गुरुवार, 24 जुलाई 2025

फ़र्ज़ी वोटर के सहारे देश लूटने की चाल और हिटलर

 फ़र्ज़ी वोटर के सहारे देश लूटने की चाल और हिटलर… 


पिछले दिनों हेमंत मालवीय और अजीत अंजुम के साथ जो कुछ हुआ  वह साधारण घटना नहीं थी, लेकिन ये घटना हिटलर के शासन की याद को फिर से ताज़ा इसलिए कर दिया क्योंकि तब भी लोग राष्ट्रवाद की पट्टी बांधे उस अत्याचार पर ख़ामोश थे जिस तरह से आज धर्म की पट्टी बांध कर अत्याचार से मुँह मोड़े हुए है, अब तो हद हो गई कि जनता सरकार चुनने कि बजाय सरकार वोटर चुनने लगी है…

हिटलर के कुछ सच पर प्रकाश डाले उससे पहले बता दूँ कि भारत इस वक़्त बहुत बड़ी साज़िश में फंस चुका है। दो उद्योगपति और दो गुजराती नेता, इन चार लोगों ने मिलकर पूरे देश पर शिकंजा कस रखा है। हालांकि मैं यह मानता हूं कि राजनीति पब्लिक के सामने समस्या बताने से ज़्यादा, समस्या का निराकरण करना होती है।

आज राहुल जी या कांग्रेस, कितने भी बड़े कांड का खुलासा कर दें, इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। आज जरूरत है कि बीजेपी की कारस्तानियों को पकड़ने के बाद उन्हें पब्लिक करने की जगह उनसे फाइट की जाए। गोपनीयता बनाई राखी जाए, हर मोर्चे पर भाजपा को पटखनी दी जाए। भारतीय जनता सोल्यूशन और रिजल्ट ओरिएंटेड हो चुकी है।

एक वक्त था जब जनता वोट देकर सरकार चुनती थी, अब हालात ये हैं कि आज सरकार वोटर चुन रही है। राहुल गांधी जी ने संसद के बाहर कल जिस बड़े खेल के विषय में पत्रकारों को बताया वो उनकी आई टी टीम द्वारा सालभर की गई मेहनत के बाद का निष्कर्ष है।

बीते वर्षों में ईवीएम मशीन पर खूब बवाल मचा था, भाजपा विरोधी लोग कांग्रेस पर आरोप लगा रहे थे कि ये खुलकर ईवीएम के खिलाफ नहीं बोल रहे, देश में बड़ा आंदोलन नहीं कर रहे। कल राहुल जी के बयान के बाद बेहद स्पष्ट हो गया है कि तब बड़े स्तर पर विरोध क्यों न हुआ।

क्योंकि राहुल जी की टीम के हाथ कुछ पुख्ता लग चुका था। कर्नाटक में वोटरलिस्ट को पूरी तरह से डिजिटल किया गया जिसमें 6 महीने लग गए और इसके उपरांत जब इसका डेटा एनालिसिस हुआ तब बीजेपी का सारा खेल सामने आ गया। नेक्स्ट लेवल फर्जी वोटिंग का गेम।

हो सकता है कि भाजपा के इस फर्जीवाड़े ईवीएम एक फैक्टर हो, लेकिन अब यह तय है कि यह एकमात्र फैक्टर नहीं। जिस ख़तरनाक खेल का ख़ुलासा हुआ हैं वो भारतीय सोच भी नहीं सकते। महाराष्ट्र, बिहार छोड़िए, कर्नाटक चुनाव में अभी 2 साल का वक़्त है और कर्नाटक में भी फ़र्ज़ी वोटर डाले जा रहे हैं। फ़र्ज़ी वोटर से सरकारें बना कर भारत को लूटा जा रहा है।

तब राहुल के खुलासे का असर इसलिए नहीं हो रहा है क्योंकि यह बिलकुल हिटलर की रणनीति की तरह है । अमिता नीरव ने एक बार लिखा था… 1942 में फेलिक्स की उम्र इक्कीस के आसपास रही होगी। उस वक्त तक हिटलर यूथ का हिस्सा होना हर जर्मन युवा के लिए अनिवार्य था तो फेलिक्स भी उसका हिस्सा था। हिटलर उसका हीरो था। वह मानता था कि जर्मनी को फिर से उसका पुराना गौरव सिर्फ हिटलर ही दिला सकता है और हिटलर भगवान की तरह हैं। वह जर्मनों के सारे संताप मिटा देगा। 


