मंगलवार, 24 मार्च 2020

जिनसे लोकतंत्र को खतरा बयाया उन्हीं से जा मिले गोगोई


दो हजार अठ्ठारह की जनवरी में जब जस्टिज रंजन गोगोई ने प्रेस कांफ्रेस लेकर जिस सत्ता को लोकतंत्र के लिए खतरा बताया था और आज जबप वे सेवानिवृत्ति के बाद उन्हीं सत्ता के साथ खड़ा हो जाते हैं तो इस परिस्थिति को कोई कैसे देखेगा? सवाल यह नहीं है कि इस देश में ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है सवाल यह भी नहीं है कि इससे पहले जब कांग्रेस की सत्ता भी यही करते रही है। सवाल है कि कांग्रेस ने यदि कोई गलत किया तो क्या वर्तमान सत्ता को भी गलत करना चाहिए।
देश के राष्ट्रपति ने जैसे ही पूर्व जस्टिज रंजन गोगोई का नाम राज्यसभा के लिए प्रेषित किया वैसे ही पूरे देश में यह बहस छिड़ गई कि क्या यह सही फैसला है। बहस इस बास की भी होने लगी कि क्या जिसे लोकतंत्र के लिए उन्होंने खतरा बताने के लिए प्रेस कांफ्रेंस तक ले डाली थी वह सत्ता आज उन्हें अनुकूल कैसे हो गई। इस बहस में यह सवाल भी उठकर सामने आयें है कि तब उनके फैसले न्याय के अनुरूप थे या सत्ता के अनुरूप थे। राफेल से लेकर उनके कितने ही फैसले को लेकर सवाल गहराने लगे हैं तब संवैधानिक संस्थानों की साख कहां रह जायेगी।
रंजन गोगाई को लेकर उठ रहे इन सवालों का जवाब रंगनाथ मिश्रा से लेकर हिदायतुल्ला तक दिया जा रहा है लेकिन इस फैसले ने लोकतंत्र की चिंता तो बढ़ा रही है।

मॉल की छत में चल रहे हुक्का बार में छापा



सौरभ धाड़ीवाल और भूपेन्द्र माखीजा चला रहे थे
विशेष प्रतिनिधि
रायपुर। प्रदेश सरकार के द्वारा हुक्का बार प्रतिबंधित करने के बाद भी कलर्स मॉल में हुक्का पार्लर चलाने वाले सौरभ धाड़ीवाल और भूपेन्द्र माखीजा को गिरफ्तार तो किया लेकिन नशीली सामग्री मिलने के बाद भी जानबूझकर केस को कमजोर किया गया। क्या धाड़ीवाल और माखीजा के खिलाफ कमजोर केस दबाव में बनाया गया।
छत्तीसगढ़ सरकार ने हुक्का पार्लरों में चल रहे नशे के व्यापार को देखते हुए इसे प्रतिबंधित तो किया है लेकिन अभी भी शहर के कई जगहों पर चोरी छिपे हुक्का पार्लरों का न केवल संचालन किया जा रहा है बल्कि इन पार्लरों में तम्बाकू सहित अन्य नशीले पदार्थों का भी धड़ल्ले से उपयोग किया जा रहा है।
ताजा मामला कर्लर मॉल के छत पर चल रहे टॉय हुक्का पार्लर का है। इस छापे ने शहर में चल रहे चोरी छिपे हुक्का पार्लरों की न केवल कलई खोल दी बल्कि छापे के बाद पुलिस पर दबाव का जो खेल चला वह भी साबित करता है कि किस तरह से पहुंच वाले लोग कानून को ठेंगा दिखकर हुक्का पार्लरों का संचालन कर रहे हैं। आखिर सौरभ धाड़ीवाल और भूपेन्द्र माखीजा कौन है यह तो शीघ्र ही खुलासा हो जायेगा लेकिन पुलिस ने यहां कुल छ: लोगों को गिरफ्तार किया है।

