प्रदूषित करते उद्योग से आने वाली पीढियों के लिए खतरा साफ़ नजर आ रहा है।

सुराज का सपना तो रमन सरकार ने अपने पहले ही संकल्प से मुकर कर तोडऩा शुरु कर दिया था और दूसरी पारी के लिए संकल्प से दूर भागने की कोशिश ने रही सही कसर पूरी कर दी। नौ साल में सरकार ने कितना विकास किया है और कैसा सुराज है यह उनके जनदर्शन ही नहीं जिला कलेक्टरों को मिल रहे आवेदनों की संख्या से साफ़ दिखने लगा है। आवेदनों की बढती संख्या से साफ़ है कि लोग भ्रष्ट तंत्र, निरंकुश नौकरशाह और मूलभूत सुविधाओं के अभाव से त्रस्त हैं और इसकी अनदेखी का परिणाम भयावह हो सकता है। राÓय बनने के बाद किसी ने नहीं सोचा था कि सरकार की प्राथमिकता इस कदर बदल जाएगी कि लोग बेहतर चिकित्सा सुविधा, बेहतर शिक्षा से वंचित हो जाएगें। निजी स्कूलों और निजी स्कूलों और निजी चिकित्सालयों को लूट की खुली छूट होगी और निजी संस्थानों को बढाने सरकारी संस्थानों को बरबाद कर दिया जाएगा। राÓय निर्माण के दौरान कर मुक्त राÓय और सरप्लस बिजली के चलते हर खेत में पानी की बात बेमानी हो जाएगी और सफ़सरों व नेताओं का राजधानी प्रेम के चलते ग्रामीण अंचल उपेक्षित हो जाएगा। यह सच है कि सरकार के पास जादू की छड़ी नहीं होती कि रातों रात समस्याएं दूर हो जाए लेकिन ऐसा भी नहीं है कि हर ब्लाक में सर्वसुविधा युक्त अस्पताल और बेहतर कालेज न खोला जा सके। ताकि लोगों को इसके लिए भी राजधानी का मोहताज रहना पड़े।  सरकार भले ही निजी क्षेत्रों को बढावा देने कौडिय़ों के मोल जमीन दे रही है। लेकिन यह भी सरकार की सोच की वजह से राजधानी तक ही सिमट कर रह गया है। मूलभूत सुविधाओं से वंचित लोगों का आक्रोश चरम पर है और रमन सरकर सुराज के झूठ पर खड़ी नजर आ रही है। तभी तो भ्रष्टाचार और अव्यवस्था ने लोगों की सहनशीलता को तार-तार करना शुरु कर दिया है। अपनी मांगों के लिए लोग कानून हाथ में लेने लगे हैं। हालांकि हम किसी भी मांग के लिए कानून हाथ में लेने की किसी भी मांग का समर्थन नहीं करते लेकिन अपने हक के लिए लोगों को न केवल बाहर आना चाहिए बल्कि अव्यवस्था के खिलाफ़ आवाज बुलंद करना चाहिए। राजधानी के पेंशनबाड़ा स्थित प्री मैट्रिक छात्रावास के ब'चों ने जिस तरह बेबाकी और हिम्मत से काम किया है वह बाकी लोगों के लिए सीख बन सकती है। छात्रावास में रहने वाले इन ब'चों ने अव्यवस्था के लिए सबसे शिकायत की थी और जब उनकी नहीं सुनी गई तो इन ब'चों ने छात्रावास में ताला जड़ सहायक आयुक्त को अव्यवस्था देखने के लिए मजबूर कर दिया। यहाँ तक कि सहायक आयुक्त आर के सिदार को कलेक्टोरेट से छात्रावास तक कार छोड़कर पैदल जाना पड़ा। छात्रावास के ब'चों के इस कदम से प्रशासनिक तंत्र में हड़कम्प है और सरकार के माथे पर बल पडऩा भी स्वाभाविक है लेकिन इस एक घटना से सरकार का सच तो सामने आया ही है सूराज के झूठ से भी परदा उठा है। राजधानी में यह हाल है कि तो प्रदेश के दूसरे हिस्सों का क्या हाल होगा। यह सुराज एवं विकास के दावे करने वालों को सोचना होगा।?