उस वक्त यहूदियों और विरोधियों के साथ जो कुछ हिटलर कर रहा था, कंस्न्ट्रेशन कैंप्स और उन कैंप्स में जो कुछ हो रहा था, उसकी कहानियाँ बहुत छन-छनकर, बहुत ही फिल्टर होकर आना शुरू तो हो गई थी। मगर ये समझ नहीं आ रहा था इसमें कितनी सच्चाई है और कितनी गहराई है, क्योंकि इन कहानियो के स्रोत अपुष्ट थे। 


फेलिक्स को इनमें से किसी भी बात पर यकीन नहीं था। तब भी नहीं जब हिटलर ने आत्महत्या कर ली। हिटलर की आत्महत्या और उसके बाद के दो-तीन महीनों तक फेलिक्स उदास रहा और उसे एलायड फोर्सेस को लेकर गहरा गुस्सा रहा। जब अलायड फोर्सेस ने जर्मनी औऱ आसपास के कंसंट्रेशन कैंप्स की सच्चाई बयान करना शुरू किया तो फेलिक्स को ये हिटलर के खिलाफ दुष्प्रचार लगा। 


बाद में अमेरिकी सेनाओ ने जर्मन नागरिको को जबरन म्यूनिख के पास 1933 में बनाए गए पहले कंसंट्रेशन कैंप डाखाऊ और वीमर शहर के आसपास बसाए गए और कई दूसरे नाज़ी कैंप्स ले जाया गया, ताकि जर्मन नागरिक यह देख सके कि वे इतने वक्त से जिस हिटलर को भगवान मान कर पूज रहे थे, उसने असल में क्या किया?


उन नागरिकों में फेलिक्स भी एक था। जब वह डाखाऊ पहुँचा औऱ वहाँ के हालात देखे तो वह बुरी तरह से डिस्टर्ब हो गया। कई साल उसकी थैरेपी चली औऱ अंत में उसने आत्महत्या कर ली। 

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यूँ हर तरह की सत्ताएँ अपने विरोधियों को कुचलती रही हैं। इससे कोई पार्टी, कोई विचारधारा नहीं बची है। मगर पिछले कुछ सालों से हमारे यहाँ ये प्रवृत्ति इतनी तेजी से बढ़ रही है कि यदि कोई आलोचना न करे, लेकिन विपक्षी की तारीफ भी कर दे तो उसके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है।


मामला सिर्फ राजनीतिक होता तब भी दिक्कत तो थी, मगर दिक्कत तब और बढ़ जाती है, जब वे दमन की प्रवृत्ति धार्मिक और सांस्कृतिक मामलों पर भी होने लगे। सोशल मीडिया ट्रोलिंग, धमकियाँ, बहिष्कार आदि-आदि से अब हम बहुत आगे आ गए हैं। 


पिछले दिनों हेमंत मालवीय और अजित अंजुमजी के खिलाफ जो कुछ हुआ, वह ताजा उदाहरण हैं। इससे पहले से भी यह होता ही आ रहा है। हर आलोचनात्मक आवाज, हर असहमति, हर प्रश्न को जैसे सत्ता कुचलने को आतुर है। 


इतना विराट जनसमर्थन और इतने नंबर्स, एक प्रशिक्षित ट्रोल आर्मी, प्रोफेशनल आईटी सेल, जमीन पर सन्नद्ध मदर ऑर्गेनाइजेशन के प्रतिबद्ध कार्यकर्ता, चौबीस घंटे चलने वाले मीडिया चैनल्स, अखबार... स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटीज के शिक्षक, पत्रकार, फिल्मकार, साहित्यकार, कलाकार और बुद्धिजीवी, व्हाट्सएप ग्रुप्स, रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी औऱ गृहस्थ महिलाएँ... सब मिलकर भी सरकार की असुरक्षा दूर नहीं कर पा रही है। ये बात बहुत चौंकाती हैं।


पिछले कुछ वक्त से फासिज्म, हिटलर और उसके वक्त के जर्मनी को समझने की कोशिश कर रही हूँ। समझा कि टोटेलिटेरियन स्टेट असल में हर तरह के हथकंडों से अपनी सत्ता को बनाए रखने औऱ लगातार ताकत बढ़ाते चले जाने के लक्ष्य पर काम करती है। 