सोमवार, 23 मार्च 2020

खबर का असर, शराब तस्कर गिरफ्तार


टिकरापारा इलाके में होली पूर्व जब्त की गई 175 पेटी शराब के तस्करों की आखिर गिरफ्तारी हो ही गई। रसूखदार माने जाने वाले इन तस्करों ने गिरफ्तारी से बचने के उपाय में कोई कमी नहीं छोड़ी थी और पुलिस के कुछ दलाल भी सक्रिय थे लेकिन सेंटिंग की खबर प्रकाशित होते ही पुलिस को गिरफ्तार करना पड़ा।
ज्ञात हो कि हमने रायपुर व आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में अवैध शराब में शामिल तस्करों को लेकर कई बार खबर प्रकाशित की है लेकिन शराब तस्करों की पहुंच के आगे हर बार मामला रफा दफा कर दिया जाता था लेकिन होली पूर्व टिकरापारा ईलाके में ट्रक से करीब 175 पेटी शराब जब्त होने के बड़े मामले ने सरकार की नींद उड़ा दी इतना ही नहीं इस मामले को भी रफा दफा करने की कोशिश में राजेश सावलानी, विजय रामानी, राजेश मोटवानी सक्रिय हो गये थे और पुलिस के कुछ दलाल भी उच्चाधिकारियों से संपर्क बना रहे थे और जिसकी सूचना जैसे ही हमारे संवाददाता को हुई इसे प्रमुखता से प्रकाशित किया गया।
खबर के प्रकाशित होते ही हड़कम्प मच गया और तस्करों का खेल बिगड़ गया। पुलिस ने इस मामले में महावीर नगर निवासी राजेश मोटवानी और राजेन्द्र नगर निवासी विजय रामानी के बाद खम्हारडीह के राजेश सावलानी को धर दबोचा। इसके बाद चौबे कालोनी के रुकु खान को भी पकड़ा गया। बताया जाता है कि इन तस्करों द्वारा लंबे अरसे से अवैध शराब की तस्करी की जा रही थी और सूत्रों का दावा है कि इनके कारनामों की खबर कुछ थाना प्रभारियों को भी है जिन्हें हर माह बंधी बंधाई रकम भी दी जाती है।
इस मामले में सिटी एसपी प्रफुल्ल ठाकुर ने कहा कि अवैध शराब बिक्री के मामले में किसी को बख्शा नहीं जायेगा। हालांकि इन तस्करों से संबंध रखने वाले थानेदारों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई है। बहरहाल शराब तस्करों के इस खेल में लाखों रुपयों के व्यारे-न्यारे की कहानी भी चर्चा में है। देखना है कि इस मामले को रफा-दफा करने वाले दलाल कब गिरफ्त में आते हैं।

