गुरुवार, 8 अगस्त 2024

उद्धव ठाकरे ने कर दिया खेल...

 उद्धव ठाकरे ने कर दिया खेल...

 मोदी-भागवत  के हाथ-पांव फूले


महाराष्ट्र में इस साल के अंत में होने बाले विधानसभा चुनाव को लेकर जिस तरह से उध्दव ठाकरे ने फ्रंट-फूट पर खेलना शुरु कर दिया है उससे मोदी सत्ता और आरएसएस की बेचैनी ही नहीं बड़ी है बल्कि उनके सामने सबसे बड़ी चुनौति उन मुद्‌दों की हवा भी निकालनी है जो उद्धव ठाकरे ने जोर-शोर से उठाना शुरु कर दिया है।

महाराष्ट्र जाने का क्या मतलब है यह मोदी सरकार ही नहीं आरएसएस भी अच्छी तरह जानता है, यही वजह है कि कल जब शिवसेना नेता उद्धव ठाकरे ने दिल्ली पहुंच कर जब राहुल गांधी और शरद पवार से मुलाकात कर बांग्लादेश के मुद्दे पर मोदी सरकार पर हमला किया तो आरएसएस ही नहीं समूची बीजेपी के हाथ पाँव फूलने लगे।

दरअसल लोकसमा चुनाव के परिणाम जिस तरह से महाराष्ट्र में इंडिया गठबंधन के पक्ष में आया है उससे साफ है कि यदि विधानसभा चुनाव में भी यह गठबंधन कायम रहा तो भाजपा के लिए महाराष्ट्र बचा पाना मुश्किल हो जायेगा।

महाराष्ट्र में मोदी का जादू नहीं चलने या आरएसएस का हिन्दूत्व कमजोर पड़‌ने की यदि बड़ी वजह पर नज़र डाले तो साफ दिखेगा कि उद्धव ठाकरे की पहचान हिन्दुत्व के जिस चेहरे को लेकर है उसे तमाम कोशिश के बाद भी बीजेपी नहीं नहीं बिगाड़ पायी।

लेकिन इससे भी बड़ा मुद्दा जो भाजपा के लिए सिरदर्द बनता जा रहा है वह महाराष्ट्र के हक की परियोजना को गुजरात शिफ्ट करने का है यह इतना बड़ा मुद्दा है कि इस मुद्दे ने शिंदे व अजित पवार तक को भी झकझोर कर रख दिया है। ऐसे में बेरोजगारी महगाई के साथ किसान के मुद्दे ने भी शिंदे सरकार को पस्त कर दिया है।

तब सवाल यह भी है कि क्या इंडिया गंठबंधन ने जब चेहरा व सीट तय कर ली है तब भाजपा गठबंधन के लिए सीटो का बटवारा भी तो मुश्किल है।

और शायद यही वजह है कि भाजपा के सामने अब हिन्दूत्व की लकीर को मोटी करने की चुनौति है लेकिन उद्धव ठाकरे के पलटवार ने

भाजपा और आरएसएस के हाथों से यह मुद्रा भी छीन लिया है।उद्धव ठाकरे जिस आक्रामक मुद्रा में खड़े है उससे आरएसएस भी सकते में है।

लेकिन इससे भी बड़ी चुनौति महाराष्ट्र चुनाव में नेतृत्व के चेहरे का है और उद्धव ठाकरे के चेहरे के सामने बीजेपी के सामने यह बेहद दुविधा की स्थिति है क्योंकि मोदी शाह के खेल ने देवेंद्र फड़नवीस के चेहरे पर पहले ही डेंट लगा दिया है।और शिंदे की मजबूरी को आरएसएस बर्दाश्त नहीं कर पा रही।

सुप्रीम कोर्ट पर भड़‌क गये हाई कोर्ट का जज...

 सुप्रीम कोर्ट पर भड़‌क गये हाई कोर्ट का जज...