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हिटलर ने पहला कंसंट्रेशन कैंप 1933 में डाखाऊ में बनाया था और प्रारंभिक तौर पर उसमें विरोधियों और आलोचकों को ही रखा गया था। असल में ताकत की भूख और असुरक्षा का बहुत गहरा संबंध होता है। जब सत्ता दावों की खोखली नींव पर खड़ी होती है, तब असुरक्षा गहरी होती है। 


जानकार कहते हैं कि हिटलर ने जर्मन नागरिकों को विरोधियों और यहूदियों के खिलाफ मोबलाइज करने की कोशिश की थी। मगर उसमें उसे सफलता नहीं मिली। जर्मनी में सत्ता संभालते ही गोएबल्स को प्रपोगंडा मंत्री बनाया गया। 


फिर सिलसिला शुरू हुआ कल्चरल डोमिनेंस का... राजनीति को नाटक का रूप दिया गया। जोशीले भाषण, समर्थन और दुष्प्रचार के लिए फिल्में जैसे 1935 में बनाई गई ट्रायम्फ ऑफ द विल, मीन कॉम्फ पर आधारित फिल्में और नाटक... कलाकारों औऱ बुद्धिजीवियों को हिटलर के समर्थन में लाने और काम करने के लिए दबाव औऱ प्रलोभन।


इसके लिए जर्मनी के प्रचार मंत्रालय ने नाजी शासन के लिए जरूरी माने जाने वाले कलाकारों औऱ बुद्धिजीवियों की सूची बनाई जिसे ‘गोटबेग्नाडेटेन-लिस्टे’ (ईश्वर के आशीर्वाद की सूची) कहा गया। रीच के प्रचार मंत्रालय से युद्ध से छूट के लिए जो आधिकारिक पत्र मिला, उसमें 1,041 कलाकारों और बुद्धिजीवियों के नाम थे। 


इसमें से ललित कला, साहित्य, संगीत, रंगमंच और वास्तुकाला के क्षेत्र की 378 हस्तियाँ गोटबेग्नाडेटन लिस्टे में शामिल थी। मतलब तमाम उपायों से नाजी नीतियों औऱ हिटलर के समर्थन में दुष्प्रचार किया गया। उसका असर हुआ और इस असर का उदाहरण था, फैलिक्स... सिर्फ अकेला फैलिक्स नहीं, कई लोग उस दुष्प्रचार का शिकार हुए। 


ये बात नागरिकों के लिए है, वे तमाम बुद्धिजीवी, पढ़े-लिखे प्रोफेशनल्स के लिए नहीं जो प्रत्यक्ष रूप से हिटलर की नीतियों के लिए काम करते रहे थे। उनके गुनाह तो क्षम्य ही नहीं थे। कुल मिलाकर एक ‘नाजी ईश्वर’ ने देश और दुनिया में तबाही मचा दी। ये कैसे हो पाया? 


उस दुष्प्रचार से जो कई सालों तक अलग-अलग माध्यमों से चलता रहा। 

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राजनीति को थियेटर का रूप देना असल में हर उस सत्ता के लिए जरूरी होता है, जिसने ताकत  तो लोकतांत्रिक तरीके से पाई हो, मगर उसे बनाए रखने के लिए तमाम अलोकतांत्रिक, असंवैधानिक तरीके इस्तेमाल करने पड़ रहे हैं। 


पिछले कुछ सालों के हमारे सांस्कृतिक परिदृश्य पर नजर डालें, हमारी फिल्में, गाने, साहित्य, बुद्धइजीवी, कलाकार, लेखक, पत्रकार... और हिटलर के जर्मनी को जानें। चकित होना बहुत मामूली शब्द लगेगा।(साभार)

बुधवार, 23 जुलाई 2025

हरेली-टोनही ज़मीन से अढ़ाई फिट ऊपर…

 हरेली-टोनही ज़मीन से अढ़ाई फिट ऊपर… 


छत्तीसगढ़ का पहला त्यौहार हरेली है और इसे सावन मास के अमावस्या को मनाया जाता है। इस दिन किसान अपने खेती किसानी में प्रयुक्त होने वाले औजारो की पूजा करते हैं तो घर घर न केवल पकवान बनते हैं बल्कि घर में आने वाली तमाम तरह की बाधाओं को दूर करने के उपाय किए जाते हैं, तब वह क़िस्सा जो बचपन की स्मृति लिये ज़ेहन में समाया हुआ है उसे आज आपके साथ शेयर कर रहा हूँ…