रविवार, 22 मार्च 2020

निजी अस्पतालों में लूट की छूट


जमीन तक लिखवा ले रहे हैं डाक्टर!
विशेष प्रतिनिधि
रायपुर। छत्तीसगढ़ में ईलाज के नाम पर डाक्टरों द्वारा चल रही लूट खसोट नया नहीं है लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद जब टीएस बाबा स्वास्थ्य मंत्री बने तो लोगों को उम्मीद थी कि बहुत कुछ ठीक कर लिया जायेगा लेकिन हॉल ही में श्री नारायणा हा
स्पिटल देवेन्द्र नगर का जो मामला सामने आया है उसके बाद तो यह स्पष्ट है कि स्वास्थ्य मंत्री को कोई मतलब नहीं है और रसूखदार राजनैतिक एप्रोच वाले डाक्टरों की मनमानी के आगे पूरी सरकार ही नतमस्तक है। आम आदमी ईलाज के नाम पर जमीन जायदाद बेच रहे हैं और कई अस्पतालों के डाक्टरों द्वारा इलाज का खर्चा नहीं पटाने पर स्टाम्प पेपर में जमीन तक लिखवा दी जा रही है।
छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित स्वास्थ्य घोटाले और स्लाटर हाउस बनते निजी अस्पतालों को लेकर हमने कई रिपोर्ट प्रकाशित की है लेकिन लगता है स्वास्थ्य मंत्री टीेस बाबा को इन बातों से कोई लेना देना नहीं है। अडानी से सेंटिंग के लिए चर्चित टीेस बाबा पर अब बड़े निजी अस्पतालों से भी सांठ-गांठ के किस्से जन चर्चा का विषय बन गया है। बताया जाता है कि जिलों के स्वास्थ्य अधिकारियों का निजी अस्पताल प्रबंधकों से न केवल गठजोड़ है बल्कि हर माह बंधी बंधाई रकम की वसूली के भी चर्चे हैं।
ताजा मामला तिल्दा विकासखण्ड निवासी निषाद परिवार का है जिसके एक सदस्य को सड़क दुर्घटना के बाद श्री नारायणा हास्पिटल देवेन्द्र नगर में एडमिट किया गया जहां बताया गया है छत्तीसगढ़ सरकार की योजना के तहत केवल राशन कार्ड से ईलाज किया जायेगा। लेकिन अस्पताल प्रबंधन ने ईलाज के नाम पर दवाई के नाम पर अलग से पैसे लगने की बात कही और जब वे  ईलाज का खर्चा उठाने में असमर्थता जाहिर करते हुए डिस्चार्ज करने की बात कही तो ढाई लाख देने के बाद ही डिस्चार्ज करने की बात कहीं। दुर्घटनाग्रस्त परिवार के विजय निषाद ने प्रेस क्लब में अपनी आप-बीती बताते हुए कहा जय निषाद पिता श्री अर्जुन निषाद निवासी राम औरिगन, तिल्दा, जिला रायपर छग का निवासी हूँ। दिनांक 02.03.2020 को मेरे पापा का किसी ने कार से एक्सीडेंट करके वहां से भाग गया जिसका ईलाज के लिए मैने श्री नारायणा हॉस्पीटल देवेन्द्र नगर में एडमीट किया डॉ. ने कहा कि आपके पापा के ऑपरेशन का खर्चा राशन कार्ड के द्वारा हो जायेगा और जो दवाई का खर्चा आयेगा वह आपको करना पड़ेगा दिनांक 14.03.2020 तक दवाई में हमने 1 लाख रुपये लगभग दवाई में लगा चुके हैं हमारे पास ईलाज के लिए और पैसे नहीं है तो हम अपने पिताजी का ईलाज सरकारी हॉस्पिटल में करना चाहते है जिसके लिए हम डॉक्टरों से पांच दिन से डिस्चार्ज करने के लिए बोल रहे हैं लेकिन वे लोग बोल रहे हैं पहले 2.50 लाख रुपये जमा करो फिर डिस्चार्ज करेंगे बोल रहे हैं। हमें ईलाज करने से पहले हमें नहीं बताया गया था कि ीलाज करने में 2.5 लाख रुपये लग जायेगा और हमें बार-बार धमकी देते हैं कि आप यहां पर साईन किये हैं हमें पता नहीं था कि उसमें क्या लिखा है हम लोग सोंचे कि डॉ. लोग हमें राशन कार्ड से ईलाज करवाने के लिए हस्ताक्षर ले रहे हैं। हमें पता नहीं था कि उसमें क्या लिखा है। अभी हमें जो भी दवाई का खर्चा आ रहा है। उसका वहन करने में हमें काफी परेशानी हो रही है हम लोग मजदूरी का काम करते हैं। हमारे पास ईलाज के लिए पैसा नहीं हो पा रहा है जिससे हमारे पिताजी का ईलाज नहीं करेंगे बोल रहे है और 2.5 लाख दोगे तभी आगे का ईलाज हो पायेगा ऐसा बोल तो अभी एटीएच क्लब द्वारा 2-3 दिन से हमें दवाई का खर्चा दिया जा रहा है। एटीएच क्लब द्वारा जब हमें बाहर से दवाई लाकर दिया गया तो पता चला कि दवाई कॉफी कम रेट में प्राप्त हुआ जो कि हॉस्पिटल के दवाईयों से कॉफी कम था। हॉस्पिटल के दवाईयों का तुलना किया गया तो दवाई का रेट बाहर के दवाई के रेट से हॉस्पीटल के दवाईयों का रेट तीन गुना ज्यादा अंतर था।
 इस दौरान वहां मौजूद एटी एच के आर्यन राव ने भी अस्पताल प्रबंधन के रवैया की आलोचना की। सूत्रों की माने तो नारायणा अस्पताल को एक दमदार पूर्व मंत्री का वरदहस्त है और वे उनके रिश्तेदारी में भी आते हैं और यही वजह है कि इस अस्पताल की शिकायतों को नजरअंदाज कर दिया जाता है।