एक तरफ सुप्रीम कोर्ट के रवैये को लेकर आम आदमी में नाराजगी है तो दूसरी अब हाईकोर्ट के एक जज ने भी संबैधानिक सीमाओं से बाहर जाने और हाईकोर्ट के अधिकार को कमजोर करने का आरोप लगा किया है। और कह दिया कि हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट के अधीन नहीं है। 

यह पूरा मामला एक अवमानना के मामले से जुड़ा हुआ है जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दीथीं,और इसी से नाराज हाईकोर्ट के न्यायपूर्ति राजबीर सहारावत ने कड़ी -टिप्पणी कर दी।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ एक आश्चर्यजनक आदेश में, पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की अपने संवैधानिक सीमाओं से बाहर जाने और हाई कोर्ट की अधिकारिता को कमजोर करने के लिए आलोचना की है। यह आदेश न्यायमूर्ति राजबीर सहारावत द्वारा 17 जुलाई, 2024 को जारी किया गया, जो भारत की न्यायिक प्रणाली में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के बीच के संबंधों पर सवाल उठाता है।

मामला एक अवमानना याचिका से जुड़ा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के समक्ष अवमानना प्रक्रियाओं पर रोक लगा दी थी। न्यायमूर्ति सहारावत का कहना है कि इस रोक आदेश ने “संवैधानिक अनुपालन बनाम कोर्ट अनुपालन की समस्या" पैदा कर दी है और हाई कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या अनावश्यक रूप से बढ़ा दी है।

आदेश इस बात पर जोर देता है कि हाई कोर्ट सुप्रीम कोर्ट के अधीनस्थ नहीं हैं, और उनके संबंध को परिभाषित करने वाले संवैधानिक प्रावधानों का हवाला देते हैं। न्यायमूर्ति सहारावत नोट करते हैं, “माननीय सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं कई बार स्पष्ट किया है कि हाई कोर्ट सुप्रीम कोर्ट के अधीन नहीं है।"

यह मामला नौरती राम द्वारा देवेंद्र सिंह आईएएस और एक अन्य पार्टी के खिलाफ दायर अवमानना याचिका से संबंधित है। सुनवाई के दौरान, प्रतिवादियों द्वारा एक अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत की गई थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश, दिनांक 3 मई, 2024, एसएलपी (सी) संख्या 9638/2024 में हाई कोर्ट के समक्ष अवमानना प्रक्रियाओं पर रोक लगा दी। इस रोक ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपीलित आदेश के संचालन को नहीं रोका, जिससे महत्वपूर्ण न्यायिक और संवैधानिक प्रभाव पड़े।

एक महत्वपूर्ण विवाद का मुद्दा यह है कि हाई कोर्ट में अवमानना प्रक्रियाओं में हस्तक्षेप करने का सुप्रीम कोर्ट का अधिकार। आदेश कहता है, “संविधान के अनुच्छेद 215 और अवमानना अदालत अधिनियम की धारा 12 के अनुसार, हाई कोर्ट द्वारा पारित आदेश के कथित अवमानना के लिए कार्यवाही शुरू करने और जारी रखने की शक्ति विशेष रूप से हाई कोर्ट के पास है।"

न्यायमूर्ति सहारावत ने सुप्रीम कोर्ट के दृष्टिकोण की आलोचना की और कहा:

“मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो इस प्रकार के आदेश दो प्रमुख कारणों से उत्पन्न होते हैं, पहला, एक प्रवृत्ति कि उस आदेश के परिणाम की जिम्मेदारी लेने से बचा जाए, जो इस प्रकार का आदेश, सभी संभावना में, उत्पन्न होने के लिए बाध्य है, यह बहाना करते हुए कि अवमानना प्रक्रियाओं पर रोक का आदेश किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता है, और दूसरा, सुप्रीम कोर्ट को वास्तव में जितना 'सुप्रीम' है उससे अधिक 'सुप्रीम' और हाई कोर्ट को संवैधानिक रूप से जितना 'हाई' है उससे कम 'हाई' समझने की प्रवृत्ति।”

न्यायमूर्ति सहारावत ने सुप्रीम कोर्ट से अधिक सावधानी बरतने का आह्वान किया, यह सुझाव देते हुए कि इसे अपने आदेश के माध्यम से कानूनी परिणामों को स्पष्ट रूप से पैदा करना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसे आदेशों की आकस्मिक व्याख्या मुकदमेबाजों द्वारा गंभीर और हानिकारक परिणाम ला सकती है।

