सोमवार, 5 अगस्त 2024

बंग्लादेश से भारत कितना अलग ?

 बंग्लादेश से भारत कितना अलग ? 

तुही के, हमी के-रजाकार रजाकार !


सवाल यह नहीं है कि बंग्लादेश के प्रधानमंत्री शेख हसीना का अब क्या होगा?

सवाल तो यह है कि लोक‌प्रियता की शिखर में बैठी शेख हसीना कैसे चूक गई और क्या इसका भारत के राज काज में कोई समानता है । हालांकि यह सवाल तो तब भी उठे थे जब श्रीलंका में भी आन्दोलन हुआ था।

लेकिन बांग्लादेश में यह स्थिति क्यों बनी इस सवाल का यदि एक लाईन में जवाब ढूँढा जाए तो सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि लोकप्रियता की शिखर में पहुंच कर शेख हसीना ने विरोध के स्वर को कुचलने के लिए जिस भाषा का इस्तेमाल किया, जिस तरह से विरोधियों को विदेशी एजेंट, देशद्रोही ओर गद्‌दार खुले आम कहने लगी उसका परिणाम सबके सामने है।

लोकप्रियता के शिखर में पहुंचने वाली शेख़ हसीना के पिता बंगबंधु मुजीबुर्ररहमान की बेटी है जिन्होंने पाकिस्तान से बंग्लादेश को आजाद कराया था और लोकतंत्र की हिमायती व नरम तेवर की मानी जाती रही है लेकिन लोकप्रियता की शिखर में पहुंचने के बाद उन्होंने विरोधियों को जिस तरह से ठेंगे पर रखा, उन्हें विदेशी एजेंट बताकर जेल में डाला,यह परिणाम उसी का है कहा जाय तो गलत नहीं होगा।

हर युद्ध के कई कारण होते हैं, वैसे ही तख्ता पलट के भी कई कारण होते है लेकिन तत्कालीक कारण ही ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। और यह कारण था बेरोजगारी के साथ आरक्षण पर सत्ता का निर्णय और विरोधियों पर बद‌जुबानी।

कोर्ट के फैसले के बाद जब छात्र भड़के तो प्रधानमंत्री शोख हसीना ने कह दिया कि यदि स्वतंत्रता सेनानियों को आरक्षण नहीं मिलेगा तो क्या रजाकारों (गद्‌दारों) को आरक्षण मिलेगा।

रजाकार (गद्दार) शब्द इतना तूल पक‌ड़‌ा कि ढाका विश्वविद्यालय के छात्रों ने आंदोलन करते हुए नारा ही बुलंद कर दिया कि 'तुही के, हमी के, रजाकार रजाकार यानी तुम कौन- हम कौन गद्‌दार-गद्दार।

इस नारे ने इतना तूल पकड़‌ा कि शेख हसीना को बांग्लादेश छोड़‌कर भागना पड़ा।

लोकप्रियता के मद में डूबे सत्ता ने क्या विरोधियों के खिलाफ भारत में भी विषवमन नहीं कर रही है, राहुल गांधी को चीनी एजेट तो किसानों को पाकिस्तान परस्त, एनआरसी-सीएए, से लेकर धारा 370 को हटाने का मामला हो या कोरेगांव ?

किस तरह से इस दौर में आन्दोलन को कुचलने के निए गोली मारों सालों को जैसे नारे नहीं उछाले गये, बढ़ती बेरोजगारी के बीच पेपर लीक का मामला हो या फिर चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर उठते सवाल? क्या लोगों में ग़ुस्सा नहीं बढ़ रहा?

हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण के लिए एक वर्ग विशेष को निशाने में लेने के ख़िलाफ़ उठते आवाज़ में विरोधियों को हिन्दू विरोधी करार देना।

शेख़ हसीना ने लोकतंत्र और संविधान को कुचल डाला था। 

जिसने भी विरोध किया उसे जेल में डाल दिया। 

विपक्ष के नेताओं को देशद्रोही और ग़द्दार कहा। 

विदेशी एजेंट कहा। 

छह महीने पहले 300 में 280 से ज़्यादा सीटें जीत गईं। क्योंकि विपक्ष ने चुनाव का बहिष्कार कर दिया था। 

शेख़ हसीना के इशारे पर नाचते थे टीवी चैनल। 

अदालतें उनके हिसाब से फ़ैसले लिखती थीं। 

दो बार की प्रधानमंत्री ख़ालिदा जिया को उन्होंने जेल में डाल दिया था। 

उन्हें इलाज तक के लिए नहीं जाने दिया। 

शेख़ हसीना को भ्रम था कि उनके "मन की बात" पूरे बांग्लादेश के मन की बात है। 

फिर जनता का ये भ्रम टूट गया।

शेख़ हसीना 5 बार प्रधानमंत्री रहीं। 

लेकिन अब बांग्लादेश के इतिहास पर धब्बा हैं।

जब आप जनता के प्यार को तानाशाही का लाइसेंस समझ लेते हैं तो नागरिक आपको नाज़ से नासूर में बदलते देर नहीं लगाता। 

लोग नीतियाँ बनाने के लिए वोट देते हैं विपक्षमुक्त करने के लिए नहीं।

शेख़ हसीना ने डेमोक्रेसी के सारे सिस्टम तहस-नहस कर डाले थे। 

नहीं जानती थीं कि विपक्ष को लेकर फैलाए गए झूठ, चुनाव आयोग के फ़रेब, अदालतों की बेहयाई से ऊबी ह जनता के सब्र का बांध टूटेगा तो चोरों की तरह भागना पड़ जाएगा।

विश्वगुरु भारत ने एक और पड़ोसी देश में भद पिटवा ली है। 

फिर साबित हुआ है कि एस जयशंकर को विदेश नीति की बारीक समझ नहीं है। 

वो बहुत अच्छे अफ़सर रहे होंगे, लेकिन उनके पास ऐसी सूक्ष्म नज़र नहीं जो नरसिम्हा राव, गुजराल या प्रणब मुखर्जी जैसे विदेश मंत्रियों पास थी॥


तब सवाल यही है कि क्या बांग्लादेश की घटना से सत्ता को सबक नहीं लेना चाहिए?


रविवार, 4 अगस्त 2024

सोशल मीडिया का किंग कौन... ?

 सोशल मीडिया का किंग कौन... ? 


भारतीय जनता पार्टी या निजी सर्वे कंपनी भले ही देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दुनिया का सबसे नम्बर वन नेता बता रही हो लेकिन सोशल मीडिया के यू-ट्यूब प्लेट फ़ार्म ने जुलाई के अंतिम पखवाड़े का जो आंकड़ा पेश किया है उसमें सोशल मीडिया का किंग कौन है यह साबित हो गया है।

आंकड़े पर गौर करे तो स्पष्ट है कि देश के लोग किसे सुनना पसंद कर रहे है और कौन किस पर भारी पड़ रहा है।

टॉप 10 का जो आँकड़ा यू-ट्यूब ने जारी किया है वह देश के मिजाज को समझने के लिए काफी है कि देश किस दिशा में जा रहा है।

यू ट्यूब का यह आंकड़ा 13 जुलाई से 31 जुलाई के बीच देखे जाने वाले दर्शकों का है।


इसमें भारतीय जनता पार्टी का यू ट्यूब चैनल  0.3 मिलियन दर्शकों के साथ दसवे नम्बर पर है। जबकि 9वे नम्बर पर अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी के नेता को 0.4 मिलियन लोगों  ने देखा या सुना। आम आदमी पार्टी पंजाब ने अपने ही पार्टी के दिल्ली को पछाड़‌ते हुए 7वे नम्बर पर है तो देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 6वे नंबर पर है।

पहले के चार स्थानों पर कांग्रेस पार्टी की धूम मची है दूसरे नम्बर पर 11.8 मिलियन लोगों के साथ यूथ कांग्रेस जमा हुआ है तो राहुल गांधी 12.7 मिलियन लोगों के साथ टॉप पर है। अब आप समय ही गये होगे कि सोशल मीडिया का किंग कौन है।

पांडे से अनुराग की बजाय द्वेष क्यों...