शनिवार, 21 मार्च 2020

विभीषण होने के मायने


इतिहासत का एक ऐसा पात्र जिसने ईश्वर भक्ति में स्वयं को प्रमाणित करने का कोई मौका नहीं छोड़ा। इसमें कतई संदेह भी नहीं है कि वे सबसे बड़े रामभक्त थे लेकिन उसे न तो समाज ने स्वीकारा न ही किसी और ने? जी हां हम यहां बात कर रहे हैं विभिषण का!
इतिहास गवाह है कि उनसे बड़ा रामभक्त कोई नहीं हुआ जिसने अपने कुल की परवाह नहीं की लेकिन यह भी सच्चाई है कि कोई भी मानव समाज न तो विभिषण बनना चाहता है और न ही कोई भी अपने पुत्र का नाम ही विभिषण रखना चाहता है ऐसे में ग्वालियर के महाराजा ज्योतिरादित्य को उसके मुंह के सामने ही मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री का विभिषण कहना? क्या बतलाता है आसानी से समझा जा सकता है। कांग्रेस में उपेक्षा और अपमान की जिस पीड़ा का ज्योतिरादित्य ने जिक्र करते हुए भाजपा प्रवेश की वजह बताई वह सम्मान उन्हें मुंह पर ही विभिषण के रुप में मिलने पर कैसा महसूस हुआ होगा यह तो वही जाने लेकिन राजनीति के विश्लेषक भी इस संबोधन से हैरान है।
हालांकि राजनीति के बारे में कहा जाता है कि यहां कोई स्थाई दोस्त और दुश्मन नहीं होता। सब कुछ परिस्थितिजन्य होता है। लेकिन एक बात तो तय है कि मोदी-शाह की जोड़ी ने मध्यप्रदेशथ में कांग्रेस को जो फटका दिया है उसकी पीड़ा से मुक्ति आसान नहीं है। हम इसी जगह पर कितनी बार लिख चुके हैं कि देश के राजनैतिक दलों ने जिस तरह से लूट मचाई है वह किसी संगठित गिरोह से कम नहीं है। असल मुद्दों से ध्यान भटकाकर जिस तरह से इन दिनों नफरत की दीवार खड़ा किया जा रहा है उससे कौन बच पा रहा है। यही वजह है कि सिंधिया के भाजपा प्रवेश से कांग्रेसियों ने भी असाधारण रुप से विषवमन करना शुरु कर दिया, कोई उनकी गद्दारी के इतिहास बताने लगा तो कोई खून और डीएनए तक पहुंच गया। इस तरह का विषवमन से क्या हासिल होगा। जिस पार्टी को गांधी के सिद्धांत पर चलने वाली पार्टी बताकर सत्ता के मजे लिया जाता रहा वह सिर्फ एक सिंधिया के छोड़कर जाने से शब्दों की हिंसा के रुप में फूट पड़ा। यह कांग्रेस के उन नेताओं के लिए भी चिंतन का विषय होना चाहिए जो गांधी के अहिंसक आंदोलन से देश को आजादी दिलाने तक की सफर का गुणगान करते हैं।
सिंधिया का भाजपा में क्या होगा यह भविष्य के गर्भ में हैं यदि सिंधिया को गांधी परिवार के आगे अपनी महत्वाकांक्षा पूरी होते नहीं दिख रही थी तो भाजपा में भी उनकी राह आसान नहीं है। भाजपा की बागडोर सिर्फ संघ के हाथों में नहीं है बदली हुई राजनैतिक परिस्थितियों में मोदी-शाह की जोड़ी ने संघ के मिथक को तोड़ दिया है। संघ भले ही हाशिये में नहीं गया हो लेकिन उसकी मौजूदगी पूरी तरह से गायब है। सत्ता की ताकत के आगे जब देश की संवैधानिक संस्थाओं की साख को लेकर सवाल उठने लगे हैं तब भला संघ की साख की चिंता किसे होगी और वह कहां बच सकेगी।
यकीन मानिए आज सांसद-विधायक होना ही बड़ी बात नहीं है बल्कि सत्ता की धूरी होना बड़ी बात है यही वजह है कि आज किस पार्टी में विचारधारा बच पाई है। संघ के जिस स्वयंसेवकों की सादगी की चर्चा गाहे-बगाहे की जाती रही है उनके सत्ता से नजदीकियों के बाद उनकी सादगी का कहां कोई अर्थ रह गया है। संघ के प्रचारकों के खान-पान और सादगी की कहानियां सिर्फ सत्ता पाते तक ही सिमट गया है नहीं तो नरेन्द्र मोदी स्वयं संघ के प्रचारक रहे हैं, प्रधानमंत्री बनने से पहले उनकी सादगी के कितने ही किस्से सुनाए गए लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद क्या हुआ। नौ लाख की सूट का जिक्र न भी करें तो चश्में-घड़ी जूते की सच्चाई कौन नहीं जानता।
इस देश ने शाी जी जैसे प्रधानमंत्री भी देखे हैं और मोरारजी देसाई जैसे प्रधानमंत्री भी। जवाहरलाल नेहरु तो शुरु से ही रहीसी में रहे लेकिन इस सच को कोई कैसे नकार सकता है कि राम मनोहर लोहिया के व्यंग्य के बाद वे भी अपने को सादगी के साथ ढालने लगे थे।
ऐसे में जब पूरी सत्ता ही पैसों की ताकत के आगे नतमस्तक होने लगी हो तब भला सिंधिया का भाजपा में जाने का क्या मायने है और फिर जब कांग्रेस की ताकत बढ़ेगी तब सिंधिया नहीं आयेंगे इसकी भी क्या गारंटी  है? शायद इसी सत्ता की ताकत की वजह से जब शिवराज सिंह ने ज्योतिरादित्य को मुंह में विभिषण कहा तो कांग्रेसी उपेक्षा और अपमान की पीड़ा से आहत सिंधिया विभिषण के मायने ढंढते हुए स्वयं को संघ का सबसे बड़ा भक्त मान रहे होंगे?