हालांकि, न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता को देखते हुए, कोर्ट ने महसूस किया कि वह आदेश का पालन करने के लिए पूर्णतः बाध्य है और इसलिए, मामला स्थगित कर दिया गया है जब तक कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा उपरोक्त एसएलपी का फैसला नहीं किया जाता।

कोर्ट ने जोड़ा, “लेकिन यह हमेशा संभव नहीं हो सकता है कि हाई कोर्ट इस तरह का मार्ग अपनाए, खासकर किसी विशेष मामले में विशेष तथ्यों और परिस्थितियों के कारण या कुछ विधायी प्रावधानों के शामिल होने के कारण। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति होगी, जिसे बेहतर तरीके से टाला जाना चाहिए।"

बुधवार, 7 अगस्त 2024

बाप रे... कदम-कदम पर साजिश...

 बाप रे... कदम-कदम पर साजिश... 

नहीं खेलती तब भी सिल्वर तो मिल ही जाता...


7 घंटे के अंदर तीन पहलवानों को हराकर स्वर्ण पदक जीतने की राह में चल पड़ी विनेश फोगाट को अयोग्य घोषित कर दिया गया, आख़िर वह कौन था? जिसे विनेश की जीत बर्दाश्त नहीं हो रही थी?

अब यह सवाल बड़ा तो हो गया है लेकिन क्या इस सवाल का हश्र  भी राफेल, नोट बंदी, करोना टीका, इलेक्ट्रोल बांड, ईवीएम, प्रधानमंत्री केयर फंड; हिडन बर्ग की तरह अनुत्तरित रह जायेगा ?

या फिर अब देश को जवाब मिलेगा ? 

कहना कठिन है लैकिन विनेश ने तो बहुत पहले ही अपने खिलाफ होने वाले षड्‌यंत्र की बात मीडिया से कर दी थी।


सवाल अब भी वही है कि विवेश के पदक जीतने से सबसे ज्यादा दिक्कत किसे की।

लोकसभा में भी यह मुद्‌दा उठा तो खेल मंत्री विनेश पर हुएर् खर्च का ब्यौरा देकर अपनी पीठ थपथपा रहे थे ?

53 किग्रा से शुरू हुआ साज़िश 50 किलो सौ ग्राम में सफल कर लिया गया ।


खुद भाजपा सांसद विजेन्द्र कुमार ने कह दिया कि यह साजिश है क्योंकि उसने इतिहास में इस तरह से अयोग्य ठहराने की घटना नहीं देखी, न सुनी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विनेश के अयोग्य घोषित होने के सेकण्डों बाद ही सांत्वना  के ट्वीट कर दिया ? जीत पर तो नहीं दी थी बधाई ?

अब आ जाइये ओलंपिक संघ के नियम के आर्टिकल 11 पर । क्यों इस पर अमल नहीं हुआ ? अमल होता तो बग़ैर खेले ही विनेश को सिल्वर मेडल मिल ही जाता।


तब क्या इस पूरे साजिश है पीछे विनेश फोगाट की वह लड़ाई है जिसे इस देश ने देखा कि महिला पहलवानों की छाती पर हाथ रखने के आरोपी बृजभू‌षण शरण सिंह को बचाने  समूची मोदी सत्ता खुलकर सामने आ गई थी।

सवाल यदि साजिश के उठ रहे हैं तो एक बार दिल पर हाथ रखकर ज़रूर सोचिए , कि आख़िर विनेश को सिल्वर भी क्यों नहीं लेने दिया गया।

फिर उस धमकी को याद कीजिए “ कैरियर ख़त्म कर देंगे”

दिल्ली शराब घोटाले में फँस गये मोदी के लाड़ले...

 दिल्ली शराब घोटाले में फँस गये मोदी के लाड़ले...

15 अधिकारियों पर भी गिरफ्तारी की तलवार...