बात तीस पैतीस साल पुरानी है, कहा जाता है कि यह अमावस्या जादू टोने के लिये सबसे उपयुक्त दिन है, इस दिन तमाम तरह की शक्तियों को जागृत भी किया जाता है इसलिए आज के दिन टोनही झुपने ज़रूर निकलती है।

इस कहा सुना के फेर में हम कुछ दोस्त नदी किनारे रात में पहुँच गये , मान्यता है कि टोनही रात में निकलती है और वह न केवल ज़मीन से अढ़ाई फिट ऊपर चलती है बल्कि उसके मुँह से आग भी निकलते रहता है।

इस पहचान के आधार पर हम कुछ दोस्तों के साथ नदी किनारे जा कर चक्कर लगाने लगे।

उस रात हमे कुछ नहीं दिखा, यह सिलसिला कई सालों तक चला…

फिर …

अब भी इस मान्यता पर क्या कहें…

हरेली तिहार के दिन पूजा करने से पर्यावरण शुद्ध और सुरक्षित रहता है और फसल उगती है तो किसी भी प्रकार की बीमारी नहीं लगती है. हरेली तिहार मनाने से फसल को हानिकारक किट तथा अनेको बीमारिया नही होती है इसलिए हरेली तिहार मनाया जाता है. हरेली त्यौहार के दौरान छत्तीसगढ़ के लोग अपने-अपने खेतों में भेलवा पेड़ की शाखाएँ लगाते हैं. वे  अपने घरों के प्रवेश द्वार पर  नीम के पेड़ की शाखाएँ भी लगाते हैं. नीम में औषधीय गुण होते हैं जो बीमारियों के साथ-साथ कीड़ों को भी रोकते हैं.  लोहार हर घर के मुख्य द्वार पर नीम की पत्ती लगाकर और चौखट में कील ठोंककर आशीष देते हैं. मान्यता है कि ऐसा करने से उस घर में रहने वालों की अनिष्ट से रक्षा होती है. हरेली पर्व में, गांव और शहरों में नारियल फेंक प्रतियोगिता आयोजित की जाती है. सुबह पूजा-अर्चना के बाद, गांव के चौक-चौराहों पर युवाओं की टोली एकत्रित होती है और नारियल फेंक प्रतियोगिता खेली जाती है. इस प्रतियोगिता में, लोग नारियल को फेंककर दूरी का मापन करते हैं. नारियल हारने और जीतने का सिलसिला रात के देर तक चलता है,  हरेली त्यौहार के दिन गाय बैल भैंस को भी साफ सुथरा कर नहलाते हैं. अपनी खेती में काम आने वाले औजारों को हल (नांगर), कुदाली, फावड़ा, गैंती को धोकर और घर के बीच आंगन में रख दिया जाता है या आंगन के किसी कोने में मुरूम बिछाकर पूजा के लिए सजाते हैं और उसकी पूजा की जाती है साथ ही अपने कुलदेवता की भी पूजा की जाती है .  

माताएं गुड़ का चीला बनाती हैं और कृषि औजारों को धूप-दीप से पूजा के बाद नारियल, गुड़ के चीला का भोग लगाया जाता है. अपने-अपने घरों में अराध्य देवी-देवताओं के साथ पूजा करते हैं. हरेली के बच्चे गेंड़ी का आनंद लेते हैं. इस अवसर पर सभी के घरों में विशेष प्रकार के पकवान बनाये जाते हैं. चावल के आटे से बनी चीला रोटी को इस दिन लोग खूब चाव से खाते हैं. कोई इसे नमकीन बनाता है, तो कोई इसे मीठा भी बनाते हैं. यह खाने वालों की पसंद के ऊपर होता है. इस तरह से यह त्यौहार परम्पराओं से भरी हुई है. हरेली तिहार के दिन सभी लोग अपने–अपने दरवाजा पर नीम टहनी तोड़ कर टांग देते है और इसी बहुत गेंड़ी खेल का आयोजन शुरु हो जाता है. हरेली तिहार के दिन सुबह से ही बच्चे से लेकर युवा तक 20 या 25 फिट तक गेंडी बनाया जाता है. उसी दिन सभी युवा एवं बच्चे गेंडी चढ़ते है गावं में घूमते है. बच्चों और युवाओं के बीच गेंड़ी दौड़ प्रतियोगिता भी की जाती है.