शुक्रवार, 20 मार्च 2020

भाजपा प्रवेश के फायदे...

भाजपा
कमल के भाजपा प्रवेश की खबर उस दिन अखबार की सुर्खियां बंटोर रही थी, जो भी सुनता हतप्रभ रह जाता। आश्चर्य में तो उसके मित्र केवल कृष्ण भी था। अखबार पढ़ते ही उसकी बेचैनी बढ़ गई थी, ठीक है कमल को आजकल उसकी पार्टी तवज्जों नहीं दे रही थी लेकिन पार्टी ने उसे क्या कुछ नहीं दिया था। यहां तक की कमल की पहचान ही इसी पार्टी से थी। और फिर उसने चुनाव में पूरी भाजपा के खिलाफ विषवमन भी किया था। भाजपा के खिलाफ उसके तीखे तेवर से पार्टी के कई नेता असहज भी हो जाते थे यही वजह है कि उसके भाजपा प्रवेश ने पूरे क्षेत्र को हैरानी में डाल दिया था। हैरान तो केवल कृष्ण भी था यही वजह है कि वह जल्द से जल्द कमल से मिलकर अपनी बेचैनी और जिज्ञासा दूर कर लेना चाहता था।
वह जल्दी से तैयार भी हुआ लेकिन पता चला कि कमल तो दिल्ली में है और एक दो दिन बाद ही लौटेगा। उसने उसे फोन लगाया लेकिन फोन किसी अन्य ने उठाया और बताया कि वे पार्टी प्रमुख के साथ बैठक कर रहे हैं। दो दिन बाद भी मौसम का तेवर वही था, मार्च-अप्रैल के महीने में भी धूप अपने तेज पर था। और केवल कृष्ण की जिज्ञासा थी या मौसम सचमुच गर्म था कहना मुश्किल है लेकिन प्रदेश की राजनैतिक फिजा का मिजाज बेहद गर्म था। शहर कमल के स्वागत में सज चुका था, कल तक जो लोग कमल के मुर्दाबाद के नारे लगाते थे वे आज जिंदाबाद के नारे लागने की होड़ में थे। 
केवल कृष्ण को तो कमल के इस बात पर हैरानी हो रही थी कि उपेक्षा के कारण ही उसने भाजपा प्रवेश किया है। वह समझ नहीं पा रहा था कि 15 दिन पहले तक मोदी सरकार की नीतियों ही नहीं खुद प्रधानमंत्री मोदी के स्टाईल का उपहास उड़ाने वाला कमल को अचानक क्या हो गया कि वह देश का भविष्य उनके हाथों में सुरक्षित जैसी बात कहने लगा।
खैर, मौसम ने मिजाज बदला, दिन की तेज धूप के बनी स्थिति शाम होते हवा ठंडी होने लगी और बूंदा-बांदी भी, होली का उत्साह अब भी आम लोगों में था, सड़क पर पी खाकर लुढ़कने वाले अपने में व्यस्त थे, फिर आम स्वागत सत्कार में भीड़ जुटाने वालों ने भी खूब दिल खोलकर खर्च किया था। जैसे-तैसे केवल कृष्ण जब कमल के घर पहुंचा तो भीड़ हटने लगी थी, और जब कमल भी सोने जाने का ईजाजत लेने लगा तो रात के बारह बज चुके थे लेकिन केवल कृष्ण अपनी जिज्ञासा को दूर करने इतना उतावला और बेचैन था कि उसने अकेले में बात करने की ईच्छा जता दी।