सुराज का सपना तो रमन सरकार ने अपने पहले ही संकल्प से मुकर कर तोडऩा शुरु कर दिया था और दूसरी पारी के लिए संकल्प से दूर भागने की कोशिश ने रही सही कसर पूरी कर दी। नौ साल में सरकार ने कितना विकास किया है और कैसा सुराज है यह उनके जनदर्शन ही नहीं जिला कलेक्टरों को मिल रहे आवेदनों की संख्या से साफ़ दिखने लगा है। आवेदनों की बढती संख्या से साफ़ है कि लोग भ्रष्ट तंत्र, निरंकुश नौकरशाह और मूलभूत सुविधाओं के अभाव से त्रस्त हैं और इसकी अनदेखी का परिणाम भयावह हो सकता है। राÓय बनने के बाद किसी ने नहीं सोचा था कि सरकार की प्राथमिकता इस कदर बदल जाएगी कि लोग बेहतर चिकित्सा सुविधा, बेहतर शिक्षा से वंचित हो जाएगें। निजी स्कूलों और निजी स्कूलों और निजी चिकित्सालयों को लूट की खुली छूट होगी और निजी संस्थानों को बढाने सरकारी संस्थानों को बरबाद कर दिया जाएगा। राÓय निर्माण के दौरान कर मुक्त राÓय और सरप्लस बिजली के चलते हर खेत में पानी की बात बेमानी हो जाएगी और सफ़सरों व नेताओं का राजधानी प्रेम के चलते ग्रामीण अंचल उपेक्षित हो जाएगा।
यह सच है कि सरकार के पास जादू की छड़ी नहीं होती कि रातों रात समस्याएं दूर हो जाए लेकिन ऐसा भी नहीं है कि हर ब्लाक में सर्वसुविधा युक्त अस्पताल और बेहतर कालेज न खोला जा सके। ताकि लोगों को इसके लिए भी राजधानी का मोहताज रहना पड़े।
सरकार भले ही निजी क्षेत्रों को बढावा देने कौडिय़ों के मोल जमीन दे रही है। लेकिन यह भी सरकार की सोच की वजह से राजधानी तक ही सिमट कर रह गया है। मूलभूत सुविधाओं से वंचित लोगों का आक्रोश चरम पर है और रमन सरकर सुराज के झूठ पर खड़ी नजर आ रही है।
तभी तो भ्रष्टाचार और अव्यवस्था ने लोगों की सहनशीलता को तार-तार करना शुरु कर दिया है। अपनी मांगों के लिए लोग कानून हाथ में लेने लगे हैं। हालांकि हम किसी भी मांग के लिए कानून हाथ में लेने की किसी भी मांग का समर्थन नहीं करते लेकिन अपने हक के लिए लोगों को न केवल बाहर आना चाहिए बल्कि अव्यवस्था के खिलाफ़ आवाज बुलंद करना चाहिए।
राजधानी के पेंशनबाड़ा स्थित प्री मैट्रिक छात्रावास के ब'चों ने जिस तरह बेबाकी और हिम्मत से काम किया है वह बाकी लोगों के लिए सीख बन सकती है। छात्रावास में रहने वाले इन ब'चों ने अव्यवस्था के लिए सबसे शिकायत की थी और जब उनकी नहीं सुनी गई तो इन ब'चों ने छात्रावास में ताला जड़ सहायक आयुक्त को अव्यवस्था देखने के लिए मजबूर कर दिया। यहाँ तक कि सहायक आयुक्त आर के सिदार को कलेक्टोरेट से छात्रावास तक कार छोड़कर पैदल जाना पड़ा।
छात्रावास के ब'चों के इस कदम से प्रशासनिक तंत्र में हड़कम्प है और सरकार के माथे पर बल पडऩा भी स्वाभाविक है लेकिन इस एक घटना से सरकार का सच तो सामने आया ही है सूराज के झूठ से भी परदा उठा है।
राजधानी में यह हाल है कि तो प्रदेश के दूसरे हिस्सों का क्या हाल होगा। यह सुराज एवं विकास के दावे करने वालों को सोचना होगा।?

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

पुलिस भी करती है गांजा तस्करी....