मंगलवार, 22 जुलाई 2025

बिसाहू दास महंत, जिन्होंने बांगो बांध का सपना देखा…

 बिसाहू दास महंत -जिन्होंने बाँगों बांध का सपना देखा…


छत्तीसगढ़ छत्तीसगढ़ी और छत्तीसगढ़ियों की उपेक्षा, अपमान की दास्तान तो उस गांधीवादी राजनेता के साथ भी जुड़ी है जिन्होंने जीवंतपर्यन्त अपने को छत्तीसगढ़ के लिये समर्पित कर दिया, कभी चुनाव नहीं हारे और आज़ादी के बाद से 1978 तक विधानसभा मेंछत्तीसगढ़ का नेतृत्व किया। किसानों की पीड़ा को अपनी पीड़ा बनाकर बांगो बांध का न केवल सपना देखा उसे पूरा भी किया कहा जायतो ग़लत नहीं होगा,

राजनीति के गुटबाज़ी ने उन्हें हाशिये पर धकेलने की तमाम कोशिश की लेकिन वे न तो झुके न ही डरे, बल्कि डटे रहे, लड़ते रहे ।

ये थे स्व बिसाहू दास महंत…

तब यहाँ शुक्ल बंधुओं की तूती बोलती थी, उनके समर्थन के बिना राजनीति कितना कठिन था बताने की ज़रूरत नहीं है, और यह सबउनके पुत्र चरण दास महंत को भी आगे जाकर झेलना पड़ा था, चरणदास महंत और उनकी पत्नी ज्योत्सना आज छत्तीसगढ़ में कांग्रेस कीराजनीति के चमकदार चेहरे हैं लेकिन आज बात स्व बिसाहू दास की..

बिसाहू दास ही वे नेता थे जिनके दम पर अर्जुन सिंह आगे बढ़े और शायद यही वजह है कि अर्जुन सिंह ने इस परिवार के लिए आगे आकर काम किया, चरण दास की नौकरी, शादी से लेकर एमएलए की टिकिट…


बिसाहू दास महंत (1 अप्रैल 1924 - 23 जुलाई 1978) मध्य प्रदेश के एक सफल  राजनीतिज्ञ थे. वह राज्य में कांग्रेस द्वारा निर्मित अबतक के सबसे सफल विधायकों में से एक थे. उन्होंने निर्वाचन क्षेत्रों के लिए क्रमशः एक, दो और तीन कार्यकालों के लिए बारादुवार काप्रतिनिधित्व किया, जिसे अब नया बाराद्वार, नवागढ़ और चांपा के नाम से जाना जाता है. उन्होंने 1952 में बाराडुवर से 1957 और1962 में नवागढ़ और वर्ष 1967, 1972 और 1977 में चांपा से विधानसभा चुनाव लड़ा और जीता. 1952 में जीतना शुरू करने के बादसे वह कभी चुनाव नहीं हारे, वे लगातार छह बार चुने गए. जब तक उनकी मृत्यु नहीं हुई, वे बहुत लंबे समय तक बिस्तर पर पड़े रहे. अंतमें कार्डियक अरेस्ट के कारण उनकी मृत्यु हो गई.

किसान थे दिल के करीब :1942 और 1947 के बीच स्व. महंत ने अपने कॉलेज जीवन में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी. इसवजह से सरकार ने उनके खिलाफ कार्रवाई की और उनकी छात्रवृत्ति को भी खारिज कर दिया था. आगे चलकर वह राजनीति में ऊंचे पदोंपर रहे. अविभाजित मध्यप्रदेश में मंत्री जैसे पदों पर काम करते हुए उन्होंने किसानों की पीड़ा को समझा और उनके लिए सिंचाई काप्रबंध करने की ठानी. कोरबा जिले में निर्मित प्रदेश के सबसे ऊंचे मिनीमाता बांगो बांध के शिलान्यास का श्रेय उन्हें दिया जाता है. जिससे आज लाखों हेक्टेयर खेतों की प्यास बुझती है. किसानों अपने खेत की सिंचाई कर पाते हैं.