दिल्ली शराब घोटाले मामले में ईडी और सीबीआई ने सनसनी खेज खुलासा किया है, इस मामले में गिरफ्तार दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के अंतरिम जमानत का विरोध करते हुए जाँच एजेंसी ने जो आरोप पत्र दाखिल किया है उसमें देश के प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी के लाड़ले के अलावा मुख्यसचिव से लेकर दिल्ली के 15 आईएएस व प्रशासनिक सेवा के अधिकारी भी फँसते नजर  आ रहे हैं और इन पर गिरफ्तारी की तलवार भी लटकने लगी है।

ज्ञात हो कि दिल्ली आबकारी नीति को लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल, उपमु‌ख्यमंत्री मनीष सीसोदिया जेल में बद है और दोनों की जमानत की सुनवाई चल रही है। इस मामले के एक आरोपी को सरकारी गवाह बनाने को लेकर मोदी सरकार पहले ही निशाने पर है और अब आरोप पत्र ने मोदी सरकार के लाड़ले एलजी की भी मुसिबत बढ़ा दी है।

आविद केजरीवाल के जमानत का विरोध करते हुए उनकी गिरफ्तारी का जो आधार बताया है उस आधार पर अब कार्रवाई हुई तो डेर दर्जन गिरफ़्तारी और होगी।

सीबीआई  ने कहा है कि उनका अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी आबकारी नीति में हस्ताक्षर करने के आधार पर किया है। और आबकारी नीति पर सह‌मति जताते हुए हस्ताक्षर काने वालों में दिल्ली के एलजी वी के सक्सेना की मुसिबत इसलिए  बढ़ गई है।

प्रधानमंत्री मोदी के लाड़ले माने जाने वाले एलजी वीके सक्सेना सहित इस नीति पर मुख्यसचिव सहित 15 अधिकारियों के दस्तख़त है और इस आधार पर इन सभी को आरोपी बनाया गया है।

मंगलवार, 6 अगस्त 2024

कहाँ गये वे सीना ताने...

 कहाँ गये वे सीना ताने...



चट्टानों का सीना

चीर रही थी नदियाँ 

बढ़ रही थी नदियां 

अहंकार का चट्‌टान 

खड़ा था सीना ताने । 


देश ने तब भी देखा 

सम्मान सड़क पर 

यातना उफान पर 

कुर्सी का मोह 

हंसा था सीना ताने ।


दुस्सासन का बढ़ता हाथ 

समूची सत्ता का था साथ

अंध-भक्तों की जमात 

और खुशामद मीडिया 

नाच रहा था सीना ताने


स्तब्ध हवा थी

 मौन गगन था 

धरती भी बे-हलचल थी

सबके थे अपने अपने 

स्वार्थ खड़ा था सीना ताने


पर यह कब तक चलता 

अहंकार रावण का टूटा

दुशासन का जंघा भी टूटा 

समम लिखेगा फिर‌ इतिहास 

कौन अड़ा था सीना ताने


माना कि रात घनी काली थी

 लंबी और दुरुह वाली थी

लेकिन उम्मीदों का सूरज 

जैसे ही सामने आया 

कहां गये वे सीना ताने...।

                   (साक्षी, बजरंग और विनेश सहित अन्याय के खिलाफ                    खड़ा होने वालों को समर्पित)

पेरिस ओलिंपिक में विनेश ने उस जापानी रेसलर को हराया जो चौदह वर्षों से अविजित थी। समय भी गजब खेल रचता है। यादों पर धूल  जमती उसके पहले विनेश और अन्य महिला पहलवानो के साथ क्या गुजरा था गूगल पर तैरने लगा।  अवसरवादी मोदी ने उन्हें अपनी बेटी कहा था लेकिन जब वे कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष द्वारा महिला पहलवानो की यौन उत्पीड़न की शिकायत कर रही थी तब दिल्ली पुलिस ने इन्ही मोदी की बेटी को सड़कों पर घसीट दिया था।


वह दिन है और आज का दिन है , मोदी ने फिर कभी विनेश की चिंता नहीं पाली। वजह  बस इतनी सी थी कि कही ब्रजभूषण भाजपा को चार पांच सीटों का नुक्सान न कर देवे।

अब शर्त इस बात पर लग रही है कि जब विनेश सेमीफइनल जीत कर फाइनल खेलेगी तब क्या मोदी आदतन उन्हें फोन लगाएंगे ? कुछ लोगों का कहना है कि वे निश्चित तौर पर फोन करेंगे , क्रेडिटजीवी जो ठहरे !!