 पांडे से अनुराग की बजाय द्वेष क्यों...


इसी महिने रिटायर्ड होने वाले आईएएस अनुराग पाण्डे को बीजापुर कलेक्टर से हटाकर मंत्रालय भेज देने की घटना से भाजपा के कई दिग्गज मी चौंक गये हैं। ख़ाटी संघ परिवार के अनुराग पाण्डे के पिता स्व मनहरण लाल पांडे बिलासपुर से सांसद रहे है तो बहन हर्षिता पाण्डे भी भाजपा में बेहद सकिय है इसने बाद भी उनका हटा दिया जाना चर्चा का विषय है।

भले ही लोग इसे भाजपा नेता से विवाद वाले विडियों से जोड़ रहे हो या फिर धमकी देने वाला भाजपाई अपनी पीठ थपथपा रहा हो लेकिन कहा जा रहा है कि असल कहानी तो बिलासपुर के इलाने की है, जहां हर्षिता पाण्डे ने डॉ रमन सिंह के कार्यकाल के दोरान की थी l हालांकि एक चर्चा तो विष्णुदेव साय के लाड‌ले मंत्री केदार कश्यप प्रदेश भाजपाध्यक्ष किरणदेव को लेकर भी सुनाई जा रही है कि वे दोनों ही नेता की वे ठीक से नहीं सुनते थे।

 कहा जाता है कि खाटी छत्तीसगढ़िया अनुराग पाण्डे को हटाने के पिछे की बड़ी वजह जगदलपुर के उस व्यापारी की है जिसका पूरा वैध-अवैध व्यापार बीजापुर पर निर्भर है और हाल ही में मुख्यमंत्री के मेरे बस्तर प्रवास पर  उस व्यापारी ने मुख्यमंत्री से मुलाकात की थी।


इधर अनुराग पाण्डे को हटाने को लेकर छत्तीसगर सवर्ण संघर्ष समिति ने भी मोर्चा खोलते हुए ज्ञापन सौंपा है। इस ज्ञापन की भी अपनी कहानी है। बहरहाल अनुराग पांडे को 

इस तरह से हटाने से उन लोगों को भी झटका लगा है जो रिटायर्ड के बाद नियुक्ति का सपना पाले अपने को भाजपाई कहते नहीं थकते हैं।

शनिवार, 3 अगस्त 2024

बीएसएसएल की इस योजना से जियों की मुश्किलें बढ़ी...

 बीएसएसएल की इस योजना से जियों की मुश्किलें बढ़ी...


जियों सहित अन्य निजी टेलीकाम कंपनियों की कीमत में बढ़ोतरी से बीएसएनएल के ग्राहकों में जबरदस्त वृद्धि हुई है और इससे उत्साहित बीएसएनएल ने ऐसी योजना पर काদ शुरु कर दिया है जिससे निजी कंपनियों की मुश्किलें बढ़ गई है । कहा जा रहा है कि बीसएसएल की इस रणनीति का सबसे ज्यादा नुकसान अंबानी ग्रुप के जियों को हो रहा है।

ज्ञात हो कि जियो एयरटेल और वीआई द्वारा टैरिफ प्लान में बढ़ोतरी  करने का असर साफ दिखाई देने लगा है और निजी टेलीकॉम कपनी के ग्राहक लाखों की संख्या में बीएसएनएल का ग्राहक बन रहे हैं। बैठे बिठाए लाखों ग्राह‌क मिलने से उत्साहित बीएसएनएल ने 4जी सैचुरेशन प्रोजेक्ट के तहत तेजी से काम शुरु कर दिया है जिसके चलते गाँवों में बीएसएनएल को भारी सफलता मिल रही है जबकि शहरो में महंगाई का भारी असर है ।

अब बीएसएनएल ने अपने 4G सैचुरेशन प्रोजेक्ट के तहत कर्नाटक में एक खास माइलस्टोन हासिल किया है. कंपनी ने इस राज्य में 501 4G साइट्स को एक्टिव किया है. बीएसएनएल का यह कदम ग्रामीण क्षेत्रों में कनेक्टिविटी गैप को कम करने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होता.