पुत्र और बहू आगे बढ़ा रहे विरासत :स्वर्गीय बिसाहू दास महंत के दो पुत्रों में डॉ चरणदास महंत भी राजनीति में उतने ही सफल हैं. जितनेकभी बिसाहू दास महंत थे. डॉ चरणदास महंत भी अविभाजित मध्यप्रदेश में मंत्री जैसे पदों पर रहे. केंद्र में भी सांसद रहे, वर्तमान में वहछत्तीसगढ़ के विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं. जबकि चरणदास महंत की पत्नी ज्योत्सना महंत कोरबा लोकसभा सीट से सांसद हैं.

सोमवार, 21 जुलाई 2025

बड़े बेआबरू होकर…

बड़े बेआबरू होकर…


उपराष्ट्रपति जगदीप धनगढ़ ने इस्तीफ़ा दे दिया। मानसून सत्र के पहले दिन आये उनके इस्तीफ़े की असली वजह जो भी हो लेकिन इतिहास उन्हें एक बेहद चाटुकार और आलोकतांत्रिक व्यक्ति के रूप में कभी नहीं भूलेगा ! क्या है पूरा मामला उन्हें कौन सी बीमारी थी…

जगदीप धनगड़ का विवादों से नाता रहा है , पहली बार वे विवादों में तब आये जब जनवरी 2023 में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की 'मूल संरचना सिद्धांत' के पुनरावृत्ति के संदर्भ में बयान दिया था जिसे लेकर विवाद खड़ा हो गया था. उन्होंने कहा...  'संसद के बनाए काननों को अगर अदालत रोक देती है तो यह लोकतंत्र के लिए खतरा होगा'. इस पर कांग्रेस ने तीखा प्रहार किया तो ममता बेनर्जी ने वहीं टीएमसी की ओर से कहा गया, यह व्यक्ति बीजेपी का एजेंडे को चला रहा है. 


छात्र राजनीति पर टिप्पणी करते हुए यहाँ तक कह दिया था कि कुछ विश्वविद्यालय देश विरोधी विचार धराओ की शरणस्थली बन गये है 

उन पर दिसंबर 2023 में उपराष्ट्रपति धनखड़ पर अधिवेशन में विपक्षी सांसदों को रोकने का आरोप लगा था. विपक्षी दलों के नेताओं ने आरोप लगाया कि संसद के शीत सत्र मे. रोका गया। कांग्रेस प्रेसिडेंट खड़के ने तो यह भी कह दिया कि धनगड़ का बर्ताव बीजेपी प्रवक्ताओं जैसा हो गया है 

 किस बीमारी से जूझ रहे थे धनखड़?

इस साल 9 मार्च 2025 की रात को जगदीप धनखड़को अचानक सीने में दर्द और बेचैनी की शिकायत के बाद एम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया था. उन्हें वहां CCU (क्रिटिकल केयर यूनिट) में निगरानी में रखा गया और वरिष्ठ कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. राजीव नारंग की देखरेख में इलाज हुआ. डॉक्टरों के अनुसार उन्हें दिल से जुड़ी परेशानी थी जिसे तत्काल नियंत्रित कर लिया गया था. करीब तीन दिनों तक अस्पताल में रहने के बाद 12 मार्च को उन्हें छुट्टी दे दी गई थी, लेकिन कार्डियक मॉनिटरिंग जारी रखी गई.

डॉक्टरों की रिपोर्ट में बताया गया था कि उपराष्ट्रपति को हाई ब्लड प्रेशर, थकावट और कार्डियक स्ट्रेस जैसी समस्याएं हैं. उम्र के लिहाज से उन्हें गंभीर श्रेणी का मरीज माना गया और मेडिकल टीम ने उन्हें लंबे समय तक विश्राम और कार्यभार में कटौती की सिफारिश की थी. अंततः उन्हें इस्तीफा देना पड़ा.