कमल बिल्कुल बड़े नेताओं की तरह केवल कृष्ण के कंधे पर हाथ रखकर उसे भीतर ले आया और मुस्कुराते हुए पूछा- कैसा रहा मेरा फैसला? 
केवल कृष्ण ने इतना ही कहा क्या भाजपा में तुम्हारी हैसियत वैसे ही रहेगी, क्या पार्टी प्रमुख से तुम्हे वैसा ही स्नेह मिलेगा, फिर दलबदल का दाग जो लगा है वह कैसे धुलेगा? पता नहीं केवल कृष्ण ने एक ही सांस में कितने सवाल कर बैठा।
लेकिन कमल भी कच्चा खिलाड़ी नहीं था, उसने केवल कृष्ण के कांधे को थपथपाते हुए हंसने लगा। केवल कृष्ण कुछ और सवाल करता इससे पहले कमल ने कहा सब बताऊंगा लेकिन चलो पहले कुछ खा लेते है। डायनिंग टेबल सज चुका था घर के लोगों के चेहरे में जो खुशी दिख रही थी  उससे स्पष्ट था कि नई पार्टी को लेकर उनके मन में कोई संशय नहीं है और वे कमल के निर्णय से खुश है। 
रोटी का टुकड़ा मुंह में डालते-डालते केवल कृष्ण ने जब कहा कि तुमने यह निर्णय सोच समझकर लिया है या भावावेश मेंं? कमल ने कहा सब सोच लिया है। भाजपा में जाने के फायदे बहुत थे और आज के दौर में यह जरूरी है। कमल यही नहीं रुका बल्कि बोलते चला जा रहा था, भाजपा में जाने का सबसे बड़ा फायदा तो यह है कि तुम्हारे राष्ट्रभक्ति पर कोई उंगली नहीं उठायेगा, दूसरा फायदा यह है कि अभी चार साल सत्ता का सुख मिलेगा तीसरा फायदा यह है कि आप हिन्दू हो जाओगे चौथा फायदा यह है कि आप आम लोगों की समस्या पर ध्यान नहीं दोगे तब भी आपकी निष्क्रियता पर कोई सवाल नहीं करेंगा और बगैर काम करे आप हिन्दू-मुस्लिम के सहारे चुनाव जीत जाओगे। वहां भी पार्टी प्रमुख को खुश रखना पड़ता था यहां भी पार्टी प्रमुख से संबंध बनाकर रखना पड़ेगा। कमल फायदा गिनाते जा रहा था और केवल कृष्ण अवाक होकर उसकी बात सुने जा रहा था। 
अचानक केवल ने कहा रात बहुत हो गई है वह चलता है। लेकिन कमल बोले जा रहा था। केवल चुपचाप उठकर बाहर निकल आया। सड़के सुनी थी, कहीं-कहीं पी-खाकर लुढ़कने वालों की टोली अपने में मशगुल थे और अंधेरा घना होता जा रहा था।

गुरुवार, 19 मार्च 2020

अंधेरा घना है कहना मना है!