बीएसएनएल ने अपने एक आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए पोस्ट करके इस बात की जानकारी दी है. 4G सैचुरेशन प्रोजेक्ट के तहत बीएसएनएल का लक्ष्य गांव-गांव तक हाई स्पीड इंटरनेट कनेक्टिविटी को पहुंचाना है.

बता दें कि बीएसएनएल की यह उपलब्धि सरकार की 'आत्मनिर्भर भारत' पहल के तहत उनकी प्रगति को दर्शाती है. कंपनी ने पहले ही पूरे देश में 10,000 4G साइट्स को स्थापित किया है. इसके अलावा, बीएसएनएल ने ग्राहकों को मुफ्त 4G सिम अपग्रेड और मुफ्त 4GB डेटा भी प्रदान किया है.

बीएसएनएल के इस कदम सेछत्तीसगढ़ सहित कई राज्यो के  ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल क्रांति को बढ़ावा मिलेगा. इससे वहां के स्थानीय लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और अन्य क्षेत्रों में डिजिटल सेवाओं का लाभ उठाने में मदद मिलेगी. बीएसएनएल अपने इस मुहीम को भारत देश के हरेक राज्य के हरेक गांव तक पहुंचाना चाहती है.

शुक्रवार, 2 अगस्त 2024

75 सालों से बसा कालोनी अचानक अवैध घोषित...

 75 सालों से बसा कालोनी अचानक अवैध घोषित...

पेरिस ओलंपिक में पदक दिलाने वाले का घर भी टूटेगा ...


सत्ता की अपनी ताकत है और उसका निर्णय कब किस पर कहर बनकर टूट जाये  कहना मुश्किल है। ऐसा ही एक मामला दिल्ली के सिविल लाईन में ख़ैबर पास स्थित कालोनी का है। 1950 से बसे इस कालोनी की जमीन को रक्षा मंत्रालय को दे दिया गया और अब मकान ख़ाली  करने का नोटिस जारी कर दिया गया, कोर्ट ने भी कालोनीवासियों की याचिका खारिज कर दी। इसने जद में ओलपिंक में कांस्य पदक दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाले नेशनल पिस्टल शूटिंग कोच समरेश जंग का मकान भी आ गया है जिसे कभी भी गिराया जा सकता है। 

मिडिया रिपोर्ट के मुताबिक पेरिस ओलंपिक में मनु भाकर और सरबजोत सिंह को कांस्य पदक जिताने में अहम भूमिका निभाने वाले नेशनल पिस्टल शूटिंग कोच समरेश जंग का घर कभी भी गिराया जा सकता है। ओलंपियन समरेश जंग नई दिल्ली के सिविल लाइंस में खैबर पास इलाके में रहते हैं। आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के भूमि और विकास कार्यालय (एलएनडीओ) ने समरेश जंग समेत अन्य कई निवासियों को नोटिस जारी किया है। नोटिस में दावा किया गया है कि जिस जमीन पर खैबर पास कॉलोनी स्थित है वह रक्षा मंत्रालय की है और इसलिए अवैध है।

बीजिंग 2008 ओलंपिक में भाग लेने वाले जंग ने कहा कि एक ओलंपियन के रूप में, वह कम से कम एक सम्मानजनक विदाई की उम्मीद करते हैं, साथ ही मामले पर स्पष्टता के साथ कम से कम 2 महीने की मोहलत की अपील भी करते हैं। मीडिया को दिए इंटरव्यू में अर्जुन अवॉर्ड समरेश जंग कहते हैं कि मुझे नहीं पता कि ये तोड़फोड़ क्यों हो रही है। क्यों लोगों के घर गिराए जा रहे हैं? उन्होंने अचानक पूरी कॉलोनी को ही अवैध घोषित कर दिया। बीती रात बताया गया कि दो दिन के भीतर हमें जगह छोड़नी है। मेरा परिवार यहां बीते 75 साल से रह रहा है। 1950 से हम यहां के रहवासी हैं। हम कोर्ट गए थे और याचिका भी दायर की थी, लेकिन उसे नकार दिया गया।