रविवार, 20 जुलाई 2025

काशी को क्योटा बनाने के बाद अब पटना को पुणे और मोतिहारी को मुंबई…

 काशी को क्योटा बनाने के बाद अब पटना को पुणे और मोतिहारी को मुंबई…


ग़ज़ब दौर है, लोग सच न देखना चाहते हैं और न ही सुनना, सत्ता में बैठे लोग कुछ भी बोलने लगे हैं और लोग ताली बजा रहे हैं । धर्म का नैरेटिव्ह सेट है इसलिए हर चुनाव के पहले इस पर नमक मिर्च का तड़का डाल दिया जाता है और फिर ताली बचाने लगते हैं, कंगना रानौत की हिमाक़त किसी मूर्खता से कम नहीं तो पटना को पुणे बनाने की घोषणा को बेशर्मी नहीं कहा जाना चाहिए…

प्रसिद्ध व्यंगकार हरिशंकर परसाई ने कहा था 

बुद्धिजीवी इस समय संशय से भरे हैं और मूर्ख भरपूर आत्मविश्वास से.

हालांकि इन पर बात करना भी नहीं करने के बराबर ही है. लेकिन जरा सोचिए अगर यह सारी धरती इन्हीं लोल लोगों से भर गई तब बातचीत के विषय कैसे होंगे? कोई भी आकर कह देगा देश को आजादी चिड़िया के अंडे से मिली है. या यह देश डेढ़ सौ सालो की लीज पर है.

कोई यह भी कह सकता है कि नेहरू और गांधी एक भूत है.

हवाई जहाज की खोज हमारे पतंग उड़ाने से हुई है. 

कोई पासपोर्ट की रैंकिंग गिरने को उपलब्धि बता सकता है

और इसलिए कंगना कह रही है कि सरदार पटेल को अंग्रेज़ी नहीं आती इसलिए वे प्रधानमंत्री नहीं बन पाये और अमित शाह का तो दवा है कि अंग्रेज़ी बोलने वालों को एक दिन शर्म आएगी..

ऐसे में समझो कि कुछ तो झोल है 

क्योंकि सरदार पटेल ने लंदन में बाक़ायदा बेरिस्टरी की है

अब थोड़ी बात नॉनबायोलॉजिकल के लिए हो जाये यानी इस झोल पर…

मोदी जानते हैं कि कहाँ क्या बोलना है क्योंकि यह देश दो धड़ों में बंट चुका है जिनमें मिडिल क्लास वर्ग का अस्तित्व ही समाप्त कर दिया जा रहा। हालात यह है कि ऊंचे दाम और ऊंचे पकवान के क्राइटेरिया में या तो आप खुद को शामिल कीजिए, या फिर अति गरीबी की श्रेणी में जाकर अपना गुजर बसर कीजिए। जाकर 5 किलो राशन की लाइन में लग जाइए तभी आपका घर चल पाएगा।

जनता इतनी मासूम है कि वो साफ साफ ये देख ही नहीं पा रही कि चुनाव आते ही ये मुगलकालीन इतिहास की कब्रें सिर्फ हिन्दू मुसलमान करने के लिए खोदी जा रही है। बहस के ऐसे ऐसे चिन्हित मुद्दों को उकेरा जा रहा है जिनमें हिन्दू मुसलमान की बहस हो। अब करणी सेना के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का स्टेटमेंट ही देख लीजिए सांसद इकरा हसन के लिए। सत्ता जानती है कि इस मुद्दे पर बहस होनी ही है। सत्ता उकसाती है और जनता उछल उछल कर प्रतिक्रिया देने उतर आती है।

असल मुद्दे जनता के बीच से गायब है। रोजगार का इनके पास कोई मॉडल नहीं है। देश को हलक तक कर्ज में डुबाए बैठे है जिसकी भरपाई जनता की जेबों से की जा रही है। आपके अकाउंट से कभी मेंटेनेंस के नाम पर तो कभी एटीएम चार्ज के नाम पर तो कभी यूपीआई चार्ज के नाम पर बिना बताए पैसे काट ले रहे है। आप ट्रेन की टिकट कटाए तो बिना थर्ड पार्टी ऐप के (जिनका चार्ज लगभग 250 से 300 रुपए ज्यादा लगता है) आप आसानी से कर ही नहीं पा रहे। चिड़ियाघर और म्यूजियम जैसे पर्यटन स्थलों पर 25 रुपए की टिकट अब दो गुनी तीन गुनी होकर बिक रही है। एयरपोर्ट में और तीर्थ स्थलों पर ठेके वाली कैंटीनों में डंके की चोट पर 25 का माल 50 में बेचा जा रहा है। 