छत्तीसगढ़ की पुलिस क्या नहीं करती, इस सवाल का जवाब देने में भले ही पुलिस के उ'चाधिकारियों को समय लग सकता है लेकिन किसी भी आम आदमी के लिए इसका जवाब देना आसान है। अवैध दारु-गांजा बेचने वालों या सटोरियों से वसूली तो कई राÓयों में होती होगी। लेकिन छत्तीसगढ़ पुलिस में पदस्थ सिपाही से लेकर ए एस आई भी गांजा तस्करी करते हैं। यह बात कोई विश्वास भले ही न करे लेकिन यह सच है। इस खेल में लगे पुलिस कर्मियों के खिलाफ़ भले ही छत्तीसगढ़ पुलिस कार्यवाई करने से हिचक रही हो लेकिन मध्यप्रदेश की पुलिस ने छत्तीसगढ़ पुलिस के एक ए एस आई अखिल पाण्डेय को गिरफ़्तार किया है। गौरेला के एस डी ओपी कार्यलय में संलग्न अखिल पाण्डेय के खिलाफ़ कार्यवाई मध्यप्रदेश की शहडोल जिले की पुलिस ने की है। गिरफ़्तारी के दौरान अखिल पाण्डेय ने भागने की कोशिश भी की थी।
ऐसा नहीं है कि छत्तीसगढ़ पुलिस में पदस्थ कर्मियों की यह पहली करतूत है। इससे पहले भी कई तरह की करतूतों की वजह से छग पुलिस शर्मशार हुई है और छग पुलिस की करतूतों की वजह से गृहमंत्री ननकी राम कंवर को विधान सभा में यह कहना पड़ा था कि थानेदार आम आदमियों से Óयादा शराब ठेकेदारों की सुनते हैं और दस-दस हजार रुपए में थाने बिके हुए हैं। अपराधियों से सांठ-गांठ के लिए चर्चित कई पुलिस वाले तो सेवानिवृत्ति के बाद भी संविदा में नियुक्ति पाने में सफ़ल हो गए हैं। इसमें एक दलाल किस्म के अधिकारी की संविदा पर तो सरकार तक कटघरे में है।
पेशी के दौरान अपराधियों के साथ मौज मस्ती करना तो आम बात हो गई है जबकि अपराधियों को भागने तक का मौका देने में छत्तीसगढ़ पुलिस कम बदनाम नहीं है। मन्नु नत्थानी हो या राजेश शर्मा, तापडिय़ा हो या कोई और अपराधी पुलिस वालों के इशारे पर ही फऱार है। बिलासपुर एस पी राहुल शर्मा कि मौत के मामले को सीबीआई को सौंपना पड़ा है। कहा जाता है कि लोहा और कोयला चोरों के खिलाफ़ कड़ी कार्यवाई करने वजह से उन पर बेहद दबाव बना था जबकि राजधानी में बद्री जैसे मिलावट खोरों पर हाथ डालने की वजह से शशिमोहन जैसे सीएसपी की हालत क्या हुई यह किसी से छिपा नहीं है।
अपराधियों को संरक्षण के अलावा अपराध कि विवेचना और गलत-सलत रपट लिखने के मामले में भी छत्तीसगढ़ पुलिस का जवाब नहीं है। तभी तो डीजीपी को हाईकोर्ट जाकर लिखित में आश्वासन देना पड़ा।
आखिर छत्तीसगढ़ की पुलिस की बढ़ती लापरवाही और अपराधियों से सांठ-गांठ का असर क्या होगा यह तो भविष्य के गर्भ में है। लेकिन शहडोल पुलिस की कार्यवाई से यह स्पष्ट हो गया कि पुलिस सिफऱ् गांजा तस्करों से वसूली का ही काम नहीं करती बल्कि तस्करी में भी शामिल है। आखिर उड़ीसा से बड़े पैमाने पर खपाए जा रहे गांजे की खपत किसी से छिपी नहीं है।
चलते-चलते
छत्तीसगढ़ पुलिस के उ'चाधिकारियों की अनदेखी की वजह से करीब डेढ़ सौ थानेदार यानी वरिष्ठ इंस्पेक्टर बगैर पदोन्नति के रिटायर्ड हो जाएगें। इस पर पहली प्रतिक्रिया अ'छा हुआ कहें तो सजा के हकदार थे और दूसरी प्रतिक्रिया "बाम्बरा जैसे लोग रहेगें तो ऐसा ही होगा।

सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

पेलिहा ले पंगनहा हारय


परन दिन खल्लारी के मड़ई म बिसरु ल भेंट डारेवं। पूछेवं कईसे बिसरु का हाल-चाल हे। धान-वान बने हो ए हे?
अतका ल सुनिस तहां ल बिसरु बईहा होगे। का महाराज आजकल आस जास नहीं। जा के गाँव ल देख धान-पान  ल चाटबो। ग़ांव ह बिगड़त हे। आजकल के नवा-नवा टूरा  मन ह कखरों नई सुनत हे। भ_ी वाला ह गांवएच म दुकान ल खोल दे हे अउ पीए बर थोड़ बहुत मंद-महुआ बनात रहेन तउना म छेका करथे। अऊ नान  नान टूरा मन ह घलो मन्दु होगे हे। चोरी-हारी बाढ़ गे हे। कुछु ल छोड़े नई सकस। ए दे मड़ई आय हावव तेमा मोर धियान घर डहार लगे हे। झिम झाम देखिस तहां ले कुछु ल उठा के लेग जथे। सित बाबा के घंटी घलो  नई बाजिस। मंदिर देवाला म चोरी हारी होवत हे। घोर कलजुग आगे हे। मय ह केहेवं - छोड़ न बिसरु चार दिन जीना हे, काबर टेंसन ले थस। कईसे फि़कर नई करहूं महाराज। गाँव ल बनाए बर का उदीम नई करे हन। डांड़-बोड़ी ले बर अपन-तुपन नई देखेन। अउ आज जेन ल देख तउने ह दूसर के जीनिस ल हड़पे म लगे हे। अनियाव ला कलेचुप देख कथें। कईसे देखबे? तय कुछु काह गा अनियाव होवत नई देखव। मरते मर जहूं महाराज , फ़ेर गलत के बिरोध ल नई  छोड़वं। तय त पतरकार हस्। बने भसेड़ के छपबे तभे सु्धरही।
बिसरु के बात सुन के मय ह दंग रहिगेंव। ए उमर म घलो वो ह नियाव बर सब ले लड़े-भिड़े बर तइयार रथे। अऊ एक झन उही गाँव के राम लाल हे। वोला अपन सुवारथ के आगु कुछु नई दिखय। ते म त भ_ी वाला मन के दू चार सौ रुपया के सेती गाँव म भ_ी वाला मन ल दारु बेचे बर जगह देहे हे। पेलिहा अतका के लउड़ी बेडग़ा धर के भिड़ जथे। तभे त बिसरु ह कहाय वोला सरपंच झन चुनव, वो ह गांव ल बेच दिही। फ़ेर बिसरु जईसे मन के बात ल कोन सुनथे। आज कल त परबुधिया मन के कोनो कमी नईए। दूचार रुपया बर लुहुर-टुपुर करत रथे। छत्तीसगढिय़ा मन के इही परबुधिया होय के सेती त कतकोइन झन मजा उड़ावत हे। अऊ छत्तीसगढिय़ा मन ह दू रुपया किलो के चांऊर मा भुलाए हे। चुनई आथे चेपटी पाथे। तहां ले जम्मो पीरा ल भुला जथे। दूचार बिसरु असन लड़ईया मन के कोनो पुछन्ता नईए। अऊ जादा होईस त कही देथे, एखर त कामेच इही हे। अब सरकार ह काय काय ल देखही। अऊ बिकास करे म दू चार बांध तरिया, गऊठान त पटाबेच करही। उद्योग ह हवा म नई लगय। खेत खार ल बेच दे के हल्ला करईया मन के का हे वो मन त कोइला के कालिखेच देखत रथे। ए नई दिखते हे के सरकार ह कइसे गरीब मन ल चांऊर देवत हे। पढ़ईया टूरी मन ल सइकिल देवत हे। बिसरु असन मन ल त खाली मंत्री विधायक के गाड़ी अऊ खेत खार के खरीदीच ह दिखथे।