विनेश ने आज न सिर्फ मोदी को पेशोंपेश में डाल  दिया है वरन भारतीय गोदी मीडिया को भी आईना दिखा दिया है। दो कोड़ी के एंकर एंकरनियों अब किस मुंह से विनेश पर प्राइम टाइम शो करेंगे , देखना दिलचस्प होगा।


सोमवार, 5 अगस्त 2024

बंग्लादेश से भारत कितना अलग ?

 बंग्लादेश से भारत कितना अलग ? 

तुही के, हमी के-रजाकार रजाकार !


सवाल यह नहीं है कि बंग्लादेश के प्रधानमंत्री शेख हसीना का अब क्या होगा?

सवाल तो यह है कि लोक‌प्रियता की शिखर में बैठी शेख हसीना कैसे चूक गई और क्या इसका भारत के राज काज में कोई समानता है । हालांकि यह सवाल तो तब भी उठे थे जब श्रीलंका में भी आन्दोलन हुआ था।

लेकिन बांग्लादेश में यह स्थिति क्यों बनी इस सवाल का यदि एक लाईन में जवाब ढूँढा जाए तो सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि लोकप्रियता की शिखर में पहुंच कर शेख हसीना ने विरोध के स्वर को कुचलने के लिए जिस भाषा का इस्तेमाल किया, जिस तरह से विरोधियों को विदेशी एजेंट, देशद्रोही ओर गद्‌दार खुले आम कहने लगी उसका परिणाम सबके सामने है।

लोकप्रियता के शिखर में पहुंचने वाली शेख़ हसीना के पिता बंगबंधु मुजीबुर्ररहमान की बेटी है जिन्होंने पाकिस्तान से बंग्लादेश को आजाद कराया था और लोकतंत्र की हिमायती व नरम तेवर की मानी जाती रही है लेकिन लोकप्रियता की शिखर में पहुंचने के बाद उन्होंने विरोधियों को जिस तरह से ठेंगे पर रखा, उन्हें विदेशी एजेंट बताकर जेल में डाला,यह परिणाम उसी का है कहा जाय तो गलत नहीं होगा।

हर युद्ध के कई कारण होते हैं, वैसे ही तख्ता पलट के भी कई कारण होते है लेकिन तत्कालीक कारण ही ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। और यह कारण था बेरोजगारी के साथ आरक्षण पर सत्ता का निर्णय और विरोधियों पर बद‌जुबानी।

कोर्ट के फैसले के बाद जब छात्र भड़के तो प्रधानमंत्री शोख हसीना ने कह दिया कि यदि स्वतंत्रता सेनानियों को आरक्षण नहीं मिलेगा तो क्या रजाकारों (गद्‌दारों) को आरक्षण मिलेगा।

रजाकार (गद्दार) शब्द इतना तूल पक‌ड़‌ा कि ढाका विश्वविद्यालय के छात्रों ने आंदोलन करते हुए नारा ही बुलंद कर दिया कि 'तुही के, हमी के, रजाकार रजाकार यानी तुम कौन- हम कौन गद्‌दार-गद्दार।

इस नारे ने इतना तूल पकड़‌ा कि शेख हसीना को बांग्लादेश छोड़‌कर भागना पड़ा।

लोकप्रियता के मद में डूबे सत्ता ने क्या विरोधियों के खिलाफ भारत में भी विषवमन नहीं कर रही है, राहुल गांधी को चीनी एजेट तो किसानों को पाकिस्तान परस्त, एनआरसी-सीएए, से लेकर धारा 370 को हटाने का मामला हो या कोरेगांव ?

किस तरह से इस दौर में आन्दोलन को कुचलने के निए गोली मारों सालों को जैसे नारे नहीं उछाले गये, बढ़ती बेरोजगारी के बीच पेपर लीक का मामला हो या फिर चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर उठते सवाल? क्या लोगों में ग़ुस्सा नहीं बढ़ रहा?

हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण के लिए एक वर्ग विशेष को निशाने में लेने के ख़िलाफ़ उठते आवाज़ में विरोधियों को हिन्दू विरोधी करार देना।

शेख़ हसीना ने लोकतंत्र और संविधान को कुचल डाला था। 

जिसने भी विरोध किया उसे जेल में डाल दिया। 

विपक्ष के नेताओं को देशद्रोही और ग़द्दार कहा। 

विदेशी एजेंट कहा। 

छह महीने पहले 300 में 280 से ज़्यादा सीटें जीत गईं। क्योंकि विपक्ष ने चुनाव का बहिष्कार कर दिया था। 

शेख़ हसीना के इशारे पर नाचते थे टीवी चैनल। 

अदालतें उनके हिसाब से फ़ैसले लिखती थीं। 

दो बार की प्रधानमंत्री ख़ालिदा जिया को उन्होंने जेल में डाल दिया था। 

उन्हें इलाज तक के लिए नहीं जाने दिया। 

शेख़ हसीना को भ्रम था कि उनके "मन की बात" पूरे बांग्लादेश के मन की बात है। 

फिर जनता का ये भ्रम टूट गया।

शेख़ हसीना 5 बार प्रधानमंत्री रहीं। 

लेकिन अब बांग्लादेश के इतिहास पर धब्बा हैं।

जब आप जनता के प्यार को तानाशाही का लाइसेंस समझ लेते हैं तो नागरिक आपको नाज़ से नासूर में बदलते देर नहीं लगाता। 

लोग नीतियाँ बनाने के लिए वोट देते हैं विपक्षमुक्त करने के लिए नहीं।

शेख़ हसीना ने डेमोक्रेसी के सारे सिस्टम तहस-नहस कर डाले थे। 

नहीं जानती थीं कि विपक्ष को लेकर फैलाए गए झूठ, चुनाव आयोग के फ़रेब, अदालतों की बेहयाई से ऊबी ह जनता के सब्र का बांध टूटेगा तो चोरों की तरह भागना पड़ जाएगा।

विश्वगुरु भारत ने एक और पड़ोसी देश में भद पिटवा ली है। 

फिर साबित हुआ है कि एस जयशंकर को विदेश नीति की बारीक समझ नहीं है। 

वो बहुत अच्छे अफ़सर रहे होंगे, लेकिन उनके पास ऐसी सूक्ष्म नज़र नहीं जो नरसिम्हा राव, गुजराल या प्रणब मुखर्जी जैसे विदेश मंत्रियों पास थी॥


तब सवाल यही है कि क्या बांग्लादेश की घटना से सत्ता को सबक नहीं लेना चाहिए?


रविवार, 4 अगस्त 2024

सोशल मीडिया का किंग कौन... ?

 सोशल मीडिया का किंग कौन... ? 


भारतीय जनता पार्टी या निजी सर्वे कंपनी भले ही देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दुनिया का सबसे नम्बर वन नेता बता रही हो लेकिन सोशल मीडिया के यू-ट्यूब प्लेट फ़ार्म ने जुलाई के अंतिम पखवाड़े का जो आंकड़ा पेश किया है उसमें सोशल मीडिया का किंग कौन है यह साबित हो गया है।

आंकड़े पर गौर करे तो स्पष्ट है कि देश के लोग किसे सुनना पसंद कर रहे है और कौन किस पर भारी पड़ रहा है।

टॉप 10 का जो आँकड़ा यू-ट्यूब ने जारी किया है वह देश के मिजाज को समझने के लिए काफी है कि देश किस दिशा में जा रहा है।

यू ट्यूब का यह आंकड़ा 13 जुलाई से 31 जुलाई के बीच देखे जाने वाले दर्शकों का है।


इसमें भारतीय जनता पार्टी का यू ट्यूब चैनल  0.3 मिलियन दर्शकों के साथ दसवे नम्बर पर है। जबकि 9वे नम्बर पर अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी के नेता को 0.4 मिलियन लोगों  ने देखा या सुना। आम आदमी पार्टी पंजाब ने अपने ही पार्टी के दिल्ली को पछाड़‌ते हुए 7वे नम्बर पर है तो देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 6वे नंबर पर है।

पहले के चार स्थानों पर कांग्रेस पार्टी की धूम मची है दूसरे नम्बर पर 11.8 मिलियन लोगों के साथ यूथ कांग्रेस जमा हुआ है तो राहुल गांधी 12.7 मिलियन लोगों के साथ टॉप पर है। अब आप समय ही गये होगे कि सोशल मीडिया का किंग कौन है।