तब जब थोड़े लोग सत्ता से न डिग सके इसलिए कुछ विकास का दावा कर दो।

लोगो ने काशी को क्योटा बनते तो देख ही लिया है अब पटना को पुणे और मोतिहारी को मुंबई बनते भी देख ही लेंगे…

शनिवार, 19 जुलाई 2025

तब जनसंघ ही नहीं कांग्रेस के भीतर का विरोध भी नहीं डिगा पाई इंदिरा को

 तब जनसंघ ही नहीं कांग्रेस के भीतर का विरोध भी नहीं डिगा पाई इंदिरा को…


अब जब अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत के पाँच विमान गिरने का दावा कर दिया है तब भी प्रधानमंत्री की चुप्पी देश को अपमानित कराने के अलावा क्या है लेकिन आज हम बात कर रहे है उस लौह महिला की जिन्होंने 19 जुलाई 1969 को वह कर दिया जो आज देश के माध्यम और ग़रीब वर्ग का जीवन है…

56 साल पहले 19 जुलाई 1969 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने का ऐतिहासिक फैसला लिया था। इस कदम ने लाखों आम लोगों और ग्रामीणों को बैंकिंग सेवाओं के दायरे में लाया और बैंकिंग संस्थानों को निजी मुनाफे से परे देश के विकास लक्ष्यों के साथ जोड़ा।  

आज, स्वतंत्रता के बाद के भारत को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण सरकारी कदमों में बैंक राष्ट्रीयकरण का एक प्रमुख स्थान है। इसने भारतीय अर्थव्यवस्था को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, और इसके प्रभावों पर आज भी विभिन्न दृष्टिकोणों से चर्चा जारी है।  

1969 से पहले, बड़े निजी बैंक मुख्य रूप से अपने मालिकों और अन्य धनी व्यक्तियों के व्यावसायिक हितों के लिए ही ऋण देते थे। कृषि क्षेत्र को केवल 2% बैंक ऋण मिलता था। लेकिन हरित क्रांति के माध्यम से बड़े कृषि परिवर्तन का लक्ष्य रखने वाले देश के लिए, कृषि क्षेत्र को बैंकिंग समर्थन को कई गुना बढ़ाने की जरूरत थी। यही वह प्रेरणा थी जिसने निजी स्वामित्व से बैंकों को सार्वजनिक क्षेत्र में लाने का फैसला लिया। 1990 के दशक तक, कृषि क्षेत्र के लिए ऋण 15% तक बढ़ गया, जो राष्ट्रीयकरण का एक सकारात्मक परिणाम था।  

राष्ट्रीयकरण से पहले ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सेवाएँ बहुत सीमित थीं। उस समय देश में केवल 7,219 बैंक शाखाएँ थीं, जिनमें से अधिकांश बड़े शहरों और मध्यम आकार के कस्बों में थीं। लेकिन राष्ट्रीयकरण के बाद, बैंकिंग गतिविधियाँ उत्साह के साथ ग्रामीण क्षेत्रों तक फैलीं। अगले चौथाई सदी में बैंक शाखाओं की संख्या आठ गुना बढ़ गई।  

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लिए यह फैसला लेना आसान नहीं था। विरोधी पक्ष में केवल धनी उद्योगपति ही नहीं थे, बल्कि संगठन परिवार की तत्कालीन राजनीतिक पार्टी जनसंघ और राजगोपालाचारी की स्वतंत्र पार्टी भी थीं, जिन्होंने संसद में बैंक राष्ट्रीयकरण बिल का विरोध किया। कांग्रेस के भीतर भी मोरारजी देसाई जैसे कुछ लोग शुरू में इसके खिलाफ थे। इंदिरा गांधी ने वित्त मंत्री मोरारजी देसाई को हटाकर ही यह फैसला लागू किया। बाद में हुए राष्ट्रपति चुनाव और कांग्रेस के विभाजन में भी बैंक राष्ट्रीयकरण एक महत्वपूर्ण कारक बन गया।  

हालांकि, बैंक प्रशासन में राजनीतिक नियंत्रण और बढ़ते गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) के कारण इसे कई बार आलोचना का सामना करना पड़ा, फिर भी 1969 का बैंक राष्ट्रीयकरण भारत के इतिहास में एक निर्णायक आर्थिक कदम के रूप में आज भी चर्चा में रहता है, जो इसकी प्रासंगिकता और महत्व को रेखांकित करता है।(साभार)