मध्यप्रदेश के सियासी हमाम ने जिस तरह से होली के दिन सभी नेताओं को जिस तरह से नंगा किया है उससे एक बात तो तय है कि जनता की चिंता किसी को भी नहीं है हर पार्टी को हर हाल में सत्ता चाहिए और पार्टी ही क्यों हर विधायक और हर सांसद को सत्ता चाहिए। जनता किसी को भी जिताएं सत्ता उन्हीं के पास होगी जिसके पास पैसों की ताकत होगी। इसलिए राजस्थान हो महाराष्ट्र हो या छत्तीसगझढ़? सब जगह पूंजी की ताकत जनता के फैसले को समय आते ही पलट देगी।
इतिहास गवाह है कि अंग्रेजी सत्ता के बढ़ते अत्याचार के बाद भी उनके समर्थकों की कमी नहीं रही है। सत्ता की मलाई तब भी कुछ लोग मजे से खाते रहे और उन्हें जनता पर हो रहे अत्याचार की फिक्र नहीं रही। लेकिन लोकतंत्र की मजबूरी यह है कि हर पांच साल में सत्ता को जनता के पास जाना है, इसलिए अब जनता के फैसले को बदलने का नया रिवाज चल पड़ा है। सत्ता ने तय कर लिया है कि मर्जी उसकी चलेगी जनता जो भी फैसला देगा, सत्ता तो हर हाल में उसी की बनेगी। लेकिन यह पूरा सच नहीं है। 
याकिन मानिये पूरा सच इससे भी भयावह है। तब पूरा सच क्या यह नहीं है कि आज के विधायकों व सांसदों को हर हाल में सत्ता चाहिए! उनके लिए न पार्टी मायने रखते हैं और न ही नीति सिद्धांत। यही वजह है कि पूंजी का खेल चरम पर है। देशभर के सांसदों व विधायकों में 80 फीसदी से अधिक लोग करोड़ पति है और 60 फीसदी से अधिक पर आपराधिक प्रकरण दर्ज है।
जनता की हालत यह है कि वह वोट किसे दे क्योंकि राजनैतिक दलों के नेताओं में गठजोड़ इतना गहरा है कि वोट आप किसी को भी दे। अत्याचारियों या भ्रष्टाचारियों को कुछ नहीं होगा। मध्यप्रदेशथ हो या छत्तीसगढ़? दोनों ही जगह सत्ता बदली। कांग्रेस जब तक विपक्ष में रही शिवराज-रमन सरकार की करतूतों पर जोरदार लड़ाई लड़ी। सत्ता आते ही एक के बाद एक जांच कमेटी भी बनी लेकिन साल बीतने के बाद भी नतीजा क्या रहा? किसी भी मामले में कोई जेल नहीं गया। राज्यों की तो छोड़ दें मोदी सरकार ने ही किसे जेल भेज दिया। आप इसे न्यायालय की कमजोरी कहकर सत्ता का बजाव कर सकते हैं क्योंकि आपको यही यकीन दिलाया गया है कि भारतीय न्याय व्यवस्था कमजोर है। जबकि यह सच मानिये कि सरकार में बैठे लोग जिस तरह से एकजुट है उसे जनता का वोट भी अलग नहीं कर सकता।
इसलिए मध्यप्रदेश में सिंधिया का भाजपा में जाना फिर अन्य विधायकों का जाने पर जो लोग खुश हो रहे हैं या दुख जता रहे है उनका जनता से कोई लेना देना नहीं है। मीडिया की भूमिका भी इन दिनों नायाब हो चला है उसे भी हर हाल में पूंजी चाहिए इसलिए वह अपने को सत्ता के साथ खड़ा करते चले जा रही है तब यकीन मानिये आज यस बैंक गया है, कुछ सार्वजनिक कंपनियां बेची गई है। दो चार घपले घोटाले किये गये है कल पूरा देश घने अंधेरे में डूबा नजर आयेगा। लेकिन इस अंधेरे के खिलाफ कौन आवाज उठाये? विपक्ष? जी नहीं जब सत्ता की ताकत ही उद्देश्य हो तो आप उससे भी उम्मीद न करें क्योंकि वह भी पूंजी के ताकत के रास्ते सत्ता के साथ हो जायेगा। यहां नहीं मिलेगा तो वहां चला जायेगा और वहां के लोग न मिलने पर नई सत्ता के साथ आ जायेगे और जनता सिर्फ ताली बजायेगी अपने वोट का ताकत देख खुश होगी?