समरेश ने गुरुवार रात एक्स पर पोस्ट किया, 'भारतीय निशानेबाजों के दो ओलंपिक पदक जीतने के बाद बेहद उत्साहित होकर मैं स्वदेश लौटा, लेकिन निराशाजनक खबर मिली कि मेरा घर और पूरा इलाका दो दिनों में ध्वस्त कर दिया जाएगा। जंग ने निष्कर्ष निकाला, 'एक ओलिंपियन और अर्जुन पुरस्कार विजेता होने के नाते कम से कम मुझे उम्मीद है कि समुदाय के साथ-साथ एक सम्मानजनक निकास होगा। मैं मामले पर स्पष्टता और उचित तरीके से खाली करने के लिए कम से कम दो महीने की अपील करता हूं।'

उन्होंने अपने पोस्ट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, खेल मंत्री मनसुख मंडाविया के साथ-साथ दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल, भारतीय ओलंपिक संघ प्रमुख पीटी उषा, आवास और शहरी मामलों के मंत्री मनोहर लाल खट्टर और आईओए उपाध्यक्ष और साथी निशानेबाज गगन नारंग को भी टैग किया। शेफ डी मिशन के रूप में इस समय भारतीय दल के साथ पेरिस में हैं।

नया बंगला वाले नेताम...

 नया बंगला वाले नेताम...


छत्तीसगर में डबल इंजन सरकार के कृषि मंत्री रामविचार नेताम ने आनन फानन में नये बंगले में शिफ्ट क्यों हो गए, उससे पहले यह जान लेना जरूरी है कि पुराने बंगले में चल रहे खेल का क्या हाल है? हालाँकि चर्चा तो यह भी रही कि रामविचार नेताम का काम न तो मंत्रालय से चलता था, न ही पुराने बंगले से। काम एश्वर्या के बंगले से चलता था और जब काम एश्वर्या से ही चलना है तब इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है कि वे नये बंगले में रहे या पुराने में।

रामविचार नेताम अब भी उतने ही प्रभावशाली हैं जितने वे रमन राज में हुआ करते थे। आदिवासी एक्सप्रेस की बात को भूल भी जाये तब भी इंदिरा प्रियदर्शनी बैंक घोटाले को कोई कैसे भूल सकता है।

लेकिन डबल इंजन सरकार में उनका अपना तरीका है। वोल्वों का शौक़ रखने वाले रामविचार नेताम ने जब से कृषि विभाग संभाला है उनके चहेते राकेश अग्रवाल की ज़िम्मेदारी कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। कृषि विभाग के सप्लायरों और ठेकेदारों के लोक लुभावन खेल से भले ही किसानों की लुटिया डूब जाये लेकिन अपने को चाँदी मिलना चाहिए । अब नकली, मिलावटी और बनावटी का खेल भी जनचर्चा का विषय बन गया है।

कहा जाता है कि जिस वजह से नया बंगला सबसे पहले हथियाया गया है उस उद्देश्य के भी पूरा होने में संशय के बादल उम‌ड़‌ने लगे हैं।तब एश्वर्या ही गुड-गाड…।

जात न पूछो राहुल की...

जात न पूछो राहुल की... 


राहुल गांधी किस जाति के हैं यह बताये इसमे पहले यह जान लेना जरूरी है झूठ और अफवाह के आसरे नफरत की राजनीति में माहिर भारतीय जनता पार्टी ने राहुल गांधी पर सीधे हमला क्यों बोल दिया है। इस हमले से भाजपा की खीज साफ दिखाई भी देने लगी है। क्योंकि अनुराग ठाकुर की बातों को जब स्पीकर ने विलोपित कर दिया उसके बाद भी देश के प्रधानमंत्री ने अपने एक्स हेडल में इसे प्रदर्शित कर संसद की गरिमा का अवमानना करने से नहीं चूके।

दरअसल यह सारा मामला जातिय जनगणना से जुड़ा हुआ है जिसका भाजपा खुलकर समर्थन नहीं कर पा रही है। और मीडिल क्लास और पिछड़े वर्ग के बिखरते वोट ने उनके भीतर के हिन्दूत्व को हिला कर रख दिया है।

दरअसल हिन्‌दु वोटरों के ध्रुवीयकरण के आसरे सत्ता तक पहुंची भाजपा के लिए नरेंद्र मोदी के करिश्में से ज़्यादा असरदार कैग का वह फर्जी रिपोर्ट और लोक आयोग को लेकर अन्ना आन्दोलन का वह तूफान था जिसकी वजह से कांग्रेस को बदनाम करने की साज़िश रची गई । लेकिन लोगों को समझाया गया कि नरेंद्र मोदी के चेहरे के आसरे ही बीजेपी सत्ता में आ सकी।

अच्छे दिन आयेंगे के सपने 2047 के विकसित भारत तक आते आते इस कदर  रिसने लगा कि मीडिल और पिछड़ा वर्ग मोदी के हाथों से फिसलते गया।

२०१९ के परिणाम का ठसक, अहंकार, आत्ममुग्धता की हवा निकल गई तो इसकी वजह राहुल गांधी का वह भारत जोड़ो यात्रा थी जो कांग्रेस को वैचारिक रूप से भी बदलकर जाति जनगणना तक पहुंचा दिया। और यही जाति जनगणना अब भाजपा और संघ के कथित हिदुत्व के आधार को हिला कर रख दिया है।

जाति किसी जननेता की क्या होती है? यह सवाल इसलिए भी भाजपा ने उठाये हैं ताकि खिसकते जनाधार को बचा लें या मोदी सत्ता की करतू‌तों पर पर्दा डाल ले।

इसरे अलावा एक बड़ी वजह है राहुल गांधी की भारतीयता की वह छवि जो किसी भी जाति या धर्म से उपर हो चुका है। 

हालांकि भाजपा के स्लीपर सेल का गांधी नेहरू परिवार की जाति और धर्म को लेकर पहला वार नहीं है इससे पहले भी वे इसे हवा देते रहे है। 

लेकिन आमने - सामने मी स्थिति पहली बार बनी है। लेकिन भाजपा ने राहुल गांधी की जाति पूछने में देर कर दी क्योंकि अब राहुल गांधी की जाति भारतीयता हो चुकी है, पूरा देश धीरे-धीरे राहुल को स्वीकार कर चुका  है सिवाय संधी संस्कारित्रों के…?


इसके बाद भी यदि सवाल राहुल के दादा फिरोज गांधी के मुसलमान  होने की अफ़वाह को हवा दी जा रही है तो देश को यह जान लेना जारी है कि फिरोज गांधी मुसलमान नहीं पारसी थे, वे फिरोज खान लिखते थे और महात्मा गांधी के द्वारा उन्हें गोद लेने के बाद वे गांधी  कहलाने लगे। उनका अंतिम संस्कार भी इसी वजह से हिन्दू रिति रिवाज से हुआ।

पारसी जोरास्ट्रि‌यन धर्म का पालन करते हैं, जो आग को पवित्र मानकर उसकी पूजा करते हैं। और जिनके बारे में आचार्य चतुर सेन ने अपने उपन्यास वयम रक्षाम में इनको यमराज की जाति के वंशज माना है....

अब सवाल पंडित नेहरू के मुसलमान होने के अफवाह का है तो इस पर केवल वहीं लोग भरोसा कर सकते है जो आँखों में कट्टरता की पट्टी बांधे घूम रहे हैं।

दररूसल पूरा खेल या षड्यंत्र की वजह अंग्रेजों की चापलूसी के सच को विस्मृत कर देने की कवायद है और कुछ नही...!